शिमला/शैल। भारतवर्ष का पर्यटन उद्योग प्रतिवर्ष लगभग 1500 करोड़ अमेरिकी डाॅलर की विदेशी मुद्रा के अर्जन के साथ ही लगभग 1.5 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी का साधन है। विदेशी मेहमानों के लिए हमारे देश में पर्यटन के हर रंग विद्यमान हैं। एक समृद्ध इतिहास की गाथा गाते प्राचीन से प्राचीनतम हमारे दुर्ग, ऐतिहासिक धरोहरें, अति रोचक पुरातात्विक महत्त्व की वस्तुएं, विभिन्न प्रकार की सांस्कृतियां, साम्प्रदायिक सोहार्द का वातावरण, विभिन्न रंगों में रंगे उत्सव और त्यौहार, अगणित प्रकार की पारम्परिक वेशभूषाएं, नाना प्रकार के व्यंजन, मुम्बई जैसे अत्याधुनिक शहर से लेकर समाज की मुख्यधारा से नितान्त विरक्त आदिवासी प्रजातियाँ, सैकड़ों किलोमीटरों
में फैले रेगिस्तान, वन्यजीवों से सुशोभित राष्ट्रीय उद्यान, कल कल करती हजारों मीलों लम्बी नदियाँ, विशाल झरने, महासागरों के अति सुन्दर किनारे, विशाल मन्दिर, मस्जिद, गिरिजाघर, गुरूद्वारे, बौद्ध मोनेस्ट्री, साल भर बर्फ से ढकी पर्वतीय क्षेत्रों की गगनचुंबी चोटियाँ, विशाल हिमखण्ड, हिमनद, पर्वतों के रोचक टेड़े-मेढ़े रास्ते, रमणीक हृदयंगम प्राकृतिक दृश्य और सबसे महत्वपूर्ण बात हमारी ‘अतिथि देवो भवः’ की संस्कृति। आखिर क्या नहीं है हमारे भारत में, एक पर्यटक को आकर्षित करने के लिए।
हिमालय पर्वत में बसे हिमाचल प्रदेश की बात कुछ और ही है। शीतल जलवायु, प्रदूषण रहित, शान्त, सुरक्षित वातावरण एवं सरल जनमानस के कारण हिमाचल आज भारतवर्ष के अव्वल नम्बर के पर्यटन स्थलों में से एक है। ईश्वर ने हमें दिल खोलकर प्राकृतिक सौन्दर्य का उपहार प्रदान किया है। 60 से 80 के दशक का एक समय वह था जब भारत की सारा की सारा फिल्म उद्योग अपने चलचित्रों में रमणीक दृश्य शामिल करने के लिए हिमाचल और कश्मीर जैसे पर्वतीय प्रदेशों की और रूख करता था और दूर दराज के प्राकृतिक सौन्दर्य को अपने कैमरों में कैद करता था। पर्यटन विकास में फिल्म उद्योग का भी महत्वपूर्ण योगदान माना जा सकता है। संभवतः इसी से प्रेरित होकर पर्यटकों ने हिमाचल और कश्मीर जैसे पर्वतीय राज्यों की और रूख किया। आज ग्लोबल वार्मिंग और बदलती जलवायु के कारण भी ग्रीष्मकाल में मैदानी क्षेत्रों के पर्यटक पर्वतीय क्षेत्रों की ओर रूख करते हैं। हिमाचल पर्यटन आज चरम पर है। वर्ष 2014 में प्रदेश में कुल 1 करोड़ 63 लाख पर्यटक से अधिक पहुंचे। वर्ष 2016 की समाप्ति तक इस आंकड़े का 2 करोड़ तक छूने का अनुमान है। हिमाचल प्रदेश वित्तीय वर्ष 2016-17 के बजट में पर्यटन और परिवहन के लिए अनुमानित राजस्व व्यय रू. 1752 करोड़ है, जो कि कुल अनुमानित राजस्व व्यय का 6.55% है। ‘हिमाचल प्रदेश पर्यटन विकास निगम’ का प्रदेश के कुल राजकोष में 10% प्रतिवर्ष का योगदान होता है। प्रदेश में लाखों व्यक्ति प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से पर्यटन व्यवसाय से जुड़े हुए हैं, जिससे प्रदेश में करोड़ों रूपयों की आय होती है। पर्यटन व्यवसाय दिन दोगुनी-रात चैगुनी तरक्की कर रहा है। मगर चिन्ता का विषय है कि हिमाचल के गठन के 45 वर्षो में कई सरकारें आयी और गई, मगर अनुपातिक रूप पर्यटन अविकसित ही रहा। आज भी यहाँ पर्यटकों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। प्रकृति प्रदत्त उपहार को सहेजेने में हम लगभग विफल रहे हैं। पर्यटक एक बार आने के पश्चात् दोबारा आने के पहले कई बार सोचते हैं। आखिर ऐसा क्यों? पर्यटन की स्थिति भविष्य में यथावत बनी रहे, इसके लिए कुछ कठोर कदम उठाने आवश्यक हो गए हैं
