Sunday, 01 March 2026
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क्या चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु सभी विभागों में 60 वर्ष नहीं है

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार में सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष है। लेकिन 2001 में एक अधिसूचना के तहत इसमें बदलाव करते हुये यह कह दिया गया कि जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी 10 मई 2001 को या इसके बाद नियुक्त हुये हैं या नियमित हुये हैं उनकी सेवानिवृत्ति 58 वर्ष पूरा होने पर हो जायेगी। इस अधिसूचना को एक नारो देवी ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। इस चुनौती पर न्यायमूर्ति अजय मोहन गोयल ने इस अधिसूचना को भेदभाव पूर्ण करार देते हुए सभी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु पूरी होने पर सेवानिवृत किये जाने का फैसला दिया है। 2024 में आये इस फैसले पर सुक्खू सरकार ने भी इसी आश्य के आदेश जारी कर दिये। लेकिन सरकार के यह आदेश अभी तक सारे विभागों और कार्यालयों तक नही पहुंचे हैं। ऊना में जल शक्ति विभाग में तो इन आदेशों के अनुसार चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति हो रही है। परन्तु इसी जिले के शिक्षा विभाग में आज तक इस आश्य के कोई आदेश नहीं पहुंचे हैं। शिक्षा विभाग में यह असमजस बनी हुई है कि वह अपने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को किस आयु सीमा में सेवानिवृत्त करें। जल शक्ति विभाग में 60 वर्ष की आयु पर एक बेलदार को सेवानिवृत्ति किये जाने का आदेश सामने आने के बाद सरकार की कार्य प्रणाली पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह चर्चा चल रही है कि एक ही सरकार के दो विभागों में अलग-अलग सेवानिवृत्ति नियम कैसे हो सकते हैं। 2024 में आये उच्च न्यायालय के फैसले की शिक्षा विभाग को जानकारी न होने से सरकार की कार्यप्रणाली सवालों में आ गयी है।

क्या प्रदेश वित्तीय आपात की ओर बढ़ रहा है? या राष्ट्रपति शासन लगेगा?

