Thursday, 15 January 2026
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सुखविंदर सिंह बनाम निशु ठाकुर एवं अन्य मानहानि मामले को प्रवीण कुमार ने दी उच्च न्यायालय में चुनौती

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने 2017 में जब वह नादौन से विधायक थे तब निशु ठाकुर, ईशा ठाकुर, प्रवीण कुमार पत्रकार अमर उजाला और कपिल बस्सी पत्रकार दैनिक सवेरा के खिलाफ आपराधिक एवं सिविल मानहानि के मामले शिमला तथा हमीरपुर में दायर किये थे। लेकिन इन मामलों का निपटारा अब तक नहीं हो सका है। हमीरपुर में दायर हुआ सिविल मामला अब शायद लोक अदालत में पहुंच गया है। शिमला में दायर हुये आपराधिक मामले में प्रतिवादियों को शायद अभी तक वांछित दस्तावेज भी उपलब्ध नहीं हो पाये हैं। यह मामले इतना लम्बा क्यों हो रहे हैं। इस पर अब अमर उजाला के पत्रकार प्रवीण कुमार ने हिमाचल उच्च न्यायालय में दस्तक देकर इस मामले को बन्द किये जाने की गुहार लगाई है। यह मामले जब दायर हुये थे तब सुखविंदर सिंह सुक्खू नादौन से विधायक और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे परन्तु अब तो वह दो वर्षों से भी अधिक समय से प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। ऐसे में यह मामले तो अब तक निपट जाने चाहिये थे। परन्तु ऐसा हो नहीं पाया है। इसलिये इन मामलों की पृष्ठभूमि में जाना आवश्यक हो जाता है। स्मरणीय है की मानहानि के यह मामले ईशा ठाकुर और निशु ठाकुर द्वारा 2016 में हमीरपुर में आयोजित एक पत्रकार वार्ता पर आधारित हैं। इस पत्रकार वार्ता में इन भाई बहन ने नादौन के जडोत गांव में मान खड्ड पर कार्यरत एक स्टोन क्रेशर और हॉट मिक्सिंग प्लांट में हो रही अवैधताओं पर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था। यह आरोप लगाया था कि क्रेशर के साथ लगती उनकी 27 कनाल जमीन पर यह क्रेशर लगाया गया है। यह मामला उच्च न्यायालय ने भी स्वतः संज्ञान में लिया था। एनजीटी के आदेश से यह स्टोन क्रेशर वहां से हटाया गया है। ऐसे में स्टोन क्रेशर को लेकर उठाये गये एतराज स्वतः ही अधारहीन हो जाते हैं। इन्हीं पत्रकार वार्ताें में एक आरोप यह भी था कि सुक्खू ने 769 कनाल जमीन अपने भाई के नाम खरीदी है। जिसे बाद में अपने नाम करवा लिया गया। यह पत्रकार वार्ताएं शायद 2016 में हुई। परन्तु इसका संज्ञान 2017 में लेकर मानहानि के मामले दायर किये गये। यहीं पर यह उल्लेखनीय हो जाता है कि सुक्खू ने 2017 में नादौन में विधानसभा चुनाव लड़ा और वह जीत गये। चुनाव परिणाम के कुछ समय बाद इन्हीं भाई बहन के पिता बसन्त सिंह ठाकुर ने सुक्खू के चुनाव को यह कहकर उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी की सुक्खू ने चुनाव शपथ पत्र में संपत्ति को लेकर तथ्यों को छुपाया है। उच्च न्यायालय ने इस पर चुनाव याचिका तो स्वीकार नहीं की क्योंकि समय अवधि निकल गयी। परन्तु आरोपों को सक्ष्म आथॉरिटी के पास उठाने को कहा और अथॉरिटी को निर्देश दिये की इस पर शीघ्र कारवाई हो। उच्च न्यायालय के निर्देशों पर यह मामला एस.पी. हमीरपुर के कार्यालय में जांच के लिये आ गया। यहां ए.एस.पी. ने इस मामले की जांच की और तथ्य छुपाने के आरोपों को सही पाया। ए.एस.पी की जांच रिपोर्ट के बाद धारा 156;3द्ध के तहत यह मामला ए.सी.जे.एम. की अदालत में नादौन में दायर हो गया। यहां अदालत ने फिर जांच करवाई और तथ्यों को सही पाया। परन्तु अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि इससे किसी को व्यक्तिगत लाभ हानि नहीं हुई है इसलिये चालान को रद्द कर दिया जाये और इस सिफारिश पर चालान रद्द हो गया और सुक्खू को राहत मिल गयी।
नादौन अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय मे चुनौति दी गयी। इस पर जस्टिस राकेश कैंथला की एकल पीठ ने इस याचिका को तो अस्वीकार कर दिया लेकिन साथ यह भी कह दिया कि इसका मामले के गुण दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इससे स्पष्ट हो जाता है की संपत्ति संबंधी तथ्यों को छुपाने के आरोप को अलग से चुनौती दी जा सकती है। क्योंकि खरीदी गई जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है कि इसमें ताबे हुकुक बर्तनदारान है और साथ ही 316 कनाल से अधिक की खरीद लैण्ड सीलिंग एक्ट के प्रावधानों में भी आती है। इस परिदृश्य में अमर उजाला के पत्रकार द्वारा मानहानि के मामले का उच्च न्यायालय में चुनौती दिया जाना रोचक और गंभीर हो जाता है। क्योंकि इस तरह के राजस्व इन्द्रराज वाली जमीन विलेज् कामन लैण्ड हो जाती है। जिसे न खरीदा जा सकता है न बेचा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में 2011 में राज्यों के मुख्य सचिवों को कड़े निर्देश जारी किये हुये हैं।

