Monday, 02 March 2026
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कमलेश के लिये आसान नहीं होगी चुनावी डगर शान्ता कुमार ने दी परिवारवाद की संज्ञा

  • देहरा की बेटी के कार्ड को बदलकर होशियार सिंह ने नादौन की बहू करार दिया
  • अब देहरा के बेटे और नादौन की बहू में मुकाबला
  • कमलेश के शपथ पत्र पर होशियार सिंह की शिकायत कानूनी उलझने खड़ी करेगी

शिमला/शैल। प्रदेश में तीन उपचुनाव होने जा रहे हैं। दस जुलाई को मतदान होगा। चुनाव प्रचार अभियान चल रहा है। इन उपचुनावों के परिणामों का सरकार और विपक्ष पर कोई ऐसा संख्यात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा जिससे सरकार की स्थिरता पर कोई सवाल खड़े हो पायें। लेकिन इस सबके बावजूद यह उपचुनाव पिछले उपचुनावों से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गये हैं। क्योंकि देहरा से मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है। स्मरणीय है कि लोकसभा की चारों सीटें कांग्रेस हार गयी हैं। 68 में से 61 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस को हार मिली है। लोकसभा के साथ हुये छः विधानसभा उपचुनाव में से चार कांग्रेस जीत गयी है। लेकिन यह जीत भाजपा के आन्तरिक समीकरणों के गणित का प्रतिफल मानी जा रही है। क्योंकि मुख्यमंत्री अपने ही विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस को बढ़त नहीं दिल पाये हैं। इस परिदृश्य में मुख्यमंत्री की पत्नी का देहरा से उम्मीदवार बनाया जाना निश्चित रूप से कई सवालों को जन्म देता है। क्योंकि यदि किन्हीं कारणों से देहरा कांग्रेस हार जाती है तो निश्चित रूप से मुख्यमंत्री के नेतृत्व को लेकर ऐसे सवाल उठेंगे जिन्हें हाईकमान भी नजरअन्दाज नहीं कर पायेगी।
मुख्यमंत्री की पत्नी कमलेश ठाकुर पहली बार कोई चुनाव लड़ रही है। संगठन में भी वह ऐसा कोई बड़ा नाम नहीं रही है जिसकी कोई अपनी अलग राजनीतिक पहचान बन पायी हो। इस नाते उनकी केवल एक ही पहचान है कि वह मुख्यमंत्री की पत्नी है। इससे अलग कमलेश ठाकुर ने अपने को देहरा की बेटी होने का भी भावनात्मक अस्त्र छोड़ा है। चुनावी मंचों से वह लगातार यह बोलना नहीं भूल रही है कि ध्याण को खाली हाथ नहीं भेजते। उसी के साथ उसने यह भी ऐलान किया है कि यदि नादौन को सुक्खू सरकार सौ रूपये देती है तो वह देहरा के लिये एक सौ एक लेकर आयेगी। देहरा में ही उनका और मुख्यमंत्री का कार्यालय होगा। वह यह सब कहकर देहरा के लोगों को आश्वस्त कर रही है कि चुनावों के बाद देहरा में उनकी लगातार उपलब्धता बनी रहेगी। लोगों को अपने कार्यों के लिये मुख्यमंत्री के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। वह पूरी तरह इस चुनाव को भावनात्मक रंग दे रही है। होशियार सिंह के खिलाफ यह आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने पन्द्रह माह के कार्यकाल में देहरा में विकास का एक भी काम नहीं किया है। कमलेश यह दावा कर रही है कि वह जीत कर देहरा में विकास की गंगा बहा देगी।