शिमला/शैल। 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बन्द किये जाने पर प्रदेश के राजनीतिक हल्कों में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं उभरी हैं उससे यह आशंका बढ़ती जा रही है की कहीं हिमाचल वित्तीय आपात या राष्ट्रपति शासन की ओर तो नहीं बढ़ रहा है। यह अनुदान बन्द होने पर सरकार की पहली प्रतिक्रिया वित्त सचिव की इस मुद्दे पर आयी प्रस्तुति से सामने आयी। इस प्रस्तुति से प्रदेश भर में चिन्ता और चिन्तन का माहौल खड़ा हो गया। इस माहौल को देखते हुये सरकार ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्तुति सिर्फ एक आकलन है कोई फैसला नहीं। इसके बाद सरकार ने इस पर चर्चा करने के लिये विधानसभा का एक दिन के लिये विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई जिसकी राज्यपाल ने यह कहकर अनुमति नहीं दी कि जब अभी बजट सत्र  रहा है तो एक दिन के विशेष सत्र की क्या आवश्यकता है। इसके बाद सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई इस बैठक में मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने वॉकआउट कर दिया। इसके बाद विधानसभा का बजट सत्र आ गया इस सत्र में सरकार ने राज्यपाल के अभिभाषण में राजस्व घाटा अनुदान पर वित्त आयोग पर विशेष फोकस कर लिया। लेकिन महामहिम राज्यपाल ने इस अभिभाषण के पैरा तीन से सोलह तक को यह कह कर पढ़ने से मना कर दिया कि इसमें संवैधानिक संस्था पर टिप्पणियां हैं इसलिये वह इसे नहीं पढ़ेंगे। इस तरह राज्यपाल का अभिभाषण दो मिनट एक सेकंड में ही पूरा हो गया। इस तरह वित्त सचिव की प्रस्तुति से लेकर राज्यपाल के अभिभाषण तक जो घटा है और उसका आगे क्या प्रभाव हो सकता है इस पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि सरकार ने इस पर लम्बी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है।
प्रदेश की वित्तीय स्थिति खराब है यह चेतावनी मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही दे दी थी। इस स्थिति का दोष पूर्व सरकार के कुप्रबंधन पर डालकर उसके अंतिम छः माह में लिये गये फैसलों को बदल दिया। खराब वित्तीय स्थिति के चलते सरकार कर्ज पर आश्रित होती चली गयी। जब इस सरकार ने पदभार संभाला था तब प्रदेश का कुल कर्जभार 74000 करोड़ था जो आज बढ़कर एक लाख करोड़ से उपर पहुंच गया है और अभी एरियर और महंगाई भत्ते की ही करीब चौदह हजार करोड़ की देनदारियां खड़ी हैं। विभिन्न विभागों की देनदारियां अलग से हैं। सरकार तीन वर्षों से लगातार पूर्व सरकार और केन्द्र पर दोषारोपण करती आ रही है। लेकिन आज तक पूर्व सरकार के एक भी भ्रष्टाचार के मामले को सामने लाकर उस पर कारवाई नहीं कर पायी है। संसाधन जुटाने और प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर सरकार तीन वर्षों में मुख्यमंत्री के अनुसार 26000 करोड़ से अधिक का राजस्व प्रदेश से इकट्ठा कर चुकी है। लेकिन इस सब के बावजूद सरकार स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों से भागती रही है। आने वाले पंचायत चुनाव सरकार के सारे दावों का खुलासा सामने रख देंगे। आज फील्ड में न तो सरकार के काम दिख रहे हैं और न ही कार्यकर्ता। यह स्थिति हो गयी है।
इस वस्तु स्थिति में जब राजस्व घाटा अनुदान बन्द होने का सच सामने आया है तो सरकार के हाथ पैर फूलने पर चर्चा आवश्यक हो जाती है। राजस्व घाटा अनुदान बन्द होगा यह पिछले वित्त आयोग की रिपोर्ट में ही स्पष्ट अंकित था। यह अनुदान 31 मार्च 2026 तक ही रहेगा यह स्पष्ट था। फिर 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी 2025 में आ गयी थी तब सरकार इस पर सचेत क्यों नहीं हुई? जो अधिकारी वित्त आयोग के पास प्रदेश का पक्ष रखते रहे हैं क्या सरकार उनको जनता के साथ सांझा करेगी? राजस्व घाटा अनुदान कोई शाश्वत अधिकार नहीं है जिसे अदालत के माध्यम से बहाल करवाया जा सके। यह वित्त आयोग की सिफारिश पर किया गया एक प्रावधान है। इसलिये यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अनुदान किसी भी सूरत में बहाल नहीं होगा। इस मुद्दे पर यदि विपक्ष भी सरकार के साथ मिलकर दिल्ली में गुहार लगाने चला तो फिर भी इससे कोई लाभ नहीं मिलेगा। बल्कि इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े होंगे उसके संकेत जयराम ठाकुर के उस बयान से सामने आ गये हैं जिसमें वह सरकार से उस कांग्रेस नेता के बारे में पूछ रहे हैं जिसे उसके खिलाफ चल रही जांच को बन्द न करने पर पार्टी पद छोड़ने की धमकी दी है। ऐसे बहुत सारे सवाल आने वाले दिनों में और भी सामने आयेंगे। ऐसे परिदृश्य में यदि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न हो पाया तो सरकार कैसे चलेगी। पिछली देनदारियां कैसे पूरी होगी? अभी राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में वित्त आयोग पर सरकार के खुलासे को अपने शब्द नहीं दिये हैं। इस पर भाजपा की प्रतिक्रिया क्या रहती है और सरकार का आचरण क्या रहता है यह सब आने वाले दिनों में सामने आयेगा? क्योंकि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न होने पर सरकार के खर्चे कैसे चलेंगे यह सवाल अपनी जगह खड़ा रह जाता है। क्योंकि वित्त सचिव ने जो कुछ अपनी प्रस्तुति में कहा है वह कोई राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि एकदम कड़वा सच है। वित्त सचिव के खुलासे पर अमल करने के लिये प्रदेश में वित्तीय आपात लागू करने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता है। क्योंकि वित्तीय आपात की स्थिति में भी वित्तीय लाभों पर कैंची चलाई जा सकती है। राष्ट्रपति शासन में सारी राजनीतिक नियुक्तियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में यदि सही में प्रदेश के वित्तीय हालत खराब हैं तो देर-सवेर प्रदेश को इन विकल्पों पर लाना ही होगा।