हिमाचल का नाम ‘हिम’ अर्थात बर्फ पर आधारित है। मगर बढ़ते शहरीकरण के कारण बर्फबारी वर्ष-दर-वर्ष घट रही है, जो चिन्ता का विषय है। बर्फ ही नहीं रहेगी तो हिमाचल के नाम का औचित्य ही समाप्त हो जायेगा। वैध-अवैध निर्माण पर अंकुश लगाकर वर्ष-दर-वर्ष बढते तापमान और घटती बर्फबारी पर नियंत्राण किया जाये, तभी पर्यटन का भविष्य सुरक्षित माना जा सकता है।
पर्यटक यहाँ की मनमोहक हरियाली से सर्वाधिक प्रभावित है। प्रयास इस बात के लिए किये जाएँ कि यहाँ की हरियाली नष्ट न होने पाए और वातावरण में शुद्धता बनी रहे। हम वैध-अवैध निर्माण और विकास के नाम पर प्राकृतिक वातावरण नष्ट कर रहे हैं और कंकरीट के जंगल खड़े कर रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार एक पेड़ वर्षभर में 650 पोंड आॅक्सीजन देता है, जो दो व्यक्तियों को वर्षभर के लिए पर्याप्त होती है। शिमला-कालका फोरलेन के लिए 25000 पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलायी जा रही है। साथ ही शिमला-मनाली फोरलेन का कार्य प्रारम्भ किया जा रहा है। साथ ही बहुत सारे राजमार्गों की घोषणा करके सरकारें अपनी पीठ थपथपा रही हैं। लेकिन अन्जाम क्या होगा? कंकरीट के जंगल खड़े करने के बजाय हरियाली को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। अन्यथा 100 वर्षों बाद पर्यटकों को फोटो खींचने के लिए भी पेड़ एवं हरियाली ढूँढनी पड़ेगी।
यूनेस्को विश्व हेरिटेज कालका-शिमला रेलवे की स्थिति ब्रिटिश काल से लगभग वही है। वही पुराने स्टेशन, वही सुरंगें और वही पुल। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए भी कोई प्रचार प्रसार नहीं, इसीलिए उनको इसका ज्यादा ज्ञान भी नहीं है। फोरलेन और राजमार्गों में हम बहुत ज्यादा उत्सुक हैं, जिनको बनाने के लिए जंगल के जंगल और साफ किये जा रहे हैं। रेलवे एवं हवाई अड्डों को विकसित किया जाये तो निश्चित रूप से पर्यटकों की कुछ नया मिलेगा, साथ ही पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी यह उचित होगा।
नित्य हजारों की संख्या में निजी वाहन प्रदेश में पहुँच रहे हैं। जिनको शिमला जैसे बड़े स्थलों में पार्किंग की समस्या से जूझना पड़ रहा है। पर्यटक वाहनों को सुविधा देने के बजाय सरकार ‘नो-पार्किंग’ का चालान काटकर यातायात व्यवस्था सुधार रही है और अपना जेब भर रही है, जो कि सर्वथा अनुचित है। इससे पर्यटकों की मानसिकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अगर सडकों पर अवैध अतिक्रमण सम्पूर्ण रूप हटा दिया जाये तो वाहनों के लिए पर्याप्त स्थान उपलब्ध हो सकता है और पार्किंग की समस्या संपूर्ण रूप से हल हो सकती है।
