शिमला/शैल। वीरभद्र सरकार ने अवैध निर्माण को नियमित करने के लिये विधानसभा के मानसून सत्रा में नगर एवम ग्राम नियोजन अधिनियम 1977 में संसोधन पारित कर अवैध निमार्णो को नियमित करने का मार्ग प्रशस्त किया है। इससे पहले भी अवैध निर्माणों को नियमित करने के लिये सात बार रिटैन्शन पालिसियां आ चुकी हैं। हर पालिसी को अन्तिम कहा जाता था लेकिन हर बार नये अवैध निर्माण खड़े होते रहे हैं। ऐसे अवैध निर्माणों का संख्या हजारों में है। लेकिन इस बार जब सदन में संशोधन पारित हुआ उसी दौरान प्रदेश उच्च
न्यायालय ने इन अवैध निर्माणों को लेकर कड़ी टिप्पणियां करते हुए इस पर गहरी चिन्ता व्यक्त की। सदन द्वारा संशोधन पारित हो जाने के बाद सरकार ने इसे राज्यपाल की स्वीकृति के लिये भेजा। लेकिन उच्च न्यायालय की तलख टिप्पणियों के बाद राज्यपाल ने इस संशोधन पर अपनी स्वीकृति की माहर लगाने की बजाये इसे अपने पास लंबित रख लिया है।
इस संशोधन के बाद फिर अवैध निर्माणों का सिलसिला बढ़ गया है। अगले वर्ष चुनाव होने हैं और यह धारणा बन गयी है कि चुनावों से पहले जितना अवैध निर्माण कर सकते हो कर लो नियमित हो जायेगा। यह संशोधन भी केवल एक वर्ष के लिये ही है इससे यह धारणा और भी स्पष्ट हो जाती है। राज्यपाल के पास यह संशोधन लंबित है और उच्च न्यायालय की चिन्ता और निर्देश भी स्पष्ट हैं। लेकिन इस चिन्ता को नजर अन्दाज करते हुए भाजपा और सरकार दोनों ने अलग-अलग जाकर राज्यपाल से इस संशोधन को अपनी स्वीकृति प्रदान करने की गुहार लगाई है। इस अवैधता को नियमित करने के लिये कांग्रेस और भाजपा दोनों का एक साथ वकालत करना यह इंगित करता है कि क्या इन दोनों पर बिल्डर लॉबी का दबाव है। जबकि भाजपा के ही वरिष्ठ नेता पूर्व मुख्यमन्त्री ने इस संशोधन पर कड़ी आपति की है। शान्ता कुमार के विरोध और उच्च न्यायालय के निर्देशों के बाद राज्यपाल का इस पर क्या रूख रहता है इस पर सबकी निगाहें लगी हैं। उच्च न्यायालय की टिप्पणी इस प्रकार है:Thousands of unauthorized constructions have not been raised overnight. The Government machinery was mute spectator by letting the people to raise unauthorized constructions and also encroach upon the government land. Permitting the unauthorized construction under the very nose of the authorities and later on regularizing them amounts to failure of constitutional mechanism/machinery. The State functionary/machinery has adopted ostrich like attitude. The honest persons are at the receiving end and the persons who have raised unauthorized construction are being encouraged to break the law. This attitude also violates the human rights of the honest citizens, who have raised their construction in accordance with law. There are thousands of buildings being regularized, which are not even structurally safe.
The regularization of unauthorized constructions/encroachments on public land will render a number of enactments, like Indian Forest Act 1927, Himachal Pradesh Land Revenue Act, 1953 and Town and Country Planning Act, 1977 nugatory and otiose. The letter and spirit of these enactments cannot be obliterated all together by showing undue indulgence and favouritism to dishonest persons. The over-indulgence by the State to dishonest persons may ultimately lead to anarchy and would also destroy the democratic polity.
