Thursday, 16 April 2026
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बजट घोषणाओं पर भाजपा सांसदों ने सरकार को घेरा

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा पेश किए गये 54,928 करोड़ रूपये के बजट ने राजनीतिक सरगर्मियां तेज कर दी हैं। विपक्ष ने इस बजट को राज्य की बिगड़ती वित्तीय सेहत का प्रमाण बताते हुए सरकार पर गंभीर आरोप लगाये हैं। बजट के घटे आकार से लेकर वेतन स्थगन, अधूरी गारंटियों और जमीनी स्तर पर न पहुंचने वाली योजनाओं तक भाजपा सांसदों ने सरकार को हर मोर्चे पर घेरने की कोशिश की है।
सबसे कड़ी प्रतिक्रिया राज्यसभा सांसद हर्ष महाजन की ओर से आई, जिन्होंने कहा कि पिछले वर्ष के 58,514 करोड़ रूपये की तुलना में इस बार का बजट 54,928 करोड़ रूपये रह जाना स्पष्ट संकेत है कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था सिकुड़ रही है। उन्होंने इसे कांग्रेस सरकार की ‘वित्तीय विफलता’ का सीधा सबूत बताया। महाजन ने यह आरोप भी लगाया कि सरकार अपनी असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए कर्मचारियों का वेतन तक स्थगित करने को मजबूर हुई है, जबकि दूसरी ओर छोटे मानदेय बढ़ाकर जनता को भ्रमित किया जा रहा है। उनके शब्दों में, ‘यह बजट विकास का नहीं, बल्कि वित्तीय दिवालियापन का दस्तावेज है।’
उधर, राज्यसभा सांसद डॉ. सिकंदर कुमार ने सरकार की गारंटियों को लेकर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बजट भाषण में 100% गारंटी पूरी करने का दावा दोहराया गया, लेकिन पिछले तीन वर्षों में एक भी प्रमुख गारंटी जमीन पर नहीं उतरी। सिकंदर कुमार का कहना है कि कर्मचारियों के वेतन का 3% से लेकर 50% तक स्थगित करना इस बात का प्रमाण है कि राजकोषीय स्थिति बेहद विकट है। उन्होंने कहा, ‘जब सरकार खुद वेतन नहीं दे पा रही, तो वह विकास के वादे कैसे पूरा करेगी?’
लोकसभा सांसद सुरेश कश्यप ने बजट को ‘किसान, जवान और गरीब-सभी को धोखा देने वाला’ करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकार दूध और फसलों के एमएसपी बढ़ाने की घोषणा जरूर कर रही है, लेकिन किसानों को न तो बाजार में उचित मूल्य मिल रहा है और न ही वास्तविक भुगतान मिल रहा है। कश्यप ने गरीब परिवारों को 300 यूनिट मुफ्रत बिजली देने की घोषणा को भी ‘चुनावी जुमला’ बताया। उनका तंज था, ‘घोषणाओं की खेती हो रही है, लेकिन किसानों के खेत सूखे पड़े हैं।’
वित्तीय अनुशासन और भविष्य की योजना पर भी विपक्ष ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया है। सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने हिमाचल को कर्ज के दलदल में धकेल दिया है। उन्होंने कहा कि बजट में न तो कोई ठोस आर्थिक रोडमैप है और न ही उन कदमों का जिक्र, जिनसे राजस्व बढ़ाया जा सके। ठाकुर ने कटाक्ष करते हुए कहा, ‘यह बजट नहीं, कांग्रेस का ‘मैनेजमेंट ऑफ फेल्योर’ है।’ उन्होंने यह भी कहा कि वेतन स्थगन जैसे कदम बताता है कि सरकार पूरी तरह से वित्तीय संकट में फंस चुकी है, जबकि जनता को भ्रमित करने के लिए प्रचार आधारित योजनाएं लाई जा रही हैं।
इसी कड़ी में लोकसभा सांसद डॉ. राजीव भारद्वाज ने कहा कि सरकार खर्च की प्राथमिकताओं को तय करने में असफल रही है। भारद्वाज के अनुसार, वेतन रोकने और योजनाओं की नई घोषणाओं का कोई संतुलन दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा कि सरकार जनता से बलिदान की अपेक्षा तो कर रही है, लेकिन खुद जवाबदेही से बच रही है। ‘वेतन स्थगन और योजनाओं की भरमार-नीति कहीं नहीं, केवल दिखावा,’ उन्होंने तीखा टिप्पणी करते हुए कहा।
