Saturday, 20 June 2026
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नोटबंदी प्रकरण पर क्या केजरीवाल गलत वक्त पर सही सवाल उठा रहे हैं

शिमला/शैल। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोट बंदी के फैसले को एक बड़ा घोटाला करार दे रहे हैं। उनका आरोप है कि भाजपा में कुछ को इस फैसले की पूर्व जानकारी थी और उन्होने फैसला घोषित होने तक अपने कालेधन को ठिकाने लगा दिया था। इस आरोप के लिये उनका तर्क है कि पूर्व जानकारी होने के कारण ही यह लोग बैंको के आगे लगी लाईनों में खडे होते नजर नही आ रहे हैं। इनका मानना है कि नोटबंदी के फैसले से कालेधन पर कोई फर्क नही पडे़गा क्योंकि कालाधन तो विदेशी बैंको में पडा है और जब तक इसे लाने के लिये कदम नही उठाये जायेंगे तब तक इस प्रयास के परिणाम बहुत बडे़ नहीं होंगे। नोटबंदी के फैसले को लागू करने के लिये जो प्रबन्ध किये जाने चाहिये थे वह नही किये गये हैं। यह आरोप भाजपा नेता राज्यसभा सांसद डा. स्वामी का भी है। इसके लिये उन्होने वित्त मन्त्रालय को दोषी ठहराया है। डा. स्वामी ने अरूण जेटली और उनके वित्त सचिव को इस दिशा में पर्याप्त प्रबन्ध न करने का दोषी करार दिया है। नोटबदी से आम आदमी को जिस तरह से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है उससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि सरकार से फैसले की व्यापकता का आकलन करने में अवश्य चूक हुई है जिसके कारण उचित प्रबन्ध नही हो पाये हैं।
लेकिन केजरीवाल का घोटाला करार देना एक गंभीर आरोप है और सरकार की ओर से भी इसमें कोई संतोषजनक उत्तर सामने नही आ पाया है। केजरीवाल के आरोपों में इस कारण से दम नजर आता है कि नोटबंदी के फैसले से पहले और कालेधन तथा बेनामी संपत्ति की घोषणा के लिये रखी गयी अन्तिम समय सीमा 30 सितम्बर के बाद विक्कीलीकस के नाम से सोशल मीडिया में स्विस बैकों में कालाधन रखने वाले भारतीय की दो सूचियां जारी हुई हैं। दोनो सूचियों में 24, 24 लोगों के नाम दर्ज हैं। एक सूची में पहला नाम संघ प्रमुख मोहन भगावत का है। तो दूसरी सूची में पहला नाम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का है। इन सूचीयों को लेकर न तो केन्द्र सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया आयी है और न ही संघ भाजपा और कांग्रेस की ओर से। जबकि इनमें इन्ही से ताल्लुक रखने वालों के नाम हैं। कालेधन पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों पर एसआईटी गठित है। वित्तमंत्री अरूण जेटली ने रजत शर्मा के आपकी अदालत कार्यक्रम में कालेधन पर पूछे गये सवाल में यह कहा था कि कालाधन रखने वालों के नामों की जानकारी दो -मैं उनके खिलाफ कारवाई करूंगा। इस परिदृश्य में विक्कीलीकस के हवाले से सोशल मीडिया में यह सूची जांच का विषय नही होनी चाहिये थी? विक्कीलीकस के नाम से चल रही इस खबर की प्रामाणिकता पर वायरल, सच की पड़ताल, करने वाले चैनल एबीपी न्यूज ने भी कोई पड़ताल नही की है। जबकि इस चैनल ने 2000 के नोट में प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी के सन्देश को अपनी पड़ताल में सही पाया है। दो हजार के नोट में प्रधान मन्त्री का देश के नाम संदेश क्यों दर्ज है। इसका भी कोई तर्क अभी तक सामने नही आया है।
इसी तरह एक और सवाल सोशल मीडिया में सामने आया है। इससे भी नोट बंदी के फैसले की कुछ लोगों को पूर्व जानकारी होने की ओर इशारा किया गया है। इसमें सवाल उठाया गया है कि नोटबंदी का फैसला आठ नवम्बर की रात को घोषित हुआ। प्रधानमन्त्री ने एक ब्यान में यह दावा किया है कि नये नोटों की छपाई का काम पिछले छः माह से चल रहा है। नोटों पर रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं। रिजर्व बैंक के नये गवर्नर पटेल ने तो सितम्बर में कार्यभार संभाला है और नये नोटों पर पटेल के हस्ताक्षर हैं। यदि वास्तव में ही यह नये नोट सितम्बर से पहले ही छपने शुरू हो गये थे तो इन पर नये गवर्नर ऊर्जित पटेल के हस्ताक्षर होने का अर्थ हो जाता है कि उन्हे पूर्व जानकारी थी और उनके हस्ताक्षर पहले ही ले लिये गये थे। उर्जित पटेल अंबानी परिवार के दामाद कहे जा रहे हैं। अंबानी परिवार की प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी से नजदीकीयां 2014 के लोकसभा चुनावों से ही चर्चा में है। बल्कि अंबानी के जीयो सिम लांच को भी नोटबंदी के साथ जोड़ा गया है। नोटबंदी के तहत पुराने नोट बदलने की अन्तिम तारीख 30 दिसम्बर है जबकि जीयो सिम के लांच के तहत मिल रही फ्री इन्टरनैट सुविधा 31 दिसम्बर को खत्म हो रही है। जीयो सिम के लिये करोड़ो आधार कार्ड रिलांयस के पास पहुंचे हुए हैं। इन आधार कार्डो का प्रयोग कालेधन को सफेद करने के लिये होने की आशंका जताई जा रही है।
ऐसे में नोटबंदी के साथ सोशल मीडिया में चर्चित हो रहे इन सवालों पर सरकार की ओर से कोई भी अधिकारिक खण्डन न आने से केजरीवाल के आरोपों को स्वतः ही एक आधार मिल जाता है। यदि यह उठ रही आशंकाएं वास्तव में ही सही हैं तो निश्चित रूप से इस पूरे प्रकरण की जांच होना आवश्यक है। संसद में भी एक संसदीय कमेटी की जांच की मांग सभंवतः इन्ही सवालों के आधार पर आयी है। सरकार का इस संयुक्त जांच के लिये तैयार न होना इन आशंकाओं को और बल देगा। देश का आम आदमी सिद्धान्त रूप में इस फैसले के साथ खड़ा है लेकिन उसे इन आशंकाओं की गहन जानकारी नही है। केजरीवाल ने अपने आरोपों को लेकर जनता में जाने की घोषणा की है। केजरीवाल के सवाल भले ही आज जनधारणा के विपरीत हैं परन्तु इन सवालों को नजर अन्दाज करना भी घातक होगा।

