सर्वाेच्च न्यायालय ने चेतावनी दी है कि यदि हिमाचल की पर्यावरणीय स्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो प्रदेश जल्द ही नक्शे से विलुप्त हो जायेगा। यह चेतावनी सरकार द्वारा नोटिफाई ग्रीन बेल्ट एरिया को लेकर आयी है। इस नोटिफिकेशन को चुनौती देने वाली याचिका को अस्वीकार करते हुए शीर्ष अदालत नेे यह चिंता और चेतावनी व्यक्त की है। ऐसी चेतावनियां और चिंताएं प्रदेश उच्च न्यायालय भी पूर्व में रिटैन्शन पॉलिसीयों को लेकर देता रहा है जिन पर कभी अमल नहीं किया गया है। इस बार बरसात में जिस तरह से बादल फटने और लैण्ड स्लाइड्स की घटनाओं में बढ़ौतरी हुई है उससे एक स्थायी डर का माहौल निर्मित हो गया है। जितनी जान माल की हानि इस बार हुई है ऐसी पहले कभी नहीं हुई है। प्रदेश का कोई जिला इस विनाश से अछूता नहीं रहा है। मण्डी जिले में जो त्रासदी घटी है उसने बहुत कुछ सोचने पर विवश कर दिया है। क्योंकि आज जिस मुहाने पर प्रदेश आ पहुंचा उसके लिए यहां की सरकारें और प्रशासन ही जिम्मेदार रहा है। इसलिए आज आम को अपने स्तर पर इस पर सजग होकर सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ खड़े होना होगा। 1977 से लेकर आज तक आयी हर सरकार ने इस विनाश में योगदान किया है। हिमाचल पहाड़ी राज्य है लेकिन हमारी सरकारें यह भूल कर इसका विकास मैदानों की तर्ज पर करने की नीतियां बनाती चली गई। जिसका परिणाम है कि इस बार बरसात ने करीब दो सौ लोगों की आहुति ले ली है।
हिमाचल निर्माता डॉ. परमार ने भू-सुधार अधिनियम में यह सुनिश्चित किया था कि कोई भी गैर कृषक हिमाचल में सरकार की पूर्व अनुमति के बिना जमीन नहीं खरीद सकता। सरकार की अनुमति के साथ भी केवल मकान बनाने लायक ही जमीन खरीद सकता है। परन्तु हमारी सरकारों ने सबसे ज्यादा लूट और छूट इसी 118 की अनुमति में कर दी। हर सरकार पर हिमाचल ऑन सेल के आरोप लगे हैं। धारा 118 की अनुमतियों को लेकर चार बार तो जांच आयोग गठित हो चुके हैं परन्तु किसी भी जांच का परिणाम ऐसा नहीं रहा है कि यह दुरुपयोग रुक गया हो। आज चलते-चलते हालात प्रदेश में रेरा के गठन तक पहुंच गये हैं। इस धांधली में राजनेताओं से लेकर शीर्ष अफसरशाही सब बराबर के भागीदार रहे हैं। हिमाचल भूकंप रोधी जोन चार में आता है इसलिये यहां पर बहुमंजिलें निर्माणों पर रोक है। प्रदेश उच्च न्यायालय से लेकर एनजीटी तक सब इस पर चिंताएं व्यक्त कर चुके हैं। लेकिन इस चिंता का परिणाम जमीन पर नहीं उत्तर पाया है। शिमला को लेकर तो यहां तक अध्ययन आ चुका है कि एक हल्के भूकंप के झटके में चालीस हजार लोगों की जान जा सकती है। प्रदेश उच्च न्यायालय इसको लेकर कड़ी चेतावनी दे चुका है। लेकिन इस चेतावनी के बावजूद शिमला में नौ बार रिटैन्शन पॉलिसीयां आ गयी। शिमला हरित पट्टिया चिन्हित है परन्तु उनकी अनदेखी शीर्ष पर बैठे लोगों से शुरू हुई है। आज भी वर्तमान सरकार ने बेसमैन्ट और ऐटीक को लेकर जो नियमों में बदलाव किया है क्या उसमें कहीं इस त्रासदी का कोई प्रभाव दिखता है? शायद नहीं।
