Thursday, 15 January 2026
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स्व. डॉ. मनमोहन सिंह के अन्तिम संस्कार पर उठा विवाद निन्दनीय है

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का अन्तिम संस्कार कहां होगा उनका स्मारक बनेगा या नहीं। बनेगा तो कहां बनेगा? इन सवालों पर जिस तरह का अनचाहा वाद-विवाद उभरा है वह निन्दनीय है। लेकिन यह विवाद सामने आया है और उससे कई और सवाल खड़े हो गये हैं। दूरदर्शन राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल और सरकार के नियंत्रण में है। दूरदर्शन ने स्व. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अन्तिम यात्रा और अन्तिम संस्कार का लाइव कवरेज करने के लिये जितना समय लगाया था उसके मुकाबले में स्व.डॉ.मनमोहन सिंह के लिये जितना समय दिया है उसी पर सवाल उठ गये हैं। जबकि दोनों ही दो-दो बार देश के प्रधानमंत्री रहे हैं। सरकारी चैनल में इस तरह का भेदभाव पाया जाना क्या सरकार की मंशा और चैनल की निष्पक्षता पर सवाल नहीं खड़े करता है? पूर्व प्रधानमंत्री के अन्तिम संस्कार के दौरान खास राजकीय प्रोटोकॉल का पालन किया जाता है। इसका मकसद देश के प्रति उनके योगदान और पद की गरिमा को सम्मानित करना होता है। पूर्व प्रधानमंत्रियों का अन्तिम संस्कार दिल्ली के विशेष स्मारकीय स्थलों पर किया जाता है जैसे जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का अन्तिम संस्कार राजघाट परिसर में किया गया था। वहीं कई पूर्व प्रधानमंत्रीयों के लिये अलग से समाधि स्थान भी बनाया जाता है। अन्तिम संस्कार का तरीका दिवंगत व्यक्ति और उनके परिजनों के धार्मिक विश्वासों के अनुसार होता है। यह प्रोटोकॉल सरकार द्वारा तय है। 1997 में इसके नियमों में संशोधन करके राज्य सरकारों को भी राष्ट्रीय शोक घोषित करने का प्रावधान किया था।
राष्ट्रीय प्रोटोकॉल के तहत स्व.डॉ. मनमोहन सिंह का अन्तिम संस्कार कहां किया जायेगा यह केन्द्र सरकार को तय करके डॉ. मनमोहन सिंह के परिवार को सूचित करना था। लेकिन केन्द्र सरकार सुबह 11ः30 बजे मंत्रिमण्डल की बैठक करने के बाद भी शाम तक इसकी सूचना नहीं दे सकी जबकि परिवार और कांग्रेस पार्टी द्वारा इसके लिये आग्रह किया गया था कि उनका संस्कार राजघाट पर किया जाये। लेकिन सरकार राजघाट पर जगह चिन्हित नहीं कर पायी। इस पर प्रियंका गांधी ने स्व.इंदिरा गांधी और स्व. राजीव गांधी के स्मारक स्थलों में जमीन चिन्हित करके स्व.डॉ. मनमोहन सिंह का अन्तिम संस्कार वहां करने और स्मारक बनाने की पेशकश कर दी। इसके बाद जो वाद-विवाद सामने आया उसमें यहां तक आरोप लगा की सरकार ने स्व.डॉ. मनमोहन सिंह का नीयतन अपमान करके एक नया मुद्दा खड़ा कर दिया है। स्व.डॉ. मनमोहन सिंह के देहान्त की खबर आने के बाद अन्तिम संस्कार तक बीच में जितना वक्त था उसमें केन्द्र सरकार सारे फैसले समय पर लेकर डॉ. साहब के परिवार और कांग्रेस पार्टी को सूचित कर सकती थी। जबकि प्रोटोकॉल के अनुसार यह केन्द्र को ही करना था। लेकिन केन्द्र सरकार ऐसा नहीं कर पायी। केन्द्र की यह चूक नीयतन हुई या अनचाहे ही हो गयी। इसका फैसला आने वाला समय करेगा। लेकिन स्व.डॉ मनमोहन सिंह जिस व्यक्तित्व के मालिक थे और देश के लिये जो योगदान उनका रहा है उसको सामने रखते हुये यदि केन्द्र का आचरण नीयतन रहा है तो यह सरकार पर भारी पड़ेगा।
