Thursday, 15 January 2026
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300 यूनिट बिजली मुफ्त देने की जगह बिजली सब्सिडी बन्द करने पर पहुंची सरकार

  • आरबीआई के मुताबिक प्रदेश का कर्ज़ भार जीडीपी के 42.5% तक पहुंचा
  • पंजाब के बाद कर्ज भार में दूसरे स्थान पर पहुंचा हिमाचल
  • सरकार के फैसलों से हाईकमान भी आई कठघरे में
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्रदेश सरकार द्वारा बिजली पर दी जा रही सब्सिडी छोड़ दी है। सब्सिडी छोड़ने की घोषणा उन्होंने वाकायदा एक पत्रकार वार्ता बुलाकर उसमें की है। उन्होंने कहा है कि उनके नाम पर पांच बिजली के मीटर हैं और उन पांचों मीटरों पर मिल रही सब्सिडी उन्होंने छोड़ दी है। पत्रकार वार्ता में ही सब्सिडी छोड़ने का फॉर्म भरकर बिजली बोर्ड के अध्यक्ष को सौंप दिया। उन्होंने दूसरे संपन्न लोगों से भी यह सब्सिडी छोड़ने का आग्रह किया। उनके आग्रह पर लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य ने भी तुरन्त यह सब्सिडी छोड़ने का फॉर्म भर दिया। मुख्यमंत्री और विक्रमादित्य सिंह दोनों ही निश्चित रूप से संपन्न व्यक्तियों की श्रेणी में आते हैं। इसलिए उन्हें यह सब्सिडी छोड़नी ही चाहिए थी। उन्हीं की तरह दूसरे संपन्न राजनेताओं को भी ऐसा ही अनुसरण करना चाहिए। सरकार ने सरकारी कर्मचारियों/अधिकारियों के लिए इस आशय का शायद आदेश भी जारी कर दिया है। जो शायद सेवानिवृत्त लोगों पर भी बराबर लागू होगा। सरकार के इस आदेश से स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश वित्तीय संकट से गुजर रहा है। वित्तीय संसाधन जुटाना के लिये जिस तरह के फैसले इस सरकार ने लिये हैं जिन सेवाओं और वस्तुओं पर प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष कर भार बढ़ाया है उससे जो सवाल खड़े हुये उसे न केवल प्रदेश कांग्रेस बल्कि कांग्रेस हाईकमान तक सवालों के घेरे में आ जाता है।
सुक्खू सरकार को सत्ता में आये दो वर्ष हो गये हैं। मंत्रिमण्डल का कोई भी सदस्य ऐसा नहीं है जो पहली बार ही विधायक बना हो। हर सरकार हर वर्ष बजट विधानसभा में रखती है और पास करवाती आयी है। हर बजट कर मुक्त बजट प्रचारित होता रहा है। हर बजट में प्रदेश की वित्तीय स्थिति का पूरा विवरण माननीय के सामने आता है। हर वर्ष कैग रिपोर्ट और आर्थिक सर्वेक्षण विधानसभा के पटल पर रखे जाते रहे हैं और आगे भी रहेंगे ही। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि किसी भी राजनीतिक दल को चुनावों में उतरते वक्त अपना घोषणा पत्र जारी करते हुये प्रदेश की वित्तीय स्थिति की जानकारी न रही हो। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि जब दो वर्ष पहले कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश की जनता को दस गारंटीयां दी थी तब उसे प्रदेश की वित्तीय स्थिति की पूरी जानकारी रही ही होगी। लेकिन सरकार बनने के बाद जिस तरह का आचरण गारंटीयों को लेकर सरकार का रहा है और जिस तरह से शौचालय शुल्क लगाने तक स्थिति आ पहुंची है उससे कुछ अलग ही तस्वीर उभरती है। क्योंकि हर जिस तरह के ‘किन्तु -परन्तु’ की शर्तें लगाई गयी हैं उससे हर गारंटी की लाभार्थियों के आंकड़ों में जो व्यवहारिक कमी आयी है उसने सरकार की नीयत और नीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं। सरकार के फैसले राष्ट्रीय स्तर पर निन्दा और चर्चा का विषय बने हैं। प्रधानमंत्री तक ने हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में हिमाचल के फैसलों पर कांग्रेस की समझ पर कड़े हमले किये हैं। बल्कि हिमाचल के फैसले ही प्रधानमंत्री की आक्रमकता का आधार बने हैं।