1977 में प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्र और पन विद्युत परियोजनाओं तथा सीमेंट उद्योग की तरफ सरकारों की सोच गई। 1977 के दौर में जो उद्योग सब्सिडी के लिए प्रदेश में स्थापित हुये क्या उनमें से आज एक प्रतिशत भी दिखते हैं। शायद नहीं। पनविद्युत परियोजनाओं सीमेंट उद्योगों के लिए सैकड़ो बीघा जमीने लैण्ड सीलिंग की अवहेलना करके इन उद्योगों को दे दी गयी। चंबा 65 किलोमीटर तक रावी हैडटेल परियोजनाओं की भेंट चढ़ गयी। उच्च न्यायालय में यह रिपोर्ट लगी हुई है। किन्नौर में स्थानीय लोगों ने इन परियोजनाओं का विरोध किया है क्या उसका कोई असर हुआ है। इन परियोजनाओं से जो बचा था उसे फोरलेन परियोजनाओं की भेंट चढ़ा दिया। आज यदि समय रहते प्रदेश के विकास की अवधारणा पर ईमानदारी से विचार करके उसके अनुरूप कदम न उठाए गए तो सर्वाेच्च न्यायालय की चेतावनी को सही साबित होने में बड़ा समय नहीं लगेगा। शिमला और धर्मशाला में जो नुकसान हुआ है क्या उससे स्मार्ट सिटी परियोजनाओं पर नये सिरे से विचार करने की आवश्यकता नहीं है?





उप-राष्ट्रपति का पद खाली होने के बाद इसी संसद सत्र में इस पर चुनाव करवाया जायेगा। चुनाव आयोग इस प्रक्रिया में लग गया है। चुनाव आयोग हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभाओं के चुनावों में जिस कदर विवादित हो चुका है और बिहार विधान सभा चुनावों की तैयारीयों में जिस तरह से मतदाता सूचियों के विशेष संघन निरीक्षण SIR पर विपक्ष सवाल उठाता जा रहा है और सत्ता पक्ष तथा चुनाव आयोग अपने को सर्वाेच्च न्यायालय से भी बड़ा मानकर चल रहा है वह सही में लोकतंत्र के लिये एक बड़ी चुनौती होगी। चुनाव आयोग और सरकार के रुख को उपराष्ट्रपति पद के साथ हुए आचरण के साथ यदि जोड़कर देखा जाये तो तस्वीर बहुत भयानक हो जाती है। संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों को यह सोच कर चलना होगा कि यदि उनका आचरण पद की मर्यादा के अनुसार नहीं होगा तो जनता को स्वयं सड़कों पर उतरना होगा। हम बच्चों को राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के पदों के अधिकार और कर्तव्य पढ़ाते हैं। क्या किसी व्यवस्था में यदि इन पदों की जलालत पढा़नी पड़े तो क्या पढ़ाएंगे। इन पदों पर बैठे हुए लोगों को भी अपनी गरिमा और मर्यादा की स्वयं रक्षा करनी होगी।
इस समय केन्द्र सरकार अकेली भाजपा की नहीं है उसके सहयोगी दल भी हैं। सहयोगी दलों में अपने-अपने वर्चस्व के सवाल उठने लग पड़े हैं। ऐसे में जिस तरह का आचरण जगदीप धनखड़ के साथ सामने आया है वह एन.डी.ए. के घटक दलों के लिये भी एक बड़ी चेतावनी प्रमाणित होगी। यदि बिहार विधानसभा चुनावों में किन्हीं कारणों से एन.डी.ए. की सरकार नहीं बन पाती है तो उसके बाद एन.डी.ए. का बिखरना शुरू हो जायेगा क्योंकि सब धनखड़ के साथ हुए व्यवहार को सामने रखेंगे।