जो लोग स्व.डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में लगे भ्रष्टाचार के आरोपों और उस दौरान उठे अन्ना आन्दोलन की बात करते हैं उनको यह भी स्मरण रखना चाहिए कि उन्ही के कार्यकाल में केन्द्रीय मंत्रियों के खिलाफ कारवाई हुई। यह अब स्पष्ट रूप से सामने आ चुका है कि अन्ना आन्दोलन एक प्रायोजित कार्यक्रम था। डॉ.सिंह के ही कार्यकाल में कॉरपोरेट घरानों के खिलाफ कारवाई हुई। उन्होंने ही लोकपाल विधेयक लाया। लेकिन जिस लोकपाल के लिये अन्ना आन्दोलन हुआ उसके तहत कितने मामलों की जांच पिछले एक दशक में हुई वह अभी तक सामने नहीं आयी है। विनोद राय सी ए जी की जिस रिपोर्ट पर टू जी स्कैम का आरोप लगा और 1,76,000 करोड़ के घपले का आरोप लगा। उसकी जांच में विनोद राय ने यह खेद क्यों प्रकट किया कि उनको गणना में गलती लग गई थी। इन तथ्यों के परिदृश्य में यह स्पष्ट हो जाता है कि स्व. डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार पर लगे आरोपों का सच क्या है। इसलिये आज उनके निधन के बाद उनके अपमान का मुद्दा कहीं कुछ बड़ा न हो जाये इसकी आशंका उभरने लगी है।

संसद परिसर में जो घटा वह निंदनीय है

इस बार संसद परिसर में अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे कांग्रेस के सांसदों कोे जिस तरह से संसद के अन्दर जाने से रोका गया और स्थिति धक्का-मुक्की तक पहुंच गयी उसे पूरे देश ने देखा है। यह मामला एफ आई आर तक पहुंच गया है। भाजपा के दो सांसदों को चोट लगने का आरोप है। इसके लिये नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ मामला बनाया गया है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिका अर्जुन खड़गे भी इस धक्का-मुक्की से नीचे गिर गये थे। कांग्रेस ने भी इस पर एफआईआर दर्ज करवाई है। पूरा प्रकरण जांच के लिये क्राइम ब्रांच को सौंपा गया है। पूरा संसद परिसर सीसीटीवी कैमरों से लैस है इसलिए जांच में इन कैमरों के माध्यम से पूरा सच देश के सामने आ जायेगा। इसलिए जांच रिपोर्ट आने तक इस प्रकरण पर कुछ भी ज्यादा कहना सही नहीं होगा। लेकिन स्थितियां यहां तक क्यों पहुंची? किस तरह का राजनीतिक वातावरण पिछले दिनों देश में निर्मित हुआ है उस पर एक नजर मोटे तौर पर डालना आवश्यक हो जाता है।
इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा-मोदी चार सौ पार का नारा लेकर चले थे। राम मन्दिर का निर्माण भाजपा का बड़ा संकल्प था। उसकी प्राण-प्रतिष्ठा का आयोजन भी सारे सवालों के बावजूद चुनावी गणित को सामने रखकर करवा दिया। लेकिन यह सब करने के बाद भी लोकसभा में भाजपा का आंकड़ा 240 पर आकर रुक गया। लोकसभा के बाद हरियाणा और महाराष्ट्र की चुनावी जीत में फिर ईवीएम का मुद्दा आकर खड़ा हो गया। महाराष्ट्र में यह मुद्दा जो आकार लेने जा रहा है उसके परिणाम गंभीर होंगे। इसी बीच अमेरिका में गौतम अडानी के खिलाफ एक भ्रष्टाचार का मामला वहां की अदालत तक पहुंच गया। यहां विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेर लिया। अडानी और ईवीएम दो मुद्दे विपक्ष के हाथ लग गये। इसी बीच संसद में संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर चर्चा की बात उठ गयी ईवीएम के मुद्दे पर ममता और उमर अब्दुल्ला तथा सपा कांग्रेस से अलग हो गये। इसी बीच प्रधान मंत्री ने संसद के इसी सत्र में ‘एक देश एक चुनाव’ लाकर खड़ा कर दिया। इन मुद्दों की चर्चा में संविधान निर्माता डॉ. अम्बेडकर को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रिया गृह मंत्री अमित शाह की ओर से आयी उसने पूरे देश में दलित समाज को एक बड़ा मुद्दा दे दिया। इण्डिया गठबंधन जो अपरोक्ष में अडानी और परोक्ष में ईवीएम के मुद्दे पर बिखरने के कगार पर पहुंच गया था उसे ‘एक देश एक चुनाव’ और डॉ. अम्बेडकर के मुद्दों ने फिर अनचाहे ही संसद में इकट्ठा कर दिया।
‘एक देश एक चुनाव’ तो कमेटी को चला गया है। लेकिन अम्बेडकर के मुद्दे को लेकर विपक्ष पूरी तरह अडिग है। गृह मंत्री अमित शाह के त्यागपत्र की मांग की जा रही है। प्रधानमंत्री यह मांग स्वीकारने की स्थिति में नहीं है। राज्यसभा में सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ चुका है। वक्फ संशोधन विधेयक भी अभी कमेटी के पास ही है। वक्फ पर नीतीश और चन्द्रबाबू नायडू का समर्थन सरकार को मिल ही जायेगा यह निश्चित नहीं है। संघ और भाजपा के रिश्ते अभी तक ज्यादा सुधार नहीं पाये हैं और इसी कारण भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चयन नहीं हो पाया है। इस वस्तु स्थिति में जब संसद में विपक्ष नियमित विरोध प्रदर्शन की रणनीति पर चल रहा हो तो सरकार के लिए स्थितियां सुखद नहीं हो सकती। जब इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कांग्रेस कर रही हो तो सरकार के लिये और भी असहज स्थिति हो जाती है। क्योंकि ‘एक देश एक चुनाव’ के मुद्दे ने कई बुनियादी संवैधानिक सवाल खड़े कर दिये है।ं देश में 1967 तक सारे चुनाव एक साथ होते थे क्योंकि तब कहीं यह नहीं था कि किसी राज्य विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा से आगे पीछे हो रहा हो। केवल 1959 में केरल में अपवाद की स्थिति बनी जब वहां राष्ट्रपति शासन लगा था। लेकिन आज पूरे देश की स्थिति बदली हुई है। ऐसे में यह कैसे संभव हो सकेगा कि विधानसभा का कार्यकाल लोकसभा के कार्यकाल पर निर्भर करेगा। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिनसे यह आशंका बलवती हो गई है कि इस विधेयक के माध्यम से क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व को खतरा हो गया। इस स्थिति को अधिनायक वाद के पहले कदम के रूप में देखा जा रहा है।
इस वस्तुस्थिति में जो कुछ संसद परिसर के अन्दर घटा है और पुलिस जांच तक जा पहुंचा है उसके परिणामों को धैर्य से देखने तथा समझने की आवश्यकता होगी। यह देश के भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम प्रमाणित होगा। इसमें कांग्रेस को अपने प्रदेशों के नेतृत्व पर कड़ी नजर बनाये रखनी होगी।

संविधान की 75वीं वर्ष गांठ-कुछ सवाल