जिस तरह के भ्रष्टाचार के आरोप सरकार पर लगने शुरू हुये हैं उससे कांग्रेस की कार्यशैली और खर्चों पर न चाहे ही सरकार के गठन से लेकर अब तक नजर जानी शुरू हो गयी है। जिस सरकार को हर माह कर्ज लेना पड़ रहा हो वहां मुख्यमंत्री कार्यालय के प्रस्तावित कायाकल्प पर 19 करोड़ के खर्च का अनुमान स्वभाविक रूप से विपक्ष के निशाने पर आयेगा ही। क्योंकि रिजर्व बैंक की 2024 में आयी रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज भार में हिमाचल राष्ट्रीय स्तर पर पंजाब के बाद दूसरे स्थान पर पहुंच चुका है। पंजाब का कर्ज जीडीपी के अनुपात में 44.1% है और हिमाचल 42.5% है। जहां कर्ज जीडीपी का 42.5 प्रतिशत पहुंच जाये वहां पर विकास सिर्फ राजनेताओं के भाषणों तक ही सीमित रहता है जमीन पर नहीं पहुंचता है। क्योंकि सारे संसाधन इस कर्ज का ब्याज चुकाने में ही लग जाते हैं और जब सरकार अपने खर्चों पर लगाम लगाने में सक्षम न रह जाये तो स्थिति और भी भयानक हो जाती है। जो पार्टी दो वर्ष पहले 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने का वायदा करके आयी हो उसे आज सब्सिडी छोड़ने के आदेश और आग्रह करने पड़ जायें उससे क्या उम्मीद की जा सकती है। बल्कि सरकार के फैसले हाईकमान के लिये विश्वसनीयता का संकट खड़ा करते जा रहे हैं।

टैंकर सप्लाई घोटाले से सुक्खू सरकार आयी सवालों में

  • क्या इस तरह का घोटाला प्रदेश के अन्य भागों में भी घटा होगा उठने लगा सवाल
  • क्या राजनीतिक संरक्षण के बिना ऐसा हो सकता है?
  • क्या शिमला जिले के नेताओं का सूचना तन्त्र सही में कमजोर है?

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पुलिस अधिनियम में संशोधन करके प्रदेश में किसी भी सरकारी कर्मचारियों को सरकार की पूर्व अनुमति के बिना गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। इस संशोधन के बाद पुलिस किसी भी आपराधिक मामले में सरकारी कर्मचारियों को गिरफ्तार नहीं कर सकती। यह संशोधन केन्द्र से अनुमोदन मिलने के बाद कानून बन जायेगा। इस संशोधन से सरकार की नीयत और नीति का पता चल जाता है। वैसे इसी सत्र में मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा कानून लाने की भी घोषणा की है। सरकार जब सदन में यह सब कर रही थी तब शिमला के ठियोग में पानी सप्लाई का बहुचर्चित घोटाला घट चुका था। इस घोटाले की जानकारी सरकार को भी हो चुकी थी। क्योंकि नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर के मुताबिक टैंकर वाले ने ही नवम्बर में एक पत्रकार वार्ता करके इस घोटाले का पर्दाफाश किया था। जयराम के मुताबिक इस घोटाले की शिकायत काफी समय तक एसडीएम ठियोग के पास लंबित रही है। एसडीएम के पास ऐसी शिकायत आने का अर्थ है कि प्रशासन के उच्च स्तरों तक भी इस घोटाले की सूचना रही होगी। घोटाले में जिस तरह से दस छोटे-बड़े अभियंताओं को