 

 

 

बजट अनुमानों में 30% का अन्तर आना शुभ संकेत नहीं अनुपूरक मांगों से उठे सवाल

  • 17000 करोड़ से अधिक की अनुपूरक मांगों को कैसे पूरा किया गया?
  • बढ़ा हुआ खर्च पूरा करने के लिये जनता पर कितना बोझ डाला गया और कितना कर्ज लिया गया?

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने वर्ष 2024-25 के लिए 17053.78 करोड़ का अनुपूरक बजट पेश किया है। इस वित्तीय वर्ष के लिये सरकार ने 58444 करोड़ के अनुमान का बजट पेश किया था। इस बजट में 46667 करोड़ का राजस्व व्यय और 42153 करोड़ की राजस्व प्राप्तियां दिखायी गयी थी। बजट अनुमानों के अनुसार यह वर्ष 10784 करोड़ के घाटे पर बन्द होना था। लेकिन अनुपूरक बजट ने सरकार की वित्तीय स्थिति पर कुछ गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। अनुपूरक बजट में यह विवरण दिया गया है कि बढ़ा हुआ खर्च किन मदो पर खर्च हुआ है। सत्रह हजार करोड़ से अधिक के अनुपूरक बजट से यह सामने आया है कि सरकार के मूल अनुमानों में करीब 30% की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि क्यों हुई है और इसका आने वाले समय सरकार की राजस्व आय पर भी कोई असर पड़ेगा या यह बढ़ौतरी नियमित राजस्व व्यय का ही हिस्सा बनकर रह जायेगी। क्योंकि सामान्यतः हर वर्ष खर्चों में दस प्रतिश्त की मानक वृद्धि लेकर अगले बजट अनुमान तैयार किये जाते हैं। ऐसे में वर्ष 2025-26 का बजट अनुमान 80,000 करोड़ लगभग रहने का अनुमान है। वर्ष 2024-25 के 58444 करोड़ के बजट अनुमानों में वर्ष 10784 करोड़ के घाटे पर बन्द हो रहा था। अब जब अनुपूरक मांगों को मिलाकर बजट का कुल आकार ही 75000 करोड़ पहुंच जाता है तब आगे का यह बजट निश्चित रूप से 80000 तक पहुंचेगा ही।
वर्ष 2024-25 में राजस्व आय 42153 करोड़ की अनुमानित थी। तब इस वर्ष 10% की वृद्धि के साथ क्या यह 65000 करोड़ हो पायेगी यह देखना बड़ा सवाल होगा। क्योंकि इसी वित्तीय वर्ष में सरकार द्वारा वित्तीय संसाधन बढ़ाने के लिये किये गये उपायों से राजस्व आय में कितनी वृद्धि हुई है इसका आंकड़ा तो अगले बजट के अनुमानों में ही सामने आयेगा। लेकिन अनुपूरक बजट से जो खर्च बढ़ा है उसका आंकड़ा तो सामने आ गया है। परन्तु इस खर्च को पूरा करने के लिये कितने टैक्स लगाये जायेंगे और कितना कर्ज लिया जायेगा तो आगे ही सामने आयेगा। क्योंकि आगे चलकर सरकार को गारंटीयां भी पूरी करनी है। अभी तो राज्यपाल के अभिभाषण में यह गारंटीयां लागू हो गयी हैं। परन्तु आगे चलकर इनको व्यवहारिक रूप में भी पूरा करना होगा। चालू वित्त वर्ष में 17000 करोड़ से अधिक का खर्च बढ़ने पर इसको पूरा करने के लिये कितना कर्ज लिया गया है और भविष्य में और कितना कर्ज लिया जायेगा यह अभी सामने आना बाकी है। विपक्ष के मुताबिक सरकार 30000 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। लेकिन अनुपूरक बजट में जब खर्च ही करीब 17000 करोड़ बढ़ा है तो इससे अधिक कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये।
ऐसे में अब यह विपक्ष की जिम्मेदारी हो जाती है कि वह इस बढ़े हुये खर्च का विवरण लेकर उस प्रदेश की जनता के सामने रखे। इसमें यह भी सामने आना चाहिये कि सही में कौन सी तत्कालिक आवश्यकताओं पर यह खर्च किया गया। इस खर्च को पूरा करने के लिये जनता पर कितना बोझ डाला गया और कितना कर्ज लिया गया। क्योंकि किसी सरकार के बजट अनुमानों में 30% तक का अन्तर आना कोई शुभ संकेत नहीं है। इतना बड़ा अन्तर किसी प्राकृतिक आपदा के बिना जायज नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि अनुपूरक बजट वर्ष के अन्त में विभिन्न मांगों में हुये खर्च के सर प्लस या सरन्डर से प्रभावित नहीं होता है। बजट आवंटनों की समीक्षा वित्त विभाग वर्ष में तीन चार बार करता है। इसलिये यह अब माननीय के विवेक और ईमानदारी पर सीधा सवाल आ जाता है कि बजट अनुमानों में आये इस अन्तर का पूरा ब्योरा कारणों सहित प्रदेश की जनता के सामने रखे।

