शिमला/शैल। प्रदेश के सरकारी कॉलिजों में भी मुकेश अबांनी की कंपनी जियो ने अपने 4-जी सिम के ग्राहको की तर्ज पर अपनी फ्री सेवायें देना आरम्भ कर दिया है। इन सेवाओं के प्रयोग के लिये छात्रां की स्मार्ट क्लासज़ तक लगायी जा रही हैं। 4-जी सेवाओें के इस्तेमाल के लिये कॉलिज प्रबन्धन इन्हे आधारभूत ढांचा उपलब्ध करवा रहा है। इन सेवाओं के लिये अभी जियो स्मार्ट क्लासज़ के माध्यम से इन सेवाओं के उपयोग के प्रतिछात्र अच्छे ट्रेंड हो जायेंगे और इससे कम्प्यूटर के प्रयोग करने में भी सहायता मिलेगी। जियो ने अब ग्राहकों को मुफ्त सेवाएं देने की समय सीमा 31 मार्च 2017 तक बढ़ा दी है। इस समय सीमा तक इन कॉलिजो में छात्र और अध्यापक पूरी तरह इनके अभयस्त हो जायेंगे और यह उनकी आवश्यकता बन जायेगी। जब 31 मार्च को मुफ्त सेवा अवधि समाप्त हो जायेगी उसके बाद कॉलिजो को इसका उपभोक्ता शुल्क स्वंय उठाना पडे़गा। छात्रों के लिये स्मार्ट क्लासों का प्रबन्ध भी अपने स्तर पर ही करना होगा। 
रिलायंस जियो की एंट्री एक सुनियोजित तरीके से कैसे हो गयी और आने वाले समय में प्रबन्धन पर इसका क्या प्रभाव पडेगा इसको लेकर शिक्षा विभाग के पास क्या प्रारूप है इसकी कोई जानकारी विभाग के पास उपलब्ध नही है। सूत्रों के मुताबिक सचिव स्तर पर इसकी कोई जानकारी ही नही है। सचिवालय सूत्रों के मुताबिक विभाग में निदेशक स्तर पर ही जियो को एन ओ सी जारी कर दिया गया है। लेकिन जब शैल ने निदेशक उच्च शिक्षा कार्यालय से इस बारे में बात की तो उन्होने भी इस बारे मे अनिभज्ञता जाहिर की और अतिरिक्त निदेशक से संपर्क करने को कहा। अतिरिक्त निदेशक ने भी इस सबंध में उनके पास जानकारी होने से इन्कार किया। रिलायंस के सूत्रों के मुताबिक उन्होने यह शुरू करने से पहले शिक्षा निदेशक से एन ओ सी हासिल किया है। बल्कि अब जियो की तर्ज पर अब कई और कंपनीयां भी प्रदेश सरकार के विभिन्न अदारों में इस तरह की एंट्री के लिये आगे आ रही हैं। इन कपंनीयों के साथ बैठकें भी चल रही हैं। इसमें क्या फैसला होता है यह तो आगे ही पता चलेगा। लेकिन रिलायंस जियो की एंट्री प्रदेश के पूरे कॉलिज सैक्टर में कैसे हो गयी इसकी पूरी जानकारी किसी के पास भी नहीं है। इसके बारे में मुख्यमंत्री कार्यालय को कितनी जानकारी है? क्योंकि शिक्षा विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के पास है इस पर भी विभाग में कोई कुछ कहने को तैयार नहीं है। बहरहाल रिलायंस जियो को प्रदेश के कॉलिज एक सुनिश्चित बाजार के रूप में उपलब्ध हो गये हैं।
शिमला/शैल। पिछले कुछ अरसे से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खु प्रदेश संगठन का खजाना खाली होने की चिन्ता व्यक्त करते आ रहे हैं। संगठन का काम चलाने के लिये वह पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ताओं से एक निश्चित धन राशि वर्ष में एक बार लेने की योजना बना रहे हैं। पार्टी की प्रदेश में सदस्य संख्या 13 लाख बताई गयी है और यदि एक व्यक्ति से वर्ष में 200 रूपये भी लिये जाते हैं तो पार्टी के पास एक साल में ही 26 करोड़ इक्टठे हो जायेंगे। यदि इस येाजना पर सही में ही काम किया जाता है तो इससे संगठन न केवल मजबूत होगा बल्कि पार्टी की सरकार पर भी हावि हो जायेगा। हर कार्यकर्ता पार्टी के लिये पूरी सक्रियता से काम करेगा। इस योजना से यह धारणा भी समाप्त हो जायेगी कि कांग्रेस का संगठन तभी नजर आता है जब उसकी सरकार होती है। संगठन में पैसे की कमी की चर्चा खुलकर बाहर आ चुकी है। लेकिन इस चर्चा पर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह से लेकर नीचे तक किसी ने कोई प्रतिक्रिया नही दी है। 