निलंबित किया गया है और जितनी पेमेंट्स इसमें हो चुकी है उससे इस घोटाले का आकार सामने आ जाता है। इसमें जितने लोगों को निलंबित किया गया है उसमें एक मृतक व्यक्ति भी एक भाजपा पदाधिकारी के ब्यान के मुताबिक शामिल है। इससे यह सामने आता है कि इस घोटाले की जांच कितनी गंभीरता से की जा रही है। इसी के साथ यह सवाल उठना भी स्वभाविक है कि यदि ठियोग में यह सब घट सकता है तो प्रदेश के अन्य भागों में क्यों नहीं जहां भी इस तरह से पानी की सप्लाई की गई होगी।
ठियोग क्षेत्र शिमला राजधानी से सटा है। शिमला जिले से मंत्रिमंडल में तीन मंत्री हैं। शिमला से ताल्लुक रखने वाले सलाहकार और ओ.एस.डी. भी मुख्यमंत्री की टीम में शामिल हैं। शिमला में इतना राजनीतिक प्रतिनिधित्व सरकार में होते हुये भी इस घोटाले की भनक तक न लग पाना अपने में ही कई सवाल खड़े कर जाता है। क्या इन राजनेताओं का सूचना तंत्र इतना कमजोर था? जबकि सरकार में लोक निर्माण और जल शक्ति विभागों में सप्लायर बनने के लिये राजनीतिक रिश्ते होना एक अघोषित और व्यवहारिक शर्त रहती ही है। फिर यह सवाल आता है कि जब टैंकरों से पानी सप्लाई करने की आवश्यकता महसूस की गई होगी तब सबसे पहले उन गांव की सूची तैयार की गई होगी जहां पानी सप्लाई किया जाना था। यह रिकॉर्ड पर आया होगा कि वहां सड़क है या नहीं। घोटाले के विवरण में यह सामने आया है कि जहां सड़क ही नहीं थी वहां भी गाड़ियों से सप्लाई दी गई और कई चक्कर लगाये गये। इससे यह सवाल उठता है कि कहीं उन गांवों को भी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क से जुड़ा हुआ तो नहीं दिखा रखा है। अन्यथा कोई भी अधिकारी रिकॉर्ड पर इतनी गलती करने की मूर्खता नहीं करेगा की सड़क न होते हुये भी गाड़ी से वहां पानी की सप्लाई का ऑर्डर दे दें। इससे प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना भी जांच के दायरे में आ जाती है। यदि अधिकारियों/कर्मचारियों ने इस सब को नजरअंदाज करते हुये इस तरह के कारनामों को अंजाम दे दिया है तो इससे स्पष्ट हो जाता है की पूरी व्यवस्था ही नीचे तक भ्रष्ट हो चुकी है।
इसी के साथ क्षेत्र के स्थानीय नेतृत्व जिसमें पंचायत बी.डी.सी. और जिला परिषद तक सब सवालों के घेरे में आ जाते हैं। जिस तरह का घोटाला घटा हुआ लग रहा है उसमें ऐसा लगता है कि सब कुछ एक दफ्तर में बैठकर ही अंजाम दे दिया गया। जहां करोड़ों में पेमेन्ट हुई है उसमें अच्छे स्तर का राजनीतिक संरक्षण प्राप्त रहना अनिवार्य हो जाता है। फिर इसमें पैसा एस.डी.आर.एफ और एन.डी.आर.एफ से दिया गया है। विपक्ष बहुत अरसे से आपदा राहत में घोटाला होने का आरोप लगाता आया है जो इससे स्वतः ही प्रमाणित हो जाता है। केंद्र पर भी इस घोटाले का प्रभाव पड़ेगा। केंद्र आसानी से राज्य के किसी भी आग्रह को भविष्य में स्वीकार नहीं कर पायेगा। कांग्रेस हाईकमान भी इस घोटाले को सामने रखते हुये प्रदेश नेतृत्व को लम्बे अरसे तक अभयदान नहीं दे सकेगी। और न ही इस घोटाले को विपक्ष की सरकार गिराने की चाल करार दे पायेगी। बल्कि यह घोटाला कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व पर भी सवाल उठाने का कारण बन जायेगा।

दो वर्ष के बाद मुख्यमंत्री सुक्खू उनकी सरकार और कांग्रेस पार्टी कहां खड़े है?