संसद में संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर चर्चा चल रही है। संविधान की इस चर्चा में हमारे माननीय सांसद भाग ले रहे हैं। लेकिन जिस तरह की चर्चा सामने आ रही है उससे यही निकल कर सामने आ रहा है कि शायद यह चर्चा पक्ष और विपक्ष में एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रतियोगिता मात्र है। जबकि संसद के मंच का उपयोग ऐसे गंभीर मुद्दों की चर्चा का केन्द्र होना चाहिए था जो वर्तमान की आशंकाओं पर माननीय का ध्यान केंद्रित करता। पिछले लोकसभा चुनाव में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी हर छोटी बड़ी जनसभा में संविधान की प्रति साथ लेकर जाते थे और जनता को यह समझाने का प्रयास करते रहे हैं कि संविधान को बदला जा रहा है। राहुल गांधी की इस आशंका का यह प्रभाव पड़ा की जनता ने भाजपा को अपने अकेले के दम पर ही सरकार बनाने का बहुमत नहीं दिया। ऐसे में यह सवाल उभरना स्वभाविक है कि राहुल गांधी की इस आशंका का आधार क्या था। संविधान को लागू हुए 75 वर्ष हो गये हैं। 2024 तक संविधान में एक सौ छः संशोधन हो चुके हैं। यह संशोधन इस बात का प्रमाण है कि हमारा संविधान सामायिक सवालों के प्रति कितना गंभीर हैं। इसी के साथ हमारे संविधान की यह भी विशेषता है कि इसके मूल स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।
भारत एक बहुधर्मी, बहुभाषी और बहुजातिय देश है। इसके इसी चरित्र को सामने रखकर संविधान निर्माताओं ने देश के हर नागरिक को धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक बराबरी का दर्जा दिया है। सरकार का चरित्र धर्मनिरपेक्ष रखा। सरकार का व्यवहार सभी धर्मों के प्रति एक सम्मान रहेगा। किसी के साथ भी जाति और लिंग के आधार पर गैर बराबरी का व्यवहार नहीं किया जा सकता। लेकिन पिछले कुछ अरसे से संविधान के इस स्वरूप के साथ व्यवहारिक रूप से हटकर आचरण देखा गया। गौ रक्षा और लव जिहाद के नाम पर भीड़ हिंसा हुई और इस हिंसा पर प्रशासन लगभग तटस्थ रहा। आर्थिक मुहाने पर संसाधनों को प्राईवेट हाथों में सौंपा गया। देश की अधिकांश आबादी को सरकारी राशन पर आश्रित होना पड़ा। कोविड काल में आये लॉकडाउन में आपातकाल से भी ज्यादा कठिन हो गया जीवन यापन। यह शायद पहली बार देखने को मिला की महामारी को भगाने के लिये ताली, थाली बजायी गयी और दीपक जलाये गये।
कोविड के इसी काल में संघ प्रमुख मोहन भागवत के नाम से भारत के संविधान का एक बारह पृष्ठों का एक बुकलेट वायरल हुआ जिसमें महिलाओं को कोई अधिकार नहीं दिया गया। पूरे समाज पर ब्राह्मण समाज का वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास था। इस पर संघ कार्यालय नागपुर और पीएमओ के नाम पर सुझाव आमन्त्रित किये गये थे। लेकिन इस वायरल हुये प्रलेख पर न तो संघ कार्यालय और न ही पीएमओ से कोई खण्डन जारी हुआ। उत्तर प्रदेश में दो जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज तो हुए लेकिन उन पर हुई कारवाई आज तक सामने नहीं आयी। इसी बीच मेघालय उच्च न्यायालय के जस्टिस सेन का फैसला आ गया जिसमें उन्होंने देश को धर्मनिरपेक्ष के स्थान पर पड़ोसी देशों की तर्ज पर धार्मिक देश बना दिये जाने का फैसला दिया। इस फैसले की प्रतियां प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और राष्ट्रपति तक को प्रेषित हुई। कुछ लोग इस फैसले के खिलाफ सर्वाेच्च न्यायालय भी पहुंचे। इसी परिदृश्य में केन्द्र में सतारूढ़ दल से मुस्लिम समाज के लोग संसद और सरकार से बाहर हो गये। क्या यह सारी स्थितियां संविधान को बदले जाने की आशंकाओं की ओर इंगित नहीं करते?
