शिमला/शैल। ईडी ने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के विधानसभा क्षेत्र से खनन व्यवसाय से जुड़े दो कारोबारियों ज्ञानचन्द और संजय धीमान को गिरफ्तार कर लिया है। पांच माह पहले ई डी और आयकर विभाग ने हमीरपुर और नादौन में छापेमारी की थी। दो माह में तीन बार ई डी ने यहां दस्तक दी थी। नादौन में चार लोगों ज्ञानचन्द, प्रभात चन्द, संजय धीमान और संजय शर्मा के यहां छापेमारी हुई थी। इस छापेमारी में ई डी को क्या कुछ मिला था इसकी कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं हुई थी। लेकिन इस छापेमारी और फिर इस गिरफ्तारी के बीच 14-9-24 को एक बसन्त सिंह ठाकुर को ई डी ने बतौर गवाह दिल्ली तलब कर लिया था। बसन्त सिंह ठाकुर ने सुक्खू के 2017 के चुनाव शपथ पत्र को चुनौती दी थी। बसन्त सिंह ने आरोप लगाया था कि इस शपथ पत्र में संपत्ति को लेकर कुछ जानकारीयों को छुपा लिया गया है। उच्च न्यायालय ने इस आरोप को गंभीरता से लिया और कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश संजय करोल ने इसकी जांच के आदेश देते हुये संबद्ध अधिकारियों को इसमें त्वरित कारवाई करने के निर्देश दिये। इन निर्देशों के बाद यह मामला जांच के लिये हमीरपुर पुलिस के पास पहुंच गया और नादौन की अदालत में केस चला। नादौन की अदालत में सुक्खू को इस आधार पर राहत दे दी कि इसमें किसी को भी न व्यक्तिगत लाभ हुआ है और न ही हानि। बसन्त सिंह इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय में आ गये। उच्च न्यायालय की जस्टिस कैंथला की एकल पीठ ने जून में इस पर फैसला देते हुये नादौन की अदालत के फैसले को यथास्थिति बनाये रखते हुये यह भी कह दिया कि इस फैसले से केस की मेरिट प्रभावित नहीं होगी।
इस बसन्त सिंह-सुक्खू मामले की फाइल ज्ञानचन्द के यहां छापेमारी के दौरान ई डी के हाथ लग गयी। जबकि ज्ञानचन्द का इस मामले के साथ कोई संबंध ही नहीं है। ई डी ने इस केस की फाइल को देखने के बाद इसके सत्यापन के लिये बसन्त सिंह को दिल्ली तलब कर लिया। इस फाइल में संपत्ति से जुड़े कई दस्तावेज होने कहे जा रहे हैं। बसन्त सिंह 14-9-24 को ई डी में पेश हो आये हैं। शायद ई डी बसन्त सिंह को गवाही के लिए फिर तलब करें। बसन्त सिंह ने सुक्खू के चुनाव शपथ पत्र में जमीन संबंधी कुछ जानकारियां छुपाने का आरोप लगा रखा है। हमीरपुर के ए एस पी ने अपनी जांच रिपोर्ट में बसन्त सिंह के आरोप को प्रमाणित कर दिया है। जिस स्टोन क्रशर की ई डी ने अधवाणी में जांच और छापेमारी की है वह पहले बसन्त सिंह के गांव जरोट में ही स्थापित था। बसन्त सिंह की शिकायत पर ही जरोट से इस क्रशर को शिफ्ट करने के अदालत ने आदेश दिये थे और तब जरोट से यह अधवाणी शिफ्ट हुआ था। माना जा रहा है कि जो केस फाइल ई डी के हाथ लगी है उसमें शायद स्टोन क्रशर से जुड़ी जानकारियां भी हैं। यह केस फाइल ई डी के हाथ लगने से इस मामले में कई मोड़ आने की संभावनाएं बन गयी हैं क्योंकि यह स्टोन क्रशर भी उस जमीन पर स्थित था जो शायद सरकार के नाम सिलिंग के समय जा चुकी है और इस पर बर्तनदारों के हक सुरक्षित थे क्योंकि यहीं पर कुछ गांवों का शमशान भी है।