दूसरी और होशियार सिंह ने कमलेश के भावनात्मक कार्ड की जो काट लोगों में रखी है उससे यह चुनाव निश्चित रूप से रोचक और गंभीर हो गया है। देहरा की बेटी के नैरेटिव को बदलते हुये होशियार सिंह ने तथ्य सामने रखा है उनका मायका नलसूहा में है जो की जसवां परागपुर क्षेत्र में आता है। उनका ससुराल नादौन में है इस नाते वह देहरा की बेटी नहीं बल्कि नादौन की बहु है। होशियार सिंह स्वयं देहरा से हैं। पिछले दोनों चुनाव उन्होंने देहरा का बेटा होने के नाम से जीते हैं। इसी तर्क पर वह यह सवाल रख रहे हैं कि लोग घर के बेटे को चुनते हैं या नादौन की बहू को। इसी के साथ वह यह स्वीकार कर रहे हैं कि वह पन्द्रह माह में देहरा में कोई काम नहीं करवा पाये हैं क्योंकि सुक्खू सरकार ने देहरा को एक पैसा तक आवंटित नहीं किया। जब सरकार पूरी तरह पक्षपात करके चल रही थी तो ऐेसी व्यवस्था में विधायक बने रहने का कोई औचित्य नहीं रह जाता था। वह सवाल कर रहे हैं कि नादौन में अपने कुछ मित्रों के दायरे से बाहर न निकल पाने के कारण ही तो लोकसभा में उनकी हार हुई है। नादौन में काम किये होते तो हार क्यों होती। इस तरह भावनात्मक पलड़े पर होशियार सिंह कमलेश पर भारी पड़ते नजर आ रहे हैं। इसी तरह प्रदेश भाजपा के वरिष्ठतम नेता पूर्व मुख्यमंत्री शान्ता कुमार ने कमलेश ठाकुर को इस तरह उम्मीदवार बनाया जाना परिवारवाद का सबसे बड़ा उदाहरण करार दिया है। परिवारवाद के इस आरोप का दिल्ली से लेकर शिमला तक कोई कांग्रेस नेता जवाब नहीं दे पा रहा है। फिर कमलेश के चुनावी ब्यान इस आरोप को सिद्ध कर रहे हैं।
इस चुनाव में एक गंभीर पक्ष यह सामने आया है कि कमलेश ठाकुर के चुनाव शपथ पत्र को लेकर होशियार सिंह ने एक शिकायत एसडीएम देहरा के पास दायर कर रखी है। इसमें शायद भू-संपत्तियां को लेकर कुछ गंभीर आरोप है जो आगे चलकर बड़ा कानूनी मुद्दा बन सकते हैं। वैसे कमलेश ठाकुर के शपथ पत्र के मुताबिक वह अपने पति मुख्यमंत्री ठाकुर सुक्खविन्दर सिंह सुक्खू से ज्यादा अमीर हैं। यह चर्चा चल पड़ी है कि मुख्यमंत्री की पत्नी होने के क्या लाभ होते हैं। आपदा में मुख्यमंत्री ने 51 लाख दान देकर जो मिसाल कायम की थी उसे इन शपथ पत्रों के आईने में देखा जाने लगा है। क्योंकि कमलेश के शपथ पत्र के साथ मुख्यमंत्री का शपथ पत्र भी चर्चा में आ गया है। इस तरह जो चुनावी परिदृश्य अब बनता जा रहा है उससे कमलेश की एकतरफा जीत अब प्रश्नित होती जा रही है। क्योंकि कमलेश के अधिकांश चुनाव प्रचारक शिमला से हैं जिनका देहरा में अपना वोट भी नहीं है। ऐेसा शायद इसलिये है कि मुख्यमंत्री स्वयं नादौन-हमीरपुर से ज्यादा शिमला के हैं।

क्या यह उपचुनाव मुद्दों की जगह आरोपों-प्रत्यारोपों पर लड़ा जायेगा?

  • आशीष शर्मा ने मुख्यमंत्री को सबसे बड़ा माफिया करार दिया
  • फरवरी 2023 में खनन पॉलिसी में बदलाव भाई को लाभ पहुंचाने के लिये किया गया
  • कांगड़ा बैंक के ऋण मुआफी के मुद्दे उछलने की संभावना
  • क्या नादौन में एचआरटीसी द्वारा खरीदी जमीन विलेज कामन लैण्ड है?
