देश में शिक्षा को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। नई शिक्षा नीति, डिजिटल शिक्षा, स्मार्ट क्लासरूम और कौशल विकास जैसे मुद्दों को लगातार सरकार की उपलब्धियों के रूप में पेश किया जाता है। लेकिन शिक्षा मंत्रालय की हालिया समीक्षा बैठक ने एक ऐसी सच्चाई सामने रखी है, जो इन दावों की जमीनी हकीकत को उजागर करती है। सरकार के अनुसार देश में 14 से 18 वर्ष आयु वर्ग के दो करोड़ से अधिक बच्चे आज भी स्कूल से बाहर हैं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि करोड़ों बच्चों के अधूरे सपनों और शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों का संकेत है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि कक्षा एक में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से केवल 62 बच्चे ही कक्षा 12 तक पहुंच पाते हैं। यानी लगभग 38 प्रतिशत बच्चे बीच रास्ते में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं। यह स्थिति तब है जब शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किया जा चुका है और केंद्र व राज्य सरकारें लगातार शिक्षा के विस्तार के दावे करती रही हैं।


इन आंकड़ों के अनुसार जनवरी-मार्च 2026 के दौरान शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में कुछ गिरावट दर्ज की गई है। पहली नजर में यह तस्वीर सकारात्मक दिखाई देती है, लेकिन इन आंकड़ों के पीछे छिपी चुनौतियों और वास्तविकताओं को समझना भी उतना ही जरूरी है।
आज देश में युवाओं के सामने सबसे बड़ी समस्या केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि अपनी शिक्षा और कौशल के अनुरूप रोजगार प्राप्त करना है। लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिताते हैं। सरकारी नौकरियों की सीमित संख्या के कारण निराशा बढ़ती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्रा में रोजगार की स्थिति अस्थिर बनी रहती है। ऐसे में सरकार को रोजगार सृजन को केवल सरकारी भर्ती तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग यानी एमएसएमई क्षेत्रा भारत में रोजगार का सबसे बड़ा आधार है। यदि इस क्षेत्रा को सस्ती पूंजी, तकनीकी सहायता और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो लाखों नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा पर्यटन, कृषि आधारित उद्योग, डिजिटल सेवाएं, हरित ऊर्जा और स्थानीय हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।
हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यहां पर्यटन, बागवानी, खाद्य प्रसंस्करण और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार दिया जा सकता है। यदि गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे तो पलायन भी कम होगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।
रोजगार से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा व्यवस्था है। आज भी बड़ी संख्या में विद्यार्थी ऐसी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं जिसका रोजगार बाजार की वास्तविक जरूरतों से सीधा संबंध नहीं है। कौशल आधारित शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण और उद्योगों से जुड़ी पढ़ाई को बढ़ावा देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है। केवल डिग्री आधारित शिक्षा युवाओं को रोजगार नहीं दे सकती।
सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में कौशल विकास और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की दिशा में कई योजनाएं शुरू की हैं। लेकिन इन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा जब वे गांवों और छोटे शहरों तक प्रभावी रूप से पहुंचें। केवल बड़े शहरों में रोजगार केंद्रित विकास भारत की विशाल आबादी की जरूरतों को पूरा नहीं कर सकता।
पीएलएफएस के आंकड़े यह भी बताते हैं कि भारत का श्रम बाजार धीरे-धीरे बदल रहा है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, ऑनलाइन सेवाएं और नई तकनीक रोजगार के नए अवसर पैदा कर रही हैं। लेकिन तकनीकी बदलाव के साथ यह खतरा भी है कि कई पारंपरिक नौकरियां समाप्त हो सकती हैं। इसलिए भविष्य की अर्थव्यवस्था के अनुरूप युवाओं को तैयार करना आवश्यक होगा।
सरकार, उद्योग जगत और शिक्षा संस्थानों को मिलकर ऐसी नीति बनानी होगी जो रोजगार को केवल आंकड़ों तक सीमित न रखे, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार लाये। बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं होती यह सामाजिक तनाव, मानसिक दबाव और असंतोष को भी जन्म देती है। इसलिए रोजगार नीति को देश के समग्र विकास की नीति के रूप में देखा जाना चाहिए।
ताजा आंकड़े यह जरूर दिखाते हैं कि स्थिति में कुछ सुधार हुआ है। लेकिन देश के सामने अब भी बड़ी चुनौती यह है कि करोड़ों युवाओं के लिए स्थायी, सम्मानजनक और भविष्य सुरक्षित करने वाले रोजगार कैसे उपलब्ध कराए जाएं।
भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यह हमारी सबसे बड़ी ताकत भी हो सकती है और सबसे बड़ी चुनौती भी। यदि युवाओं को सही शिक्षा, कौशल और रोजगार मिले तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। लेकिन यदि रोजगार का संकट बना रहा तो यही युवा आबादी असंतोष और आर्थिक दबाव का कारण भी बन सकती है।
इसलिए समय की मांग यही है कि रोजगार को राजनीतिक नारों से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। असली सफलता तब होगी जब देश का हर युवा सम्मान के साथ कह सके कि उसके पास सुरक्षित और बेहतर भविष्य देने वाला रोजगार है।


अगर इन पांचों राज्यों के परिणामों को एक साथ देखें, तो एक बहुत स्पष्ट तस्वीर सामने आती है कि भारत का मतदाता अब किसी भी दल से पूरी तरह संतुष्ट नहीं है। वह हर चुनाव में नए सिरे से फैसला करता है और हर बार अपने हितों को प्राथमिकता देता है।आज की राजनीति में ‘वोट फॉर’ से ज्यादा ‘वोट अगेंस्ट’ काम कर रहा है। यानी लोग किसी पार्टी को पसंद करके नहीं, बल्कि दूसरी पार्टी से नाराज होकर वोट दे रहे हैं।
कांग्रेस के संदर्भ में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब उसे ‘स्वाभाविक विकल्प’नहीं माना जाता। पहले जहां सत्ता विरोधी माहौल में लोग सीधे कांग्रेस की ओर देखते थे, अब ऐसा नहीं है। आज कांग्रेस केवल एक विकल्प बनकर रह गई है, जिसे जनता परिस्थितियों के अनुसार चुनती है।
वहीं भाजपा के प्रति जनमत दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक वर्ग उसे मजबूत नेतृत्व और निर्णायक सरकार के रूप में देखता है, जबकि दूसरा वर्ग उसे वैचारिक कठोरता और केंद्रीकरण से जोड़कर देखता है। इस समय भाजपा के सामने भी चुनौती कम नहीं है उसे अपने समर्थकों का भरोसा बनाये रखने के साथ-साथ आलोचकों की चिंताओं को भी समझना होगा।
सबसे दिलचस्प बदलाव क्षेत्रीय दलों को लेकर आया है। कभी ये दल स्थानीय हितों के सबसे बड़े रक्षक माने जाते थे, लेकिन अब जनता इनके प्रति अधिक सतर्क और संदेहशील हो गई है। बंगाल और तमिलनाडु के परिणाम बताते हैं कि अगर ये दल पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं दिखाएंगे, तो जनता उन्हें बदलने में देर नहीं करेगी। तमिलनाडु में टीवीके की जीत ने जो संकेत दिया है वह केवल एक राज्य की घटना नहीं है, बल्कि एक नयी शुरुआत भी हो सकती है।