क्या "असली भाजपा" व्यक्तिगत रोष का प्रतिफल है

  • क्या यह रोष समय आने पर स्वतः ही शांत हो जायेगा
प्रदेश भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन होगा? क्या वर्तमान अध्यक्ष को ही फिर से जिम्मेदारी मिल जायेगी या कोई नया अध्यक्ष चुना जायेगा? नया अध्यक्ष महिला होगी या पुरुष? प्रदेश अध्यक्ष का चयन टलता क्यों जा रहा है? भाजपा को लेकर यह सवाल लम्बे समय से चर्चा में चल रहा है। इन सवालों का जवाब आने से पहले ही भाजपा में पनपता रोष मुखर होकर सामने आ गया है। भाजपा में इस मुखरता को आकार दिया है पूर्व मंत्री रमेश धवाला ने। उन्होंने रुष्ट भाजपाइयों को इकट्ठा करके इस रोष को "असली भाजपा" का नाम दिया है। "असली भाजपा" का नाम देने से ही यह सामने आ जाता है कि यह रोष भाजपा की विचारधारा से असहमति होने का परिणाम नहीं है। बल्कि कुछ नेताओं के साथ व्यक्तिगत मतभेदों का परिणाम है। तय है कि व्यक्तिगत मतभेद जितनी तीव्रता से आकार लेते हैं उसी तीव्रता के साथ समय आने पर शांत भी हो जाते हैं। इस रोष के आकार लेने से यह स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान में प्रदेश भारी गुटबन्दी का शिकार है। क्योंकि प्रदेश भाजपा में कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष हर्ष महाजन जब भाजपा में शामिल हुये थे तब भाजपा के किसी भी छोटे-बड़े नेता ने उनके विरोध में कुछ नहीं कहा था। लेकिन हर्ष महाजन जब भाजपा में राज्यसभा का उम्मीदवार बन गये और कांग्रेस में तोड़फोड़ करके जीत भी हासिल कर गये तब उनके विरोध में स्वर उभरने लगे। पूर्व मंत्री रमेश धवाला रमेश ने तब यह आरोप लगाकर अपना विरोध प्रकट किया कि जब वह भाजपा के समर्थन में आये थे तब महाजन ने उनकी गाड़ी तोड़ी थी।
राज्यसभा में भाजपा की जीत के बाद कांग्रेस के छः विधायक पाला बदलकर भाजपा में शामिल हो गये तब इसका विरोध भाजपा के अन्दर कहीं से मुखर नहीं हुआ। जब दल बदल के कारण आये उपचुनावों में इन कांग्रेसियों को भाजपा से टिकट मिल गये तब यह विरोध थोड़ा सा व्यक्तिगत होकर सामने आया। बल्कि तब इन नये बने भाजपाइयों का जितना विरोध मुख्यमंत्री ने किया उतना भाजपा के भीतर नहीं उभरा। परन्तु लोकसभा चुनावों के बाद दिल्ली में बनी मोदी सरकार में प्रदेश को भागीदारी नहीं मिली अनुराग ठाकुर की जगह जे.