जब सरकार की सारी सोच जनता पर करभार बढ़ाकर ही राजस्व जुटाने तक सीमित हो जाये तो वह प्रदेश के लिये एक बड़े खतरे का संकेत बन जाता है। सरकार ने हर बजट कर मुक्त बजट प्रचारित और घोषित किया है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब बजट कर मुक्त थे तो फिर कर राजस्व में पांच हजार करोड़ की वृद्धि कैसे हो गयी? स्वभाविक है कि जनता के साथ गलत ब्यानी हुई है। सरकार की कर और करेतर राजस्व से सिर्फ बीस हजार करोड़ की आय हो रही है जबकि इस आय के मुकाबले सरकार का राजस्व व्यय ही 48733.04 करोड़ जो कि आय के दो गुणा से भी अधिक है। यह राजस्व व्यय लगातार बढ़ता जा रहा है। जबकि पूंजीगत व्यय जो 2023-24 में 9252.24 करोड़ था वह 2024-25 में 10276.98 करोड़ था अब 2025-26 में घटकर 8281.27 करोड़ रह गया है। पूंजीगत व्यय शुद्ध विकासात्मक व्यय होता है। इस व्यय का घटना इस बात का प्रमाण है कि इस वर्ष विकास कार्यों पर बहुत ही कम खर्च होगा। आंकड़ों से स्पष्ट है कि इस सरकार में विकास कार्यों पर खर्च लगातार कम होता जा रहा है।
बजट के इन आंकड़ों से यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब विकास कार्यों पर खर्च ही लगातार कम होता जा रहा है तो सरकार के आत्मनिर्भरता के दावों पर कैसे विश्वास किया जा सकता है? क्योंकि आत्मनिर्भरता तो तब बनेगी जब विकास पर खर्च बढ़ेगा। दूसरी ओर जब सरकार का कर राजस्व कर लगाने से बढ़ रहा है और कर्ज का आंकड़ा भी लगातार बढ़ रहा है तो फिर सरकार की स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सेवाएं क्यों कुप्रभावित हो रही है। कर्मचारियों के एरियर का भुगतान अब तक नहीं हो पाया है। मेडिकल बिल लम्बे अरसे से लंबित चल रहे हैं। ठेकेदारों के भुगतान नहीं हो रहे हैं। जब वित्त विभाग को ट्रेजरी ही बन्द करनी पड़ी है और जिन कार्यों के लिये प्रतिमाह सब्सिडी का भुगतान किया जाता था उनमें अब वार्षिक आधार पर यह भुगतान करने के आदेश करने से यह कार्य प्रभावित हो जायेंगे। मनरेगा के कार्य काफी अरसेे से बन्द चल रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यह करों और कर्ज का पैसा कहां खर्च हो रहा है? सरकार इस सवाल पर लगातार चुप्पी बनाये हुये है। जबकि भ्रष्टाचार को बड़े स्तर पर संरक्षण दिया जा रहा है यह मुख्य सचिव के सेवा विस्तार पर उच्च न्यायालय में आयी याचिका से स्पष्ट हो जाता है। भ्रष्टाचार के बड़े मुद्दों पर सरकार खामोश चल रही है विपक्ष मूक दर्शक बनकर तमाशा देख रहा है। इस उम्मीद में बैठा है कि कांग्रेस के बाद सत्ता उसी के पास आनी है। लेकिन यदि कोई तीसरा राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा के इस खेल को बेनकाब करते हुये सामने आ जाये तो किसी को कोई हैरत नहीं होनी चाहिये। जब जनता की दशा पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों रस्म अदायगी से आगे नहीं बढ़ते हैं तभी विकल्प के उभरने की जमीन तैयार होती है।