आने वाले समय में इन परिणामों का असर देश की राजनीति पर साफ दिखाई देगा। इससे राजनीति में अनिश्चितता बढ़ेगी। अब कोई भी दल यह दावा नहीं कर सकेगा कि उसका जनाधार स्थायी है। राजनीतिक दलों को अपने कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी केवल घोषणाएं और वादे काफी नहीं होंगे अब जनता काम और परिणाम दोनो देखना चाहती है। नए दलों और नए नेतृत्व के लिये रास्ता खुलेगा। अगर एक नया दल तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में जीत सकता है, तो अन्य राज्यों में भी ऐसे प्रयोग संभव हैं।
इन चुनाव परिणामों का सबसे बड़ा संदेश बहुत सरल है भारत का मतदाता अब किसी के साथ स्थायी नहीं है, वह केवल अपने हितों के साथ स्थायी है। यह राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। जो दल इस सच्चाई को समझेंगे और खुद को बदलेंगे, वही आगे बढ़ेंगे। जो नहीं समझेंगे, उनके लिए यह जनादेश एक चेतावनी है। अब राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं रही, यह विश्वास की परीक्षा बन चुकी है, और इस परीक्षा में असफल होने वालों को दूसरा मौका मिलना तय नहीं है।



देश के सीमावर्ती गांवों के विकास की बात नई नहीं है, लेकिन इन इलाकों के युवाओं की हकीकत अब भी बदलने का इंतजार कर रही है। हाल ही में कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा ‘जीवंत ग्राम कार्यक्रम’ के तहत आयोजित कार्यशाला ने एक बार फिर उम्मीदें जगाई हैं। मगर सवाल यह है कि क्या ये पहल सच में युवाओं के जीवन में बदलाव ला पाएगी या फिर यह भी योजनाओं की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगी।
सीमावर्ती क्षेत्रों के युवा आज भी रोजगार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार की योजनाएं अक्सर कागजों पर अच्छी दिखती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी पहुंच सीमित रहती है। गृह मंत्रालय के इस कार्यक्रम का उद्देश्य भले ही 662 गांवों को आत्मनिर्भर बनाना हो, लेकिन युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल है क्या उन्हें वास्तव में रोजगार मिलेगा?
कौशल विकास की बात तब सार्थक होती है जब वह स्थानीय जरूरतों और बाजार की मांग से जुड़ी हो। सीमावर्ती गांवों के युवाओं को ऐसे प्रशिक्षण की जरूरत है, जो उनके अपने क्षेत्र में ही रोजगार के अवसर पैदा करे। यदि प्रशिक्षण के बाद भी उन्हें काम के लिए शहरों की ओर पलायन करना पड़े, तो यह पूरी प्रक्रिया अधूरी मानी जाएगी।
एक और बड़ी समस्या है संसाधनों और प्रशिक्षकों की कमी। कार्यशालाओं में इन मुद्दों को स्वीकार तो किया जाता है, लेकिन समाधान अक्सर धीमे रहते हैं। गांवों में प्रशिक्षण केंद्रों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और योग्य प्रशिक्षकों की उपलब्धता जैसे मुद्दे आज भी जस के तस हैं। ऐसे में युवाओं को मिलने वाला प्रशिक्षण अधूरा और कम प्रभावी रह जाता है।
इसके अलावा, योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी भी युवाओं के विश्वास को कमजोर करती है। कई बार लाभार्थियों के चयन में स्पष्टता नहीं होती और जानकारी भी समय पर नहीं पहुंचती। इससे जरूरतमंद युवा पीछे रह जाते हैं और अवसर कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो जाते हैं।