आर्थिक संकट से सरकार की नीयत और नीति पर उठते सवाल

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार अपने ही बोझ तले दम तोड़ने के कगार पर पहुंच गयी है? यह सवाल इसलिये उठ खड़ा हुआ है कि 16वें वित्त आयोग ने सत्रह राज्यों को मिल रही राजस्व घाटा अनुदान योजना को बन्द कर दिया है। संविधान की धारा 275(1) के तहत केन्द्र की ओर से राज्यों को यह अनुदान मिल रहा था। जिन राज्यों की राजस्व आय उन राज्यों के राजस्व व्यय से कम हो जाती थी उन राज्यों को सहायता देने के लिये यह अनुदान दिया जाता था। लेकिन इस अनुदान की पात्रता और आकार का आकलन वित्त आयोग के जिम्मे था। वित्त आयोग का गठन महामहिम राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है और इसकी सिफारिशें सबको मान्य होती हैं। इसकी सिफारिशों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है। लेकिन सिफारिशों का दुरुपयोग होना शुरू हो गया। राज्यों में वित्तीय अनुशासन गायब होता चला गया। इस वस्तु स्थिति को देखते हुये वर्ष 2003 में राज्यों में वित्तीय अनुशासन और प्रबंधन को सुचारू बनाने के लिये एफआरबीएम अधिनियम लाया गया। यह रखा गया कि राज्य अपने जीडीपी के तीन प्रतिशत तक ही कर्ज ले सकते हैं। प्रतिबद्ध राजस्व व्यय के लिये कर्ज लेने का कोई प्रावधान नहीं है। कर्ज केवल पूंजीगत परिसंपत्तियां खड़ी करने के लिये ही लिया जा सकता है ताकि उनसे राजस्व मिले। लेकिन इस अनुशासन का भी राज्यों पर ज्यादा असर नहीं हुआ। जबकि 2003 में एक उच्च राज्य स्तरीय बैठक वरिष्ठ अधिकारी दीपक सानन की अध्यक्षता में हुई थी और जो पद दो वर्षों से किन्हीं कारणों से खाली चले आ रहे थे उन्हें समाप्त करने का फैसला लिया गया था। इस फैसले पर उस समय भी भाजपा और कांग्रेस में सदन में विवाद हुआ था। लेकिन यह सब होने के बाद भी प्रदेश में वित्तीय अनुशासन नहीं आया। दशकों तक उपयोगिता प्रमाण पत्र जारी नहीं हुये और पलान के पैसे से नॉन पलान के खर्चे चलाये गये। जो प्रदेश 1993 तक कर्ज मुक्त था आज उसका कर्ज एक लाख करोड़ से कैसे बढ़ गया? जो कर्ज जीडीपी के 3% तक रहना चाहिए था वह आज करीब 45% तक पहुंच गया है। जबकि एफआरबीएम अधिनियम लाकर इस कर्ज को शून्य पर लाने की कवायत की गई थी। लेकिन जब चुनावी लाभ लेने के लिये वायदों की रेवड़ियां बंटनी शुरू हुई तब वित्तीय अनुशासन लाने के लिये आज राजस्व घाटा अनुदान बन्द करने पर आना पड़ा है। 15वें वित्त आयोग की जब रिपोर्ट आयी थी तो उसी में यह दर्ज था कि यह राजस्व घाटा अनुदान 31 मार्च 2026 को समाप्त हो जाएगा। लेकिन व्यवस्था परिवर्तन के घोड़े पर सवार सुक्खू सरकार इस सच्चाई को समझ नहीं पायी और आज हर तरह की प्रतिक्रियाएं देने के कगार पर पहुंच गयी है। पहली बार है कि प्रदेश के वित्त सचिव को अपनी प्रतिक्रिया देते हुये हर सुविधा पर कैंची चलाने की बात करनी पड़ी है। वित्त सचिव की