सीबीआई प्रकरण में फैसले के कगार पर पहुंचा वीरभद्र मामला

एक पखवाडे में ईडी की दो बार दस्तक
30 सितम्बर के बाद खुले बैंक खातों की जानकारी में जुटा आयकर
वीरभद्र के विरोधी फिर हुए सक्रिय चण्डीगढ में की बैठक

शिमला/शैल। वीरभद्र के खिलाफ चल रही सीबीआई जांच का मामला दिल्ली उच्च न्यायालय में अब फैसले के दौर में पहुंच गया है। पिछली पेशी में हिमाचल सरकार का पक्ष रख रहे प्रदेश के महाधिवक्ता को अपना पक्ष संक्षेप में लिखित में 2 दिसम्बर को अदालत के सामने रखने को कहा है। उसी दिन सीबीआई इस याचिका से जुडे़ सारे वादीयों के दावों का जबाव देगी। इस जबाव में सीबीआई को जितना भी समय लगेगा उसके बाद इस मामले का फैसला आना है। यदि वीरभद्र सिंह की याचिका स्वीकार हो जाती है तो पूरा प्रकरण वहीं समाप्त हो जायेगा और यदि यह याचिका अस्वीकार हो जाती है तो फिर इसमें चालान ट्रायल कोर्ट में दायर हो जायेगा। हिमाचल सरकार, वीरभद्र और अन्य याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस मामले में सीबीआई का प्रदेश सरकार की अनुमति के बिना या किसी अदालत के निर्देशों के बिना जांच का क्षेत्राधिकार ही नही बनता है और ऐसे में सीबीआई की सारी कारवाई गैर कानूनी हो जाती है। लेकिन उच्च न्यायालय ने प्रदेश के महाधिवक्ता को यह भी स्पष्ट कर दिया था कि जांच अवधि के काल में वीरभद्र केन्द्र में मन्त्री थे और इस कारण दिल्ली क्षेत्राधिकार बन जाता है। ऐसे में यह माना जा रहा है कि इस मामले में चालान दायर होना तय है।