पी. नड्डा गुजरात से राज्यसभा सांसद होने पर मंत्री बन गये। तब प्रदेश भाजपा के भीतरी समीकरणों का गणित बिगड़ा। इस बिगड़े गणित में कांग्रेस से भाजपायी बने नेताओं को मुख्यमंत्री और उनकी सरकार से सीधा भिड़ने की स्थिति बन गयी। आज कांग्रेस और मुख्यमंत्री के साथ नये बने भाजपायी सीधा टकराव में खड़े हैं। नादौन और हमीरपुर में हुई ई.डी. और आयकर की छापेमारी में विरोधी पक्ष की भूमिका यह नये भाजपायी निभा रहे हैं। मूल भाजपाइयों में से केवल नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ही सरकार पर हमलावर हो रहे हैं और बाकी भाजपायी तो विरोध की रस्म अदायगी भी नहीं कर पा रहे हैं। यह सही है कि इस समय सरकार अपने ही फैसलों से इस कदर जनता में बदनाम होती जा रही है कि भाजपा या किसी अन्य को सरकार का विरोध करने की आवश्यकता ही नहीं रही है। भाजपा इसी से खुश है कि उसे एक सुनियोजित विरोध करने की आवश्यकता ही नहीं है। लेकिन यदि कांग्रेस ने ही आने वाले दिनों में नेतृत्व में परिवर्तन करके किसी नये नेता को जिम्मेदारी सौंप दी तब भाजपा के पास सरकार के विरोध का कोई तार्किक आधार नहीं बचेगा।
इस समय प्रदेश की राजनीतिक स्थितियां जिस दौर से गुजर रही हैं और प्रदेश लगातार कर्ज के दलदल में फसता जा रहा है उसका सीधा कुप्रभाव रोजगार पर पड़ेगा। सरकार में रोजगार के अवसर लगातार कम होते जायेंगे। उद्योग पलायन करने के कगार पर पहुंच जायेंगे। इससे सीधा प्रदेश का नुकसान होगा और इसकी जिम्मेदारी सरकार के साथ ही विपक्ष पर भी आयेगी। यह प्रदेश का दुर्भाग्य है कि कांग्रेस के लोग सरकार होने के कारण विरोध में कुछ नहीं कर पा रहे हैं। भाजपा इसी नीति पर चल रही है कि कांग्रेस अपने ही भार के नीचे दबकर दम तोड़ देगी। इसलिये उसे कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। इससे प्रदेश का कितना नुकसान हो रहा है और इस ओर किसी का ध्यान नहीं है।

क्या देहरा उपचुनाव के दौरान कांगड़ा बैंक ने क्षेत्र के महिलाओं मण्डलों को पचास-पचास हजार की सहायता दी है?

