Sunday, 01 March 2026
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हिंसा और अराजकता राष्ट्रीय प्रश्नों के विकल्प नहीं हो सकते

लोकतंत्र तब खतरे में आ जाता है जब इसके सबसे बड़े मंच संसद में राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस न हो पाये। विपक्ष के सवालों का जवाब लोकसभा में न आ पाये। बल्कि इन सवालों से बचने के लिए प्रधानमंत्री लोकसभा में ही न आये। संसद के बाहर अराजकता, भय और हिंसा का वातावरण निर्मित होने में सरकार की सक्रिय भूमिका पर प्रश्न खड़े होने शुरू हो जाये। इस समय दुर्भाग्य से यह सब घट रहा है। राष्ट्रीय प्रश्नों को जब शीर्ष न्यायपालिका भी लंबाने की नीति पर चल पड़े तो निश्चित रूप से यह मानना ही पड़ेगा कि लोकतंत्र सही में खतरे में है। इस समय वोट चोरी से लेकर एपस्टिन फाइल तक जितने भी राष्ट्रीय प्रश्न उठे हैं एक पर भी संसद के अन्दर बहस नहीं हुई है। जब-जब यह सवाल उठे हैं तब-तब प्रधानमंत्री लोकसभा में आये ही नहीं। विपक्ष को लोकसभा में बोलनेे ही नहीं दिया गया। बल्कि कुछ महिला सांसदों से प्रधानमंत्री को खतरा हो सकता है यह जानकारी स्वयं लोकसभा अध्यक्ष प्रधानमंत्री को देते हैं और प्रधानमंत्री लोकसभा में आने की बजाये राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई चर्चा पर अपना धन्यवाद प्रस्ताव रखते हैं। लेकिन उन महिला सांसदों को चिन्हित करके उन पर कोई कारवाई नहीं की जाती है। संसद के बाहर एक भक्त इन सांसदों और राहुल गांधी को घर में घुसकर गोली मारने की बात करता है। पुलिस जब इस व्यक्ति के खिलाफ कारवाई करती है तब इसका आपराधिक रिकॉर्ड सामने आता है। इसी तरह एक सनातन सम्मेलन में जहां पर धार्मिक उन्माद और वैमनस्य बढ़ाने के आयोजकों द्वारा भाषण दिये जाते हैं तब आरटीआई की एक सूचना के माध्यम से यह जानकारी आती है कि इस सनातन सम्मेलन को संस्कृति मंत्रालय द्वारा तरेसठ लाख का अनुदान दिया गया है। इस सम्मेलन में हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक वैमन्सय का वातावरण निर्मित किया जाता है। ऐसे और भी कई प्रसंग है जहां हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक और जातीय भेदभाव को उकसाया गया है। ऐसे संकेत और संदेश उभर रहे हैं जहां हिन्दू राष्ट्र के लिये धार्मिक और जातिय हिंसा को बढ़ावा देने के उपक्रम किये जा रहे हैं। राष्ट्रीय प्रश्नों को हिंसा और अराजकता से दबाने के खुले प्रयास हो रहे हैं। सरकार कब तक राष्ट्रीय प्रश्नों से बचती रहेगी यह अब एक आम चर्चा का विषय बनता जा रहा है। क्योंकि जिस अनुपात में इन प्रश्नों से ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही है उस अनुपात में यह सवाल और बड़े होते जा रहे हैं। सरकार की इस नीति और नीयत के कारण ही आज स्थितियां लोकसभा अध्यक्ष और चुनाव आयोग के अध्यक्ष के खिलाफ लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव तक आ गये हैं। आज जिस तरह से अमेरिका के साथ हुये व्यापार समझौते में देश के किसान पर संकट आया है उससे किसान के पास सड़क पर उतरने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होगा। कृषि कानूनों के विरोध में देश किसान आन्दोलन को देख चुका है और सरकार भोग चुकी है। अब अमरिकी व्यापार समझौते के साथ ही पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाणे की किताब का मुद्दा भी सरकार से जवाब मांग रहा है। जिस तरह से यह किताब चर्चा में आई है उसके परिणामस्वरुप इसका कथ्य हर आदमी तक पहुंच गया है। सरकार राष्ट्रीय प्रश्नों से बचने के लिये जितने प्रयास कर रही है उसके कारण उसकी हिन्दू राष्ट्र की मंशा जन चर्चा में आती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस ढंग से पूरी भाजपा का प्रायः बन गये थे आज शायद पूरी भाजपा उनके अपने ही भार से दबने के कगार पर पहुंचती जा रही है। यही स्थिति भाजपा के लिये नुकसानदेह होगी। क्योंकि राष्ट्रीय प्रश्नों के साथ महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और काले धन के मुद्दे जुड़ जाएंगे। व्यवहारिक रूप से इन मुद्दों का आकार आज 2014 से कई गुना बढ़ गया है। इस बढ़ते आकार के साये में राष्ट्रीय प्रश्नों पर बहस की मांग को हिंसा और अराजकता से दबाना असंभव हो जाएगा।