यह है बसन्त सिंह के नाम ई डी के सम्मन


शिमला/शैल। प्रधानमंत्री द्वारा हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स को महाराष्ट्र और झारखण्ड के चुनाव में भी मुद्दा बनाया गया तब मुख्यमंत्री सुक्खू ने इसका जवाब देते हुए आरोप लगाया है कि भाजपा प्रदेश को बदनाम कर रही है तथा प्रधानमंत्री को भी गलत सूचनाएं दी जा रही हैं। मुख्यमंत्री अपनी सरकार की स्थिति स्पष्ट करने महाराष्ट्र भी गये लेकिन इन्हीं चुनाव के मतदान से पहले एक मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा हिमाचल भवन दिल्ली को अटैच करने के आदेश जारी हो गये। उच्च न्यायालय के यह आदेश एकदम पूरे देश में चर्चा का विषय बन गये। प्रदेश की वित्तीय स्थिति ठीक होने और पांच चुनावी गारंटीयां लागू कर देने के दावों पर भी स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग गये। यहां पर यह प्रश्न उठता है कि जब प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह पैसा जमा करवाने के निर्देश बहुत पहले दे रखे थे तो उनकी अनुपालना क्यों नहीं हुई। जबकि ऐसे मामलों में अपील दायर करने के लिये भी यह शर्त रहती है कि संदर्भित पैसा अदालत की रजिस्ट्री में पहले जमा करवाना पड़ता है। अदालत के फैसले की अनुपालना न करने के लिये कौन अधिकारी जिम्मेदार है। उन्हें चिन्हित करने के निर्देश देते हुये इस रकम का ब्याज इस बीच के समय का उनसे वसूलने के आदेश भी अदालत ने दे रखे हैं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार ऐसे अधिकारियों को चिन्हित करके उनके खिलाफ कारवाई करती है या नहीं। इस सरकार के कार्यकाल में आर्विटेशन के जो मामले हुये हैं उनमें शायद पन्द्रह सौ करोड़ की देनदारी सरकार पर आ खड़ी हुई है। सभी मामलों में अधिकारियों के स्तर पर गड़बड़ होने की आशंकाएं सामने आयी हैं। लेकिन किसी के भी खिलाफ जिम्मेदारी तय करने की बात नहीं हुई है। बल्कि सर्वाेच्च न्यायालय से लेकर प्रदेश उच्च न्यायालय तक कई मामलों में सरकार को भारी जुर्माने तक लगे हैं। लेकिन इन मामलों का सरकार के स्तर पर कोई गंभीर संज्ञान नहीं लिया गया। इसी दौरान सीपीएस मामले में फैसला आया है। उच्च न्यायालय ने इन नियुक्तियों को अवैध और असंवैधानिक ठहराते हुये इस आश्य के अधिनियम को भी अवैध करार दे दिया है। 1971 के जिस अधिनियम के तहत इन लोगों को संरक्षण हासिल था उसे भी रद्द कर दिया है। इस मामले में एक दर्जन भाजपा विधायकों की याचिका उच्च न्यायालय में थी। अब इस याचिका के बहाल होने के बाद सीपीएस की विधायकी भी खतरे में आ गयी है। जब याचिकाकर्ता विधायकों की ओर से यह फैसला राज्यपाल के संज्ञान में ला दिया जायेगा तब राजभवन संविधान की धारा 191 और 192 के प्रावधानों के तहत कारवाई करने के लिये बाध्य हो जायेगा। संभावना है कि यह कारवाई सर्वाेच्च न्यायालय में यह मामला सुनवाई के लिए आने तक पूरी हो जायेगी। भाजपा सीपीएस नियुक्तियों को शुरू से ही गैर जरूरी करार देती आयी है। क्योंकि एक ओर तो सरकार वित्तीय संकट के कारण अपने वेतन भत्ते निलंबित करने के लिये बाध्य हो गयी और दूसरी ओर सीपीएस पर