अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारतीय अर्थव्यवस्था को एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन वाली अर्थव्यवस्था करार दिया है। आईएमएफ ने आरोप लगाया है कि भारत सरकार आर्थिक आंकड़ों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रही है। भारत सरकार ने आईएमएफ के इस आकलन का कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन इस आकलन के आईने में कुछ आंकड़े अवश्य ही सोचने पर विवश करते हैं कि यह सरकार देश के अस्सी करोड़ लोगों को पांच किलो मुफ्त राशन हर माह दे रही है। यदि 144 करोड़ के देश में 80 करोड़ लोगों को सरकार के 5 किलो मुफ्त राशन पर आश्रित रहना पड़ रहा है तो इसी से विकास के सारे दावों पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है। इस समय रुपया डॉलर के मुकाबले अपने सबसे निचले स्तर पर चल रहा है और यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि रुपया जो आज 90 के पार है जल्द ही 100 का आंकड़ा छू सकता है। आज कर्जदारों में देश शीर्ष स्थान पर पहुंच गया है और रसोई गैस का जो सिलेंडर 2014 में 400 रूपये का था वह आज 1000 का आंकड़ा छूने के कगार पर पहुंच गया है। सरकार ने हर चुनाव में जनता से जो जो वायदे किये थे वह कितने पूरे हुये हैं आज देश की जनता इस पर गंभीरता से विचार करने पर पहुंच गयी है। क्योंकि जिस सरकार का व्यवहारिक पक्ष इतना प्रश्नित हो वह किस आधार पर चुनाव में सफलता प्राप्त कर रही है। यह प्रश्न अब और भी उग्रता से उठना शुरू हो गया है जब से कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पूरे प्रमाणिक साक्ष्य के साथ चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाये हैं।





हिमाचल की अर्थव्यवस्था में एमएसएमई का महत्व इसलिये भी बढ़ जाता है क्योंकि यहां बड़े उद्योगों की संभावनाएं सीमित हैं। ऐसे में छोटे और मध्यम उद्यम स्थानीय स्तर पर कच्चे माल का उपयोग कर मूल्य संवर्धन करते हैं और गांवों से शहरों तक रोजगार के अवसर पैदा करते हैं। खाद्य प्रसंस्करण, हथकरघा, हस्तशिल्प, फार्मास्यूटिकल्स, आयुर्वेद, डेयरी, पर्यटन आधारित सेवाएं और उभरते स्टार्टअप ये सभी क्षेत्र एमएसएमई के जरिए नई पहचान बना रहे हैं। इससे न केवल आय के स्रोत बढ़े हैं, बल्कि युवाओं को पलायन के बजाये अपने ही क्षेत्र में भविष्य गढ़ने का अवसर भी मिला है।
राज्य के पारंपरिक उत्पादों ने एमएसएमई के माध्यम से आधुनिक बाजारों में जगह बनाई है। सेब, शहद, जड़ी-बूटियां, ऊनी वस्त्र, हस्तशिल्प और स्थानीय खाद्य उत्पाद अब बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और गुणवत्ता मानकों के साथ राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच रहे हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स ने छोटे उद्यमियों को बड़ी मंडियों से जोड़ा है, जिससे ‘लोकल से ग्लोबल’ का सपना साकार होता दिख रहा है। यह बदलाव ग्रामीण उत्पादकों के आत्मविश्वास को भी मजबूत कर रहा है।
एमएसएमई सैक्टर में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी हिमाचल के सामाजिक परिदृश्य में एक सकारात्मक बदलाव का संकेत है। स्वयं सहायता समूहों से लेकर व्यक्तिगत स्टार्टअप तक, महिलाएं खाद्य प्रसंस्करण, सिलाई-कढ़ाई, हथकरघा, ऑर्गेनिक उत्पाद, हस्तशिल्प और सेवा क्षेत्रा में उल्लेखनीय भूमिका निभा रही हैं। इससे महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी है और परिवार व समाज में उनकी निर्णयात्मक भूमिका भी सशक्त हुई है। कई क्षेत्रों में महिला-नेतृत्व वाले उद्यम सामूहिक रोजगार का आधार बनते जा रहे हैं, जो समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
सरकारी योजनाओं और नीतिगत समर्थन ने एमएसएमई को मजबूती देने में अहम भूमिका निभाई है। वित्तीय सहायता, सब्सिडी, कौशल विकास कार्यक्रम, उद्यमिता प्रशिक्षण और सिंगल विंडो सिस्टम जैसे प्रयासों से छोटे उद्यमियों का भरोसा बढ़ा है। मुख्यमंत्री स्टार्टअप योजना, एमएसएमई फेस्ट, निवेशक संवाद और क्लस्टर आधारित विकास ने नए उद्यमों को प्रोत्साहित किया है। इससे बाजार संपर्क, तकनीकी सहयोग और निवेश के अवसर बढ़े हैं, जो छोटे उद्योगों को बड़े मंच तक ले जाने में सहायक साबित हो रहे हैं।