अनगिनत वाहनों की संख्या को नियंत्रित कर, पर्यटन विभाग की ओर से दो या तीन दिन के पैकज के हिसाब से सार्वजनिक परिवहन जैसे बसें व टैक्सी उपलब्ध करवानी चाहिए। इससे सडकों पर वाहनों को संख्या भी नियंत्रित होगी साथ ही पर्यटन भी किफायती होगा।
पुराने और उबाऊ पड़ चुके पर्यटन स्थलों के अलावा भी दूर दराज के क्षेत्रों में नए स्थान जैसे बाग-बगीचे, चिल्ड्रनस पार्क, वाटर स्पोर्ट्स, ट्रैकिंग मार्ग, हरे-भरे रिसाॅर्ट्स, फोटोग्राफी साइट्स, प्राचीन धरोहर आदि को विकसित जायें तो पर्यटकों को कुछ नया आकर्षण मिलेगा और वो बार-बार आने को लालायित रहेगा
हिमालय की गोद में बसे होने के कारण प्रदेश में ‘जीओ-टूरिज्म’ अर्थात ‘भू-पर्यटन’ की अपार संभावनाएँ बनती हैं। इस पर कुछ प्रयास भी हुए पर सिरे न चढ़ सके। ‘भू-पर्यटन’ लिए ऐसे स्थान चयनित करने होते हैं, जो भू-वैज्ञानिक और भौगोलिक दृष्टि से आकर्षक हों। जैसे चूनापत्थर की प्राकृतिक गुफाएं एवं उनमे पाई जाने वाली स्टेलेकटाईट एवं स्टेलेगमाईट स्थालाकृतियाँ, प्राकृतिक सन्तुलन बनाती विशाल चट्टानें, प्राकृतिक सुरंगें, धरती से फूटते झरने आदि। ऐसे स्थान यदि पर्यटन के लिए विकसित किया जाये तो निश्चित की यह पर्यटकों के एक विशेष वर्ग के लिए अति रोचक प्रतीत होंगे।
पर्यटन के लिए एक ऐसा स्वस्थ वातावरण तैयार हो कि पर्यटक को ग्राहक की दृष्टि से न देखकर अतिथि के रूप में देखा जाये।
ईश्वर के प्राकृतिक सौन्दर्य रुपी इस उपहार को अगर हम समय रहते नहीं सहेज पाए तो दूरगामी परिणाम अत्यंत भयानक होंगे। समय के साथ अगर हिमाचल पर्यटन को विकसित न किया गया तो हिमाचल भी प्रदूषण, अतिक्रमण, गर्मी, सूखा, अनावृष्टि आदि का शिकार हो जायेगा एवं पर्यटक यहाँ से मुंह मोड़ने लगेगा। जिसका प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभाव यहाँ के पर्यटन व्यवसाय आर्थिक व्यवस्था पर निश्चत रूप से पड़ेगा।
शिमला/शैल। दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार का अपने गठन के पहले दिन से लेकर ही मोदी का केन्द्र सरकार से टकराव चल रहा है। केन्द्र सरकार केजरीवाल को अराजकतावादी तक करार दे चुकी है। आम आदमी पार्टी ने भी मोदी सरकार को खुली चुनौती दे रखी है कि वह हटने वाली नहीं है। दोनों सरकारों के बीच चल रहा यह टकराव आज आम आदमी में चर्चा का केन्द्र बन चुका है। यह टकराव मोदी की भाजपा और केजरीवाल की आप पर क्या असर डालेगा यह तो आने वाले समय में ही स्पष्ट हो पायेगा। लेकिन इस टकराव से देश को लाभ होगा यह
तय है। क्योंकि इस समय देश एक राजनीतिक बदलाव के दौर में गुजर रहा है। देश में व्यवस्था के खिलाफ पहली बार स्व. जय प्रकाश नारायण की समग्रक्रान्ति से जो स्वर उभरे थे उन्हे आज एक स्पष्ट दिशा-दशा मिलने के संकेत झलकते नजर आ रहे हैं। यहां तक पहुंचने के लिये देश नेे जनता पाटी्र्र के टूटने से लेकर स्व. वी.पी.सिंह की भ्रष्टाचार के खिलाफ खुली लड़ाई उसके बाद मण्डल बनाम कमंडल और फिर रामदेव तथा अन्ना आन्दोलन का एक लम्बा दौर देखा है। इसमें किसकी क्या भूमिका रही है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह रहा है कि हर बार कांग्रेस के समस्त विकल्प की तलाश मुख्य बिन्दु रहा है। क्योंकि बहुभाषी और बहुधर्मी देश की संस्कृति ने वाम विचारधारा तथा आर एस एस की हिन्दु अवधारणा को कभी विकल्प के रूप में नहीं स्वीकारा है। यदि ऐसा होता तो वाम दल केरल, बंगाल और त्रिपुरा से निकलकर केन्द्र तक में स्वीकार्य हो चुके होते। संघ भी 1967 में पहली बार जन संघ को सबिं( सरकारों में कुछ राज्यों में मिली भागीदारी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता बना चुका होता।