करोड़ों खर्च कर रही है। ऐसे में उच्च न्यायालय का फैसला सीपीएस के खिलाफ आने से भाजपा का एक और आरोप प्रमाणित हो गया है। यह फैसला भी महाराष्ट्र और झारखण्ड के मतदान से पहले आया है। इससे भी अनचाहे ही प्रदेश सरकार की परफारमैन्स इन चुनावों में भी चर्चा का विषय बन गयी है। इस फैसले को लेकर भाजपा ने उन तीन कांग्रेस विधायकों को भी लाभ के पद के दायरे में परिभाषित करना शुरू कर दिया है जिन्हें सरकार ने कैबिनेट रैंक दे रखे हैं। बल्कि कैबिनेट रैंक प्राप्त और विधायक भी कल को चर्चा का विषय बन जाएंगे। क्योंकि कैबिनेट रैंक से ही यह लोग मंत्री के बराबर सुविधाओं के पात्र बन जाते हैं।
शिमला/शैल। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश की सुक्खू सरकार में एक और घोटाला सामने आया है। यह घोटाला ट्रामा सेंटर में मैन पॉवर उपलब्ध करवाने के नाम पर हुआ। डेढ़ साल से बंद पड़ा आईजीएमसी का नव निर्मित ट्रामा सेंटर सिर्फ कागजों में चल रहा था और वहां पर अलग-अलग समय में सपोर्टिव और पैरामेडिकल स्टाफ की नियुक्ति ठेकेदार के माध्यम से कर दी गई थी। अपने चहेतों को लाभ दिलवाने के लिए सभी कायदे कानून ताक पर रख दिये गये। एक बन्द पड़े ट्रामा सेंटर में सैकड़ों कर्मचारी की नियुक्ति की गई और बिना एक भी मरीज का इलाज किये ट्रामा सेंटर के मैन पॉवर के नाम पर दो करोड़ तीस लाख का बिल सरकार पर लाद दिया गया। गौरतलब है कि मैन पॉवर के लिए आने वाले खर्च को केन्द्र सरकार द्वारा उठाया जा रहा है। यह केन्द्र द्वारा जनहित के लिए भेजे गये पैसों की खुलेआम लूट है। फाइनेंस प्रूडेंश और फाइनेंस डिसिप्लिन के नाम पर कर्मचारियों का वेतन और पेंशनधारकों की पेंशन रोकने वाले मुख्यमंत्री की नाक के नीचे इस तरह से जनहित के काम में आने वाले पैसों को अपने चहेतों में बांटा जा रहा है।
जयराम ठाकुर ने कहा कि हर दिन सुक्खू सरकार के कारनामें बाहर आ रहे हैं। नया मामला लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ के साथ साथ केंद्र सरकार द्वारा भेजे गये पैसे की बंदरबांट का है। केंद्र सरकार के सहयोग से बने आईजीएमसी के ट्रामा सेंटर का उद्घाटन मुख्यमंत्री ने फीता काटने और पटिका लगवाने के शौक में मुख्यमंत्री ने पिछले साल 09 मार्च को कर दिया और उसी के साथ ही मैन पॉवर की भर्ती के लिये अपने चहेते ठेकेदारों को ऑर्डर भी दे दिया। अपेक्षित मैनपॉवर को ठेकेदारों ने ट्रामा सेंटर में नियुक्ति भी दे दी लेकिन सरकार ट्रामा सेंटर को फंक्शनल करना भूल गई। बिना इलाज किये हर महीनें ठेकेदार का बिल बनता रहा। धीरे-धीरे बढ़कर यह राशि 2 करोड़ 30 लाख हो गई। जिससे भुगतान के लिए अब ठेकेदारों ने जोर लगाना शुरू कर दिया। पिछले दिनों ट्रामा सेंटर को फंक्शनल करने आये मुख्यमंत्री से भी ट्रामा सेंटर में तैनात कर्मचारियों ने मुलाकात की और वेतन न मिलने की शिकायत की। इसको लेकर कई बार प्रदर्शन भी किया जा चुका है।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि अस्पताल प्रशासन ने विभिन्न समय पर ट्रामा सेंटर के लिए अलग-अलग पदों पर जिसमें सपोर्टिव स्टाफ और पैरामेडिकल स्टाफ शामिल है के लिए भर्तियां निकाली और आउट सोर्स के माध्यम से उन्हें भरा गया। सूचना के अधिकार के तहत हासिल किये गये डॉक्यूमेंट के आधार पर पता चलता है कि रेडियो ग्राफर, फार्मासिस्ट, वार्ड बॉय ट्रॉली मैन सफाई कर्मचारी के कुल 126 पदों पर अलग-अलग समय में नियुक्तियां हुई। हैरानी की बात है कि जो ट्रॉमा सेंटर अब फंक्शनल हुआ है उसके लिए कई महीनों या साल भर पहले से ही कर्मचारियों की नियुक्ति का क्या औचित्य है।
