Wednesday, 03 June 2026
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क्या प्रदेश को उद्योगों के भरोसे ही चलाया जा सकता है ?

शिमला/शैल। क्या औद्योगिक विकास हिमाचल के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का सूत्र बन सकता है? यह प्रश्न सुक्खू सरकार के दावे के बाद प्रासंगिक हो जाता है। हिमाचल में 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार शान्ता कुमार के नेतृत्व में बनी थी तब प्रदेश में औद्योगिक विकास का रास्ता अपनाया गया था। औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना हुई और उसके बाद आज तक आने वाली हर सरकार ने उद्योगों की स्थापना और उनको बढ़ावा देने की नीति अपनायी है। हिमाचल में 1977 के बाद दो बार शान्ता कुमार मुख्यमंत्री बने दो बार ही प्रेम कुमार धूमल और एक बार जयराम ठाकुर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। करीब 20 वर्षों तक प्रदेश में संघ पोषित विचारधारा के मुख्यमंत्री रहे हैं। संघ पोषित विचारधारा उद्योगों में प्राइवेट सैक्टर की पक्षधर रही है। जो आज केंद्र सरकार के इस दिशा में आचरण से स्पष्ट हो जाता है। 1977 से आज तक करीब तीस वर्ष कांग्रेस की सरकार स्व.रामलाल ठाकुर, स्व. वीरभद्र सिंह और सुखविंदर सिंह सुक्खू के नेतृत्व में कार्यरत है। लेकिन कांग्रेस की सरकारें भी निजी क्षेत्र की भागीदारी का विकल्प नहीं खोज पायी हैं। 1977 से आज तक उद्योगों को बढ़ावा देने के लिये भारत सरकार ने अपनी सोच के मुताबिक सुविधा प्रदान की नीतियां अपनायी। पर्यटन को भी उद्योग का दर्जा दिया गया। शान्ता कुमार स्वयं होटल उद्योग में आये प्रोत्साहन देने के लिये सरकारी जमीन पर बने होटल यामिनी को प्राइवेट जमीन के साथ तबादले की सुविधा प्रदान की गयी। कुल मिलाकर उद्योगों के लिये सरकार ने सारे दरवाजे खोल दिये। बिजली की उपलब्धता के नाम पर उद्योगों को आमंत्रित किया गया। लेकिन इसी औद्योगीकरण से प्रदेश को हासिल क्या हुआ जो सार्वजनिक उपक्रम इन उद्योगों की सुविधा के लिये स्थापित किये गये थे उनमें से वित्त निगम जैसे कितने संस्थान लगभग खत्म हो चुके हैं। 90% सार्वजनिक उपक्रम घाटे में चल रहे हैं और प्रदेश का कर्ज एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर गया है। रोजगार के नाम पर आउटसोर्स, मल्टी टास्क और मित्र योजना तक प्रदेश पहुंच गया है। आज प्रदेश नये संस्थान खोलने के नाम पर पुराने संस्थाओं को बन्द करने के कगार पर पहुंच गया है। सरकार ने जब भी कर्ज लिया है तो हमेशा विकास योजनाओं के नाम पर लिया है। विकास से परिणामतः आय होना स्वाभाविक है चाहे सरकार को हुई हो या आम आदमी को। यदि सही में विकास पर किये गये निवेश से आय हुई होती तो प्रदेश को कर्ज का ब्याज चुकाने के लिये भी कर्ज लेने की स्थिति न खड़ी होती। आज कर्ज के जिस आंकड़े पर प्रदेश पहुंच चुका है उससे भविष्य लगातार प्रश्नित होता जा रहा है। आज सरकारें चुनाव जीतने के लिये समाज को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर आर्थिक प्रलोभनों के सहारे चल रही है यह भूल रही है कि जिस छोटे से वर्ग को आर्थिक सहायता प्रदान करने का भरोसा दिलाया जाता है उसकी भरपाई तो प्रदेश को करनी पड़ती है। आज समय आ गया है जब पार्टियों के चुनाव घोषणा पत्रों पर यह शर्त लगानी पड़ेगी की क्या आप यह सुविधा कर्ज और शुल्क के रूप में तो नहीं वसूल करेंगे। हिमाचल पहाड़ी प्रदेश है यहां कृषि और बागवानी विश्वविद्यालय के शोध को यहां के गांव तक ले जाने की आवश्यकता है। क्योंकि एक बड़े औद्योगिक निवेश से जीडीपी का आंकड़ा बढ़कर सरकार के कर्ज लेने की सीमा और बढ़ जाती है परन्तु उससे आम आदमी को व्यवहारिक लाभ नहीं पहुंचता है।