अभी जब सोनिया गांधी अपनी बेटी के मकान के सिलसिले में शिमला आयी थी तब जिला शिमला कांग्रेस के अध्यक्ष केहर सिंह खाची ने उनसे लम्बी बात-चीत की है। इस बातचीत का राजनीतिक फीड बैक लिया जाना चर्चित किया गया है। इसमें एक महत्वपूर्ण संयोग यह भी घटा है कि इस बार सेानिया के निजी सविच जैन भी मालरोड़ पर पार्टी के कई ऐसे कार्यकर्ताओं से बातचीत करते रहे जो वीरभद्र विरोधी खेमे से ताल्लुक रखने वाले माने जाते हैं। प्रियंका के मकान को लेकर सोनिया दर्जनो बार शिमला आ चुकी हैं लेकिन इस तरह की राजनीतिक चर्चा पहली बार ही सामने आयी है और इसी दौरान संगठन का खजाना खाली होने के समाचार प्रमुखता से समाने आये। प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और चार साल से सत्ता में है। कांग्रेस में ऐसे पदाधिकारियों की भी कमी नही है जिनके पास 80/80 लाख की गाड़ियां है दर्जनों लोग करोड़ पति हैं लेकिन संगठन में पैसे की कमी की चर्चा पहली बार सार्वजनिक रूप से बाहर आयी है। इससे सरकार और संगठन के रिश्तों पर भी सवाल उठता है। क्योंकि जब वीरभद्र के कुछ समर्थकों ने उनके नाम से एक ब्रिगेड का गठन किया था तब उस कदम को एक समानान्तर संगठन खड़ा करने के प्रायस के रूप में देखा गया था और तुरन्त प्रभाव से उसे बन्द कर दिया गया था। लेकिन उसके थोड़े समय बाद ही वीरभद्र के उन्ही समर्थकों ने उस ब्रिगेड को एक एनजीओ के रूप में फिर खड़ा कर दिया। इस एनजीओ का वाकायदा पंजीकरण करवाया गया है। बल्कि इस एनजीओ के प्रधान बलदेव ठाकुर ने तो प्रदेश अध्यक्ष सुक्खु के खिलाफ कुल्लु की अदालत में एक मानहानि का मामला तक दायर कर रखा है। पार्टी के अन्दर घट रहें इन घटनाक्रमों से यह स्पष्ट हो जाता है कि पार्टी में सब कुछ ठीक नही चल रहा है।
दूसरी ओर जब से युवा कांग्रेस अध्यक्ष विक्रमादित्य द्वारा अगला विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा सार्वजनिक हुई है उससेे भी संगठन के भीतरी समीकरणों में बदलाव देखने को मिल रहा है। जिला शिमला में ही आईपीएच मन्त्री विद्या स्टोक्स ने अब अपने विरोधीयों से रिश्ते सुधारने की कवायद शुरू कर दी है। पिछले दिनों स्टोक्स के जुब्बल कोटखाई के दौरे को इसी आईने में देखा जा रहा है। आज भले ही विक्रमादित्य ने यह कहा है कि यदि संगठन उन्हे टिकट देगा तो वह चुनाव लडे़ेगे। लेकिन एक समय यही विक्रमादित्य टिकटों को लेकर हाईकमान के दखल का विरोध कर चुके हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि उनका चुनाव लड़ना हाईकमान के फैसले पर नहीं बल्कि उनके अपनेे फैसले पर टिका है। फिलहाल कुछ हल्कों में विक्रमादित्य के चुनाव लड़ने की इस पूर्व घोषणा को इस संद्धर्भ में भी देखा जा रहा है कि प्रदेश के किस चुनाव क्षेत्र से कार्यकर्ता उन्हें चुनाव लड़ने की आॅफर देते हैं। क्योंकि राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक विक्रमादित्य का चुनाव लड़ना कोई बड़ा मुद्दा नही है बल्कि बड़ा मुद्दा यह है कि वह अपने कितने समर्थकों को पार्टी का टिकट दिलाकर चुनाव लड़वा पाते हैं। माना जा रहा है कि वह अपने करीब एक दर्जन समर्थकों को चुनाव में उतारने का मन बना चुके हैं।
सरकार, विजिलैन्स और ईडी ने अभी तक नही उठाया कोई कदम
शिमला/शैल। वनभूमि पर किये नाजायज कब्जों का कड़ा संज्ञान लेते हुए प्रदेश उच्च न्यायालय ने 29.8.2016 को दिये अपने फैसले में राज्य सरकार को निर्देश दिये थे कि वनभूमि पर नाजायज कब्जा करके उस पर फलदार पौधे लगाने वालों की पहचान करके उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करके इन अवैध कब्जों को छुड़ाये। उच्च न्यायालय ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के निदेशक प्रर्वतन (ईडी) को भी निर्देश दिये थे कि वह ऐसे अवैध कब्जा धारकों के खिलाफ धन शोधन (मनी लाॅड़रिंग) के तहत तीन ताह के भीतर मामले दर्ज करके कारवाई करे। अदालत ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिये थे कि वह चार सप्ताह के भीतर ऐसे लोगों की पूरी जानकारी ईडी को उपलब्ध करवाये जिन्होने दस बीघे या इससे अधिक वनभूमि का