शिमला/शैल। प्रदेश पर्यटन निगम के पूर्व कर्मचारी नेता ओम प्रकाश गोयल एक लम्बे अरसे से निगम में करोडों के केन्द्रिय धन के दुरूपयोग और उसमें घपला होने के आरोप लगाते आ रहे हैं। यह आरोप लगाने की उन्होने बड़ी कीमत भी चुकायी है लेकिन निगम में फैले भ्रष्टाचार को बेनकाव करने के मुद्दे से पीछे नही हटे हैं। गोयल ने जो भी आरोप लगाये हैं उनके साथ आरटीआई के माध्यम से जुटाये दस्तवेजी प्रमाण भी साथ लगाये हैं। इन आरोपों को लेकर 2002 में प्रदेश उच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं। इस याचिका पर 13.3.2003 को फैसला आया था जिसमें निगम को कुछ निर्देश भी जारी हुए थे। गोयल का आरोप है कि उच्च न्यायालय के निर्देशों की भी अनुपालना नही की गयी है। गोयल के आरोपों पर निगम के निदेशक मण्डल और मुख्यमंत्री द्वारा भी कोई कारवाई न किये जाने के बाद ही उसने 20 मई 2016 को राष्ट्रपति प्रधानमंत्री, राज्यपाल, शांता कुमार, आप के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय सिंह और राजन सुशांत के नाम शिकायत भेजी। इस शिकायत पर क्या कारवाई हुई है इसकी जानकारी भी आरटीआई के माध्यम से मांगी गयी है। 20 मई को भेजी शिकायत के बाद गोयल ने सितम्बर में कुछ और तथ्यों के साथ एक और शिकायत राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री, सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायधीश, प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्यन्यायधीश केन्द्रिय वित्त मंत्री, केन्द्र के केबिनेट सैक्रेटरी, सीएजी निदेशक सीबीआई और केन्द्रिय वित्त मंत्री केन्द्रिय पर्यटन सचिव को भेजी है। अब यह शिकायत सीबीआई ने प्रदेश विजिलैन्स को भेज दी है। सूत्रों के मुताबिक केन्द्रिय पर्यटन मन्त्रालय में भी इन आरापों को लेकर एक तीन सदस्यीय जांच कमेटी गठित की गयी है।

गोयल के आरोपों के मुताबिक 2001 से 2002 के बीच प्रबन्धन निदेशक ने होटल पीटरहाॅफ में अपने मेहमानों को ठहराया जिनका खर्च निगम ने उठाया। इसी दौरान पर्यटन निगम ने कर्मचारियों का सी पी एफ जमा नही करवाया और उसके लिये निगम को 72 लाख का जुर्माना भरना पडा है। केन्द्र की सहयता से खड़ा पत्थर के होटल गिरी गंगा प्रौजैक्ट को 31 .12.2001 को 39.30 लाख में पूरा होकर इस्तेमाल में भी आ चुका होना दिखा दिया गया। जबकि जब 24.10.2005 को निगम के निदेशक मण्डल की वीरभद्र सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस प्रौजैक्ट को पूरा करने के निर्देश दिये जाते हैं। अन्त में 25.6.2006 को इसी प्रौजैक्ट को 1,38,84,076 रूपये में पूरा हुआ दिखाया जाता है। इन आंकडों से प्रबन्धन की नीयत और नीति का खुलासा हो जाता है। जो प्रौजैक्ट 31.12.2001 को 39.30 में पूरा हुआ दिखाया जाता है वह 2006 में एक करोड़ से भी अधिक को पहुंच जाता है जिस पर क्यांे और कैसे के सवाल उठना स्वाभाविक है। गोयल ने मार्च 2003 के उच्च न्यायालय के फैसले के निर्देशों पर अमल न होने पर अवमानना याचिका दायर की थी। इस पर तत्कालीन सचिव पर्यटन अशोक ठाकुर ने अदालत में दायर