शिमला/शैल। कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक युद्ध चन्द बैंस के ऋण प्रकरण के बाद चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। बैंस के ऋण प्रकरण की जांच प्रदेश की विजिलैन्स कर रही है। बैंस के खिलाफ ऊना में विजिलैन्स ने जनवरी में मामला दर्ज किया था। बैंस ने विजिलैन्स कार्यालय ऊना में ई.डी. और आयकर ने जो छापेमारी हमीरपुर और नादौन में की थी उस प्रकरण का शिकायतकर्त्ता वही था। स्मरणीय है कि इस छापेमारी में जो मामला ई.डी ने दर्ज किया है उसमें दो लोगों की गिरफ्तारी भी ई.डी कर चुकी है। यह छापेमारी चार लोगों पर हुई थी। बैंस द्वारा ऊना में खुलासा करने के बाद बैंस प्रकरण की जांच को विजिलैन्स मुख्यालय यिामला में ही चल रही है। अभी तक इस जांच को विजिलैन्स पुरा नही कर पायी है बल्कि बैंस के अतिरिक्त विजिलैन्स द्वारा कांगड़ा केंद्रीय सहकारी बैंक के तत्कालीन चेयरमैन और प्रबन्ध निदेशक या किसी अन्य अधिकारी को बुलाकर पूछताछ करने का कोई प्रकरण सामने नहीं आया है। बैंस उच्च न्यायालय द्वारा अन्तरिम जमानत पर चल रहा है। अब उच्च न्यायालय में अगली पेशी 17 मार्च की है। अभी तक ई.डी. ज्ञानचंद और धर्मेन्द्र की गिरफ्तारी से आगे नहीं बढ़ पायी है और विजिलैन्स भी बैंस से आगे नहीं गयी है।
बैंस का मामला कांगड़ा केंद्रीय बैंक से संबंधित है और वह ई.डी. में शिकायतकर्त्ता भी है इसलिए ई.डी. की जांच शायद इस बैंक तक भी जा पहुंची है। ई.डी. के सूत्रों के मुताबिक इसी कांगड़ा बैंक द्वारा देहरा विधानसभा के उपचुनाव के दौरान मतदान से कुछ दिन पूर्व देहरा क्षेत्र के 68 महिला मण्डलों को पचास-पचास हजार रुपए की सहायता दिये जाने का मामला सामने आया है। इस बारे में जब बैंक के चेयरमैन कुलदीप पठानिया से शैल ने बात की तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें इस मामले की जानकारी आज ही मिली है। ऐसे मामले चेयरमैन के सामने नहीं आते हैं प्रबन्ध निदेशक के स्तर पर ही निपट जाते हैं। मैं कल धर्मशाला जा रहा हूं और इसकी पूरी जानकारी हासिल करूंगा। चेयरमैन के जवाब से स्पष्ट था कि इस तरह का फैसला प्रबन्ध निदेशक के स्तर पर हुआ है। इसमें यह महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या इन महिला मण्डलों ने ऐसी सहायता के लिये कब आवेदन किया था? किस कार्य के लिये यह पैसा दिया गया और मतदान के कुछ दिन पूर्व ही क्यों दिया गया? क्या यह चुनाव आचार संहिता के दायरे में नहीं आता है? यदि इस तरह से पैसे का आवंटन हुआ है तो इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं। यह जानकारी ई.डी. के सूत्रों के माध्यम से बाहर आयी है इसलिये इस हलके से नहीं लिया जा सकता। इस बजट सत्र में भी इस संबंध में प्रश्न पूछे जाने की संभावना है।

क्या रेरा अध्यक्ष पद की नियुक्ति में केन्द्र के दिशा निर्देशों को नजरअन्दाज किया जा सकेगा

  • कार्मिक विभाग ने आपराधिक मामले की जानकारी प्रधान सचिव हाऊसिंग को भेजी
  • अनूप दत्ता की शिकायत से मामला और गंभीर हुआ।
  • धारा 118 की अवैध अनुमति पर प्रशासन की चुप्पी सवालों में