आज देश में क्या धर्म के नाम पर एक और विभाजन का जोखिम उठाया जा सकता है शायद नहीं? क्या आर्थिक संसाधनों की मलकियत किसी एक आदमी के हाथ में सौंपी जा सकती है। जिस देश में आज भी 80 करोड़ लोग सरकार के राशन पर आश्रित रहने को मजबूर हों उसके विकास के दावों को किस तराजू में तोला जा सकता है। इस समय संसद में इन आशंकाओं पर एक विस्तृत चर्चा की आवश्यकता है।

विपक्ष के विरोध का जवाब उपलब्धियों के विज्ञापन

हिमाचल सरकार सत्ता में दो वर्ष होने पर बिलासपुर में एक राज्य स्तरीय आयोजन करने जा रही है। परन्तु विपक्षी दल भाजपा इस आयोजन को लेकर आक्रोश दिवस मनाने जा रही है। भाजपा ने पूरे प्रदेश में जगह-जगह रैलियां करके अपने रोष को जनआक्रोश की संज्ञा दे दी है। भाजपा जिस अनुपात में इन रैलिया का आयोजन कर रही है सुक्खू सरकार उसी अनुपात में अपनी दो वर्ष की उपलब्धियों को लगातार विज्ञापन जारी करके भाजपा को जवाब दे रही है। विज्ञापनों के माध्यम से आधिकारिक रूप से सरकार की उपलब्धियां जनता के सामने आ रही है। अब जनता इन उपलब्धियां को अपने आसपास जमीन पर देखने का प्रयास करेगी और फिर सरकार को लेकर अपनी राय बनाएगी। सरकार लगातार अपने व्यवस्था परिवर्तन के सूत्र का महिमा मण्डन कर रही है। सरकार ने पहले दिन विज्ञापन जारी करके अपनी एक बड़ी उपलब्धि लैंड सीलिंग एक्ट में पिछले वर्ष संशोधन करके बेटियों को उनका हक देने की बात की है। 1971 से लागू हुये लैंड सीलिंग एक्ट में 2023 में संशोधन किया गया है। विधानसभा से पारित होकर यह संशोधन राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए गया है। अभी तक राष्ट्रपति की इस संशोधन को स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई है। जब तक यह संशोधन राष्ट्रपति से स्वीकृति मिलने के बाद राजपत्र में अधिसूचित नहीं हो जाता है तब तक यह कानून नहीं बनता है। इस संशोधन की स्वीकृति के बाद कितना क्या कुछ खुलेगा यह अगली बात है। लेकिन अभी इस संशोधन को कानून का आकार लेने से पहले ही इस तरह से उपलब्धि गिनाना अपने में कई सवाल खड़े करता है। और भी जो-जो उपलब्धियां दर्ज की गई है उनके आंकड़े बहुत ज्यादा सरकार के 2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों से मेल नहीं खाते हैं।
उपलब्धियां के विज्ञापनों से हाईकमान को प्रभावित किया जा सकता है लेकिन आम आदमी को नहीं जो जमीन पर भुक्तभोगी है। गांव में पता है कि किसके बच्चों को सरकार में नौकरी मिली है और किसके बच्चे की नौकरी चली गई। स्कूलों में अध्यापकों के कितने पद खाली है और कितने अस्पतालों में डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ नहीं है। इस समय आवश्यकता सौ बीघा में खोले जा रहे राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूलों की नहीं है बल्कि जो स्कूल चल रहे हैं उन्हें सुचारू रूप से चलाने की आवश्यकता है। जो अटल आदर्श विद्यालय खोले गये थे उनकी परफॉरमैन्स जनता के सामने रखने की आवश्यकता है। क्या