जवाब में छः करोड तय कार्यो से अनयत्र खर्च होना स्वीकार किया है। सुंगरी प्रौजेक्ट को लेकर भी गंभीर आरोप लगाये गये हैं। इस प्रौजैक्ट के लिये 26396 को भारत सरकार से 46,11,600 रूपये स्वीकृति होने हैं तीन लाख प्रदेश सरकार देती है 31.12.2009 को भारत सरकार को भेजे प्रमाण पत्रों में यह प्रौजेक्ट पूरा हो जाता है। लेकिन 2006 में जब मुख्यमंत्री यहां आते हैं तो इसे अधूरा पाते हैं। इसे पूरा करने के लिये इसको लोक निमार्ण को देने की बात करते हैं। इन निेर्देशों पर लोक निमार्ण विभाग पर्यटन से मिल कर इसकी प्रक्रिया पूरी करते हैं और लोक निमार्ण विभाग इसको पूरा करने के लिये 76 लाख का अनुमान देते है।
इस तरह पर्यटन में जितने भी प्रौजेक्टों के लिये केन्द्र से पैसा आता है उसे प्राप्त करने के लिये उपयोगिता प्रमाण पत्र और कमीशनिंग तक के सर्टीफिकेट भेज दिये जाते हैं और इनके आधार पर केन्द्र से सहायता की अन्तिम किश्त भी प्राप्त कर ली जाती है। लेकिन बाद में यह सारे प्रौजेक्ट अधूरे पाये जाते हैं। और इनकी लागत कई गुणा बढ़ जाती है। इससे केन्द्र को भेजे गयेे सारे प्रमाण पत्रों की प्रमाणिकता पर ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। यह प्रश्न चिन्ह लगाना केन्द्र के धन का सीधा दुरूपयोग बन जाता है। गोयल के मुताबिक पर्यटन में केन्द्र के करीब दस करोड़ के दुरूपयोग के दस्तावेजी प्रमाण उन्होने शिकायतों के साथ भेजे हैं। केन्द्र के धन के इस तरह के दुरूपयोग का कड़ा संज्ञान लेते हुए सीबीआई ने इसकी जांच विजिलैन्स को भेजी है। अब वीरभद्र की विजिलैन्स गोयल की इन शिकायतों पर कितनी और क्या कारवाई करती है। इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है क्योंकि पर्यटन मन्त्री मुख्यमन्त्री स्वयं है और मुख्यसचिव ही पर्यटन सविच भी हैं। गोयल ने दावा किया है कि इन शिकायतों को ठीक अंजाम तक पहुंचाने के लिये वह हर लड़ाई लड़ने के लिय तैयार हैं। इस संद्धर्भ में उसने सभी संवंद्ध अदारों से आरटीआई के तहत उसकी शिकायतों पर हुई कारवाई की जानकारी भी मांग रखी है। जिन अधिकारियों के खिलाफ गोयल की शिकायतें है वह सब मुख्यमंत्री के अतिविश्वस्तों में गिने जाते हैं। मामला केन्द्र के धन का है। जिसके लिये अधिकारियों पर झूठे उपयोगिता प्रमाण पत्र सौपने का आरोप है।
शिमला/शैल। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रदेश की तीन जलवि़द्युत परियोजनाओं के लोकार्पण अवसर पर आयोजित रैली एक सफल रैली रही है इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है। यह रैली प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का सफल संकेत मानी जा सकती है। क्योंकि इस रैली मे प्रधानमंत्री ने जो बुनियादी सवाल उछाले हैं वह आने वाले दिनों में निश्चित रूप से बहस का मुद्दा बनेगे? प्रधानमंत्री ने प्रदेश की जनता को बताया कि केन्द्र ने 15वें वित्तायोग