महामहिम राज्यपाल का अभिभाषण पर आचरण क्या संकेत है?

इस समय हिमाचल सरकार के सामने राजस्व घाटा अनुदान बहाल करवाने तथा राज्यसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी को विजयी बनाने और पंचायत चुनाव में पार्टी तथा हाईकमान की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की चुनौतियां एक साथ सामने आ गयी हैं। राज्यसभा चुनाव 16 मार्च को और पंचायती चुनाव मई के अन्त तक होने हैं। क्या सरकार इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पायेगी यह सवाल हर आदमी के सामने खड़ा है। क्योंकि पिछली बार भी कांग्रेस की सरकार होते हुये भी राज्यसभा भाजपा छीन कर ले गयी थी। भाजपा इस बार भी चुनाव लड़ेगी और जब भाजपा चुनावी मैदान में होगी तो कांग्रेस हार की आशंका से मुक्त नहीं हो सकती। पार्टी और सरकार के भीतर जो राजनीतिक परिस्थितियां पिछले चुनाव के दौरान थी वह शायद इस बार पहले से ज्यादा मुखर है। पिछली बार कांग्रेस का संगठन था परन्तु इस बार यह संगठन जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों से अभी तक आगे नहीं बढ़ पाया है। पिछली बार कांग्रेस के नाराज लोगों ने अपनी नाराजगी हाईकमान तक पहुंचाने के लिये चिट्ठी पत्र का माध्यम चुना था। इस बार सरकार के मंत्रियों और विधायकों ने खुलेआम अफसरशाही पर निशाना साधते हुये अपरोक्ष में मुख्यमंत्री और हाईकमान दोनों को एक साथ इंगित कर दिया है। ऐसे ही वातावरण में वीरभद्र कांग्रेस के गठन की संभावनाएं भी गंभीरता से तैरना शुरू हो गई है। क्योंकि अनचाहे ही यह संदेश और संकेत खुलेआम चले गये हैं कि मुख्यमंत्री वीरभद्र समर्थकों को किनारे लगातेे चले आ रहे हैं। शिमला, सोलन, सिरमौर और मण्डी संसदीय क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले कांग्रेसियों के क्षेत्र से जितने कार्यकर्ताओं को राजनीतिक तजापोशियां दी गयी हैं उनसे अनचाहे ही कई मंत्रियों और दूसरे प्रभावी नेताओं के सामने इन नियुक्तियों के माध्यम से समानान्तर सत्ता केन्द्र स्थापित किये जा रहे हैं। वैसे भी इन ताजपोशियों में क्षेत्रीय संतुलन को लगभग नजरअन्दाज कर दिया गया है। पिछली बार राज्यसभा सीट इस कारण हारी थी क्योंकि उम्मीदवार प्रदेश से बाहर का व्यक्ति था। इस बार भी यदि पिछले ही क्रम को दोहराया गया तो पहले जैसा ही आचरण होने की संभावनाएं शायद बढ़ जायेगी। फिर पंचायत चुनाव टालने की सरकार ने हर संभव कोशिश कर ली है। सर्वाेच्च न्यायालय तक दस्तक दे दी। लेकिन अन्त में अदालत के फैसले से चुनाव करवाने की बाध्यता आ गयी। इससे भी सरकार के पक्ष में कोई सकारात्मक संदेश नहीं गया। इसी वस्तुस्थिति में राजस्व घाटा अनुदान बन्द होने का फैसला आ गया। सरकार ने 16वें वित्त आयोग के सामने जो भी पक्ष रखा उसका कोई लाभ नहीं मिला। लेकिन इसी संकट के बीच जब एपीएमसी की गाड़ी खरीद का प्रकरण सामने आ गया तो सरकार के प्रति जन सहयोग और सहमति पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग गये। सरकार द्वारा की गई सारी राजनीतिक ताजपोशियां चर्चा में आ गयी। क्योंकि इस आर्थिक संकट के बीच राजनीतिक ताजपोशी पाये एक भी मित्र ने अपने वेतन भत्ते त्यागने या पद छोड़ने की पेशकश नहीं की। इसी कारण सरकार की आज तक की सारी कार्यप्रणाली और फैसले जन समीक्षा का केन्द्र बन गये हैं। जिन अफसरशाहों को उनके दिल्ली से मधुर संपर्क को और रिश्तों के नाम पर सेवानिवृत्ति के बाद भी सेवा विस्तार और पुनः नियुक्तियों से नवाजा गया था वह भी इस आर्थिक संकट में कोई ठोस सहायता नहीं दे पाये। इस समय कुल मिलाकर जो परिस्थितियां निर्मित हो गयी हैं उनसे जो वातावरण बन चुका है उससे राजनीतिक खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। यह स्वभाविक है कि जो लोग सरकार की कार्य प्रणाली पर मत भिन्नता रखते हैं उन्हें अपने रोष को हवा देने का पूरा-पूरा संयोग खड़ा हो गया है। क्योंकि विधानसभा में जिस तरह से महामहिम राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में वित्त आयोग पर आई टिप्पणियों को नहीं पढ़ा है उसका संकेत और संदेश बहुत दूरगामी है यह तय है। इस परिदृश्य में यह संभावना बहुत प्रबल हो गयी है कि इस सब का प्रतिफल सहज नहीं होगा। इसे आने वाले संकट का संकेत मानना ही होगा।