शिमला/शैल। दो वर्ष के कार्यकाल के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू स्वयं उनकी सरकार और कांग्रेस पार्टी कहां खड़े हैं यह सवाल प्रदेश के जन मानस में चर्चा का विषय बन गये हैं। क्योंकि कांग्रेस ने सत्ता में आने के लिये विधानसभा चुनाव में जनता को दस गारंटीयां दी थी। मुख्यमंत्री के मुताबिक बहुत सी गारंटीयों पर अमल हो चुका है और कुछ पर अब अमल के आदेश कर दिये गये हैं। मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के इन दावों का व्यवहारिक सच जनता जानती है जो इससे प्रत्यक्षतः प्रभावित हो रही है। इसलिये गारंटीयों की व्यवहारिकता पर कुछ भी कहना ज्यादा संगत नहीं होगा। अभी सरकार ने दो वर्ष पूरे होने पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस आयोजन के बाद विधानसभा का चार दिवसीय शीत सत्र धर्मशाला के तपोवन में हुआ। इस सत्र में जो विधेयक सरकार लायी और पारित किये यदि उन पर ही निष्पक्ष नजर डाली जाये तो सरकार का सारा व्यवहारिक पक्ष खुलकर सामने आ जाता है।
एक विधेयक लाकर राधा स्वामी सत्संग ब्यास को भोटा स्थित जमीन अपनी सहयोगी संस्था के नाम ट्रांसफर करने का मार्ग पर प्रशस्त करने के लिए टेनेंसी और भू-सुधार अधिनियम में संशोधन कर दिया गया। राधा स्वामी सत्संग ब्यास ने यह ट्रांसफर की सुविधा इसलिये मांगी थी कि उन्हें अढ़ाई करोड़ का जीएसटी देने से छूट मिल जाये। वित्तीय संकट से जूझती सरकार ने नौ सौ सत्संग घरों और हजारों अन्याइयों के वोट बैंक को सामने रखते हुये संशोधन को अंजाम दे दिया। अब यह संशोधन राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिये जायेगा तब दिल्ली में यह सामने आयेगा की अढ़ाई करोड़ का वार्षिक नुकसान झेलते हुये यह संशोधन किया गया है। मुख्यमंत्री ने इसी शीतकालीन सत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक कड़ा विधेयक लाने का आश्वासन दिया है। लेकिन इसी आश्वासन के साथ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम में संशोधन करते हुये भ्रष्टाचार के किसी भी मामले में सरकार के कर्मचारियों/अधिकारियों की गिरफ्तारी पर सरकार की अनुमति के बिना रोक लगा दी है। पहले यह अनुमति अदालत में चार्जशीट दायर के लिये वांछित होती थी। अब मामले की जांच के दौरान ही गिरफ्तारी की संभावना पर ही यह राइडर लगा दिया गया है। यह संशोधन भी स्वीकृति के लिये राष्ट्रपति के पास जायेगा। इस संशोधन से सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ दावों का सच सामने आ जाता है। इस सत्र में कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा शर्तों का विधेयक पारित किया गया है। यह विधेयक दिसम्बर 2003 से लागू माना जायेगा। इससे प्रदेश में कार्यरत करीब चालीस हजार अनुबन्ध कर्मचारी सीधे प्रभावित होंगे। इस अधिनियम को उच्च न्यायालय में चुनौती मिलने की पूरी संभावना है। पंजाब एवं हरियाणा उच्चतम न्यायालय पंजाब पुनर्गठन के बाद ही हरियाणा सरकार द्वारा लाये गये इसी तरह के कानून को निरस्त कर चुका है। संभव है कि राज्यपाल ही इस अधिनियम को अपने पास ही रोक ले। सर्वाेच्च न्यायालय के फैसले को निष्प्रभावी बनाने के लिये पारित किये गये इस अधिनियम का प्रभाव कर्मचारियों और उनके अभिभावकों पर क्या पड़ेगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है।