शिमला/शैल। क्या यह उपचुनाव मुद्दों पर सवाल पूछने और बहस उठाने की बजाये आरोपों और प्रत्यारापों के तीखे पन पर लड़ा जायेगा? यह सवाल इसलिये प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि मुख्यमंत्री और पूरी कांग्रेस पार्टी भाजपा द्वारा धन-बल के सहारे सरकार गिराने का प्रयास करने को अब भी केंद्रीय मुद्दा बनाकर जनता में उछाल रहे हैं। इस आरोप के खुलासे में उन सारे विधायकों को जिनके क्रॉस वोटिंग करने से राज्यसभा चुनाव में भाजपा के हर्ष महाजन कांग्रेस के बराबर वोट हासिल करके पर्ची सिद्धांत पर जीत गये। यह सही है कि जब भाजपा के अपने 25 ही विधायक थे तो वह वोटिंग में 34 कैसे हो गये। यहां क्रॉस वोटिंग करने वालों को बिकाऊ विधायक लोकसभा चुनाव में प्रचारित किया गया। लेकिन इस प्रचार से भाजपा चारों सीटें जीत गयी। विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस छः में से चार सीटें जीत गयी। इस जीत को मुख्यमंत्री में जनता के विश्वास की संज्ञा दी गयी। लेकिन इस विश्वास पर उस समय एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया जब मुख्यमंत्री अपने ही विधानसभा क्षेत्र नादौन में कांग्रेस को बढ़त नहीं दिला पाये। उपचुनावों में चारों सीटें जीतने को अधिकांश में भाजपा की आंतरिक राजनीति को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। बल्कि प्रदेश की चारों सीटें जीतने के बाद भी अनुराग ठाकुर को केंद्रीय मंत्री परिषद में स्थान न मिल पाना भी इसी राजनीति का प्रतिफल माना जा रहा है।
इस परिदृश्य में हो रहे हैं इन उपचुनावों में फिर मुख्यमंत्री ने विधायकों को बिकाऊ होने के आरोप को उछाल दिया है। इसी बिकाऊ के आरोप के साथ ही खनन माफिया और भू-माफिया के टैग में भी इनके साथ जोड़ दिए गये हैं। पिछली बार धर्मशाला में सुधीर शर्मा को मुख्यमंत्री ने भू- माफिया की संज्ञा देते हुये उनकी कुछ संपत्तियों के नाम मीडिया में उछाले थे लेकिन उनके कोई दस्तावेजी प्रमाण जारी नहीं कर पायेे थे। इन आरोपों के जवाब में सुधीर शर्मा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ कुछ आरोप दस्तावेजी प्रमाणों के साथ लगाये। सुधीर के आरोपों के सामने मुख्यमंत्री द्वारा लगाये गये आरोप हल्के पड़ गये और परिणाम स्वरूप सुधीर शर्मा चुनाव जीत गये। इसी तरह बड़सर में पैसे मिलने का एक आरोप उछाला गया। मुख्यमंत्री ने यह कथित पैसे लखनपाल के नाम लगा दिये। पैसे मिलने के आरोप का जिस आक्रमकता के साथ नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने जवाब दिया और प्रति प्रश्न किये तब मुख्यमंत्री का आरोप कमजोर पड़ गया और लखनपाल जीत गये।