महिलाओं और युवाओं से जुड़े वादों पर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा है। लोकसभा सांसद कंगना रनौत ने महिला सम्मान राशि के वादे को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने कहा कि 1500 रूपये प्रतिमाह देने की घोषणा तीन वर्षों से सिर्फ कागजों में है और अब फिर से उसी वादे को बजट में दोहराया जा रहा है। कंगना रनौत ने युवाओं के लिए रोजगार योजनाओं को ‘खोखला’ बताते हुए कहा कि सरकार नौकरी देने के बजाये उन्हें केवल प्रशिक्षण और भत्तों के नाम पर बहला रही है। उन्होंने कहा, ‘यह बजट उम्मीद का नहीं, निराशा और धोखे का प्रतीक है।’
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमाचल की आर्थिक चुनौतियां वास्तविक हैं-राजस्व में कमी, केंद्र से मिलने वाले अनुदानों में कटौती और बढ़ते वेतन-पेंशन भार ने सरकार के लिए कठिन परिस्थितियां खड़ी की हैं। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन चुनौतियों से निपटने के लिए कोई ठोस समाधान प्रस्तुत करने में विफल रही है। बजट में कई नई घोषणाएं की गई हैं, पर विपक्ष का कहना है कि पिछले वादे ही पूरे नहीं हुए, तो नई घोषणाओं पर भरोसा कैसे किया जाए?
बजट पर इस तीखी राजनीतिक जंग के बीच अब आम जनता की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या सरकार जमीनी स्तर पर राहत दे पाएगी या विपक्ष के आरोप आने वाले महीनों में और अधिक तेज होंगे। फिलहाल, विपक्ष ने साफ संकेत दे दिया है कि वे बजट को लेकर सरकार को हर मोर्चे पर घेरने के लिए तैयार हैं, जबकि सरकार इस बजट को विकासोन्मुखी और संतुलित बताने में जुटी है।

विमल नेगी मौत प्रकरण में पूर्व एसपी संजीव गांधी को सीबीआई का समन

शिमला/शैल। पावर कॉरपोरेशन के पूर्व चीफ इंजीनियर विमल नेगी की रहस्यमय मौत के मामले में जांच कर रही सीबीआई ने शिमला के पूर्व एसपी संजीव गांधी को पूछताछ के लिए समन जारी किया है। उन्हें छः मार्च को दिल्ली के लोधी रोड स्थित सीजीओ कॉम्प्लेक्स में सीबीआई कार्यालय में उपस्थित होकर जांच में सहयोग करने के लिए कहा गया था। जानकारी के अनुसार यह समन दो मार्च को भेजा गया था।
मामले की जांच कर रहे सीबीआई के डीएसपी ब्रिजेंद्र प्रसाद सिंह ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता बीएनएसएसद्ध की धारा 179 के तहत यह समन जारी किया। समन में कहा गया है कि ऐसा प्रतीत होता है कि संजीव गांधी इस मामले की परिस्थितियों से भली-भांति परिचित हैं, इसलिए जांच के दौरान उनसे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर लिए जाने आवश्यक हैं।
सीबीआई ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 108, 3(5) के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित मामला दर्ज कर रखा है। हालांकि अब तक इस मामले में जांच एजेंसी की ओर से कोई बड़ा खुलासा सामने नहीं आया है, जिससे मामले की जांच को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं।
इस प्रकरण में पावर कॉरपोरेशन के पूर्व निदेशक (इलेक्ट्रिकल) देशराज को आरोपी बनाया गया है। उनकी जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत में सीबीआई अधिकारियों को कड़ी फटकार का सामना भी करना पड़ा था। अदालत ने जांच की धीमी प्रगति और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाने पर नाराजगी जताई थी।
गौरतलब है कि 10 मार्च 2025 को विमल नेगी शिमला से बिलासपुर के लिए रवाना हुए थे, जिसके बाद वह अचानक लापता हो गए थे। कई दिनों तक उनकी तलाश जारी रही और अंततः 18 मार्च को उनका शव बिलासपुर जिले के शाहतलाई क्षेत्र में एक दरिया से बरामद हुआ था। इस घटना ने प्रदेश भर में सनसनी फैला दी थी। मृतक के परिजनों ने शुरुआत से ही इसे आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या का मामला बताया था और निष्पक्ष जांच की मांग की थी।
शुरुआत में इस मामले की जांच शिमला पुलिस ने की थी। उस समय के एसएसपी संजीव गांधी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था। पुलिस ने कई लोगों से पूछताछ भी की, लेकिन मामले में स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आ पाया।