मनरेगा को समाप्त करने का दावा भ्रामकः डॉ.राजीव भारद्वाज

शिमला/शैल। भाजपा सांसद एवं उपाध्यक्ष डॉ. राजीव भारद्वाज ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के कांगड़ा जिला के इंदौरा में दिये गये ब्यान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मनरेगा को समाप्त किए जाने का आरोप तथ्यहीन और भ्रामक है। उन्होंने कहा कि ऐसे ब्यानों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न की जा रही है।
डॉ. भारद्वाज ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने मनरेगा को समाप्त नहीं किया है, बल्कि इसे अधिक प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के उद्देश्य से ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) के रूप में संरचनात्मक रूप से सुदृढ़ किया गया है। उनके अनुसार, नए प्रावधानों के तहत रोजगार गारंटी की अवधि 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन की गई है, जिससे ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कहा कि संशोधित ढांचे के अंतर्गत जल संरक्षण, ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका संसाधनों के सृजन और जलवायु अनुकूलन जैसे क्षेत्रों में स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण किया जाएगा, जिससे गांवों में दीर्घकालिक विकास और रोजगार के अवसर सुनिश्चित होंगे।
डॉ. भारद्वाज ने संसद में हालिया विधायी प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि संबंधित विधेयक पर व्यापक चर्चा हुई और बड़ी संख्या में सांसदों ने इसमें भाग लिया। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार की ओर से विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर देने की सहमति व्यक्त की गई थी।
उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनाये रखना सभी दलों की सामूहिक जिम्मेदारी है और संसदीय मर्यादाओं का पालन लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
डॉ. भारद्वाज ने कहा कि केंद्र सरकार ग्रामीण भारत को रोजगार, आत्मनिर्भरता और सम्मानजनक जीवन प्रदान करने के उद्देश्य से नीतिगत सुधारों पर लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि भाजपा तथ्यों के साथ जनता के बीच अपनी बात रखती रहेगी और किसी भी प्रकार के भ्रम का निराकरण किया जाएगा।

संसद के शीतकालीन सत्र में जनहित के आठ विधेयक पारितःअनुराग ठाकुर

शिमला/शैल। संसद के शीतकालीन सत्र की समाप्ति के बाद हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि इस सत्र में जनहित से जुड़े आठ महत्वपूर्ण विधेयकों को संसद की मंजूरी मिली है। उन्होंने इसे अठारहवीं लोकसभा के छठे सत्र की उल्लेखनीय उपलब्धि बताया।
अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार देश और नागरिकों के हितों को सर्वाेपरि रखते हुए कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का फोकस सामाजिक उत्थान, राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर रहा है, जिसका प्रतिबिंब शीतकालीन सत्र के दौरान पारित विधेयकों में दिखाई देता है।
उन्होंने बताया कि इस सत्र में संसद ने ‘विकसित भारत-जी राम जी विधेयक, 2025’ सहित कुल आठ विधेयकों को मंजूरी दी। इसके अलावा ‘भारत के रूपांतरण के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन (शांति) विधेयक, 2025’, ‘सबका बीमा, सबकी रक्षा (बीमा कानूनों में संशोधन) विधेयक, 2025’ तथा वर्ष 2025-26 के लिए अनुदानों की अनुपूरक मांगें (प्रथम बैच) और संबंधित विनियोग (संख्या-4) विधेयक, 2025 भी पारित किए गए।
अनुराग ठाकुर के अनुसार, संसद ने देश में अप्रचलित और पुराने हो चुके 71 कानूनों को निरस्त या संशोधित करने से जुड़े ‘निरसन और संशोधन विधेयक, 2025’ को भी स्वीकृति प्रदान की। इसके साथ ही लोकसभा ने ‘मणिपुर माल और सेवा कर (दूसरा संशोधन) विधेयक, 2025’, ‘केंद्रीय उत्पाद शुल्क (संशोधन) विधेयक, 2025’ और पान मसाला पर उपकर लगाने से संबंधित ‘स्वास्थ्य सुरक्षा से राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर विधेयक, 2025’ को भी ध्वनिमत से पारित किया।
उन्होंने कहा कि विपक्ष के असहयोग और व्यवधान के बावजूद सरकार ने सदन में जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया और विधायी कार्यवाही को आगे बढ़ाया। अनुराग ठाकुर ने यह भी आरोप लगाया कि सत्र के दौरान कुछ दलों का राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ को लेकर विरोध सामने आया, जिसे उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
अनुराग सिंह ठाकुर ने कहा कि सरकार संसद के माध्यम से देश की जनता से जुड़े विषयों पर निर्णय लेने और राष्ट्रहित में कानून बनाने के लिए प्रतिबद्ध है तथा भविष्य में भी यह प्रक्रिया निरंतर जारी रहेगी।

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