केजरीवाल और मोदी के टकराव को इस बड़े परिप्रेक्ष में देखना होगा। मोदी और भाजपा का मूल आधार संघ है। संघ अपने गठन से लेकर आज तक हिन्दु अवधारणा पर टिका हुआ है। हिन्दु अवधारणा को आगे बढ़ाने के लिये समान नागरिक संहिता, धारा 370 और राम मन्दिर निर्माण जैसे मुद्दे इसका मुख्य आधार रहें हैं। आज केन्द्र में 282 सीटें जीतकर संघ का आर्थिक चिन्तन भी भामाशाही अवधारणा पर टिका है। इसके लिये उसे अदानी-अंबानी जैसे भामाशाह पोषित करना भी अनिवार्यता है। संघ-भाजपा को अपने हिन्दु ऐजैण्डे को आगे बढ़ाने में कांग्रेस और वामदलों से कोई चुनौती नहीं है। क्योंकि कांग्रेस को भ्रष्टाचारी छवि के आरोपों से बाहर निकलने में बहुत वक्त लगेगा। वामदल भी बंगाल खोने के बाद बचाव की मुद्रा में चल रहे हैं। ऐसे में केवल केजरीवाल की आप ही रह जाती है जिससे मोदी-भाजपा को खतरा हो सकता हेै।
भाजपा को केजरीवाल से खतरा क्यों है? इस सवाल को समझने के लिये थोड़ा सा अन्ना आन्दोलन को समझना होगा। अन्ना आन्दोलन संघ का प्रायोजित ऐजैण्डा था यह स्पष्ट हो चुका है। केजरीवाल और आप भी इसी आन्दोलन का प्रतिफल है। आज संयोगवंश केजरीवाल और अन्ना के रास्ते अलग हो चुके हंै। केजरीवाल तो आप बनाकर भाजपा-कांग्रेस का विकल्प बनते नजर आ रहे हंै। लेकिन अन्ना अपने आन्दोलन का फिर से आह्वान कर पाने की स्थिति में नहीं है। केजरीवाल पहले कभी राजनीतिक सत्ता में नही रहे हंै और आज भी अपने पास कोई विभाग न रखकर सत्ता के विकेन्द्रीकरण के ऐजैण्डे को मूर्त रूप दे दिया है। आज केजरीवाल और मोदी सरकार में दिल्ली सरकार के अधिकारों की व्याख्या और सीमा ही टकराव का केन्द्र बिन्दु है। इस मुद्दे को लेकर आप सरकार सर्वोच्च न्यायालय में पहंुच चुकी है और सर्वोच्च में दो न्यायधीश इस इस मुद्दे की सुनवाई से बिना कारण बताये पीछे हट गये हैं। इससे अधिकारों के इस मामले में ठोस आधार का होना स्पष्ट होता है। इस परिदृश्य में केजरीवाल और आप का पक्ष जायज नज़र आता है। इससे राष्ट्रीय स्तर पर केजरीवाल की स्वीकार्यता बनती नजर आ रही है। क्योंकि कांग्रेस-भाजपा और वामदलों को छोड़कर बाकी दल अपने हर आयोजन में केजरीवाल को आमन्त्रिात करने लग गये हैं। ऐसे में केजरीवाल को भी कुछ मामलांे में विशेष सावधानी से चलना होगा। उनके राजनीतिक और प्रशासनिक सहयोगीयों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के हर आरोप पर पूरी सावधानी से कदम उठाने होगें। क्योंकि जब उनके पहले कानून मंत्राी पर आरोप लगे थे तब शुरू में उन्होंने उसका बचाव किया लेकिन जैसे ही पूरे तथ्यों की जानकारी मिली तो अपना स्टैण्ड बदला और जनता को स्पष्ट बताया भी। आज उनके प्रधान सविच की गिरफ्तारी के मामले में भी देश उनसे वैसी ही स्पष्टता की उम्मीद रखता है। इसी के साथ आगे संगठन को बढ़ाने के लिये जहां भी इकाई गठित की जायेगी वहां पदाधिकारियो का चयन करते समय पर्याप्त सावधानियां बरतनी होंगी।