 

आरडीजी की समाप्ति और वित्तीय संकट का असली चेहरा

हिमाचल प्रदेश की वित्तीय स्थिति आज किसी एक फैसले या एक वर्ष की उपज नहीं है, बल्कि वर्षों की लापरवाही, अव्यावहारिक वादों और कमजोर वित्तीय अनुशासन का परिणाम बन चुकी है। सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालते समय जिस ‘‘व्यवस्था परिवर्तन’’ का नारा दिया था, वह आज अपने ही बोझ तले दबता दिखाई दे रहा है। संविधान के तहत चलने वाली स्थापित प्रशासनिक व्यवस्था, वित्तीय नियमों और जवाबदेही के ढांचे से ऊपर आखिर क्या बदला जाना था, यह सवाल आज भी प्रदेश की जनता के सामने अनुत्तरित है। जनता ने कांग्रेस को सत्ता इसलिए सौंपी थी क्योंकि वह पिछली सरकार से असंतुष्ट थी और कांग्रेस ने दस गारंटियों के रूप में एक वैकल्पिक भरोसा प्रस्तुत किया था। लेकिन सत्ता में आते ही जिस तरह श्रीलंका जैसे हालात की चेतावनी देकर भय का माहौल बनाया गया, उससे यह उम्मीद बनी थी कि सरकार खर्च पर लगाम लगाएगी और वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता देगी। व्यवहार में हुआ ठीक इसके विपरीत।
राजस्व घाटा अनुदान यानी आरडीजी की समाप्ति ने सरकार की असल तैयारी और सोच को पूरी तरह उजागर कर दिया है। आरडीजी कोई स्थायी आय का साधन नहीं था, बल्कि सीमित अवधि के लिए दी जाने वाली राहत थी, जिसकी समाप्ति पूर्वनिर्धारित थी। इसके बावजूद राज्य सरकार ने अपनी योजनाओं और खर्च संरचना को इस अनुदान पर निर्भर बना लिया। अब जब यह सहायता बंद हुई है, तो संकट के लिए केंद्र को दोषी ठहराने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविक समस्या राज्य के भीतर है। बीते तीन वर्षों में सरकार ने जनता पर करों और उपकरों का भारी बोझ डालकर करोड़ों रुपये अतिरिक्त राजस्व जुटाया, फिर भी वित्तीय संतुलन नहीं बन पाया। जब सरकार सत्ता में आई थी, तब प्रदेश का कर्ज लगभग 76 हजार करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंच चुका है। यह कर्ज किस विकास में लगा, इसका ठोस और पारदर्शी विवरण आज तक जनता के सामने नहीं रखा जा सका है।