यह संशोधन और अधिनियम सरकार पारित कर चुकी है। इससे सरकार के सारे दावों का सच उजागर हो जाता है। सरकार ने संशाधन बनाने के नाम पर टैक्स लगाने और शुल्क बढ़ाने का कोई भी संभव साधन नहीं छोड़ा है। प्रदेश से बाहर अपनी छवि रखने के लिये और हाईकमान को प्रभावित करने के लिये सरकार ने करोड़ों रुपए प्रचार माध्यमों पर खर्च किये हैं। इससे हाईकमान तो प्रभावित हो सकती है लेकिन प्रदेश की भुक्त भोगी जनता नहीं। इस शीत सत्र में पारित किये गये इन संशोधनों से सरकार का सारा सच स्वतः ही सामने आ जाता है। फिर इसी वर्ष राज्यसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से कांग्रेस के छः विधायक पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये राज्यसभा का चुनाव कांग्रेस हार गयी। इस हार के बाद जिस तरह का घटनाक्रम प्रदेश की राजनीति में घटा है उससे स्थितियां और गंभीर होती चली गयी है।
कांग्रेस से निकले छः विधायकों ने जिस तरह से मुख्यमंत्री को घेरा है उसका परिणाम हमीरपुर नादौन में ईडी और आयकर की छापेमारी तक पहुंच गया है। नादौन के दो लोग इसमें ईडी ने गिरफ्तार कर लिये है। कुछ और गिरफ्तारी की तलवार लटकी हुई है। गिरफ्तार हुये लोगों में से ज्ञानचंद चौधरी मुख्यमंत्री का निकटस्थ कहा गया। इस निकटस्थता पर इसी शीत सत्र में मुख्यमंत्री ने सदन में कहा कि ज्ञानचंद विधानसभा में तो उनका समर्थक है परन्तु लोकसभा में अनुराग ठाकुर का समर्थक है। अनुराग ने इस पर कोई प्रतिक्रिया जारी नहीं की है। लेकिन इस सत्र में जिस तरह से नादौन में एचआरटीसी के ई-बस स्टैंड के लिये 70 कनाल जमीन की खरीद बेच का मामला उठा है। उसके दस्तावेज जिस दिन सार्वजनिक रूप से सामने आ जाएंगे तब इस मामले में कई कठिनाइयां उठ खड़ी होगी यह तय है। इसी तरह भाजपा द्वारा राज्यपाल को सौंपे काले चिट्ठे में मुख्यमंत्री के नाम 770 कनाल जमीन होने का मामला सामने आया है। इस मामले का राजस्व रिकॉर्ड और अदालती फैसलों के दस्तावेज सार्वजनिक रूप से सामने आने पर बहुत लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। इस वस्तुस्थिति में यदि सरकार और कांग्रेस पार्टी का आकलन किया जाये तो दोनों के लिये स्थितियां सुखद नहीं है। लेकिन मुख्यमंत्री के लिये अपने स्तर पर भी स्थितियां सुखद नहीं है। क्योंकि कांग्रेस से निकले हुये छः विधायकों के लिये मुख्यमंत्री के खिलाफ खोले मोर्चे को अन्तिम परिणाम तक पहुंचाना आवश्यक है। इन लोगों की लड़ाई में भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व को अपनी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिये इन लोगों का पूरा साथ देना राजनीतिक आवश्यकता बन चुका है।

क्या सुक्खू सरकार भ्रष्टाचार को लेकर गंभीर है