अतिक्रमण कर रखा है। वनभूमि पर हुुए अतिक्रमणों को लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय के पास Cr. Appeal No. 224 of 2010 तथा CWPIL 17 of 2014 दो याचिकाएं थी जिन पर फैसला देते हुए अदालत ने यह निर्देश दिये है। स्मरणीय है कि इन मामलों की सुनवाई के दौरान भी इन अतिक्रमणों को हटाने और अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कड़ी कारवाई करने के अन्तरिम निर्देश देते रहें है लेकिन इस पर पूरी ईमानदारी से कारवाई नहीं हुई और अब अन्त में अदालत ने ईडी को भी इसमें कारवाई के निर्देश दिये है। 
उच्च न्यायालय के फैसले के मुताबिक राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर ऐसे लोगों की जानकारी ईडी कोे देनी थी। ईडी को तीन माह के भीतर ऐसे लोगों के खिलाफ मामले दर्ज करके अगली कारवाई शुरू करनी थी। उच्च न्यायालय का फैसला और निर्देश आये हुए तीन माह का समय निकल चुका है। लेकिन अभी तक इस दिशा में कहीं भी कोई कारवाई शुरू नहीं हुई है। राज्य सरकार के सचिवालय से इस संद्धर्भ में 3.9.2016 को पत्र संख्या FFE-B-E (3). 74/2016 को प्रधान अरण्यपाल को इस फैसले की कापी भेजकर इसमें अदालत के निर्देशानुसार तय समय के भीतर आवश्यक कारवाई करने के निर्देश जारी किये गये थे। इस फैसले के बाद ईडी ने भी आवश्यक जानकारी सरकार से मांगी है। सचिवालय ने 16.11.2016 को प्रधान अरण्यपाल को फिर पत्र भेजकर इस संद्धर्भ में निर्देशित कारवाई करने के लिये कहा है। शैल ने जब वन विभाग के संवद्ध अधिकारियों से इस बारे में बात की तो उन्होने राज्य सचिवालय से 3.9.2016 को कोई ऐसा पत्र आने से साफ इन्कार कर दिया। संवद्ध अधिकारी ने 16.11.2016 का पत्र मिलने को स्वीकारते हुए यह बताया कि इस पत्र के बाद फील्ड के संवद्ध अधिकारियों को इस संबध में आवश्यक कारवाई करने के निर्देश जारी कर दिये है। वन विभाग द्वारा की जा रही इस कारवाई से स्पष्ट हो जाता है कि विभाग इन अतिक्रमणों के खिलाफ कारवाई करने के लिये कितना गंभीर है। उच्च न्यायालय ने चार सप्ताह के भीतर जो कारवाई करने के निर्देश दिये थे उस संबंध में तीन माह बाद फील्ड अधिकारियों को आवश्यक कारवाई करने के लिये पत्र भेजा गया है।
वनभूमि पर अतिक्रमण करके प्रदेश के सारे सेब उत्पादक क्षेत्रों में करीब हर परिवार के खिलाफ थोड़े बहुत अतिक्रमण का आरोप है। दस बीघे या उससे अधिक वनभूमि पर अतिक्रमण के हजारों मामलों की सूची अदालत के पास मामले की सुनवाई के दौरान ही आ चुकी है। प्रदेश वनभूमि पर अतिक्रमण के सबसे अधिक मामले मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पुराने चुनाव क्षेत्र रोहडू से सामने आये है। स्मरणीय है कि प्रदेश सरकार ने सरकारी भूमि पर हुए अवैध कब्जों को नियमित करने के लिये वर्ष 2002 में एक नीति घोषित की थी। इस नीति के तहत लोगों से स्वेच्छा से अपने अवैध कब्जों की वाकायदा शपथ पत्र के साथ राज्य सरकार को जानकारी देने को कहा गया था। इस नीति के तहत एक लाख से अधिक लोगों ने सरकारी/वनभूमि पर अवैध कब्जा होना स्वीकारा है। लेकिन इस नीति पर अमल होने से पहलेे ही इसे प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी गयी। उच्च न्यायालय ने इस नीति पर प्रशासन को अपनी प्रक्रिया जारी करने के निर्देश देते हुए यह कहा था कि इसमें अवैध कब्जा धारक को भूमि पट्टा अदालत का अन्तिम फैसला आने तक न दिया जाये। यह मामला अभी भी उच्च न्यायालय में लंबित है। अब यह मामला प्रशासनिक से ज्यादा राजनीतिक बन गया है। क्योंकि लाखों लोग प्रदेश में सरकारी वनभूमि पर अवैध कब्जे के दोषी है। प्रदेश उच्च न्यायालय के ताजा फैसले से इन सब लोगों से अवैध कब्जे छुड़ाने होंगे। माना जा रहा है कि पूरे मामले की राजनीतिक गंभीरता को देखते हुए इस मामले को लम्बाने की नीति अपनाई जा रही है।
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