पिछले उपचुनाव ने यह प्रमाणित कर दिया है कि जिसने तीव्र आक्रामकता अपनायी उसकी जीत हुई है। अब इन उपचुनावों में भी मुख्यमंत्री के पास वही पुराना राग है। बिकाऊ और धनबल का लेकिन आज तक इस आरोप का कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण जनता के सामने नहीं ला पाये हैं। हमीरपुर से पूर्व निर्दलीय विधायक और अब भाजपा प्रत्याशी आशीष शर्मा ने मुख्यमंत्री को ही सबसे बड़ा माफिया होने का आरोप लगा दिया है। आशीष शर्मा ने खुलासा किया है कि दिसम्बर 2022 में सुक्खू सरकार बनने के बाद फरवरी 2023 में प्रदेश की खनन पॉलिसी बदल दी गयी। आशीष के मुताबिक यह बदलाव अपने सगे भाई को लाभ पहुंचाने के लिये किया गया है। मुख्यमंत्री की ओर से इस आरोप का कोई जवाब नहीं आया है। पीछे जब सुधीर शर्मा ने नादौन में ढाई लाख में खरीदी गई जमीन को एचआरटीसी द्वारा करीब पौने सात करोड़ में खरीद लेने का जो आरोप लगाया था माना जा रहा है कि उसके पूरे दस्तावेज इस चुनाव में सामने आएंगे। इस खरीद-बेच में बड़ा सवाल तो यह उठा था कि यह जमीन बिक कैसे गयी? इसकी रजिस्ट्री हो कैसे गयी? चर्चा है कि जहां पर यह एचआरटीसी द्वारा खरीदी गई जमीन है वहीं पर 1974 में भूदान आन्दोलन यज्ञ के नाम पर राजा नादौन की 1224 कनाल जमीन को लैण्ड सीलिंग से बाहर रखा गया था। उस समय राजा नादौन की एक लाख कनाल से अधिक जमीन विलेज कामन लैण्ड हो गयी थी। इस विलेज कामन लैण्ड को खरीदा बेचा नहीं जा सकता। इसी तर्ज पर भूदान आन्दोलन यज्ञ के नाम पर हुई जमीनों को भी खरीदा बेचा नहीं जा सकता। माना जा रहा है कि शायद एचआरटीसी द्वारा खरीदी गई जमीन भी शायद विलेज कामन लैण्ड है।
इस उपचुनाव में आरोपों और प्रत्यारोपों के हथियार ही इस्तेमाल होंगे। यह आशीष शर्मा के ब्यान से स्पष्ट हो जाता है। फिर इस बार तो पिछले चुनाव के अंतिम दिनों में कांगड़ा सैन्ट्रल कोऑपरेटिव बैंक के करोड़ों की ऋण माफी को लेकर वायरल हुये वीडियो के रूप में और हथियार उपलब्ध हो गये हैं। जबकि इस समय के सबसे बड़े मुद्दे हैं कि यह सरकार कितना कर्ज लेकर चुनावी गारंटीयां पूरी कर पायेगी? क्योंकि हर माह कर्ज लेना पड़ रहा है। संसाधन बढ़ाने के लिये लगाया गया वाटर सैस कानूनी दाव पेंच में उलझ गया है। विद्युत परियोजनाओं से रॉयल्टी बढ़ाने का प्रयास भी अदालत में सफल नहीं हो पाया है। युवाओं को रोजगार उपलब्धता भाषणों से आगे नहीं बढ़ पायी है। ओपीएस के कारण पैन्शन में कटौती करने की संभावनाएं चर्चा में आ गयी हैं। इन मुद्दों पर खुली बहस की आवश्यकता है क्योंकि उपचुनाव में हार जीत से सरकार और विपक्ष के भविष्य पर कोई बड़ा अन्तर पढ़ने वाला नहीं है।

यदि मुख्य संसदीय सचिवों को बाहर का रास्ता देखना पड़ा तो भाजपा के नौ लोग भी बाहर जाएंगे

  • चुनाव आचार संहिता के चलते देहरा को मिला पुलिस जिला और लोक निर्माण विभाग का अधीक्षण अभियंता कार्यालय
  • कमलेश ठाकुर के चुनावी शपथ पत्र पर होशियार सिंह ने उठाये सवाल एसडीएम को दी शिकायत
