Wednesday, 03 June 2026
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ऊना के तालाब प्रोजेक्ट में फर्जीवाड़े के आरोप, विजिलेंस जांच की मांग

शिमला/शैल। ऊना जिले के हरोली क्षेत्र में करीब 2.05 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किए गए पुबोवाल तालाब परियोजना (Pubowal Pond Project) पर गंभीर सवाल खड़े हो गये हैं। सरकार ने इस परियोजना को ‘नेचुरल ट्रीटमेंट सिस्टम’ और ‘स्टेट ऑफ आर्ट टेक्नोलॉजी’ आधारित मॉडल के रूप में पेश किया था, लेकिन अब सामने आये दस्तावेज और विजिलेंस को दी गई शिकायत इस पूरे प्रोजेक्ट को शक के घेरे में ला रहे हैं। ऊना निवासी रोहित कटवाल ने राज्य विजिलेंस एवं एंटी करप्शन ब्यूरो को लगभग 700 पन्नों के दस्तावेजों के साथ शिकायत सौंपते हुए आरोप लगाया है कि परियोजना में फर्जी डीपीआर, टेंडर में मिलीभगत, हितों के टकराव और करोड़ों रुपये के सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला सामने आता है। शिकायत के अनुसार जिस व्यक्ति ने परियोजना की डीपीआर तैयार की, उसी से जुड़ी कंपनी को बाद में काम दे दिया गया और करोड़ों रुपये का भुगतान भी कर दिया गया। शिकायत में कहा गया है कि जिस व्यक्ति ने डीपीआर तैयार की और बाद में यह काम Rebound Enviro Tech Pvt. Ltd. को मिला, जिसमें वह निदेशक बताये गये हैं। यानी जिसने परियोजना की जरूरत, लागत और तकनीकी ढांचा तय किया, वही सरकारी भुगतान लेने वाली एजेंसी से जुड़ा निकला। सरकारी परियोजनाओं में डीपीआर ही वह आधार होती है, जिसके आधार पर तकनीकी मंजूरी और प्रशासनिक स्वीकृति मिलती है। ऐसे में यदि डीपीआर तैयार करने वाला ही काम लेने वाला निकले, तो पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मामले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा डीपीआर की सामग्री को लेकर सामने आया है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि डीपीआर में अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य की कुछ जगहों का जिक्र किया गया है। इतना ही नहीं, केरल के दो स्थानों के नाम भी दस्तावेज में पाए गए। सवाल यह उठ रहा है कि यदि परियोजना ऊना के हरोली क्षेत्र की थी, तो डीपीआर में अमेरिका और केरल की जगहों का क्या काम था। शिकायतकर्ता का आरोप है कि पूरी डीपीआर इंटरनेट या किसी अन्य परियोजना से कॉपी-पेस्ट कर तैयार की गई। तकनीकी शब्दावली भी कथित तौर पर शहरी सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से जुड़ी हुई बताई गई है, जबकि यह परियोजना एक ग्रामीण तालाब के लिए थी। यदि यह आरोप सही साबित होता है, तो इसका अर्थ होगा कि जिस दस्तावेज के आधार पर करोड़ों रुपये की मंजूरी मिली, वह वास्तविक साइट अध्ययन पर आधारित ही नहीं था।
शिकायतकर्ता ने 13 मई 2026 को मौके का निरीक्षण कर तस्वीरें भी संलग्न की हैं। शिकायत में कहा गया है कि जिस ‘नेचुरल ट्रीटमेंट सिस्टम’ के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, उसकी मुख्य संरचनाएं मौके पर दिखाई नहीं देतीं। डीपीआर में ‘कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड’, ‘फ्लोटिंग वेटलैंड’, ‘कैस्केडिंग एरेशन सिस्टम’ और ‘रूटजोन मीडिया’ जैसी हाईटेक संरचनाओं का उल्लेख है, लेकिन जमीन पर जो दिख रहा है वह एक सामान्य तरीके से सुंदर बनाया गया तालाब है, जिसमें रेलिंग, पक्की पगडंडी, लाइटें, एक छोटा फाउंटेन और एक झोपड़ीनुमा ढांचा नजर आता है। यानी जनता ने जिस ‘स्टेट ऑफ आर्ट टेक्नोलॉजी’ के लिए पैसा दिया, वह तकनीक आखिर जमीन पर कहां है, यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है। शिकायत में कई खर्चों को भी संदिग्ध बताया गया है। उदाहरण के तौर पर केवल 3X3 मीटर के ‘मेडिटेशन हट’ पर 7.71 लाख रुपये खर्च दिखाए गए हैं। एलईडी स्क्रीन और साउंड सिस्टम के लिए 7.5 लाख रुपये का भुगतान दर्ज है, लेकिन उसके मॉडल और तकनीकी विवरण तक नहीं दिए गए। ‘फ्लोटिंग वेटलैंड’ पर 12 लाख रुपये से अधिक और सामान्य निर्माण सामग्री पर बाजार दर से कई गुना अधिक खर्च दिखाया गया है। सबसे गंभीर आरोप यह है कि रिकॉर्ड में करीब 60 लाख रुपये का सीमेंट कंक्रीट दिखाया गया, जबकि मौके पर साधारण पत्थर की चिनाई दिखाई देती है। शिकायतकर्ता का दावा है कि केवल इसी मद में 30 से 35 लाख रुपये तक का अंतर हो सकता है।