इसके साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि उन्होंने ट्रॉमा सेंटर को फंक्शनल करने में 19 महीने का वक्त क्यों लगाया? क्या बने बनाये प्रोजेक्ट का बार-बार फीता काटना ही व्यवस्था परिवर्तन है। जहां केन्द्र सरकार के कामों का फीता काटा जाये और केंद्र सरकार को कोसा जाये। क्योंकि जो पैसा घोटाले के माध्यम से उड़ाया जा रहा है वह भी केंद्र सरकार से आया है और जिस पैसे से ट्रामा सेंटर और कैंसर टर्शरी सेंटर बन रहा है वह भी केंद्र सरकार का है। सरकार बस फीता कटर बनकर फीता काटे जा रही है।
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्रदेश के कर्मचारियों को 4 प्रतिशत डी.ए. जो जनवरी 2023 से देय था देने की घोषणा की है। इसी के साथ प्रदेश के सारे कर्मचारीयों को निगमों/बोर्डों सहित वेतन की अदायगी भी इसी माह की 28 तारीख को करने की घोषणा करके इस आश्य के आदेश भी जारी कर दिये हैं। पैन्शनरों को भी यह अदायगी 28 तारीख को ही हो जायेगी। मुख्यमंत्री का यह फैसला प्रदेश की कठिन वित्तीय स्थिति पर उठते सवालों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन इसी फैसले के साथ यह सवाल भी उठाना शुरू हो गया है कि क्या भविष्य में भी यह भुगतान इसी तरह सुनिश्चित हो पायेंगे। इसी के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अन्य लोगों के भुगतान भी इसी तरह समय पर हो जायेंगे जो कर्मचारी नहीं हैं। क्योंकि काफी अरसे से ठेकेदार और दूसरे सप्लायर भी यह शिकायत कर रहे हैं कि उनके भुगतान भी काफी अरसे से अटके पड़े हुये हैं। प्रदेश के कर्मचारियों के तो संगठन है और वह अपनी आवाज इनके माध्यम से सरकार तक पहुंचा सकते हैं। लेकिन जिन ठेकेदारों के माध्यम से विकास कार्यों को फील्ड में अंजाम दिया जा रहा है यदि उनके भुगतान समय पर न हुये तो उससे विकास कार्यों पर ब्रेक लग जायेगी और वह सरकार के लिये और भी नुकसान देह स्थिति होगी। इसलिये वित्तीय स्थिति और उसके प्रबंधन का टेस्ट आने वाले दिनों में होगा। लेकिन जैसे ही मुख्यमंत्री ने कर्मचारियों और पैन्शनरों के यह भुगतान करने का ऐलान किया तो उस पर भी भाजपा ने तुरन्त यह कह दिया है कि यह सब कुछ केन्द्र द्वारा 1479 करोड़ की एडवांस अदायगी कर देने से संभव हुआ है। जबकि अब तक केन्द्र ने हिमाचल को उसके हिस्से से ज्यादा आदायगी नहीं की है। परन्तु भाजपा का सारा नेतृत्व राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर नीचे तक यह सन्देश देने में लगा हुआ है कि प्रदेश सरकार केन्द्र के सहयोग के बिना एक दिन भी नहीं चल सकती। बल्कि जेपी नड्डा जब पिछले दिनों बिलासपुर आये थे तब जो ब्यान उनका आया वह विश्लेषकों की