की सिफारिशों के बाद हिमाचल को 72 हजार करोड़ रूपेय का आवंटन किया है। जबकि 14 वें वित्तायोग के तहत यह राशी केवल 21 हजार करोड़ थी। 14वां वित्त आयोग यूपीए सरकार के समय आया था और 15वां अब भाजपा सरकार के दौरान आया है। कांग्रेस के मुकाबले तीन गुणा से भी ज्यादा आंवटन प्रदेश को मिला है। मोदी ने स्पष्ट कहा है कि केन्द्र और प्रदेश की जनता राज्य सरकार से इस पैसे के खर्च का हिसाब मांगेगी। राज्य सरकार का खर्च कितना तर्क संगत होता है? उसमें कितनी फज़ूल खर्ची होती है? इन सवालों पर कभी बहस नही हुई है। क्योंकि जनता को इस तरह के तथ्यों की कभी सीधी जानकारी होती ही नहीं है। यह पहली बार है कि देश के प्रधान मंत्री ने जनता के सामने इतना बड़ा आंकड़ा रखा है। इस आंकड़े को झुठलाना या इस पर कोई और किन्तु/परन्तु उठाना राज्य सरकार के लिये संभव नही होगा।
केन्द्र ने राज्य को 61 राष्ट्रीय उच्च मार्ग दिये हैं इन उच्च मार्गों पर कार्य शुरू हो इसके लिये समय पर इनकी डीपीआर बनकर केन्द्र के पास पहुचनीं चाहिये। डीपीआर राज्य सरकार को बनानी है और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने पिछले दिनों यह कहा हैं कि डीपीआरज बनाने के लिये उन्हे पैसा नही दिया गया हैं अब मुख्यमंत्री का यह तर्क प्रधान मन्त्री के 72 हजार करोड़ के आंकड़े के नीचे इस कदर दब जायेगा कि
इससे उभरना राज्य सरकार के लिये संभव नहीं हि पायेगा क्योंकि प्रधानमन्त्री ने अपने संबोधन में जहां पूर्व मुख्यमन्त्रीयों शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को विकास का पर्याय बताया वहीं वर वीरभद्र को नाम लिये बगैर ही भ्रष्टाचार का पर्याय करार दिया। प्रधान मन्त्री के इस संकेत से यह भी संदेश उभरता है कि केन्द्र के खिलाफ चल रही जांच के प्रति पूरी तरह गभीर है और सही समय पर उसके परिणाम सामने आयेंगें आज राज्य सरकार का कर्जभार लगातार बढ़ता जा रहा है। इस समय बहुत सारे विकास के कार्य पैसों के अभाव में बन्द हो चुके है। मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में ठेकेदारों की पैमेन्टस रूकने के कारण ठेकेदारों ने काम बन्द कर दिये है। प्रदेश के पेयजल योजनाओं के लिये आये हजारों करोड़ के उपयोगिता प्रमाण पत्र समय पर न जाने के कारण केन्द्र ने इन योजनाओं के लिये अगले भुगतान के लिये शर्ते कड़ी कर दी है। पर्यटन में फर्जी उपयोगिता पर जांच प्रमाण पत्र सौंपे जाने को लेकर शिकायते केन्द्र के पास पहुंच चुकी हैं और इन शिकायतों पर जांच को रोक पाना संभव नही होगा क्योंकि आर टी आई के तहत इन शिकायतों पर हुई कारवाई की जानकारी भी मांग ली गयी है।
कैग रिपोर्टो में सरकार के खर्चो को लेकर एक लम्बे समय से सवाल उठते रहे हैं लेकिन यह सवाल कभी बहस का मुद्दा नही बन पाये है। आज प्रधान मन्त्री द्वारा एक खुले मंच से 72 हजार करोड़ के आंकड़े की जानकारी आम आदमी के बीच आने से स्वाभाविक रूप से इस पर बहस उठेगी ही। क्योंकि यह आम आदमी का पैसा है और उसे यह हक हासिल है कि वह इस खर्च का हिसाब मांगे। प्रधानमंत्री ने जनता से स्पष्ट कहा है कि वह इस खर्च का सरकार से हिसाब मांगे। मोदी के इस आंकडे़ के हथौड़े से राज्य सरकार का बचना अंसभव है।
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