शिमला/शैल। लोकसभा चुनाव से लेकर अब इन उपचुनाव तक विपक्ष और सत्ता पक्ष में सरकार के गिरने को लेकर जो दावों प्रतिदावों का खेल चल रहा है वह अब मुख्य संसदीय सचिवों और भाजपा के नौ विधायकों के संभावित निष्कासन तक पहुंच गया है। मुख्य संसदीय सचिवों का मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित है। यह मामला उच्च न्यायालय में इस आधार पर पहुंचा है कि संसद में हुये 91वें संविधान संशोधन में हर सरकार में केंद्र से लेकर राज्यों तक मंत्रियों की संख्या 15प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती। इस संशोधन के मुताबिक हिमाचल में मंत्रियों की संख्या बारह ही हो सकती है। लेकिन इस संशोधन के प्रभाव को कम करने के लिये राज्यों की कई सरकारों ने अपने-अपने एक्ट पास करके संसदीय सचिवों के पद सृजित कर रखे हैं जो व्यवहारिक तौर पर मंत्रियों के ही समक्ष प्रभावशाली हो गये हैं। हिमाचल में स्व. वीरभद्र सिंह के शासनकाल में मुख्य संसदीय सचिवों और संसदीय सचिवों की नियुक्तियां की गई थी। इन नियुक्तियों को सिटीजन प्रोटेक्शन फॉरम के अध्यक्ष देशबंधु सूद ने प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने इन नियुक्तियों को असंवैधानिक करार दिया और यह लोग हट गये। उसके बाद सरकार ने इस मामले की अपील सर्वाेच्च न्यायालय में दायर कर दी और साथ ही इस आश्य का नया कानून भी पारित कर दिया। प्रदेश के कानून को उच्च न्यायालय में चुनौती मिली हुई है जिस पर फैसला संभावित है। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में हिमाचल की अपील असम के मामले के साथ संबंद्ध हो गई और फैसला आ गया कि राज्य विधायिका इस तरह का कानून पारित करने के लिये सक्षम ही नहीं है। इस पृष्ठभूमि में यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित चल रहा है और कभी भी फैसला आ सकता है। भाजपा इस मामले को ऐसे प्रचारित कर रही है की मुख्य संसदीय सचिवों को संभावित फैसले में सदन से बाहर होना पड़ेगा। बाहर होने की स्थिति में इनके संस्थानों पर भी उपचुनाव की नौबत आ जायेगी। लेकिन यह सब उच्च न्यायालय के फैसले पर निर्भर करेगा। परन्तु इस संभावना का जवाब सरकार की ओर से इस तर्ज पर दिया जा रहा है कि यदि ऐसा हुआ तो भाजपा के नौ विधायकों के खिलाफ भी निष्कासन की कार्यवाही को अंजाम दे दिया जायेगा। स्मरणीय है कि राज्यसभा का चुनाव हार जाने के बाद ही कांग्रेस के बागियों को सदन से बाहर किया गया था। उसी के प्रतिफल के रूप में निर्दलीयों के स्थान पर अब उप चुनाव हो रहे हैं। उसी चुनाव के दौरान भाजपा विधायकों पर असंसदीय आचरण का आरोप लगा और इस मामले में कारवाई विधानसभा अध्यक्ष के पास लंबित है। ऐसा लगता है कि यदि मुख्य संसदीय सचिवों को सदन से बाहर जाना पड़ा तो भाजपा के लोगों के खिलाफ चल रहे मामले में भी उनको बाहर का रास्ता दिखाकर उनके स्थानों पर भी उपचुनाव की नौबत आ जायेगी। यह स्पष्ट संकेत दिया जा रहा है कि यदि संसदीय सचिवों को बाहर जाने की नौबत आयी तो भाजपा के नौ लोगों को भी बाहर कर दिया जायेगा। आज प्रदेश की राजनीति इस मुकाम पर पहुंच चुकी है।