वह सारे विधानसभा क्षेत्र में खोले जा चुके हैं? एक राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूल खोलने पर कितना खर्च आयेगा? सभी विधानसभा क्षेत्र में यह स्कूल खोलने में कितने वर्ष लगेंगे? क्या अटल आदर्श विद्यालय और राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूल में जाने की इच्छा हर बच्चे और उनके मां-बाप की नहीं होगी? क्या हम इस तरह के प्रयोग शिक्षा जैसे क्षेत्र में सरकारी स्तर पर करके समाज में भेदभाव की नीव नहीं डाल रहे हैं? शिक्षा स्वास्थ्य और न्याय तो सबको मुफ्त मिलना चाहिए क्या हम उसके लिये ईमानदारी से प्रयास कर रहे हैं।
इस समय सरकार को हर माह कर्ज लेना पड़ रहा है। यदि कर्ज की यही गति रही तो पांच वर्ष पूरे होने तक इतना कर्ज हो जायेगा कि आगे प्रदेश को चलाना कठिन हो जायेगा। इसलिए इस अवसर पर ऐसा बड़ा आयोजन करने की बजाये इस पर मंथन होना चाहिये था की आम आदमी को राहत कैसे उपलब्ध हो पायेगी। क्योंकि सरकार ने व्यवस्था परिवर्तन के और वित्तीय संसाधन जुटाने के नाम पर केवल आम आदमी पर करों और कर्ज का बोझ ही बढ़ाया है। इस आयोजन के बाद सरकार के यह दावे सरकार के सामने सवाल बनकर खड़े हो जायेंगे यह तय है। विपक्ष के विरोध का जवाब दावों के विज्ञापन एक अच्छी राजनीति हो सकती है लेकिन जब यह दावे जमीन पर नजर नहीं आयेंगे तब स्थिति कुछ और ही हो जायेगी।

प्रदेश का वित्तीय संकट कुछ सवाल

इस समय हिमाचल जिस वित्तीय मुकाम पर आ पहुंचा है उसमें कुछ ऐसे बुनियादी सवाल खड़े हुये हैं जिनको और अधिक समय के लिए नजरअन्दाज कर पाना संभव नहीं होगा। आज प्रदेश के हर व्यक्ति पर 1.17 लाख का कर्ज है। बेरोजगारी में प्रदेश देश के छः राज्यों की सूची में आ पहुंचा है। सरकार को हर माह कर्ज लेना पड़ रहा है। बल्कि इस कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लिया जा रहा है। कर्मचारियों के वेतन और पैन्शन का ही प्रतिमाह प्रतिबद्ध खर्च करीब 2000 करोड़ है। सरकार अप्रैल से दिसम्बर तक केवल 6200 करोड़ का ही कर्ज ले सकते हैं और यह सीमा पूरी हो चुकी है। जनवरी से मार्च की तिमाही में कितना कर्ज मिल पायेगा यह आगे फैसला होगा। पिछले वर्ष 2023-24 में जनवरी से मार्च के बीच केवल 1700 करोड़़ मिला था। अगले वर्ष कर्ज की सीमा 6200 करोड़ से कम रहेगी। इस गणित से यदि जनवरी से मार्च में 1700 करोड़ भी मिल जाता है तब भी गुजारा नहीं हो पायेगा क्योंकि वेतन और पैन्शन के लिये ही प्रतिमाह 2000 करोड़ चाहिए। इस वस्तुस्थिति से स्पष्ट हो जाता है कि वित्तीय संकट का आकार कितना बड़ा है और इसके परिणाम कितने गंभीर होंगे। इस वस्तुस्थिति में यह सवाल उठता है कि इस संकट के लिये जिम्मेदार कौन है? हिमाचल में 1977 के बाद उद्योगों को प्रदेश में आमंत्रित करने की योजना बनाई गई। इस योजना के तहत औद्योगिक क्षेत्र चिह्नित किये गये। उद्योगों को हर तरह की सब्सिडी दी गई। प्रदेश की वित्त निगम से कर्ज दिया गया। खादी बोर्ड ने भी