शिमला। 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है क्योंकि उसकी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और मंहगाई के जो आरोप लगे उनका वह जवाब नहीं दे पायी। जनता ने उसे भ्रष्टाचारी सरकार कहकर सत्ता से बेदखल कर दिया। इस बेदखली के बाद राज्यों की विधान सभाओं के जो भी चुनाव हुई उनमें पांडीचेरी को छोड़कर और कहीं भी कांग्रेस सत्ता में नही आयी। दिल्ली में तो शून्य पर चली गयी। दिल्ली के बाद बिहार और बंगाल में भले ही पार्टी का प्रदर्शन कुछ अच्छा रहा है लेकिन इसका श्रेय अकेले कांग्रेस को नही जाता है। यह श्रेय चुनावी गठबन्धन के दूसरे सहयोगीयों को उसी बराबरी में जाता है। अब पंजाब में 2017 जनवरी में चुनाव होने हंै और इसके लिए अभी से तैयारी शुरू कर दी गयी है। इसी तैयारी के परिदृश्य में कांग्रेस ने पंजाब में वरिष्ठ नेेता कमल नाथ को यहां का प्रभार दिया। लेकिन 1984 में दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों में रही कमल नाथ की भूमिका को लेकर सवाल उठने शुरू हो गये। इन सवालों के दवाब में कमल नाथ को पंजाब से हटाना पड़ा। कमल नाथ के बाद आशा कुमारी को वहां का प्रभार दिया गया। लेकिन संयोग वश आशा कुमारी को जमीन के मामले में ट्रायल कोर्ट से एक साल की सजा हो चुकी है। भले ही अपील में अब यह मामला हिमाचल उच्च न्यायालय में है लेकिन जब तक उच्च न्यायालय से क्लीन चिट नही मिल जाती है तब तक आशा कुमारी के खिलाफ सजा का यह फतवा जनता में यथा स्थिति बना रहेगा।
आशा कुमारी को यह जिम्मेदारी दिये जाने पर भाजपा और आम आदमी पार्टी ने कड़ी प्रतिक्रियाएं जारी करते हुए इसे कांग्रेस द्वारा जन-अनादर करार दिया है। इन प्रतिक्रियाओं का कांग्रेस ने इसे पार्टी का अंदरूनी मामला कहा है। यह ठीक है कि पार्टी किस आदमी को कहां क्या जिम्मेदारी देना चाहती है यह उसका अपना मामला है। लेकिन जब पार्टी जनता के बीच वोट मांगने-सत्ता मांगने जाती है तो वह जनता से पहला वायदा स्वच्छ शासन-प्रशासन देने का करती है। आज हर पार्टी पर यह आरोप लग रहा है कि वह अपने संगठन और पैसे के दम पर आपराधियों को चुनावों में उम्मीदवार बनाकर उतार रही है। लोकतन्त्रा में लोक लाज बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील भूमिका अदा करती है। लोकलाज के लिये सबसे पहली आवश्यकता नेता की अपनी छवि का स्वच्छ होना है। आज आशा कुमारी के लिये और पार्टी के लिये यह धर्म संकट की स्थिति होगी जब उसके सामने कोई ऐसा व्यक्ति चुनाव का टिकट मांगने के लिये आ जायेगा जिसके खिलाफ कोई अपराधिक मामले खडे हों। ऐसे व्यक्ति को किस नैतिक अधिकार से वह मना कर पायंेगी। आज चुनाव के परिदृश्य में पार्टी ने आशा कुमारी को यह जिम्मेदारी देकर यह सवाल खड़े कर लिये कि क्या पार्टी में स्वच्छ छवि के लोगों की कमी है? क्या पार्टी आज किसी भी नेता के खिलाफ लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों का संज्ञान लेने को तैयार नही है?