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार सही में भ्रष्टाचार के खिलाफ है? क्या यह सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कड़ा कानून बन पायेगी? यह सवाल विधानसभा के शीतकालीन सत्र में भाजपा द्वारा लाये गये स्थगन प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री के जवाब के बाद उभरे हैं। क्योंकि मुख्यमंत्री ने जोर देकर कहा है कि उनकी सरकार इस आश्य का कानून बनाये जाने के प्रति गंभीर है। भ्रष्टाचार सही में हर व्यवस्था के लिये एक बहुत बड़ी चुनौती रहता है। हर सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरैन्स के दावे करती है। हिमाचल प्रदेश में स्व. डॉ. परमार के कार्यकाल में स्व. हरि सिंह और स्व. ठाकुर कर्म सिंह के बीच उभरा विवाद भ्रष्टाचार के खिलाफ पहला आरोप पत्र कहा जा सकता है। डॉ. परमार के ही कार्यकाल में खिड़की सकैण्डल चर्चा में आया। इस पर स्व. सत्य देव बुशहरी की लघु पुस्तिका हिमाचल पर-मार सामने आयी यह दूसरा आरोप पत्र था। इसके बाद शान्ता कुमार और स्व. वीरभद्र सिंह, प्रो. प्रेम कुमार धूमल, जयराम और सुक्खू सरकार तक विपक्ष द्वारा सत्तारूढ़ सरकारों के खिलाफ आरोप पत्र जारी करने का चलन रहा है। राष्ट्रपति तक यह आरोप पत्र सौंपे गये हैं। मेजर विजय सिहं मनकोटिया ने एक ऑडियो सीडी जारी की थी 2017 में एक वीडियो आरोप पत्र जारी हुआ था। कांग्रेस के सारे विधायकों से जवाब मांगा गया था। हिमाचल ऑन सेल के आरोप लगे हैं। इन आरोपों पर तीन बार जांच आयोग बैठे हैं। लेकिन किसी का कोई ठोस परिणाम निकला हो ऐसा कुछ सामने नहीं आया है। सरकारी जमीन पर होटल बनाकर मामला सामने आने के बाद उस जमीन का तबादला प्राइवेट जमीन के साथ विशेष परिस्थितियों में अनुमोदित हो गया। बिजली बोर्ड से जल विद्युत परियोजना लेकर प्राइवेट पार्टी को दे दी गयी। समझौता हुआ कि विद्युत बोर्ड का निवेश 16% ब्याज के साथ लौटा दिया जायेगा। लेकिन जब यह राशि 92 करोड़ हो गयी तो इसे बट्टे खाते में डाल दिया गया।
31 अक्तूबर 1997 को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक रिवॉर्ड स्कीम अधिसूचित हुई स्कीम में कहा गया की शिकायत मिलने के तीस दिन के भीतर प्रारंभिक जांच करके अगर मामला बनता होगा तो नियमित जांच की जायेगी। शिकायतकर्ता को सरकार को होने वाले लाभ का 25% दिया जायेगा। 10% तो प्रारंभिक जांच पर ही दे दिया जायेगा। स्कीम के तहत 21 नवम्बर 1997 को ही शिकायत दर्ज करवायी गयी। लेकिन इस पर कभी कोई कारवाई नहीं हुई। शिकायतकर्ता को प्रताड़ित किया जाता रहा है। यह मामला किसी संद्धर्भ में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सितम्बर 2018 में दिये फैसले में कहा की लाभार्थियों को मिले लाभों को 12% ब्याज के साथ वसूल किया जाये। लेकिन इस पर आज तक पूरा अमल नहीं हुआ है। शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला साथ लगाकर सरकार को प्रतिवेदन 2018 में ही दे दिया जिसका आज तक जवाब नहीं आया है। अभी कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों के दौरान एक आरोप पत्र जारी किया था जिस पर दो वर्ष में कोई कारवाई सामने नहीं आयी है। अभी मुख्यमंत्री ने जिस मुद्दे की चर्चा पर भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून लाने की बात की है वह मुद्दा स्वयं एक जांच मांगता है। नादौन के राजा नादौन के पास लैण्ड सीलिंग के बाद केवल तीन सौ कनाल जमीन बची थी। राजस्व रिकॉर्ड में इसके अन्दराज में ताबे हकूक बर्तन बर्तनदारान दर्ज है जिसका अर्थ है कि इस जमीन की मालिक सरकार है। राजा नादौन की एक लाख कनाल से ज्यादा जमीन सरकार को चली गयी थी। इस संबंध में उस समय के अदालती फैसले पूरी तरह स्पष्ट हैं। ऐसे में सीलिंग के बाद राजा नादौन द्वारा बेची गयी हर जमीन जांच के दायरे में आती है। 