जैसे जैसे यह मामला फैसले की ओर बढ़ रहा है उसी अनुपात में ईडी ने भी इस प्रकरण में अपनी शेष बची जांच तेज कर दी है। पिछले एक पखवाडे़ में ईडी की टीम दो बार रामपुर और शिमला का दौरा कर चुकी है। ईडी ने रामपुर के एक ऐडवोकेट राम आसरा से भी कुछ जानकारी हासिल की है। राम आसरा भी वीरभद्र के सेब बागीचे के प्रबन्धन से अप्रत्यक्षतः जुड़े रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि वीरभद्र ने जो पुश्तैनी संपति विक्रमादित्य और अन्य के नाम ट्रांसफर की है उसका रिकार्ड भी ऐजैन्सी ने हासिल कर लिया है। सूत्रों के मुताबिक ईडी टीम का दूसरा दौरा सरकार के नोटबंदी फैसले के बाद हुआ है और इसमें आयकर विभाग के लोग भी शामिल थे। चर्चा के मुताबिक कालाधन और बेनामी संपति की घोषणा योजना की 30 सितम्बर को अवधि समाप्त होने के बाद अचानक कई बैंक खाते खुलने की सूचना ईडी और आयकर विभाग को मिली थी। उसी की प्रमाणिकता जांचने के लिये ईडी टीम ने दस्तक दी थी। माना जा रहा है कि इन खातों की जानकारी के लिये आरटीआई का भी सहारा लिया गया है। क्योंकि आरटीआई के तहत खाता धारक की जानकारी तो नही मिल सकती है। लेकिन बैंक के पास अमुक अवधि में खुली खातों की संख्या की जानकारी को नहीं रोका जा सकता है । आयकर और ईडी सूत्रों के मुताबिक नोटबंदी फैसले के बाद तीन बडे़ बैंको के बडे़ अधिकारियों की सरकार के एक बडे़ अधिकारी और एक राजनेता के साथ हुई बैठक की जानकारी मिलने के बाद यह ऐजैन्सीयां हरकत में आयी है और अब बराबर निगरानी बनाये हुए हैं। इस सद्धर्भ में ईडी ने राज्य सहकारी बैंक को पत्र लिखकर जानकारी मांगी है। 

दूसरी ओर अदालत में मामला फैसले के कगार पर पहुंचने और ईडी द्वारा अपनी जांच तेज कर दिये जाने के साथ ही वीरभद्र विरोधीयों ने भी अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। माना जा रहा है यदि वीरभद्र सिंह के खिलाफ चालान अदालत में दायर हो जाता है तो उन पर पार्टी के भीतर भी त्याग पत्र देने का दबाव आ सकता है। ऐसे में एक वर्ग का मानना है कि वीरभद्र पद त्यागने की बजाये विधानसभा भंग करवाकर चुनाव में जाने की रणनीति पर चलेंगे। लेकिन दूसरा वर्ग चुनाव की बजाये नया नेता लाने की वकालत कर रहा है। इस संद्धर्भ में पार्टी के कुछ विधायकों की चण्डीगढ में बैठक हुई है। इस बैठक की जानकारी प्रदेश प्रभारी अंबिका सोनी को भी रही है। बल्कि सूत्रों का दावा तो यहां तक है कि इस बैठक में सोनी का एक विश्वस्त भी शामिल रहा है। इस बैठक की जानकारी पंजाब की प्रभारी आशा कुमारी को भी रही है। बैठक में शामिल रहे एक विधायक ने दावा किया है कि पार्टी हाईकमान को विधायकों की चिन्ता और उनके फैसले से सूचित करवा दिया गया है। बैठक में पार्टी की एक जुटता बनाये रखने के लिये कौल सिंह को मुख्यमंत्री और जी एस बाली को उपमुख्यमन्त्री बनाने पर सहमति बनी है। इस फैसले से कांगडा और मंडी क्षेत्रों में राजनीतिक सन्तुलन बन जाता है। यह माना जा रहा है कि विधायक वीरभद्र को विधान सभा भंग करने का फैसला नही लेने देंगे। क्योंकि अभी उनके पास एक साल का कार्यकाल बचा हुआ है। जिसे वह खोना नही चाहेंगे। ऐसे में हाईकमान को भी पार्टी के बहुमत के फैसले को अधिमान देना होगा अन्यथा पार्टी के अन्दर बगावत हो जायेगी यह माना जा रहा है।