टेंडर प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में है। शिकायत के अनुसार परियोजना का टेंडर जनवरी 2024 में जारी हो गया था, जबकि पूरी योजना की प्रशासनिक मंजूरी सितम्बर 2024 में मिली। यानी मंजूरी बाद में और टेंडर पहले। इसके अलावा 2 करोड़ रुपये से अधिक के काम के लिए केवल 11 दिन का टेंडर समय दिया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इतनी कम अवधि में वास्तविक प्रतिस्पर्धा संभव नहीं थी। तीन कंपनियों ने बोली लगाई, लेकिन शिकायत में दावा किया गया है कि इनमें आपसी संबंध थे। एक कंपनी के दस्तावेज में दूसरी कंपनी के निदेशक का नाम ‘क्लाइंट’ के तौर पर दर्ज मिला, जिससे टेंडर में मिलीभगत यानी ‘बिड कार्टेलाइजेशन’ का संदेह पैदा होता है। ट्रेजरी रिकॉर्ड के अनुसार इस परियोजना में अब तक लगभग 1.63 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद मौके पर वह हाईटेक सिस्टम नजर नहीं आता, जिसके नाम पर पूरा प्रोजेक्ट तैयार किया गया था। शिकायत में यह भी कहा गया है कि इसी तरह की डीपीआर और ठेकेदार पैटर्न गोंदपुर जयचंद और दुलैहड़ा तालाब परियोजनाओं में भी दिखाई देते हैं, जिससे यह मामला एक अकेली परियोजना से आगे बढ़कर पूरे मॉडल की जांच की मांग करता है। अब देखना यह होगा कि विजिलेंस ब्यूरो इस शिकायत पर क्या कारवाई करता है, क्योंकि यदि आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल एक तालाब परियोजना तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी परियोजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन जाएगा।

क्या भारत आर्थिक दबाव की नई चुनौती की ओर बढ़ रहा है?

शिमला/शैल। भारत में जब भी प्रधानमंत्री देशवासियों से पेट्रोल, डीजल, गैस या सोने जैसी वस्तुओं के सीमित उपयोग की अपील करते हैं, तो उसका असर केवल एक सामान्य सरकारी सलाह तक सीमित नहीं रहता। यह संदेश सीधे देश की आर्थिक स्थिति, विदेशी मुद्रा भंडार, बढ़ते आयात खर्च और वैश्विक अस्थिरता से जुड़ जाता है। हाल ही में तेलंगाना के एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल-डीजल और गैस का ‘संयमित उपयोग’ करने तथा ऊर्जा बचाने की अपील की। उन्होंने कहा कि भारत जिन ऊर्जा उत्पादों का आयात करता है, उनका जरूरत के अनुसार ही इस्तेमाल होना चाहिए ताकि विदेशी मुद्रा की बचत हो सके और वैश्विक युद्ध जैसे संकटों के दुष्प्रभाव कम किए जा सकें।
प्रधानमंत्री का यह ब्यान ऐसे समय आया है जब दुनिया लगातार आर्थिक अनिश्चितता, युद्ध, महंगे कच्चे तेल और व्यापारिक तनावों से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन की समस्याओं ने ऊर्जा बाजार को अस्थिर बना दिया है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
हालांकि प्रधानमंत्री ने किसी आर्थिक संकट की औपचारिक घोषणा नहीं की, लेकिन उनकी अपील ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष ने इसे देश की आर्थिक स्थिति पर ‘अप्रत्यक्ष चेतावनी’ बताया है। विपक्षी दलों का कहना है कि अगर देश की अर्थव्यवस्था मजबूत है और भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का दावा कर रहा है, तो फिर आम जनता से पेट्रोल और ऊर्जा बचाने की अपील क्यों करनी पड़ रही है।
कांग्रेस के नेताओं ने कहा कि सरकार लगातार विकास और रिकॉर्ड विदेशी निवेश की बात करती है, लेकिन दूसरी ओर ईंधन की बढ़ती कीमतें, महंगाई और बेरोजगारी आम परिवारों की कमर तोड़ रही हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार को केवल जनता से बचत की अपील करने के बजाय टैक्स कम कर राहत देनी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि पेट्रोल और डीजल पर भारी टैक्स लगाकर सरकार आम आदमी पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है।
दूसरी ओर सरकार समर्थक इसे जिम्मेदार नेतृत्व का उदाहरण बता रहे हैं। उनका कहना है कि वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए ऊर्जा बचत और आत्मनिर्भरता की बात करना दूरदर्शी सोच है। सरकार के समर्थकों का तर्क है कि विकसित देशों में भी नागरिकों से ऊर्जा बचत की अपील की जाती रही है और भारत जैसे विशाल देश में संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग आवश्यक है।
आर्थिक विशेषज्ञों की राय भी इस मुद्दे पर बंटी हुई दिखाई देती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री का संदेश पूरी तरह व्यावहारिक है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भर है। यदि वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है। इससे रुपये पर दबाव बढ़ेगा, विदेशी मुद्रा भंडार प्रभावित होगा और महंगाई में और वृद्धि हो सकती है।
