शिमला/शैल। नादौन के खनन कारोबारी और कांग्रेस नेता ज्ञान चन्द को ई.डी. द्वारा दर्ज किये गये मनी लॉन्ड्रिंग में सी.बी.आई. के स्पेशल जज की गाजियाबाद स्थित अदालत से 6-7-2025 को जमानत मिल गयी है। इस जमानत से ई.डी. की कार्य प्रणाली सवालों के घेरे में आ गयी है। क्योंकि विशेष जज ई.डी. की कार्य प्रणाली के जांच अधिकारी और इस मामले के शिकायतकर्ता के खिलाफ आवश्यक कारवाई करने के निर्देश सी.बी.आई. निदेशक को दिये हैं। सम्रणीय है कि ई.डी.ने 2-7-2024 को धन संशोधन की विभिन्न धाराओं में यह मामला दर्ज किया था और 18-11-2024 को इसमें ज्ञान चन्द की गिरफ्तारी हो गयी थी। उस दौरान इस संद्धर्भ में नादौन, हमीरपुर में छापेमारी हुई थी। इस छापेमारी के बाद चार लोगों के खिलाफ मामला बनाये जाने की चर्चाएं सामने आयी थी। लेकिन गिरफ्तारी केवल दो लोगों ज्ञान चन्द और संजय धीमान की हुई थी। लेकिन जमानत केवल ज्ञान चन्द को ही मिली है। शायद संजय की जमानत याचिका अभी तक आयी ही नहीं है।
ज्ञान चन्द के खिलाफ यह मामला कुछ शिकायतों और गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर दायर किया गया था। इन सूचनाओं और शिकायतों का आधार इन लोगों के खिलाफ कांगड़ा और ऊना में 2018 से लेकर 2024 तक दर्ज किये गये सात मामलों को बनाया गया था। जबकि यह सारे मामले ई.डी. द्वारा 2-7-2024 को दर्ज किये गये मनी लांडरिंग के मामले से पहले ही अदालतों द्वारा निपटा दिये गये थे। सारे मामलों में क्लोजर रिपोर्ट अदालत में दायर और स्वीकार हो चुकी थी। जिसका अर्थ है कि ई.डी. द्वारा मामला दर्ज करने के समय ज्ञान चन्द के खिलाफ कोई भी आपराधिक मामला कहीं पर भी लंबित नहीं था। जबकि ई.डी. द्वारा मामला दर्ज करने के लिये यह अनिवार्य है कि कथित अभियुक्त के खिलाफ कहीं पर कोई मामला चल रहा होना चाहिये। सी.बी.आई. के विशेष जज ने इस वस्तुस्थिति का कड़ा संज्ञान लेते हुये ई.डी. के जांच अधिकारी और शिकायतकर्ता के खिलाफ कारवाई किये जाने की संस्तुति की है।
इस मामले में जब छापेमारी हुई थी तब यह मामला बहुत चर्चित हुआ था। विपक्ष ने इस मामले में मुख्यमंत्री को यह कह कर घेरने का प्रयास किया था कि ज्ञान चन्द उनका एक खास समर्थक है। मुख्यमंत्री ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि ज्ञान चन्द विधानसभा में मेरा समर्थक है परन्तु लोकसभा में वह अनुराग ठाकुर का समर्थक है। ज्ञान चन्द के साथ जो दूसरा व्यक्ति संजय धीमान गिरफ्तार हुआ था उसकी जमानत को लेकर अभी तक कुछ भी सामने नहीं आया है। जबकि वह इसी मामले में ज्ञान चन्द के साथ सह अभियुक्त है। इसमें यह भी स्मरणीय है कि जिन मामलों का जिक्र अदालत में आया वह सारे मामले पूर्व भाजपा सरकार के समय में ही दर्ज हुये और क्लोज भी हुए। कांग्रेस सरकार के समय 2023 में एक मामला ऊना के गगरेट में दर्ज हुआ और उसमें 30 -11-2024 को क्लोजर रिपोर्ट भी आ गई तथा स्वीकार भी हो गयी। यह जमानत का फैसला 3-7-2025 को आया है लेकिन जांच अधिकारी और शिकायतकर्ता के खिलाफ अभी तक कोई कारवाई होना भी सामने नहीं आया है।
यह है दर्ज मामले की सूची और अदालत का जमानत आदेश














शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने नगर निगम में मेयर और डिप्टी मेयर के कार्यकाल को एक अध्यादेश लाकर अब पांच वर्ष के लिये कर दिया है। पहले यह कार्यकाल अढ़ाई वर्ष का था और शिमला नगर निगम में यह पन्द्रह नवम्बर को पूरा होने जा रहा था। इसके बाद अगला मेयर बनने की बारी महिलाओं की थी। यह कार्यकाल बढ़ाये जाने को लेकर निगम पार्षदों में कोई परामर्श नहीं हुआ। यह परामर्श न किया जाना ही कांग्रेस पार्षदों में नाराजगी का कारण बना है। कांग्रेस के यह पार्षद निगम के सदन की बैठक में अपनी नाराजगी को मुखर कर चुके हैं और इस दिशा में अपना अगला कदम विधायक के साथ मुख्यमंत्री से मिलने के बाद उठाएंगे। चौंतीस सदस्यों के सदन में कांग्रेस के पार्षदों की संख्या चौबीस है जिनमें से पन्द्रह नाराज बताये जा रहे हैं। भाजपा पार्षदों की संख्या नौ हैं और एक पार्षद माकपा का है भाजपा ने निगम के सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाने की घोषणा की है। यदि यह अविश्वास प्रस्ताव आ जाता है और कांग्रेस के पन्द्रह नाराज पार्षद यदि ऐसे प्रस्ताव का समर्थन कर देते हैं तो राजनीतिक परिदृश्य ही बदल जायेगा।
शिमला प्रदेश की राजधानी है और यहां की निगम के चुनावों को लघु विधानसभा चुनावों की संज्ञा दी जाती है। भाजपा लगातार सरकार पर यह आरोप लगाती आ रही है कि यह सरकार जनता का सामना करने से डर रही है। भाजपा अपने आरोप का आधार स्थानीय निकायों के चुनावों को टालने और फिर पंचायत चुनावों को आपदा के नाम पर टालने तथा अब नगर निगम में महापौर और उपमहापौर के कार्यकाल को बढ़ाने के लिये लाये गये अध्यादेश को बता रही है। भाजपा ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस शिमला नगर निगम में अपने ही पार्षदों की नाराजगी का सामना करने से डर रही है। उसे महापौर और उपमहापौर के चुनाव में हार का डर डरा रहा था। यह संशोधन लाकर सरकार ने अनचाहे ही विपक्ष को एक बड़ा मुद्दा दे दिया है। क्योंकि स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों को आगे सरकाने के लिये प्रदेश में आयी आपदा को आधार बनाया है। जब प्रदेश में आपदा अधिनियम लागू किया गया था तभी शैल ने यह शंका जाहिर की थी कि सरकार इस आपदा के नाम पर इन चुनावों को टालने की भूमिका बना रही है। शैल के पाठक यह जानते हैं।
सरकार प्रदेश में आपदा अधिनियम लागू करके अपने ही तर्क में उलझ गई है। क्योंकि यह अधिनियम लागू करने से सरकार के इस दावे पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं कि सरकार ने आपदा प्रभावितों को राहत पहुंचाने और रोड नेटवर्क तथा पेयजल सुविधाओं को तुरन्त बहाल कर दिया है। आपदा में इस समय कोई भी शैक्षणिक संस्थान ऐसा नहीं है जो अब तक इस कारण से बन्द चल रहा हो। जब स्कूलों के छोटे बच्चे नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं तो फिर किसी भी निकाय अथवा पंचायत का चुनाव करवाने में आपदा कैसे अड़चन डाल सकती हैै। इसी के साथ अनचाहे ही विपक्ष को अब केन्द्र द्वारा पूर्व में आपदा के नाम पर दी गई सहायता के खर्च का ब्योरा मांगने का मौका दे दिया है। विधानसभा सत्र में एक प्रश्न के उत्तर में सरकार यह स्वीकार चुकी है कि केन्द्र ने हिमाचल को पिछले अढ़ाई वर्षों में 5500 करोड़ की सहायता दी है। इसके बाद 207 करोड़ की सहायता दी है। परन्तु सरकार करीब 300 करोड रुपए ही प्रभावितों को दे पायी है। भाजपा यह भी आरोप लगा रही है कि प्रधानमंत्री ने जो अब 1500 करोड़ की सहायता का ऐलान प्रदेश को देने का किया है वह पैसा आपदा प्रभावितों को मिलेगा और सरकार चलाने के लिये नहीं। इस वस्तुस्थिति में जहां सरकार अपने ही तर्क में उलझ गयी है वहीं पर भाजपा के लिये भी यह चुनौती बन गया है कि क्या वह शिमला नगर निगम में अविश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार को हरा पाती है या नहीं। इसी के साथ भाजपा में मुख्यमंत्री पद के लिये जो खींचतान अभी से चल पड़ी है उसकी भी परीक्षा हो जायेगी कि कौन सा वर्ग कहां खड़ा है।