कैग रिपोर्ट ने इस वित्तीय अव्यवस्था की पुष्टि आधिकारिक तौर पर कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार सरकार द्वारा लिए जा रहे कर्ज का बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों में जा रहा है, जबकि विकासात्मक कार्यों के लिए सीमित धन ही बच पा रहा है। नियमों के तहत कर्ज केवल उन्हीं परियोजनाओं के लिए लिया जाना चाहिए जिनसे भविष्य में आय उत्पन्न हो, लेकिन हिमाचल में विकास के नाम पर लिया गया कर्ज रोजमर्रा के खर्चों की भरपाई में झोंका जा रहा है। यही कारण है कि भारी कर्ज और बढ़े हुए करों के बावजूद कर्मचारियों को समय पर वेतन और पेंशनरों को समय पर पेंशन नहीं मिल पा रही है।
सरकार की गारंटियों की जमीनी हकीकत भी वित्तीय प्रबंधन की कमजोरी को उजागर करती है। प्रतिवर्ष एक लाख रोजगार देने का वादा बेरोजगारी के बढ़ते आंकड़ों के सामने दम तोड़ता नजर आता है। महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने की गारंटी कुछ सीमित क्षेत्रों तक ही सिमट गई है। अन्य गारंटियों में लगातार शर्तें जोड़कर उनके दायरे को कम किया जा रहा है। यह सवाल अब स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस को सत्ता में आने से पहले प्रदेश की वास्तविक आर्थिक स्थिति का आकलन नहीं था, या फिर सत्ता प्राप्ति के लिए जानबूझकर ऐसे वादे किए गए जिन्हें निभाना संभव ही नहीं था।
वित्तीय संकट के बीच सरकार के फैसले विरोधाभासों से भरे रहे हैं। एक ओर जनता से त्याग की अपील की जाती है, दूसरी ओर राजनीतिक नियुक्तियां, सलाहकारों की नियुक्ति, निगमों और बोर्डों में मानदेय वृद्धि और प्रशासनिक खर्च लगातार बढ़ते रहे हैं। जिसका सीधा असर प्रदेश की वित्तीय सेहत पर पड़ना स्वाभाविक है।
आरडीजी की समाप्ति के बाद आने वाला समय हिमाचल के लिए और भी चुनौतीपूर्ण होने वाला है। ऐसे में वेतन, पेंशन, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं का सुचारु संचालन सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।
हिमाचल की वित्तीय हकीकत अब नारों और आरोप-प्रत्यारोप से परे है। आरडीजी की समाप्ति कोई अचानक आया तूफान नहीं है, बल्कि पहले से तय प्रक्रिया थी, जिसके लिए समय रहते तैयारी की जा सकती थी। लेकिन सरकार ने खर्च नियंत्रण, राजस्व बढ़ाने और पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन की बजाये अल्पकालिक राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी। परिणामस्वरूप आज प्रदेश कर्ज, करों और अनिश्चित भविष्य के चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है। यदि अब भी ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे हिमाचल के भविष्य का संकट बन जाएगा।