हालांकि कुछ विशेषज्ञ इसे सरकार की चिंता का संकेत भी मान रहे हैं। उनका कहना है कि जब सरकार सार्वजनिक रूप से ईंधन और विदेशी मुद्रा बचाने की बात करती है, तो यह बताता है कि आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां और कठिन हो सकती हैं।
सार्वजनिक प्रतिक्रिया भी मिश्रित रही है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने प्रधानमंत्री की अपील का समर्थन करते हुए ऊर्जा बचत को राष्ट्रीय जिम्मेदारी बताया। कुछ लोगों ने कहा कि यदि देश संकट के दौर से गुजर रहा है तो नागरिकों को सहयोग करना चाहिए। वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने यह सवाल भी उठाया कि आखिर आम आदमी कितना और बचत करे, जब पहले से ही महंगाई लगातार बढ़ रही है।
मध्यम वर्ग के परिवारों का कहना है कि पेट्रोल, रसोई गैस और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतें पहले ही उनकी आय पर भारी दबाव डाल रही हैं। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अब दोपहिया वाहन चलाना भी महंगा हो चुका है और गैस सिलेंडर की कीमतें घरेलू बजट बिगाड़ रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी चिंता दिखाई दे रही है। किसानों का कहना है कि डीजल महंगा होने से खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। ट्रैक्टर, सिंचाई और परिवहन का खर्च सीधे कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहा है। यदि ईंधन की कीमतें और बढ़ती हैं, तो इसका असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दिखाई देगा।
सोने को लेकर भी बाजार में चर्चा तेज हो गई है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में शामिल है। आर्थिक संकट या वैश्विक अनिश्चितता के समय भारतीय परिवार परंपरागत रूप से सोने में निवेश बढ़ाते हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े पैमाने पर सोने का आयात भी विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ाता है। ऐसे में सरकार लंबे समय से लोगों को वैकल्पिक निवेश की ओर प्रोत्साहित करने की कोशिश कर रही है।
राजनीतिक रूप से भी यह मुद्दा आने वाले समय में महत्वपूर्ण बन सकता है। विपक्ष सरकार को महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता के मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है। वहीं केंद्र सरकार अपनी उपलब्धियों, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और वैश्विक मंच पर भारत की मजबूत स्थिति को सामने रख रही है।
सच्चाई यह है कि भारत आज एक ऐसे दौर में खड़ा है जहां विकास और आर्थिक दबाव दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे हैं। एक ओर देश तेजी से हाईवे, रेलवे, डिजिटल नेटवर्क और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में निवेश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक संकटों का असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर साफ महसूस किया जा रहा है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार महंगाई नियंत्रण, रोजगार सृजन और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाती है। क्योंकि किसी भी अर्थव्यवस्था की असली मजबूती केवल बड़े प्रोजेक्ट्स या निवेश से नहीं, बल्कि आम नागरिक की आर्थिक सुरक्षा और भरोसे से तय होती है।

हिमाचल में 51 शहरी निकायों के चुनाव का ऐलान 17 मई को मतदान

शिमला/शैल। राज्य निर्वाचन आयोग हिमाचल प्रदेश ने प्रदेश के 51 शहरी निकायों में चुनाव कार्यक्रम जारी कर दिया है। यह चुनाव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243ZA के तहत कराये जा रहे हैं, जिसके अनुसार शहरी निकायों के चुनाव करवाने की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग के पास होती है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन निकायों का आरक्षण रोस्टर सरकार से प्राप्त हो चुका है, उनमें चुनाव प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
इस चुनाव में कुल 51 शहरी निकाय शामिल हैं, जिनमें 4 नगर निगम, 25 नगर परिषद और 22 नगर पंचायत हैं। इन सभी निकायों में कुल 449 पदों पर चुनाव होंगे। इनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। कुल 195 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखी गई हैं, जिससे स्थानीय शासन में उनकी भागीदारी और मजबूत होने की उम्मीद है।