प्रतिक्रिया आज हर जगह सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गयी है। वित्त सचिव ने बिजली बोर्ड प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की बात की है। बिजली बोर्ड के कर्मचारियों में पिछले लम्बे समय से बोर्ड को निजी हाथों में सौंपने की चर्चाएं चली हुई हैं। परिवहन निगम को भी प्राइवेट हाथों में सौंपने की चर्चाएं हैं। पर्यटन निगम के होटलों को प्राइवेट क्षेत्र को देने की बात हो रही है। राजस्व घाटा अनुदान बन्द किये जाने को ऐसे दिखाया जा रहा है कि सरकार को सब कुछ निजी हाथों में सौंपना पड़ेगा। जबकि यह घाटा अनुदान बन्द करने के साथ ही वित्त आयोग ने स्थानीय निकायों और पंचायती राज संस्थाओं और आपदा प्रबंधन के लिये उदार रूप से धन का प्रावधान किया है। लेकिन इस पैसे को दूसरे राजस्व व्यय वेतन, पैन्शन और ब्याज की अदायगी पर खर्च नहीं किया जा सकेगा। आज सरकार को यह सार्वजनिक करना पड़ेगा कि उसकी कौन सी जन कल्याण की योजनाएं प्रभावित होने जा रही हैं। अब उसकी हर योजनाओं को आम आदमी की आवश्यकता के तराजू में तोल कर देखा जायेगा। प्रदेश में एक लाख करोड़ से अधिक के कर्ज का निवेश कहां हुआ है यह जानने का आम आदमी को पूरा हक है। अभी सरकार जनता में अपनी विश्वसनीयता के सबसे निचले पायदान पर है। इसी विश्वसनीयता के संकट के कारण सरकार पंचायत चुनाव को टालने के लिये हर संभव प्रयास में लग गयी है। क्योंकि जनता में राहुल गांधी के वोट चोरी के चुनाव आयोग पर लगाये आरोपों पर कोई जानकारी नहीं है। मनरेगा योजना में केंद्र ने जो बदलाव किये हैं प्रदेश में उनकी जानकारी शिमला में किये गये धरना प्रदर्शनों से आगे नहीं निकली है। इस समय प्रदेश सरकार को लेकर यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि सरकार ने तो परंपरा के मुताबिक हारना ही है। इस हार की आड़ में मुख्यमंत्री कांग्रेस के अन्दर भविष्य के लिये अपने समर्थकों के एक बड़े वर्ग को पोषित करने में लगे हुये हैं। इसलिये सैकड़ो के हिसाब से अपने मित्रों को ताजपोशीयां देकर नवाज रहे हैं। इसी मकसद से सबको धनी बनाने के लिये सबके मानदेय में लाखों की बढ़ौतरीयां की गयी है। इसी कारण से विधायकों के वेतन भत्तों और पैन्शनों में बढ़ौतरीयां की गयी। अन्यथा जो मुख्यमंत्री पद संभालते ही प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी दे वह ईमानदारी से सरकारी खजाने का ऐसा दुरुपयोग नहीं कर सकता। आज कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और विधायकों को जनता का शुभचिंतक होने के नाते मुख्यमंत्री से लेकर हाईकमान तक सबको पूरी बेबाकी से प्रदेश के हालात से अवगत करवाना होगा। अन्यथा हिमाचल प्रदेश की कार्यप्रणाली राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस पर भारी पड़ेगी। यह परिस्थितियां बजट सत्र और राज्यसभा में अपना प्रभाव दिखायेगी यह तय है।