भ्रष्टाचार के आरोपों के साये में सत्ता से बेदखल हुई कांग्रेस ने क्या अभी तक हार से कुछ नही सीखा? आज मोदी सरकार जिन योजनाओं को लेकर जनता में अपनी सफलता का राग अलाप रही है उन सबकी नीव कांग्रेस में रखी गयी थी। कम्यूटरीकरण का सपना सबसे पहले स्व. राजीव गांधी ने देखा था। स्व0 चन्द्रशेखर के प्रधानमन्त्राी काल में जब सोना गिरवी रखकर कर्ज लिया गया था तो क्या नरसिंह राव और मनामोहन सिंह की सरकारों ने देश को उस स्थिति से बाहर नहीं निकाला। सब्सिडी का पैसा सीधे उपभोक्ता के खाते में ले जाने की योजना क्या मनमोहन सिंह की नहीं थी। जिस मनरेगा को लेकर मोदी ने इसे कांग्रेस का कंलक कहा था क्या आज उसको भाजपा अपनी उपलब्धि नही बता रही है? जब आधार योजना शुरू की गयी थी तक क्या इसका भाजपा ने विरोध नही किया था और उसे आज अपनी सफलता करार दे रही है। ऐसे बहुत सारे मुद्दे हैं जिन पर कांग्रेस भाजपा को घेर सकती है लेकिन ऐसा कर नही पा रही है क्योंकि पार्टी अपने भीतर बैठे भ्रष्टाचारीयों को बाहर का रास्ता दिखाने का साहस नहीं कर पा रही है और यही उसका सबसे बडा संकट है।
एफ डी आई कुछ सवाल !
शिमला:- केन्द्र सरकार ने पन्द्रह क्षेत्रों में एफ डी आई निवेष के मानदण्डो में संशोधन किया है। इस संशोधन से कई क्षेत्रों में सौ फीसदी विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया गया है। जिन क्षेत्रों में सौ फीसदी विदेशी निवेश को हरी झण्डी दी गई हैं उनमें टाऊनशिप, शापिंग काम्पलैक्स, व्यापारिक केन्द्रो का निर्माण, काफी रबर और कुक तेल, मैडिकल उपकरण रेवले, तथा एटीएम आप्रेशनज आदि शामिल है। गैर प्रवासी भारतीयों को फेेमा के शडूयल चार में संशोधन चार में संशोधन करके खुले निवेश की सुविधा देे दी गयी हैं विकासात्मक निर्माण के क्षेत्रा में एफ डी आई के तहत होने वाले निवेश में एरिया की न्यूतम और अधिकतम
सीमाओं की बंदिश से भी छुट दे दी गई है। इसमें केवल 30% हाऊसिंग गरीब तबकांे के लिये होनी चाहिये की ही शर्त रखी गई है। प्राईवेट सैक्टर के बैंको में 74% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सुविधा कर दी गई हैं एफडी आई के तहत होने वाले उत्पादन को निर्माता सीधे सरकार की अनुमति के बिना ही थोक और खुदरा तथा ई-कार्मस के माध्यम से बेचने के लिये स्वतन्त्रा रहेंगे । इस तरह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कृषि पशुपानल आदि क्षेत्रों के लिये खोल दिया गया है। सौ फीसदी निवेश वाले क्षेत्रों में सरकार की स्वीकृति की भी आवश्यकता नही है। निवेशक के मानदण्डों में सशोंधन का प्रभाव आम आदमी पर क्या पडेगा इसका खुलासा तो आने दिनो में ही सामने आयेगा। लेकिन यह तय है कि जब निर्माताओं को थोक और खुदरा बिक्री ई कामर्स के माध्यम से दे दी गयी है तो इसकी सीधा प्रभाव हर क्षेत्रा के छोटे और मध्यम स्तर के दुकानदार पर पेड़गा। क्योंकि इस क्षेत्रा में कार्यरत दुकानदार और छोटा कारखानेदार विदेशी वस्तुओं की बराबरी नहीं कर पायेगा। एमजान और स्नैपडील को ई कामर्स को लेकर मध्यम स्तर का दुकानदार पहले ही चिन्ता जता चुका है। सरकार इस विदेशी निवेश के माध्यम से देश को निर्माण का केन्द्र बनाना चाहती है। सरकार का दावा है कि इससे रोजगार के अवसर बढेगें ।