 

समान कार्य-समान वेतन पर क्या सरकार सर्वोच्च न्यायालय का फैसला लागू कर पायेगी या कर्मचारी आन्दोलन और अदालत का करेंगे रूख

शिमला/शैल। राज्य सरकार इस समय आर्थिक संकट से गुजर रही है। हर माह कर्ज उठाना पड़ रहा है। अगला वर्ष चुनावी वर्ष है और इसमें सामान्यतः खर्च बढ़ता ही है। सरकार जीडीपी के 3% से अधिक कर्ज नहीं ले सकती है। वर्ष 2016-17 में सरकार अधिकतम कर्ज 3540 करोड़ ही उठा सकती है। कर्ज की यह सीमा भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के निदेशिक व्यय द्वारा प्रदेश के वित्त सचिव को 29-3-2016 को भेजे पत्र के माध्यम से सूचित की गई है। कर्ज की इस तय सीमा के भीतर काम चलाना कभी भी कठिन हो सकता है। सरकार ने पिछले कुछ अरसे से मन्त्री मण्डल की हर बैठक में नये पद सृजित करने और भरने की नीति अपना रखी है। स्मरणीय है कि एक समय हिमाचल सरकारी नौकरी देने वाला सिक्कम के बाद देश का दूसरा राज्य बन गया था और इस कारण से पूरा आर्थिक सन्तुलन बिगड़ गया था। योजना आयोग ने इसका कड़ा संज्ञान लिया था। सरकार को आयोग के साथ एम ओ यू साईन करना पड़ा था। इसके तहत दो वर्ष से खाली चले आ रहे पदों को समाप्त करने की शर्त पर अमल करना पडा था। लेकिन चुनावी गणित को सामने रखकर कर्मचारियों की भर्ती रेगुलर आधार पर करने की बजाये कान्ट्रैक्ट का रास्ता अपनाया गया। क्योंकि इस आधार पर भर्ती किये कर्मचारी को रेगुलर के मुकाबले लगभग आधा वेतन देने का प्रावधान किया गया। कान्ट्रैक्टपर लगे कर्मचारी को पांच /सात साल बाद नियमित हो जाने का वायदा मिलने के कारण वह इस शोषण के खिलाफ आवाज नंही उठा सका।
अब तो कांन्ट्रैक्ट से भी आगे बढ़कर आऊट सोर्सिंग का माध्यम अपना लिया गया है। शिक्षा विभाग में कम्प्यूटर का सारा शिक्षण आऊट सोर्सिंग से चलाया जा रहा है। इसमें आऊट सोर्सिंग दे रही कंपनी /ठेकेदार को बैठे बिठाये प्रति कर्मचारी मोटा कमीशन मिल रहा है। इस समय प्रदेश में हजारों की संख्या में गैर रेगुलर कर्मचारी जिन्हें लगभग आधा ही वेतन मिलता है। प्रदेश के कम्यूटर शिक्षक तो हड़ताल पर आ चुके हैं। ऐेसे में अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से ऐसे शोषण से कर्मचारियों को राहत मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस जे एस केहर की खण्डपीठ ने 26 अक्तूबर को ऐतिहासिक फैसला देते हुए समान कार्य के लिये समान वेतन के सिद्धान्त को लागू करने के निर्देश दिये हैं। सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पूरे देश के लिये कानून बन जाता है और देश की सारी अदालतें संविधान की धारा 141 से इस फैसले से बंध जाती है। सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला सरकार को मानना ही पडे़गा। यदि कोई कर्मचारी फैसला लागू न होने की शिकायत सर्वोच्च न्यायालय से करेगा तो सरकार के लिये और फजीहत की स्थिति हो जायगी।
इस फैसले के बाद सरकार को अपनी नीतियों की निष्पक्ष समीक्षा करने की आवश्कयता है क्यांकि राजनीतिक हितों के लिये सरकारें मन्त्रीयों की सीमा तय होने के बावजूद उतनी ही संख्या में संसदीय सचिवों की नियुक्तियां कर रही हैं। राजनेताओं के लिये दर्जनों के हिसाब से निगम बोर्डो में अध्यक्षों/उपाध्यक्षों और निदेशकों के पद सृजित कर लेती है। चुनावी लाभ के लिये हर कहीं संस्थान खोल दिये जाते हैं। इस परिदृश्य में सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर तुरन्त प्रभाव से अमल करना बाध्यता हो जायेगा। इसी के साथ नये पदों का सृजन करते हुए सरकार को सावधानी बतरनी पडे़गी। क्यांंकि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने 2012 में दिये एक फैसले में बहुत सारी कान्ट्रैक्ट आदि की नियुक्तियों को लेकर सरकार द्वारा बनायी गयी पॉलिसी को गैर कानूनी करार दे रखा है। जस्टिस आर बी मिश्रा ने ऐसी नियुक्तियों को पिछले दरवाजे से की जा रही भर्तीयां करार दिया है। लेकिन सरकार ने इस फैसले पर पूरा अमल न करके इस चलन को जारी रखा। अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद ऐसे सारे नियुक्त हुए कर्मचारियों को रैगुलर के बराबर ही वेतन देना पडे़गा। फैसले के महत्वपूर्ण अंश : 