देहरा में उपचुनाव हो रहा है और आदर्श आचार संहिता लागू है। आचार संहिता के चलते मंत्रिपरिषद द्वारा देहरा को पुलिस जिला बनाने का फैसला जाना और लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता का कार्यालय खोलने का फैसला लेना आचार संहिता की अहवेलना है लेकिन इन फैसलों पर भाजपा की ओर से कोई सार्वजनिक बयान नहीं आया है। केवल चुनाव आयोग को शिकायत भेजने की औपचारिकता निभाकर शांत होकर बैठ गये हैं यही नहीं देहरा से कांग्रेस ने मुख्यमंत्री की पत्नी कमलेश ठाकुर को चुनाव में उतारा है। चुनाव में कमलेश ठाकुर द्वारा दायर किये गये शपथ पत्र पर भाजपा प्रत्याशी होशियार सिंह ने कुछ एतराज उठाते हुए इस संबंध में सबंद्ध अधिकारी के पास शिकायत दर्ज करवाई है। लेकिन इस शिकायत के तथ्यों पर भाजपा द्वारा कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया जारी नहीं की गई है। देहरा में भाजपा को रैली की अनुमति देकर बाद में उसे रद्द कर दिया गया। भाजपा ने इसकी शिकायत चुनावआयोग को करके एसडीएम देहरा के तुरंत स्थानांतरण की मांग की थी। लेकिन शिकायत की औपचारिकता निभा कर चुप बैठ जाना एक अलग ही कहानी बयां करता है। इस परिदृश्य में मुख्य संसदीय सचिवों और भाजपा के नौ विधायकों के खिलाफ कारवाई की चर्चाएं केवल जनता का ध्यान आकर्षित करने की औपचारिकता से अधिक कुछ भी नहीं माना जा रहा है मुख्यमंत्री की पत्नी के प्रत्याशी होने के कारण देहरा का वातावरण ऊपर से जितना शान्त दिखाई दे रहा है अंदर से उतना ही विस्फोटक होने की कगार पर पहुंच रहा है

बीबीएन क्षेत्र के भू-जल में कैंसर कारक तत्वों का मिलना एक गंभीर मुद्दा

  • सरकार के निगरान तंत्र की कार्यशैली पर उठे सवाल
शिमला/शैल। बीबीएन औद्योगिक क्षेत्र के भू-जल में कैंसर कारक तत्व हैं। यह तथ्य आईआईटी मण्डी के एक शोध अध्ययन के माध्यम से सामने आया है। एक लंबे अरसे से इस क्षेत्र के भू-जल स्रोतों को लेकर शिकायतें आ रही थी कि यहां का पानी पीने योग्य नहीं है। कई स्रोतों को बंद भी कर दिया गया था। बीबीएन क्षेत्र प्रदेश का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है। फार्मा उद्योग का तो यह देश का सबसे बड़ा हब है। यहां पर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर के कामगार हजारों की संख्या में यहां काम करते हैं। इसके विस्तार के कारण इस क्षेत्र को पुलिस जिला भी बना दिया गया है। उद्योगों के सुचारू संचालन के लिये यहां पर उद्योग विभाग, स्वास्थ्य विभाग का ड्रग नियंत्रण यूनिट और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय यहां स्थापित है। लेकिन इतना सारा प्रशासनिक तन्त्र यहां तैनात होने के बावजूद भी यहां का भू-जल प्रदूषण के कारण कैंसर कारक हो जाये तो निश्चित रूप से इससे ज्यादा चिंता का विषय और नहीं हो सकता। यहां पर निर्मित दवाओं के सैंपल टेस्ट एक लंबे अरसे से लगातार फेल होते जा रहे हैं। इस फेल होने पर सरकार कारण बताओं नोटिस जारी करने से आगे नहीं बढ़ सकी है। किसी उद्योग के उत्पादन पर रोक नहीं लगा सकी है। पिछले दिनों यहां हुये अग्निकांड में उद्योगों द्वारा अपनाये जा रहे अग्नि सुरक्षा कुप्रबंधों पर गंभीर सवाल खड़े किये हैं। अब यहां के भू-जल में कैंसर कारक तत्वों के पाये जाने से प्रदूषण नियंत्रण की कार्य शैली पर गंभीर स्वाल खड़े कर दिये हैं। क्योंकि