केंद्रीय बजट हिमाचल के लिए निराशाजनक

  • राजस्व घाटा अनुदान समाप्ति से बढ़ी वित्तीय चिंता

शिमला/शैल। केंद्रीय बजट 2026-27 को हिमाचल प्रदेश के लिए निराशाजनक और अन्यायपूर्ण बताते हुए मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने कहा है कि यह बजट आम लोगों, मध्यम वर्ग, किसानों, बागवानों और विशेष रूप से पहाड़ी राज्यों की जरूरतों के प्रति केंद्र सरकार की असंवेदनशीलता को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि बजट में न तो बढ़ती महंगाई से जूझ रहे मध्यम वर्ग को राहत दी गई है और न ही हिमाचल जैसे राज्यों की संरचनात्मक चुनौतियों को समझा गया है।
मुख्यमंत्राी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 275 (1) के तहत राज्यों को दिए जाने वाले राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) को 16वें वित्त आयोग द्वारा समाप्त करना संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार है। उन्होंने स्मरण कराया कि वर्ष 1952 से यह अनुदान राज्यों को दिया जाता रहा है और 15वें वित्त आयोग के दौरान हिमाचल प्रदेश को लगभग 37,000 करोड़ रुपये की सहायता मिली थी। इससे पहले भी अंतरिम व्यवस्था के तहत 11,431 करोड़ रुपये प्रदान किए गए थे। ऐसे में पहली बार आरडीजी को पूरी तरह समाप्त किया जाना गंभीर चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे और पहाड़ी राज्य की वित्तीय वास्तविकताएं मैदानी राज्यों से बिल्कुल भिन्न हैं। राज्य का 67 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र वन एवं पारिस्थितिक आवरण में आता है, जिससे राजस्व अर्जन की क्षमता सीमित होती है। पर्वतीय भूगोल के कारण प्रति व्यक्ति सेवा वितरण की लागत अधिक है। इसके अलावा, हाल के वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से प्रदेश को 15,000 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान उठाना पड़ा है। इन सभी तथ्यों की अनदेखी कर राजस्व घाटा अनुदान समाप्त करना राज्य की वित्तीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा पैदा करेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आरडीजी समाप्त होने से राज्य को आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं, विकास कार्यों और सामाजिक क्षेत्र में निवेश के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ेंगे, जिससे कर्ज का बोझ भी बढ़ सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि विस्तृत ज्ञापनों और तकनीकी प्रस्तुतियों के बावजूद केंद्र सरकार और वित्त आयोग ने हिमाचल प्रदेश की वास्तविकताओं को नजरअंदाज किया, जिससे यह आशंका गहराती है कि कांग्रेस शासित राज्यों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है।
कृषि क्षेत्र पर बजट की आलोचना करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्य के लिए किए गए प्रावधान अपर्याप्त हैं। सेब उत्पादन, जो प्रदेश की अर्थव्यवस्था में लगभग 5,000 करोड़ रुपये का योगदान देता है और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है, बजट में पूरी तरह उपेक्षित रहा। न तो बागवानी के लिए कोई विशेष पैकेज दिया गया और न ही विपणन, भंडारण या प्रसंस्करण के लिए कोई ठोस पहल की गई।
पर्यटन क्षेत्र को लेकर भी मुख्यमंत्री ने निराशा जताई। उन्होंने कहा कि पर्यटन हिमाचल की पहचान और रोजगार का प्रमुख स्रोत है, लेकिन बजट में इसके लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया। पूर्वाेत्तर राज्यों के लिए बौद्ध सर्किट की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन विश्व प्रसिद्ध बौद्ध स्थलों वाले हिमाचल को इससे बाहर रखना भेदभाव को दर्शाता है। इसी तरह, भानुपल्ली-बिलासपुर और बद्दी-चंडीगढ़ जैसी महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं के लिए भी बजट में कोई आवंटन नहीं किया गया।
मुख्यमंत्री ने राज्यों की ऋण सीमा को तीन प्रतिशत से बढ़ाकर चार प्रतिशत करने की मांग दोहराई। उन्होंने कहा कि ब्याज-मुक्त ऋण की सीमा 1.5 लाख करोड़ रुपये पर ही सीमित रखना और उस पर कठोर शर्तें लागू करना हिमाचल जैसे राज्यों के लिए व्यावहारिक नहीं है। साथ ही, जीएसटी मुआवजा बंद होने से राज्य को हर वर्ष भारी राजस्व नुकसान हो रहा है, जिसकी भरपाई के लिए केंद्र ने कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भले ही पूंजी निवेश की बात करे, लेकिन पहाड़ी राज्यों के लिए आपदा प्रबंधन, सड़क-रेल कनेक्टिविटी, जलविद्युत, पर्यटन और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों के समाधान के लिए कोई ठोस सहायता नहीं दिखाई देती। केंद्रीय बजट 2026-27 न तो हिमाचल को विकास का स्पष्ट मार्ग देता है और न ही न्याय की भावना को दर्शाता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार प्रदेश और उसके लोगों के हितों के लिए इस अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज मजबूती से उठाती रहेगी।

क्या सुक्खू सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ गंभीर है?