There is no room for any doubt, that the principle of ‘equal pay for equal work’ has emerged from an interpretation of different provisions of the Constitution. The principle has been expounded through a large number of judgments rendered by this Court, and constitutes law declared by this Court. The same is binding on all the courts in India, under Article 141 of the Constitution of India.
In our considered view, it is fallacious to determine artificial parameters to deny fruits of labour. An employee engaged for the same work, cannot be paid less than another, who performs the same duties and responsibilities. Certainly not, in a welfare state. Such an action besides being demeaning, strikes at the very foundation of human dignity. Any one, who is compelled to work at a lesser wage, does not do so voluntarily. He does so, to provide food and shelter to his family, at the cost of his self respect and dignity, at the cost of his self worth, and at the cost of his integrity. For he knows, that his dependents would suffer immensely, if he does not accept the lesser wage. Any act, of paying less wages, as compared to others similarly situate, constitutes an act of exploitative enslavement, emerging out of a domineering position. Undoubtedly, the action is oppressive, suppressive and coercive, as it compels involuntary subjugation.
56. We would also like to extract herein Article 7, of the International Covenant on Economic, Social and Cultural Rights, 1966. The same is reproduced below:-
“Article 7
The States Parties to the present Covenant recognize the right of everyone to the enjoyment of just and favourable conditions of work which ensure, in particular:
(a) Remuneration which provides all workers, as a minimum, with:
(i) Fair wages and equal remuneration for work of equal value without distinction of any kind, in particular women being guaranteed conditions of work not inferior to those enjoyed by men, with equal pay for equal work;
(ii) A decent living for themselves and their families in accordance with the provisions of the present Covenant;
(b) Safe and healthy working conditions;
(c) Equal opportunity for everyone to be promoted in his employment to an appropriate higher level, subject to no considerations other than those of seniority and competence;
(d) Rest, leisure and reasonable limitation of working hours and periodic holidays with pay, as well as remuneration for public holidays.”
India is a signatory to the above covenant, having ratified the same on 10.4.1979. There is no escape from the above obligation, in view of different provisions of the Constitution referred to above, and in view of the law declared by this Court under Article 141 of the Constitution of India, the principle of ‘equal pay for equal work’ constitutes a clear and unambiguous right and is vested in every employee– whether engaged on regular or temporary basis.

 

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