2011 में सर्वाेच्च न्यायालय ने अपने फैसले में देश के सारे मुख्य सचिवों को ऐसी जमीनों की सुरक्षा के निर्देश दे रखे हैं। जिनकी अनुपालन हिमाचल में नहीं हुई है। इसलिये इसकी जांच किया जाना आवश्यक हो जाता है।
भ्रष्टाचार पर प्रदेश की इस वस्तुस्थिति के परिदृश्य में यह उम्मीद करना कि वर्तमान सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कानून ला पायेगी बेमानी लगता है। हो सकता है कि आने वाले समय में कोई उच्च न्यायालय के दरवाजे पर इसके लिये दस्तक दे दे। संभव है कि इस समय जिस पीढ़ी के लोग विधानसभा में प्रदेश का नेतृत्व कर रहे हैं उन्हें प्रदेश में हुये भूमि सुधारों की पूरी जानकारी ही न हो। लैण्ड सीलिंग के संद्धर्भ में जमीन की पूरी परिभाषा की ही जानकारी न हो। ऐसे में यदि मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार पर कानून लाने से पहले ऊपर चर्चित किये गये मामलों की सही जानकारी जुटाकर इसकी ही जांच करवा पाये तो यह उनका एक बड़ा योगदान माना जायेगा।

क्या कानून बनाकर अनुबंध कर्मचारियों के लाभ रोके जा सकते हैं?

  • बारह मासी और स्थायी प्रकृत्ति की नौकरी अनुबंध के दायरे से बाहर
  • अनुबंध की ऐसी नौकरी संविधान के अनुच्छेद चौदह और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के खिलाफ है।

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने विधानसभा के इस शीतकालीन सत्र में सरकारी कर्मचारी भर्ती और सेवा शर्तें अधिनियम पारित करके इसे 12 दिसम्बर 2003 से ही प्रभावी होने का प्रावधान किया है। सरकार के इस अधिनियम पारित करने से राज्य में कार्यरत हजारों कर्मचारीयों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ हिमाचल प्रदेश ने इस अधिनियम के पारित होने का संज्ञान लेते हुये सरकार से इसे वापस लेने की मांग की है। संघ के अनुसार इस अधिनियम का 2003 के पश्चात लोकसभा सेवा आयोग के माध्यम से नियुक्त किये कॉलेज प्रवक्ताओं पर पड़ेगा। संघ का कहना है कि कॉलेज प्रवक्ताओं ने 2003 से लम्बी लड़ाई लड़कर न्यायालय के माध्यम से न्याय प्राप्त किया है। इस न्याय को इस कानून के माध्यम से प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है। यदि सरकार इस फैसले को वापस नहीं लेती है तो संघ ने सारे प्रभावितों को लामबंद करके आन्दोलन का रास्ता अपनाने की चेतावनी भी दी है।