नजर में एक तरह का चुनावी भाषण ही था। भाजपा का हर नेता जिस तरह से सरकार के खिलाफ आक्रामक हो उठा है और आपदा राहत में घपला होने का आरोप लगा रहा है उससे यह कुछ अलग ही तरह का संकेत और संदेश जा रहा है। भाजपा नेता सुक्खू सरकार को एकदम असफल और भ्रष्टाचार में लिफ्त होने का तमगा देते जा रहे हैं। भाजपा के इन आरोपों का सरकार और कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई कारगर जवाब नहीं आ रहा है। भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रही है और सरकार कांग्रेस द्वारा ही विधानसभा चुनाव के दौरान पूर्व सरकार के खिलाफ सौंपी अपनी ही चार्जशीट पर कोई कारवाई नहीं कर पा रही है। इससे सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों को स्वतः ही बल मिल जाता है। इस समय केन्द्र सरकार के सहयोग पर जहां मुख्यमंत्री फूटी कौड़ी भी न मिलने की बात कह रहे हैं वहीं पर उनके ही कुछ मंत्री इस सहयोग को रिकॉर्ड पर लाकर मोदी सरकार का धन्यवाद कर रहे हैं। इस तरह सरकार में ही उठते इन अलग स्वरों का राजनीतिक अर्थ बदल जाता है। फिर राज्यसभा चुनाव के दौरान भाजपा पर धनबल के सहारे इस सरकार को गिराने का प्रयास करने का आरोप लग ही चुका है। इस आरोप को प्रमाणित करने के लिये एफ आई आर तक दर्ज है। एफ आई आर जांच में हरियाणा की पूर्व खट्टर सरकार के प्रचार सलाहकार पर भी आरोप आये हैं। अब हरियाणा में पुनः भाजपा की सरकार बन गयी है। हिमाचल में दल बदल का खेल नड्डा के अध्यक्ष काल में हुआ है। अब नड्डा केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हो गये हैं लेकिन उस समय दल बदल से सुक्खू सरकार गिराई नहीं जा सकी। यह असफलता एक तरह से नड्डा के नाम पर भी है। लेकिन राज्यसभा चुनाव और उसके बाद के घटनाक्रम ने सुक्खू सरकार को अब तक चैन से बैठने नहीं दिया है। वेतन भत्ते निलंबित करने का रिकॉर्ड सदन के पटल पर आ गया है। इस समय सरकार के चार-पांच मंत्री किसी न किसी मुद्दे पर मुख्यमंत्री के साथ तकरार में चल रहे हैं। कर्मचारी आन्दोलन की स्थिति पूरी तरह खत्म नही हुई है। मीडिया को पुलिस बल के माध्यम से डराने के प्रयास लगातार रिकॉर्ड पर आ रहे हैं। जनता इस सरकार को ‘‘टैक्स’’ की सरकार का तमगा दे रही है। इस तरह मित्रों के अलावा हर वर्ग सरकार से पीड़ित है। भाजपा इस स्थिति पर बराबर नजर बनाये हुये है और यह सन्देश सफलतापूर्वक दे रही है कि केन्द्र के सहयोग के बिना सरकार एक दिन नहीं चल सकती। आने वाले दिनों में जब कर्ज लेने की सीमा पार हो जायेगी तब प्रदेश का वित्तीय प्रबंधन कैसे आगे बढ़ेगा उस पर सबकी निगाहें लगी हैं। माना जा रहा है कि सरकार अपने ही बोझ से दम तोड़ने के कगार पर पहुंच रही है। भाजपा इसी स्थिति की प्रतीक्षा में है और तब सरकार तोड़ने के प्रयास एक दम गति पकड़ लेंगे। उस समय तक यदि नेतृत्व परिवर्तन की दिशा में कोई ठोस कदम न उठ सके तो सरकार और पार्टी में बगावत खुलकर सामने आ जाएगी। भाजपा अपने ब्यानों से इसी संभावित बगावत को हवा दे रही है। माना जा रहा है कि भाजपा की आक्रामकता प्रदेश को चुनावों की ओर ले जाने का एक सुनियोजित प्रयास है।