भू-जल में इन तत्वों का पाया जाना यह प्रमाणित करता है कि उद्योग अपने वेस्ट को सही से ट्रीट न करके उसे खुले में फेंक रहे हैं। उद्योगों से निकलने वाला रसायन जब खुले में विसर्जित किया जायेगा तो वह निश्चित रूप से यहां की जमीन के अन्दर ही जमा हो जाएगा और भू-जल को ही दूषित करेगा। जबकि भू-जल पीने के लिये सबसे स्वच्छ माना जाता है। जब भू-जल इस हद तक प्रदूषित मिलेगा तो निश्चित ही यहां पर प्रदूषण के मानकों की अनुपालन न होना प्रमाणित होता है। बल्कि यहां की ऐसी प्रभावित जमीन के हर उत्पादन की गुणवत्ता भी प्रश्नित हो जाएगी। दवाओं के सैंपल फेल होने पर आज तक दवा नियंत्रक विभाग के किसी भी संबंधित अधिकारी कर्मचारी के खिलाफ कभी कोई कारवाई नहीं की गई है। अग्निकांड, अग्नि सुरक्षा उपायों के मानकों की अवहेलना सामने ला दी है परन्तु इसके लिए संबंधित तंत्र में से किसी की भी जिम्मेदारी तय नहीं की गई है। अब भू-जल में कैंसर कारक तत्वों के पाये जाने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के यहां पर तैनात अधिकारियों/कर्मचारियों की कोई जवाब देही तय नहीं हो पायी है जबकि प्रदूषण नियंत्रक बोर्ड का वरिष्ठ अधिकारी एक लंबे अरसे से यहां पर तैनात है। सरकारी तंत्र की इसी असफलता का प्रतिफल है की प्रदेश में कैंसर के रोगियों की संख्या में पिछले करीब एक दशक से 800% की वृद्धि हुई है। 2013 में ऐसे मरीजों की संख्या प्रदेश में 2419 थी जो 2022 में बढ़कर 17212 हो गयी है। इससे आने वाले समय में उद्योग नीति पर यह सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो जायेगा कि ऐसी भयानक बीमारी की कीमत पर ऐसा औद्योगिक विस्तार प्रदेश हित में होगा या नहीं।

तीनों उपचुनावों में निर्दलीयों की उम्मीदवारी बहाल रखना भाजपा के लिये बना चुनौती

  • संभावित विरोध और विद्रोह को शांत रखना होगी बड़ी चुनौती
  • नड्डा और अनुराग पर भी आयेगी जिम्मेदारी
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश को केंद्रीय मंत्री परिषद में इस बार कोई स्थान नहीं मिला है जबकि प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की है। हिमाचल से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा इस समय गुजरात से राज्यसभा सांसद हैं और केंद्रीय मंत्री परिषद में स्वास्थ्य मंत्राी बनाये गये हैं। उनके मंत्री बनने से प्रदेश को प्रतिनिधित्व न मिलने का मुद्दा भले ही भाजपा में बड़ा सवाल नहीं बना है लेकिन सतारूढ़ कांग्रेस ने इस पर सवाल अवश्य खड़े किये हैं। प्रदेश की राजनीति में यह सवाल बराबर बना हुआ है कि अनुराग ठाकुर को इस बार मंत्री परिषद में स्थान क्यों नहीं मिल पाया। इसके संभावित कारणों पर दबी जुबान से यह आवश्यक सुनने को मिल रहा है कि जब भाजपा लोकसभा की चारों सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही है तो फिर विधानसभा के लिये हुये छः उपचुनावों में से चार पर कैसे हार गयी? जबकि जिन चार स्थानों पर कांग्रेस विधानसभा के लिये जीत गयी और उन्हीं स्थानों पर