स्मरणीय है कि हिमाचल सरकार ने अनुबंध के आधार पर नियुक्तियों की नीति 2003 में अपनायी थी। लोक सेवा आयोग के माध्यम से परीक्षा पास करके आये अभ्यार्थियों को अनुबंध के आधार पर ही नौकरियां दी गयी। नियमित होने के लिये अनुबंध काल 8 वर्ष, 6 वर्ष, पांच वर्ष और तीन वर्ष तक लाया गया। हर सरकार ने अपने अनुसार अनुबंध काल में परिवर्तन किया। सुक्खू सरकार ने दिसम्बर 2023 में यह घोषित किया कि 2024-25 में दो वर्ष का अनुबंध काल पूरा कर चुके कर्मचारियों को नियमित कर दिया जायेगा। ऐसे में यह समझना आवश्यक हो जाता है कि सरकार को एक वर्ष में अपना फैसला क्यों बदलना पड़ा और वह भी अधिनियम के माध्यम से। केंद्र सरकार ने 2003 में ही न्यू पैन्शन स्कीम अधिसूचित की थी। इसके तहत 2004 में नौकरियों में लगे लोग न्यू पैन्शन के दायरे में आ गये और अपना अंशदान उसमें देने लगे। कांग्रेस ने विधानसभा जीतने के लिये ओल्ड पैन्शन स्कीम फिर से लागू करने की गारन्टी दे दी। सरकार बनने के बाद ओल्ड पैन्शन तो लागू कर दी गई लेकिन न्यू पैन्शन स्कीम के तहत प्रदेश के कर्मचारियों का जो अंशदान करीब नौ हजार करोड़ केंद्र के पास जमा हो चुका था वह इस सरकार को वापस नहीं मिला क्योंकि नियम नहीं था। इससे सरकार का सारा गणित बिगड़ गया।
दूसरी ओर देश भर में अनुबंध कर्मचारी अपनी सेवा शर्तों को लेकर अदालतों तक पहुंचे गये। सर्वाेच्च न्यायालय ने मार्च 2024 में दिये एक फैसले में स्पष्ट कहा है कि बारह मासी स्थायी प्रकृत्ति वाली नौकरियों में अनुबंध के आधार पर नियुक्ति देना संविधान के अनुच्छेद चौदह और राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों की अवहेलना है। सर्वाेच्च न्यायालय ने अनुबंध के आधार पर नियुक्त कर्मचारियों को पहली नियुक्ति की तिथि से ही वरियता और अन्य लाभों का पात्र करार दे दिया है।
हिमाचल उच्च न्यायालय में भी इस आश्य की याचिकाएं आ चुकी है। हिमाचल सरकार अनुबंध कर्मचारियों को नियुक्ति की तिथि से वित्तीय लाभ देने की स्थिति में नहीं है। अदालत में मामलों को लगवाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प सरकार के पास है नहीं। बल्कि नवम्बर में उच्च न्यायालय ने इन मामलों में अपनाई जा रही अनावश्यक देरी के लिये सरकार के प्रधान सचिव पर एक लाख का जुर्माना तक लगा दिया और निर्देश दिये कि यह जुर्माना प्रधान सचिव से वसूला जाये। अनुबंध कर्मचारियों के हजारों मामले सरकार के पास लम्बित है जिन्हें वित्तीय लाभ नियुक्ति की तिथि से दे पाना सरकार के लिये कठिन होगा। इस समय करीब चालीस हजार कर्मचारी अनुबंध के आधार पर अपनी सेवाएं सरकार को दे रहे हैं जिन्हें सिर्फ अदालत के फैसले के बाद नियमित करना होगा और वित्तीय लाभ देने पड़ेंगे। चर्चा है कि इससे बचने के लिये ही 2024 में यह अधिनियम लाकर इसे दिसम्बर 2003 से प्रभावी बनाने का रास्ता अपनाया गया है। अनुबंध के अतिरिक्त आउटसोर्स कर्मचारी भी बारह मासी और स्थायी नौकरी की श्रेणी में आते हैं। यदि अनुबंध कर्मीयों के लिये संविधान का अनुच्छेद चौदह और नीति निर्देश सिद्धांत पिक्चर में आते हैं तो आउटसोर्स कर्मियों के लिये क्यों नहीं ? इसी के साथ यह सवाल अहम हो जाता है कि जब ऐसी नौकरियां संविधान की अवमानना है तो क्या कोई राज्य सरकार ऐसा कानून लाकर स्वयं संविधान की अवमानना की दोषी नहीं बन जाती है। यदि सुक्खू सरकार के इस कानून को अदालत में चुनौती दी गयी तो यह सारे सवाल उठेंगे यह तय है।

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