यूजीसी नियमों पर उठे विरोध के परिणाम दूरगामी होंगे

क्या देश में फिर से मण्डल बनाम कमण्डल का खेल खेला जाने की तैयारी हो रही है? यह सवाल यूजीसी द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में बढ़ते जातिगत उत्पीड़न को रोकने के लिये लाये गये नये नियमों के विरोध में उठतेे रोष की पराकाष्ठा को देखते हुये एक बड़ा सवाल बनकर सामने आया है। देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न के मामलों में यूजीसी के अपने मुताबिक ही 2019-20 से 2023-24 तक 118 प्रतिशत की बढ़ौतरी हुई है। इस बढ़ौतरी का अर्थ है कि अब तक जो नियम और प्रावधान इस उत्पीड़न को रोकने के लिये बनाये गये थे उनके वांछित परिणाम नहीं आये हैं। इसलिये नये नियमों की आवश्यकता मानी गयी है। यह आवश्यकता रोहित वेमुला और पायल तड़वी के प्रकरणों के बाद एकदम अनिवार्य हो गयी थी। क्योंकि रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताएं अपने बच्चों को इंसाफ दिलाने के लिये अदालत तक पहुंची और यह मामला सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंच गया। सर्वाेच्च न्यायालय की उसी पीठ के सामने यह मामला आया था जिसने अब इन नियमों पर रोक लगाई है। जब यह मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पहली बार सामने आया था तब सर्वाेच्च न्यायालय ने जातिगत उत्पीड़न को लेकर बनाये गये नियमों को नाकाफी करार देकर तुरन्त प्रभाव से नये नियम बनाने के लिये कहा था। सर्वाेच्च न्यायालय के ही निर्देश पर यह नये नियम लाये गये थे और अब जब नियमों पर स्वर्ण जातियों ने विरोध का स्वर उठाया तब सर्वाेच्च न्यायालय ने इन नियमों पर तुरन्त प्रभाव से रोक लगा दी। इस रोक पर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं कुछ भाजपा नेताओं की आयी हैं उससे और कई शंकाएं उभर आयी हैं क्योंकि केन्द्र सरकार ने सर्वाेच्च अदालत में अपने ही बनाये नियमों के पक्ष में कुछ नहीं कहा है। इसी से सरकार की नीयत और नीति पर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा संघ परिवार की एक राजनीतिक इकाई है। यह एक स्थापित सच है। संघ देश में हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना चाहता है और इसका हर प्रयास इस दिशा में उठा एक कदम है। यदि किसी कारण से संघ को अपने इस उद्देश्य को छोड़ना पड़े तो संघ में ही सबसे बड़ा विरोध और विद्रोह देखने को मिलेगा। संघ भाजपा के रिश्तों का आकलन इसी तथ्य से किया जा सकता है कि भाजपा में संगठन मंत्री का पद हर स्तर पर संघ के ही प्रतिनिधि को सौंपा जाता है। देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है इसलिये देश के ढांचे में कोई भी बदलाव सविधान को बदले बिना नहीं हो सकता और संविधान को संसद के रास्ते सरकार के माध्यम से ही बदला जा सकता है। 2024 से आज 2026 तक सरकार को जब भी मौका मिला है उसने संविधान को बदलने के लिये कदम उठाये हैं। लेकिन आज केन्द्र की मोदी नीत भाजपा सरकार जिस तरह अपना आधार लगातार खोती जा रही है उसमें भाजपा संघ की कठिनाइयां भी बढ़ती जा रही है। क्योंकि 2024 से लेकर आज तक सरकार के मंत्रालय और उसकी विभिन्न योजनाओं की जो रिपोर्ट संसद के पटल पर आयी है उनसे सरकार की परफॉरमैन्स और नीयत पर सवाल गहराते जा रहे हैं। क्योंकि सरकार का चुनाव जीतने का सच वोट चोरी के तथ्यात्मक प्रमाणों के बाद प्रश्नित हो गया है। सरकार की यह स्थिति कहीं नई पीढ़ी में चर्चा का विषय न बन जाये यह सबसे बड़ा सवाल इस समय बन चुका है। नई जनरेशन को इस सवाल पर अपना ध्यान केंद्रित करने से रोकने के लिये ही मण्डल बनाम कमण्डल पहले खड़ा हुआ था और आज उसी तर्ज पर यूजीसी के नियमों पर विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है। स्मरणीय है जब ओबीसी को 27% आरक्षण का प्रावधान किया गया था तब उसका विरोध करने के लिये इस आरक्षण के विरोध में आन्दोलन खड़ा किया गया था इस विरोध में तब आत्मदाह तक हुये थे। इस परिदृश्य में यूजीसी नियमों पर उठे विरोध के परिणाम दूरगामी होंगे।