लेकिन इसी विदेशी निवेश को लेकर जब यूपीए सरकार ने पहल की थी तब भाजपा के वरिष्ठ नेता डाक्टर मुरली मनोहर जोशी और आज केन्द्रिय मन्त्री राजीव प्रताप रूडी इसके प्रखर आलोचकों के रूप में सामने आये थे। आज संघ से जुडा स्वदेशी जागरण मंच इस निवेश का विरोध कर रहा हैं यह विरोध अगर यूपीए के समय में जायज था तो आज भी यह उतना ही जायज और प्रासंगिक है। इस संद्धर्भ में कुछ बुनियादी सवाल खड़े होते है क्योंकि जब से विदेशी निवेश के दारवाजे खूले है तब से मंहगाई और बेरोजगारी के आंकडे बढे़ हैं ऐसा क्यों हुआ है इसके कई अध्ययन सामने आ चुके है। मूल प्रश्न है कि हमें विदेशी निवेश आवश्यकता क्यों है? क्या देश के काले धन के विदेशों में पड़े होने के बडे़ बड़े आंकडे आये थे। इस काले धन को वापिस लाकर प्रत्येक के बैंक खाते में पन्द्रह लाख आने के दावे किये गये थे जो पूरे नहीं हुए है और न ही हो सकेगें।
एफडीआई को लेकर यह भी आशंका जताई जा रही है कि इसके माध्यम से अपने ही कालेधन को निवेश के रूप में सामने लाया जायेगा।
यह आशंका कितनी सही हैं इसका खुलासा भी आने वाले दिनों में ही सामने आयेगा। लेकिन आज हाऊसिग निमार्ण के सारे क्षेत्रों में शतप्रतिशत विदेशी निवेश की स्वीकृति दे दी गयी है। जबकि देश के अन्दर बिल्डर अब माफिया की शक्ल ले चुका है। इस बिल्डर माफिया को नियन्त्रित करने की सरकारों से मांग की जा रही है। लेकिन एफ डीआई के नाम पर आने वाले इन बिल्डरों को हर तरह की छूट का प्रावधान कर दिया गया है क्यों? सरकार निवेश के लिए पूंजी आमन्त्रित करना चाह रही है जो क्या इसका यह सरलतम तरीका नहीं हो सकता कि इस कथित काले धन को देश के अन्दर निवेश के रास्ते खोल दिये जाये। आज देश का लाखों करोड़ का काला धन विदेशों में पडा हेै उससे देश में किसी को कोई लाभ नही मिल रहा है। यदि इस काले धन पर से सारी बंदिशे हटाकर भयमुक्त करके सीधे निवेश के लिये आमन्त्रित कर लिया जाये तो पूंजी की सारी समस्या ही हल हो जाती है।
दिल्ली की केजरीवाल सरकार द्वारा नियुक्त इक्कीस संसदीय सचिवों के भविष्य पर तलवार लटक गयी है। इन विधायकों की सदस्य रद्द होने की संभावना बढ़ गयी है क्योंकि संसदीय सचिव के पद को लाभ के पद की परिभाषा से बाहर रखने के आश्य का एक विधेयक दिल्ली विधानसभा से पारित करवाकर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिये भेजा था। दिल्ली को अभी तक पूर्णराज्य का दर्जा प्राप्त नहीं है। इसलिये यह विधेयक केन्द्र सरकार के माध्यम से राष्ट्रपति के पास गया। केन्द्र सरकार ने इस पर प्रक्रिया संबधी कुछ तकनीकी टिप्पणीयां के साथ यह बिल राष्ट्रपति को भेजा। लेकिन इन तकनीकी टिप्पणीयों के कारण राष्ट्रपति भवन से इसकी स्वीकृति नही मिली। स्वीकृति न
मिलने से यह मुद्दा एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया हैं क्योंकि देश के लगभग राज्यों में वहां के मुख्यमन्त्राीयों ने संसदीय सविच/ मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त कर रखें हंै। इसमें हर राजनीतिक दल ने अपनी-अपनी सरकारों में इस तरह की राजनीतिक नियुक्तियां कर रखी हैं।