हरोली काण्ड से उठे सवाल
शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सही में गंभीर है? क्या हिमाचल में कोई भी सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कारवाई कर पायी है? यह सवाल इसलिये प्रसांगिक हो जाते हैं क्योंकि इन दिनों ऊना के हरोली में घटा भूमि घोटाला विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। इस घोटाले पर नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी राजनीतिक सवाल उठाये हैं। यह सही है कि कोई भी सरकार भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण देने से बचती है। बल्कि भ्रष्टाचार कतई सहन नहीं किया जाएगा इसको लेकर ऊंचे से ऊंचे स्वर में घोषणाएं करने को श्रेय लेने का प्रयास करती है। इसी प्रयास में 31 अक्तूबर 1997 को हिमाचल सरकार ने एक रिवार्ड स्कीम अधिसूचित की थी। इस स्कीम के अनुसार भ्रष्टाचार के खिलाफ आयी हर शिकायत की एक माह के भीतर प्रारंभिक जांच करके यदि शिकायत में दम हुआ तो इसकी नियमित जांच करके शिकायतकर्ता को एक लाख का इनाम देने का प्रावधान किया गया था। इस स्कीम के अधिसूचित होने के बाद इसके तहत दर्जनों शिकायतें आयी लेकिन एक भी शिकायत की नियमानुसार जांच नहीं हुई। बल्कि प्रदेश उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बाद भी कोई कारवाई नहीं हुई है। यहां तक की सर्वाेच्च न्यायालय के फैसलों तक पर कोई अमल नहीं हुआ है। हिमाचल के भू-राजस्व अधिनियम की धारा 118 के तहत कोई भी गैर हिमाचली गैर कृषक सरकार की पूर्व अनुमति के बिना प्रदेश में जमीन नहीं खरीद सकता। लेकिन प्रदेश में सबसे अधिक इसी प्रावधान का दुरुपयोग हुआ है। शान्ता सरकार से लेकर आज तक हर सरकार पर हिमाचल ऑन सेल के आरोप लगे हैं। इसकी जांच के लिये प्रदेश में चार बार जांच आयोग गठित हो चुके हैं। हजारों पन्नों की रिपोर्ट सरकार के पास मौजूद है। लेकिन आज तक किसी भी जांच रिपोर्ट पर कोई निर्णायक कारवाई नहीं हो पायी है। विधानसभा में धारा 118 के तहत दी गयी अनुमतियों की सूचियां तक आयी है। अधिकांश नौकरशाहों ने एक से अधिक बार यह अनुमतियां हासिल की हैं। परन्तु आज तक सरकार यह प्रावधान नहीं कर पायी है कि मकान बनाने के नाम पर एक से अधिक बार अनुमति नहीं मिल सकती है। एक समय तक विपक्ष हर सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर महामहिम राज्यपाल को आरोप पत्र सौंपता आया है। लेकिन एक बार भी कोई भी सरकार अपने ही आरोप पत्र पर सत्ता में आने पर कारवाई नहीं कर पायी है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के दौरान सार्वजनिक रूप से एक आरोप पत्र सौंपा था। जिस पर कारवाई नहीं हो पायी है क्योंकि जयराम ठाकुर ने भी अपनी सरकार आने पर कांग्रेस सरकार के खिलाफ किसी आरोप पत्र पर कारवाई नहीं की है। इसलिये भ्रष्टाचार के खिलाफ ऊंचे स्वर में बोलने का अर्थ जांच करना नहीं रहा है। जांच केवल व्यक्तिगत स्कोर सैटल करने तक ही सीमित रहती है। इस परिप्रेक्ष में यह उम्मीद करना की हरोली का जमीन खरीद घोटाला कोई परिणाम लायेगा भी बेमानी होगा। क्योंकि राजा नादौन की एक लाख कनाल से ज्यादा जमीन लैण्ड सीलिंग एक्ट के तहत सरकार में निहित हो जाने के बाद कैसे प्राइवेट लोगों में बिक गई इसकी आज तक कोई भी जांच क्यों नहीं हो पा रही है? राजा नादौन सीलिंग के बाद केवल 316 कनाल का मालिक रह गया था फिर उसके नाम पर लाखों कनाल जमीन कैसे बिक गई? क्या यह एक बड़ा घोटाला नहीं है। हरोली का जमीन घोटाला 1 अप्रैल 2012 से 31 मार्च 2023 तक घटा कहा जा रहा है। जिसमें हाउसिंग बोर्ड ने 600 कनाल जमीन आवास बनाने के नाम पर खरीदी। आरोप है की खरीदी गई जमीन आवास योग्य नहीं थी। 2012 में चुनावी वर्ष था और 4 नवम्बर 2012 को विधानसभा चुनाव हुये थे और कांग्रेस की सरकार आयी थी। कांग्रेस आने से छः माह पहले तक भाजपा की सरकार थी स्वभाविक है की जमीन चिन्हित करने की सारी कारवाई तो इसी सरकार के दौरान शुरू हो गई थी। फिर 2017 नवम्बर में पुनः नयी जयराम सरकार आ गयी। इस सरकार में भी इस पर कोई सवाल नहीं उठे। क्या जयराम सरकार के दौरान अधिकारियों ने इस प्राजैक्ट पर कोई काम नहीं किया? क्या उस दौरान सब कुछ ठीक था। दिसम्बर 2022 में सुक्खू सरकार आ गयी और 31 मार्च 2023 तक यह सब कुछ घट गया। यह मामला विजिलैन्स जांच में चल रहा है इसलिये जांच रिपोर्ट आने तक इन्तजार करना होगा।

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