मामले ने बाद में राजनीतिक रूप ले लिया था। विपक्षी दलों, विशेषकर भाजपा ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और सरकार पर मामले की निष्पक्ष जांच कराने का दबाव बनाया। वहीं मृतक के परिजनों ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए मामले की सीबीआई जांच की मांग की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में प्रदेश सरकार की ओर से तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव (राजस्व) ओंकार शर्मा और तत्कालीन डीजीपी अतुल वर्मा द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों ने पावर कॉरपोरेशन से जुड़े कई पहलुओं को उजागर किया था। इन रिपोर्टों के सामने आने के बाद मामला और अधिक चर्चा में आ गया था।
विशेष रूप से डीजीपी अतुल वर्मा की रिपोर्ट में पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए गए थे, जिससे मामले ने और तूल पकड़ लिया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच को सीबीआई के सुपुर्द करने के आदेश जारी कर दिए थे।
सीबीआई ने जांच अपने हाथ में लेने के बाद कई अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों से पूछताछ की है। इस मामले में पावर कॉरपोरेशन के तत्कालीन प्रबंध निदेशक हरीकेश मीणा का नाम भी चर्चा में रहा है, जो वर्तमान में खेल विभाग में निदेशक के पद पर कार्यरत हैं।
फिलहाल सीबीआई की जांच जारी है और एजेंसी मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच कर रही है। वहीं पूर्व एसपी संजीव गांधी को समन जारी होने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। जांच के अगले चरण में सीबीआई किन निष्कर्षों तक पहुंचती है, इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

स्मार्ट मीटर क्रांति या नया विवाद? बिजली क्षेत्र के बदलाव पर उठते सवाल

शिमला/शैल। देश में बिजली वितरण व्यवस्था को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई स्मार्ट प्रीपेड मीटर योजना अब तेजी से आगे बढ़ रही है। सरकार का दावा है कि यह पहल बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता, दक्षता और वित्तीय सुधार लाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। लेकिन दूसरी ओर कई राज्यों में इस योजना को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। यही कारण है कि स्मार्ट मीटर अब केवल तकनीकी सुधार का विषय नहीं रह गया, बल्कि नीति और जनहित से जुड़ी बहस का केंद्र भी बन गया है।
केंद्रीय विद्युत और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा राज्य मंत्री श्रीपद येसो नाइक के अनुसार देश भर में अब तक लगभग 5.5 करोड़ स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाए जा चुके हैं। यह काम केंद्र सरकार की पुनर्गठित वितरण क्षेत्र योजना (RDSS) के तहत किया जा रहा है, जिसकी कुल लागत करीब 3,03,758 करोड़ रुपये है और जिसे वर्ष 2021-22 से 2025-26 तक लागू किया जा रहा है। इस योजना का सबसे बड़ा लक्ष्य देशभर में 20 करोड़ पारंपरिक बिजली मीटरों को स्मार्ट प्रीपेड मीटर से बदलना है।
सरकार का तर्क है कि बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की खराब वित्तीय स्थिति देश के ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या रही है। तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान, गलत बिलिंग, बिजली चोरी और भुगतान में देरी के कारण डिस्कॉम पर भारी कर्ज का बोझ बढ़ता गया। ऐसे में स्मार्ट मीटरिंग को इस समस्या का समाधान बताया जा रहा है।