हालांकि, एमएसएमई सैक्टर के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कच्चे माल की बढ़ती लागत, सीमित लॉजिस्टिक्स, परिवहन की कठिनाइयां और तकनीकी उन्नयन की जरूरत कई उद्यमों के लिए बाधा बनती हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी और मौसम आधारित जोखिम भी उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करते हैं। इसके बावजूद, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन मार्केटिंग और स्थानीय स्तर पर सहयोगात्मक मॉडल ने इन चुनौतियों को काफी हद तक कम किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में ऑर्गेनिक खेती, एग्रो-प्रोसेसिंग, नवीकरणीय ऊर्जा, वेलनेस, हर्बल उत्पाद और पर्यटन आधारित एमएसएमई हिमाचल की अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगे। यदि तकनीकी नवाचार, वित्तीय पहुंच और बाजार नेटवर्क को और मजबूत किया जाए, तो यह क्षेत्र राज्य को आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास की ओर तेजी से अग्रसर कर सकता है।
कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश का एमएसएमई सैक्टर छोटे प्रयासों के जरिए बड़े बदलाव की कहानी कहता है। यह क्षेत्र न केवल रोजगार और आय के अवसर पैदा कर रहा है, बल्कि स्थानीय पहचान, सामाजिक संतुलन और आर्थिक स्थिरता को भी मजबूत कर रहा है। स्थानीय संसाधनों और आधुनिक सोच के समन्वय से एमएसएमई आज हिमाचल के विकास मॉडल का सबसे भरोसेमंद आधार बन चुका है, जो आने वाले वर्षों में राज्य को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।






नशा किसी एक कारण से पैदा नहीं होता। इसके पीछे बेरोजगारी, असफलता का डर, मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा का दबाव, पारिवारिक संवाद की कमी और आधुनिक जीवनशैली की खोखली चमक जैसे कई कारक हैं। हिमाचल जैसे पर्यटन और सीमावर्ती राज्य में मादक पदार्थों की आसान उपलब्धता इस समस्या को और गंभीर बना देती है। ऐसे में यह भ्रम पालना कि केवल पुलिस कारवाई से नशे को जड़ से खत्म किया जा सकता है, एक खतरनाक आत्मसंतोष होगा।
यह सच है कि हिमाचल सरकार ने नशे के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। चिट्टा और अन्य मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ पुलिस और विशेष टास्क फोर्स की कारवाई ने कई नेटवर्क तोड़े हैं और यह संदेश दिया है कि राज्य में नशे के कारोबार के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि दमनात्मक कारवाई नशे की समस्या का केवल एक पहलू है, समाधान नहीं। जब तक मांग बनी रहेगी, आपूर्ति के रास्ते नए-नए रूपों में निकलते रहेंगे।
सरकार ने इस सच्चाई को कुछ हद तक स्वीकार करते हुए जागरूकता अभियानों और पुनर्वास पर ध्यान दिया है। स्कूलों और कॉलेजों में नशा विरोधी कार्यक्रम, सार्वजनिक अभियानों के जरिए संदेश और पुनर्वास केंद्रों की व्यवस्था-ये सभी सकारात्मक कदम हैं। नशे को अपराध नहीं, बल्कि बीमारी मानकर उपचार की ओर बढ़ना एक जरूरी और मानवीय दृष्टिकोण है। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये प्रयास पर्याप्त गहराई तक पहुंच पा रहे हैं, या फिर ये भी कई बार औपचारिकता बनकर रह जाते हैं?
सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि नशा निवारण को अब भी अक्सर अभियान की तरह देखा जाता है, जबकि यह एक लंबी और निरंतर सामाजिक प्रक्रिया है। स्कूलों और कॉलेजों में स्थायी काउंसलिंग व्यवस्था का अभाव गंभीर चिंता का विषय है। जब तक युवाओं के मानसिक दबाव, असुरक्षा और अवसाद को समय रहते नहीं समझा जाएगा, तब तक नशा उनके लिए आसान पलायन बना रहेगा।
परिवारों की भूमिका पर भी सख्ती से आत्ममंथन जरूरी है। माता-पिता की व्यस्तता, संवाद की कमी और कई बार सामाजिक दिखावे की दौड़ में बच्चों की वास्तविक स्थिति अनदेखी रह जाती है। जब परिवार ही शुरुआती संकेत नहीं पहचान पाएगा, तो सरकार या पुलिस से चमत्कार की उम्मीद करना अव्यावहारिक है।
समाज और समुदाय की निष्क्रियता भी उतनी ही चिंताजनक है। पंचायतें, युवक मंडल और सामाजिक संगठन यदि केवल दर्शक बने रहेंगे, तो नशे के खिलाफ लड़ाई कभी निर्णायक नहीं हो सकती। यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब समाज खुद नशे के खिलाफ खड़ा हो और इसे सामूहिक अपमान के रूप में देखे।
डिजिटल युग में नशे की चुनौती भी डिजिटल हो चुकी है। ऑनलाइन नेटवर्क, सोशल मीडिया और नए तरीकों से फैलता नशा सरकार की पारंपरिक रणनीतियों को बार-बार चुनौती दे रहा है। इसके मुकाबले के लिए उतनी ही आक्रामक और आधुनिक सोच की जरूरत है।
हिमाचल में नशे के खिलाफ लड़ाई केवल सरकार की नहीं है। सरकार नीति बना सकती है और कानून लागू कर सकती है, लेकिन समाज की भागीदारी के बिना यह लड़ाई अधूरी रहेगी। यदि आज भी हम इसे दूसरों की समस्या समझकर टालते रहे, तो कल इसकी कीमत पूरे राज्य को चुकानी पड़ेगी। युवाओं को नशे से बचाना विकल्प नहीं, अनिवार्यता है-और इसमें सरकार, समाज और परिवार, तीनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभानी होगी।