हिमाचल प्रदेश में नौ मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त हंै। विधानसभा में जब माननीयों के वेतन भत्ते बढ़ौतरी के बिल आये हैं उनमें मुख्यसंसदीय सचिवों का उल्लेख अलग से रहा है। इनके वेतन भत्ते मंत्रीयों से कम और सामान्य विधायकों से अधिक रहे हंै। इन्हें सचिवालय में अलग से कार्यालय मिले हुए हंै। सरकार से मन्त्रीयों के समान सुविधायें इन्हें प्राप्त हैं। कार्यालय में पूरा स्टाफ है तथा सरकार से गाड़ी ड्राईवर और उसके लिये पैट्रोल आदि का सारा खर्च सरकार उठा रही है। पदनाम को छोड़कर अन्य सुविधायें इन्हें मन्त्रीयों के ही बराबर मिल रही है। बल्कि प्रदेश के लोकायुक्त विधेयक में तो इन्हें मन्त्री परिभाषित कर रखा है।
स्मरणीय है कि वर्ष 2005 में एक संविधान संशोधन के माध्यम से केन्द्र और राज्यों की सरकारों में मन्त्रीयों की संख्यां एक तय सीमा के भीतर रखी गयी है। हिमाचल में मन्त्रीयों की अधिकतम सीमा मुख्मन्त्री सहित बारह है। दिल्ली में यह संख्या सात तक है। लेकिन राजनीतिक समांजंस्व बिठाने के लिये संसदीय सचिवों की नियुक्तियां हो रखी हैं। नियमों के मुताबिक संसदीय सचिव को किसी विभाग की वैसी जिम्मेदारी नही दी जा सकती है जो एक मन्त्री/राज्य मन्त्री/ उप मन्त्री को हासिल रहती है। संसदीय सचिव का किसी न किसी मन्त्री से अटैच रहना आवश्यक है। उन्हे एक राज्य मन्त्री की तरह स्वंतत्र प्रभार नही दिया जा सकता । संसदीय सचिव जिस भी विभाग के लिये संवद्ध हो वह उस विभाग की फाईल पर संवद्ध विषय पर अपनी राय अधिकारिक रूप से दर्ज नही कर सकता। नियमों के मुताबिक संसदीय सचिव की भूमिका तभी प्रभावी होती है जब विधानसभा का सत्र चल रहा हो। सत्र के दौरान संव( मन्त्री को संसदीय सलाह/ सहयोग देना ही उसकी जिम्मेदारी रहती है। बल्कि सत्र में मंत्री की अनुपस्थिति में संसदीय सचिव संवद्ध विभाग से जुडे़ प्रश्न का उत्तर भी सदन में रख सकता है। लेकिन सामान्यतः ऐसा किया नही जाता है।
ऐसे में जब किसी संसदीय सचिव किसी भी विभाग की वैधानिक तौर पर जिम्मेदारी नही दी जा सकती है तब उसमें और एक सामान्य विधायक में कोई अन्तर नही रह जाता है। क्योेंकि संसदीय सचिव मन्त्री के समकक्ष नही रखा गया है। लेकिन वह सामान्य विधायक से संसदीय सचिव होने के नाते ज्यादा सुविधायें भोग रहा है। उसके वेतन भत्ते भी सामान्य विधायक से अधिक हंै। लेकिन 2005 में संविधान में संशोधन लाकर मन्त्रीयों की अधिकतम सीमा तय की गयी थी तब संसदीय सचिवोें का कोई प्रावधान नही रखा गया था क्योंकि ऐसा प्रावधान मूलतः संविधान की नीयत के एकादम विपरीत है। ऐसे में अब दिल्ली के संसदीय सचिवों का मुद्दा एक बड़ा सवाल बनकर सामने आ खड़ा हुआ है तो उसके लिये पूरे देश में एक समान व्यवस्था का प्रावधान करना होगा। अलग-अलग राज्यों में आज अलग-अलग प्रावधान नहीं हो सकते। इसके लिये एक बार फिर संशोंधन लाकर मन्त्रीयों की संख्या बढ़ा देना ज्यादा व्यवहारिेक होगा और उसमें संसदीय सचिवों की नियुक्तियों पर विराम लग जाना चाहिए।