आयोग ने बताया कि मतदाता सूची को पूरी तरह अद्यतन और त्रुटिरहित बनाने पर विशेष ध्यान दिया गया है। 1 अक्तूबर 2025 को प्रारूप मतदाता सूची प्रकाशित की गई थी, जिसे 13 नवंबर 2025 को अंतिम रूप दिया गया। इसके बाद 1 अप्रैल 2026 को विशेष पुनरीक्षण किया गया, ताकि अधिक से अधिक पात्र लोगों को मतदान का अधिकार मिल सके।
इन 51 शहरी निकायों में कुल 3,80,859 मतदाता पंजीकृत हैं। इनमें 1,80,963 पुरुष, 1,79,882 महिलाएं और 14 अन्य मतदाता शामिल हैं। खास बात यह है कि 1,808 युवा मतदाता इस बार पहली बार वोट डालेंगे। आयोग ने इसे लोकतंत्र के लिए सकारात्मक संकेत बताया है।
मतदान को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए कुल 589 मतदान केंद्र बनाए जाएंगे। जिन केंद्रों पर मतदाताओं की संख्या अधिक होगी, वहां सहायक मतदान केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे। आयोग ने निर्देश दिए हैं कि जहां संभव हो, महिलाओं के लिए अलग मतदान केंद्र बनाए जाएं और वहां महिला स्टाफ व सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जाए।
मतदाताओं की सुविधा के लिए आयोग द्वारा SMS के माध्यम से मतदान से जुड़ी जानकारी दी जाएगी। इसके अलावा ‘वोटर सारथी’ ऐप के जरिए मतदाता अपना नाम और मतदान केंद्र की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं। आयोग ने कहा कि केवल उन्हीं मतदाताओं को SMS सूचना मिलेगी, जिन्होंने अपना मोबाइल नंबर पंजीकृत कराया है।
मतदान के दिन मतदाताओं को पहचान के लिए फोटो पहचान पत्र के साथ कोई अन्य वैध दस्तावेज जैसे आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, बैंक पासबुक या राशन कार्ड साथ लाना होगा। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केवल मतदाता सूची में नाम दर्ज होना ही मतदान के लिए जरूरी है।
चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए भी दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। नगर निगम के उम्मीदवार अधिकतम 1 लाख रुपये, नगर परिषद के उम्मीदवार 75 हजार रुपये और नगर पंचायत के उम्मीदवार 50 हजार रुपये तक चुनाव खर्च कर सकेंगे। सभी उम्मीदवारों को चुनाव परिणाम घोषित होने के 30 दिनों के भीतर अपने खर्च का पूरा विवरण जमा करना होगा। इसके लिए आयोग ने candidate expenditure reporting system (CERS)नामक ऑनलाइन प्रणाली भी उपलब्ध कराई है।
चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के साथ ही सभी निकायों में आदर्श आचार संहिता लागू हो गयी है। आयोग ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर मतदाताओं को प्रभावित न करें। साथ ही सरकारी संसाधनों का चुनाव प्रचार में उपयोग करने पर भी रोक लगाई गई है।
शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए कानून-व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। आयोग ने पुलिस और प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि सुरक्षा के पर्याप्त प्रबंध किए जायें। मतदान और मतगणना से 48 घंटे पहले शराब की बिक्री और वितरण पर पूरी तरह प्रतिबंध रहेगा।
इसके अलावा, मतदान के दिन सभी सरकारी और निजी संस्थानों में सवैतनिक अवकाश घोषित करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग मतदान में भाग ले सकें।
निर्वाचन कार्यक्रम के अनुसार अधिसूचना 21 अप्रैल 2026 को जारी की गई है। नामांकन पत्र 29 और 30 अप्रैल को दाखिल किए जाएंगे। 2 मई को नामांकन पत्रों की जांच होगी और 4 मई को नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। इसके बाद चुनाव चिन्ह आवंटित किए जाएंगे। मतदान 17 मई 2026 को सुबह 7 बजे से दोपहर 3 बजे तक होगा।
नगर पंचायत और नगर परिषद के चुनावों की मतगणना मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद संबंधित मुख्यालयों में की जाएगी। वहीं नगर निगमों के लिए मतगणना 31 मई 2026 को सुबह 9 बजे से शुरू होगी। आयोग ने सभी मतदाताओं से अपील की है कि वे बिना किसी डर या दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग करें और किसी भी प्रकार के प्रलोभन से दूर रहें। साथ ही सभी अधिकारियों और कर्मचारियों को निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ चुनाव प्रक्रिया संपन्न कराने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रदेश में होने जा रहे ये शहरी निकाय चुनाव स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। आयोग को उम्मीद है कि सभी के सहयोग से यह चुनाव शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और सफलतापूर्वक संपन्न होंगे।

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