युवाओं की सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि उन्हें केवल प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि रोजगार या स्वरोजगार के लिए वास्तविक समर्थन मिले। इसके लिए जरूरी है कि कौशल विकास कार्यक्रमों को स्थानीय उद्योगों, पर्यटन, कृषि और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों से जोड़ा जाए। साथ ही, प्रशिक्षण के बाद वित्तीय सहायता, मार्केट लिंक और मेंटरशिप भी उपलब्ध कराई जाए।
कुल मिलाकर, ‘जीवंत ग्राम कार्यक्रम’ एक अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह युवाओं की वास्तविक जरूरतों को कितना समझता और पूरा करता है। सीमावर्ती युवाओं को वादों से ज्यादा ठोस अवसरों की जरूरत है। अगर यह कार्यक्रम उनकी उम्मीदों पर खरा उतरता है, तो यह बदलाव की शुरुआत बन सकता है, वरना यह भी एक अधूरी कहानी बनकर रह जाएगा।



देश के सीमावर्ती गांवों के विकास की बात नई नहीं है, लेकिन इन इलाकों के युवाओं की हकीकत अब भी बदलने का इंतजार कर रही है। हाल ही में कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा ‘जीवंत ग्राम कार्यक्रम’ के तहत आयोजित कार्यशाला ने एक बार फिर उम्मीदें जगाई हैं। मगर सवाल यह है कि क्या ये पहल सच में युवाओं के जीवन में बदलाव ला पाएगी या फिर यह भी योजनाओं की लंबी सूची में एक और नाम बनकर रह जाएगी।
सीमावर्ती क्षेत्रों के युवा आज भी रोजगार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार की योजनाएं अक्सर कागजों पर अच्छी दिखती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी पहुंच सीमित रहती है। गृह मंत्रालय के इस कार्यक्रम का उद्देश्य भले ही 662 गांवों को आत्मनिर्भर बनाना हो, लेकिन युवाओं के सामने सबसे बड़ा सवाल है क्या उन्हें वास्तव में रोजगार मिलेगा?
कौशल विकास की बात तब सार्थक होती है जब वह स्थानीय जरूरतों और बाजार की मांग से जुड़ी हो। सीमावर्ती गांवों के युवाओं को ऐसे प्रशिक्षण की जरूरत है, जो उनके अपने क्षेत्र में ही रोजगार के अवसर पैदा करे। यदि प्रशिक्षण के बाद भी उन्हें काम के लिए शहरों की ओर पलायन करना पड़े, तो यह पूरी प्रक्रिया अधूरी मानी जाएगी।
एक और बड़ी समस्या है संसाधनों और प्रशिक्षकों की कमी। कार्यशालाओं में इन मुद्दों को स्वीकार तो किया जाता है, लेकिन समाधान अक्सर धीमे रहते हैं। गांवों में प्रशिक्षण केंद्रों की कमी, आधुनिक उपकरणों का अभाव और योग्य प्रशिक्षकों की उपलब्धता जैसे मुद्दे आज भी जस के तस हैं। ऐसे में युवाओं को मिलने वाला प्रशिक्षण अधूरा और कम प्रभावी रह जाता है।
इसके अलावा, योजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी भी युवाओं के विश्वास को कमजोर करती है। कई बार लाभार्थियों के चयन में स्पष्टता नहीं होती और जानकारी भी समय पर नहीं पहुंचती। इससे जरूरतमंद युवा पीछे रह जाते हैं और अवसर कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित हो जाते हैं।
युवाओं की सबसे बड़ी अपेक्षा यह है कि उन्हें केवल प्रशिक्षण ही नहीं, बल्कि रोजगार या स्वरोजगार के लिए वास्तविक समर्थन मिले। इसके लिए जरूरी है कि कौशल विकास कार्यक्रमों को स्थानीय उद्योगों, पर्यटन, कृषि और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों से जोड़ा जाए। साथ ही, प्रशिक्षण के बाद वित्तीय सहायता, मार्केट लिंक और मेंटरशिप भी उपलब्ध कराई जाए।
कुल मिलाकर, ‘जीवंत ग्राम कार्यक्रम’ एक अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह युवाओं की वास्तविक जरूरतों को कितना समझता और पूरा करता है। सीमावर्ती युवाओं को वादों से ज्यादा ठोस अवसरों की जरूरत है। अगर यह कार्यक्रम उनकी उम्मीदों पर खरा उतरता है, तो यह बदलाव की शुरुआत बन सकता है, वरना यह भी एक अधूरी कहानी बनकर रह जाएगा।