Thursday, 19 March 2026
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सवालों के घेरे में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, संकट से उबरना चुनौती

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, दशकों से प्रदेश की उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा है। इसी विश्वविद्यालय से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू सहित अनेक वरिष्ठ ब्यूरोक्रेट्स, आईपीएस अधिकारी और विभिन्न क्षेत्रों की बड़ी हस्तियां शिक्षा प्राप्त कर चुकी हैं। आज भी हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की प्रमुख परीक्षाओं में इस विश्वविद्यालय के छात्रा बड़ी संख्या में सफलता हासिल करते हैं, जो इसकी शैक्षणिक परंपरा और क्षमता को दर्शाता है।
2 जून 2025 को विश्वविद्यालय की कमान नए कुलपति प्रोफेसर महावीर सिंह ने संभाली। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि विश्वविद्यालय शैक्षणिक और प्रशासनिक दृष्टि से अपने सबसे निम्न स्तर पर पहुंच चुका है और इसे ‘पाताल लोक’ से बाहर निकालना अत्यंत आवश्यक है। इसके बाद कुलपति ने पहला बड़ा निर्णय लेते हुए परिसर में पांच नए सेंटर खोलने की घोषणा की।
हालांकि इससे जुड़ा एक गंभीर प्रश्न भी सामने आता है। वर्ष 2023 की कैग रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि विश्वविद्यालय के कई विभागों में 30 से 79 प्रतिशत तक बुनियादी उपकरणों की कमी है। जिन विभागों का जिक्र कैग की रिपोर्ट में किया गया है, वे विश्वविद्यालय के लगभग 30-35 वर्ष पुराने विभाग हैं।
इसी विषय पर जब कैग की रिपोर्ट के संदर्भ में कैग द्वारा ही हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुल सचिव से यह प्रश्न किया गया कि यदि विश्वविद्यालय के विभागों में इतनी बड़ी संख्या में बेसिक इंस्ट्रूमेंट की कमी है, तो क्या इससे छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान से वंचित नहीं होना पड़ेगा?
इस पर उनका जवाब था कि विश्वविद्यालय के पास उपकरण और इक्विपमेंट खरीदने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जब पुराने और मूलभूत विभागों में आवश्यक तकनीकी सुविधाओं और उपकरणों का अभाव है, तो क्या विश्वविद्यालय को पहले इन विभागों को सशक्त बनाना चाहिए या नए विभाग और सेंटर खोलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
स्थिति का एक और उदाहरण फोरेंसिक साइंस विभाग है, जिसे वर्ष 2021 में शुरू किया गया था। वर्तमान में यह विभाग एक सस्ती राशन की दुकान के साथ संचालित हो रहा है। यह स्थिति न केवल बुनियादी ढांचे की कमी को उजागर करती है, बल्कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। कई पुराने विभागों में छात्रों के लिए पर्याप्त बैठने की व्यवस्था तक नहीं है और प्रयोगशालाओं में आवश्यक उपकरण उपलब्ध नहीं हैं।
इसी बीच विश्वविद्यालय के शिक्षक और गैर-शिक्षक समुदाय की समस्याएं भी लगातार सामने आती रही हैं। पिछले वर्ष कर्मचारियों को समय पर वेतन न मिलने के कारण महीने में लगभग 5 से 7 दिन तक हड़ताल की स्थिति बनी रही थी। वर्तमान में भी पदोन्नति, नियुक्तियों और अन्य प्रशासनिक मांगों से जुड़ी समस्याओं के कारण समय-समय पर आंदोलन और विरोध देखने को मिलते रहे हैं।
कुलपति ने ‘कैंपस टू कम्युनिटी’ मॉडल को बढ़ावा देने की बात कही। यह भी दावा किया गया कि प्राकृतिक आपदाओं को रोकने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जाएंगे। हालांकि दूसरी ओर आईआईटी मंडी ने 2025 में बिना किसी प्रचार के डिजास्टर मैनेजमेंट विभाग के साथ मिलकर एआई आधारित लैंडस्लाइड अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया, जिसे मंडी सहित हिमाचल प्रदेश के कई संवेदनशील क्षेत्रों में स्थापित किया जा रहा है। लगभग 90 प्रतिशत सटीकता वाला यह सिस्टम आपदा प्रबंधन के क्षेत्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है और इसे ‘कैंपस टू कम्युनिटी’ मॉडल का एक सफल उदाहरण भी माना जा रहा है।
इसके अलावा विश्वविद्यालय परिसर में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। पिछले नौ महीनों में छात्रों या छात्र संगठनों के बीच हिंसक घटनाओं में कोई विशेष कमी देखने को नहीं मिली है। हाल ही में विधि विभाग में एक छात्र द्वारा दूसरे छात्र को चाकू मारने की घटना ने भी विश्वविद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
सार्वजनिक मंचों और प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह कहना कि विश्वविद्यालय ‘पाताल लोक’ में पहुंच चुका है या इसका शैक्षणिक स्तर अत्यंत निम्न हो चुका है, इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसी टिप्पणियों से न केवल हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के वर्तमान छात्रों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि उन हजारों पूर्व छात्रों का भी मनोबल प्रभावित होता है जिन्होंने इसी विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर देश के विभिन्न क्षेत्रों चाहे वह राजनीति हो, प्रशासनिक सेवाएं हों, न्यायिक सेवाएं हों या शिक्षा का क्षेत्रा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
हर वर्ष प्रशासनिक सेवाओं में हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के छात्र उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर रहे हैं। न्यायिक सेवाओं में भी विश्वविद्यालय के छात्र लगातार आगे आ रहे हैं। हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं के परिणामों में भी बड़ी संख्या में सफल अभ्यर्थी इसी विश्वविद्यालय से जुड़े होते हैं। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को ‘निम्न स्तर’ या ‘पाताल लोक’ में पहुंचा हुआ बताना वास्तव में उचित है?
अब जबकि कुलपति को पदभार संभाले लगभग नौ महीने हो चुके हैं, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या पिछले नौ महीनों में विश्वविद्यालय वास्तव में ‘पाताल लोक’ से बाहर निकल पाया है, या फिर यह केवल अखबारों और घोषणाओं तक ही सीमित रह गया है? प्रदेश की जनता, छात्रा और विश्वविद्यालय समुदाय अब इस बात का उत्तर ठोस कार्यों के रूप में देखना चाहते हैं।
 

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