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार रेरा अध्यक्ष पद की नियुक्ति में केन्द्र सरकार के क्रामिक विभाग द्वारा जारी दिशा निर्देशों को अनदेखा कर पायेगी? यह सवाल इसलिये चर्चा में आया है क्योंकि इस पद के लिये जिन लोगों ने आवेदन कर रखा है उनमें एक नाम प्रदेश में कार्यरत मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना का भी कहा जा रहा हैै। प्रबोध सक्सेना इसी मार्च माह में सेवानिवृत होने जा रहे हैं। इसलिये चर्चाओं के मुताबिक सरकार सेवा निवृत्ति के बाद भी इस अधिकारी की सेवाएं लेना चाहती है। इससे पहले भी इस पद पर सेवा निवृत मुख्य सचिव अपनी सेवाएं देते रहे हैं। लेकिन वर्तमान मुख्य सचिव के खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित चल रहा है। आई एन एक्स मीडिया प्रकरण में सक्सेना पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ सह अभियुक्त हैं। यह मामला 2017 में सीबीआई में पंजीकृत हुआ था और सीबीआई की अदालत में लंबित चल रहा है। इसकी जानकारी प्रदेश के क्रामिक विभाग ने 20-2-2025 को प्रदेश के प्रधान सचिव हाऊसिंग को दे रखी है। क्योंकि रेरा का प्रशासनिक नियंत्रण हाऊसिंग के तहत है।
भारत सरकार के क्रामिक की अक्तूबर 2024 में जारी अधिसूचना के अनुसार यदि किसी अधिकारी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला अदालत में लंबित चल रहा हो तो उस स्थिति में ऐसे अधिकारी को किसी संवेदनशील पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता। न ही ऐसे अधिकारी को सरकार में किसी दूसरे पद पर सेवानिवृत्ति के बाद भी नियुक्त किया जा सकता है। केंद्र सरकार ने 2024 में अपने नियमों में किये संशोधन में स्पष्ट कर दिया है कि अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मामले का दायर होना ही पर्याप्त है चाहे उसकी स्टेज कोई भी क्यों न रही हो। ऐसे में इस मामले के लंबित चलते इस अधिकारी को विजिलैन्स क्लीयरैन्स ही जारी नहीं हो सकता था और उसके अभाव में अधिकारी इस आवेदन के लिये पात्र ही नहीं हो पाता। अब जब यह सब कुछ संज्ञान में होने के बावजूद भी विजिलैन्स क्लीयरैन्स जारी हुआ है तो माना जा रहा है कि सरकार अपने निहित कारणों से नियुक्ति तक भी चली जाये।
यही नहीं धर्मशाला के योल निवासी अनूप दत्ता ने 2002 में जब सक्सेना शायद कांगड़ा के जिलाधीश थे तब भू-सुधार अधिनियम की धारा 118 के तहत दी गयी जमीन खरीद की अनुमति में की गयी हेराफेरी में एक दर्जन के करीब अधिकारियों के खिलाफ लोकायुक्त और अब सीबीआई जांच की मांग कर सरकार के सामने एक गंभीर स्थिति पैदा कर दी है। क्योंकि इस मामले में यह मान लिया गया है की धारा 118 के तहत दी गयी अनुमति अवैध है। लेकिन यह अवैधता करने वालों के खिलाफ आज तक कोई कारवाई न हो पाना अपने में एक बड़ा सवाल बन जाता है। अनूप दत्ता का आरोप है कि संबद्ध अधिकारियों ने उच्च न्यायालय को भी अंधेरे में रखने का प्रयास किया है। अनूप दत्ता का सबसे बड़ा आरोप तो यह है कि उसे ही रास्ते से हटाने के प्रयास किये गये और यह संबद्ध अधिकारी मौन बैठकर इसमें योगदान करते रहे। अनूप दत्ता ने मुख्यमंत्री कार्यालय को भी इस बारे में अवगत कराया है परन्तु कोई जवाब नहीं मिला है। इस मामले की जब भी जांच होगी तब इसमें कई विस्फोट होंगे।
ऐसे में अनूप दत्ता के आरोपों और केंद्र की अक्तूबर 2024 की अधिसूचना तथा इस सबका सरकार को संज्ञान होने से स्थिति बहुत रोचक हो गयी है।

यह है कार्मिक विभाग का पत्र

 

 यह है अनूप दत्ता की शिकायत

 

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