भ्रष्टाचार और काले धन पर घिरती मोदी सरकार

केन्द्र में 2014 में भ्रष्टाचार और काले धन के जिन मुद्दों पर सत्ता परिवर्तन हुआ था क्या उन मुद्दों से देश को मोदी के 11 वर्ष के शासन में निजात मिल गयी है या उनका आकार आज पहले से भी कहीं गुना बढ़ गया है? यह सवाल गौतम अडाणी का मुद्दा सामने आने के बाद हर भारतीयों के लिए एक चिन्ता और चिन्तन का विषय बन गया है। क्योंकि यह मुद्दा अमेरिकी अदालत में पहुंचने के बाद भारत सरकार और प्रधानमंत्री ने जिस तरह की प्रतिक्रियाएं इस पर दी हैं उससे यह और जटिल हो गया है। क्योंकि इन प्रतिक्रियाओं से जहां गौतम अडाणी और प्रधानमंत्री मोदी के संबंधों की प्रगाढ़ता सामने आयी है उससे यह आशंका बढ़ गयी है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन शब्दों के साये में भारत को अपनी शर्तों पर व्यापार समझौता करने के लिए विवश कर सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो भारत की स्थिति आने वाले समय में वेनेजुऐला जैसी होने का खतरा है। इस पूरे परिदृश्य में यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या भारत सरकार इस स्थिति पर देश की जनता के सामने सारे तथ्यों को रखने का साहस कर पायेगी। क्योंकि आज गौतम अडाणी का संकट पूरे देश का संकट बनता जा रहा है। क्योंकि अडाणी को लेकर जब भी देश में सवाल उठे हैं तो मोदी सरकार ने उनका जवाब देने की बजाये विषयान्तर करने का ही विकल्प चुना है। आज अडाणी अमेरिकी अदालत में जिस तरह से घिर गये हैं उसका नुकसान पूरे देश को होगा यह तय है। क्योंकि अडाणी पर उठे सवाल भ्रष्टाचार और काले धन के स्पष्ट प्रमाण हैं जिन पर मोदी सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। लेकिन जिस अनुपात में अडाणी संकट सामने है उसी अनुपात में भारत सरकार इसके तथ्यों को देश के सामने रखने की बजाये उन्हें विषयान्तर करके दबाने का प्रयास कर रही है। इसलिए मोदी सरकार से सीधे सवाल करने का समय आ गया है। 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनाव जिस बहुमत के साथ विषयान्तर करके मोदी भाजपा ने जीते उनका सच पिछले चुनाव में सामने आ गया है। इस चुनाव के बाद वोट चोरी का सच सामने आ गया है। बिहार में चुनाव परिणामों को लेकर मामला उच्च न्यायालय में पहुंच चुका है। कर्नाटक में इस पर मामला दर्ज है। अब कर्नाटक राज्य चुनाव आयोग ने वहां नगर निगमों के चुनाव ईवीएम मशीनों की जगह मत पत्रों से करवाने का फैसला लिया है। इस चुनाव में करीब 90 लाख मतदाता वोट डालेंगे। यह चुनाव एक ही दिन में होंगे और उनके परिणाम भी एक ही दिन में आ जाएंगे। भाजपा मत पत्रों के माध्यम से चुनाव करवाये जाने का विरोध कर रही है। यदि कर्नाटक में यह प्रयोग सफल रहता है तो शीर्ष अदालत और चुनाव आयोग के सामने मत पत्रों से चुनाव न करवाने का ठोस तर्क नहीं बचेगा। इस समय भाजपा सरकारों पर यह आरोप लगातार गहराता जा रहा है कि यह सरकारें न्यायपालिका पर पूरे नियंत्राण के प्रयासों में लगी हुई है। ई.डी. और सीबीआई के दुरुपयोग पर ममता सरकार केन्द्र के साथ सीधे टकराव पर आ गयी है। मामला उच्च न्यायालय और सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंच गया है। इसी बीच शंकराचार्य प्रकरण पर पूरे हिन्दू समाज में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं उभरी हैं उससे भाजपा का हिन्दुत्व प्रश्नित हो गया है। कुल मिलाकर जिस तरह की परिस्थितियां निर्मित होती जा रही हैं उससे मोदी सरकार अपने ही एक समय पर उठाये गये सवालों में घिरती जा रही है।

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