इसमें सहयोग दिया। लेकिन आज इन उद्योगों की सहायता करने वाले वित्त निगम और खादी बोर्ड जैसे आदारे खुद डूब चुके हैं। इन्हें अपने कर्जदारों को ढूंढने के लिये इनाम योजनाएं तक लानी पड़ी। अधिकांश उद्योगों का आज पता ही नहीं है कि वह कहां है। सस्ते बिजली की उपलब्धता, सस्ती जमीन की उपलब्धता और सब्सिडी मिलने के नाम पर स्थापित हुए उद्योगों का व्यवहारिक सच यह है कि जितनी भी सब्सिडी राज्य और केन्द्र से इन्हें दी जा चुकी है उसका आंकड़ा उनके मूल निवेश से कहीं ज्यादा है। कैग रिपोर्ट और उद्योग विभाग की अपनी रिपोर्ट में यह दर्ज है। रोजगार के नाम पर भी इनका आंकड़ा सरकार के रोजगार से कहीं कम है। उद्योग की सफलता के दो मूल मानक हैं कि या तो क्षेत्र में कच्चा माल उपलब्ध हो या तैयार माल का उपभोक्ता हो। परन्तु हिमाचल में यह दोनों ही स्थितियां नहीं है। इसलिये यह उद्योग प्रदेश पर भारी पड़ रहे हैं। सरकार की थोड़ी सी सख्ती से पलायन पर आ रहे हैं। उद्योगों के साथ ही हिमाचल को पर्यटन हब बनाने की कवायत शुरू हुई। इसमें होटल उद्योग आगे आया। इसके लिए जमीन खरीद को आसान बनाने के लिए धारा 118 में कई रियायतें दी गई। जिस पर एक समय हिमाचल ऑन सेल के आरोप तक लगे। इन आरोपों की जांच के लिये तीन बार जांच आयोग गठित हुई है। लेकिन आयोग की जांच रिपोर्ट पर क्या कारवाई हुई है कोई नहीं जानता। पर्यटन के साथ ही हिमाचल को बिजली राज्य बनाने की मुहिम चली। प्राइवेट सैक्टर को इसमें निवेश के लिए आमंत्रित किया गया। बिजली बोर्ड से प्रोजेक्ट लेकर प्राइवेट निवेशों को दिये गये। इनमें जो बिजली बोर्ड का निवेश हो चुका था उसे ब्याज सहित लौटाने के अनुबंध हुये। परन्तु यह निवेश वापस नहीं आया। कैग की प्रतिकूल टिप्पणीयांे का भी कोई असर नहीं हुआ। जल विद्युत परियोजनाओं के कारण पर्यावरण का जो नुकसान हुआ है उस पर अभय शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट चौंकाने वाली है। पिछले दिनों जो प्राकृतिक आपदाएं प्रदेश पर आयी थी। बादल फटने की घटनाएं इसका कारण भी इन परियोजनाओं का क्षेत्र ही ज्यादा रहा है। जिस बिजली उत्पादन से प्रदेश की सारी आर्थिक समस्याएं हल हो जाने का सपना देखा गया था। आज उसी के कारण प्रदेश का संकट गहराता जा रहा है। हिमाचल की करीब 60% जनसंख्या कृषि और बागवानी पर निर्भर है। लेकिन इसके लिए कोई कारगर योजनाएं नहीं हैं। एक समय स्व.डॉ. परमार ने त्री मुखी वन खेती की वकालत की थी। इसी के लिए बागवानी और कृषि विश्वविद्यालय स्थापित हुये थे लेकिन आज इनकी रिसर्च को खेत तक ले जाने की कोई योजनाएं नहीं है। यदि 60% जनसंख्या को हर तरह से आत्मनिर्भर बना दिया जाये तो प्रदेश का संकट स्वतः ही हल हो जायेगा। वोट के लिये छोटे-छोटे वोट बैंक बनाने और उन्हें मुफ्ती का लालच देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। इसके लिए सरकार को ठेकेदारी की मानसिकता से बाहर आना होगा।

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