स्मार्ट मीटर की खासियत यह है कि यह रियल-टाइम ऊर्जा डेटा उपलब्ध कराता है, जिससे बिजली खपत का सटीक आकलन संभव होता है। इससे बिलिंग में मानवीय हस्तक्षेप कम होता है और उपभोक्ता को सही बिल मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रीपेड प्रणाली लागू होने से उपभोक्ता पहले भुगतान करते हैं और फिर बिजली का उपयोग करते हैं, जिससे डिस्कॉम को नकदी प्रवाह बेहतर मिलने की उम्मीद है।
सरकार यह भी मानती है कि भविष्य में जब रूफटॉप सोलर, इलेक्ट्रिक वाहनों और स्मार्ट ग्रिड तकनीक का विस्तार होगा, तब स्मार्ट मीटरिंग ऊर्जा प्रबंधन का आधार बनेगी। उच्च- रिज़ॉल्यूशन डेटा के आधार पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से बिजली मांग का पूर्वानुमान और लोड प्रबंधन अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा।
लेकिन इन दावों के साथ-साथ कई सवाल भी उठ रहे हैं। कई उपभोक्ता संगठनों और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्ट मीटरिंग से बिजली उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है। कुछ राज्यों में उपभोक्ताओं ने शिकायत की है कि स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली बिल पहले की तुलना में अधिक आने लगे हैं। हालांकि बिजली कंपनियों का कहना है कि स्मार्ट मीटर केवल वास्तविक खपत दिखाते हैं, जबकि पुराने मीटरों में अकसर कम रीडिंग दर्ज होती थी।
हिमाचल प्रदेश में भी स्मार्ट मीटर लगाने की प्रक्रिया जारी है। राज्य में लगभग 28 लाख बिजली उपभोक्ता हैं और सभी के पारंपरिक मीटरों को स्मार्ट मीटर से बदलने का लक्ष्य रखा गया है। अब तक प्रदेश में करीब 8 लाख स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं।
यह प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई। वर्ष 2019 में हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड लिमिटेड ने इंटीग्रेटेड पावर डेवलपमेंट स्कीम (IPDS) के तहत शिमला और धर्मशाला में स्मार्ट मीटर लगाने का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया था। इस परियोजना के तहत करीब 1.51 लाख मीटर लगाने की योजना बनाई गई थी, जिसे वर्ष 2022-23 में पूरा कर लिया गया।
अब RDSS के तहत इस परियोजना को पूरे राज्य में विस्तार दिया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे बिजली वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी और आधुनिक बनेगी। लेकिन विपक्ष और कुछ उपभोक्ता समूह यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या राज्य सरकार ने इस योजना के आर्थिक और सामाजिक प्रभावों का पर्याप्त आकलन किया है।
एक बड़ा मुद्दा यह भी है कि पहाड़ी राज्यों में बिजली वितरण की लागत पहले ही ज्यादा होती है। दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बिजली लाइनें बिछाना और उनका रखरखाव महंगा पड़ता है। ऐसे में यदि स्मार्ट मीटरिंग से बिजली दरों में अप्रत्यक्ष वृद्धि होती है, तो इसका असर आम उपभोक्ता पर पड़ सकता है।
बिजली क्षेत्र के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत तेजी से डिजिटल ऊर्जा प्रबंधन की ओर बढ़ रहा है और स्मार्ट मीटर इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। यदि बिजली वितरण प्रणाली को आधुनिक नहीं बनाया गया तो भविष्य में बढ़ती ऊर्जा मांग को संभालना मुश्किल हो सकता है।
इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू पारदर्शिता और जनविश्वास है। यदि सरकार और बिजली कंपनियां स्मार्ट मीटरिंग के लाभों और लागतों के बारे में स्पष्ट जानकारी दें और उपभोक्ताओं की आशंकाओं का समाधान करे।
सवाल केवल यह नहीं है कि कितने मीटर लगाए गए, बल्कि यह भी है कि क्या यह बदलाव उपभोक्ता के लिए लाभकारी साबित होगा या नहीं। आने वाले वर्षों में यही तय करेगा कि स्मार्ट मीटर योजना ऊर्जा क्षेत्र में सुधार की मिसाल बनती है या फिर एक और विवादास्पद नीति के रूप में याद की जाती है।

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