लोकसभा के लिये भाजपा जीती है। एक ही विधानसभा में एक ही समय में इस तरह का अलग मतदान कई सवाल खड़े कर रहा है। भाजपा की ओर से विधानसभा उपचुनाव हारने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। इन उपचुनावों में चार तो ऊना और हमीरपुर जिलों में ही है जो कि अनुराग ठाकुर का अपना लोकसभा चुनाव क्षेत्र है। विधानसभा के लिये हुये उपचुनावों की स्थिति राज्यसभा के चुनाव में कांग्रेस के बागियों द्वारा भाजपा के पक्ष में क्रॉस वोटिंग करने के कारण पैदा हुई थी। क्योंकि क्रॉस वोटिंग के बाद यह बागी भाजपा में शामिल हो गये थे। कांग्रेस ने भाजपा के इस आचरण की सुक्खू सरकार को गिराने के लिए ऑपरेशन लोटस की संज्ञा दी थी। पूरे चुनाव प्रचार में भाजपा पर धनबल से सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगा। इस पूरे प्रकरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस कथित लोटस ऑपरेशन की व्यूह रचना में भाजपा हाईकमान की पूरी सहमति रही है। क्योंकि भाजपा हाईकमान ने इन बागियों और तीनों निर्दलीयों को विधानसभा उपचुनाव के लिये अपना उम्मीदवार भी घोषित कर दिया था। इन लोगों को उम्मीदवार बनाना भाजपा को अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए आवश्यक था। स्वभाविक है कि इस सबके लिये प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी अवश्य विश्वास में लिया गया होगा। अनुराग ठाकुर उस समय केंद्र में मंत्री थे। इस नाते यह सब कुछ उनके संज्ञान में भी अवश्य रहा होगा। फिर अनुराग या प्रदेश के किसी भी अन्य नेता ने इस दल बदल पर कभी कोई सवाल भी नहीं उठाया है। लेकिन अन्त में हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र में ही चार में से तीन स्थान हार जाना अपने में कई सवाल तो पैदा करता ही है। क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह अपनी चुनावी सभाओं में सुक्खू सरकार के भविष्य पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगा चुके हैं। इस परिदृश्य में आने वाले दिनों में प्रदेश भाजपा के समीकरणों में भी कई बदलाव देखने को मिले तो इनमें आश्चर्य नहीं होगा। अब प्रदेश के तीनों निर्दलीयों के क्षेत्रों में भी उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है। इन निर्दलीयों के भाजपा में शामिल होते ही हाईकमान ने उन्हें उपचुनाव के लिये उम्मीदवार भी घोषित कर दिया था। लेकिन पिछले कुछ समय से इन क्षेत्रों में भी भाजपा के पुराने लोगों में निर्दलीयों को प्रत्याशी बनाये जाने पर रोष पनपने के समाचार लगातार सामने आ रहे हैं। यह भी फैल रहा है की संभावित विद्रोह को देखते हुये शायद इन लोगों को प्रत्याशी बनाने पर पुनः विचार हो। क्योंकि इस तरह के समाचारों का प्रदेश भाजपा नेतृत्व की ओर से कोई खण्डन भी नहीं आया है। ऐसे में इन तीन उपचुनाव में इन निर्दलीयों की उम्मीदवारी कायम रखना और उनके खिलाफ पार्टी में कोई विरोध या विद्रोह न उभरने देना प्रदेश नेतृत्व की कसौटी बन जायेगा। संयोगवश इन तीन उपचुनावों में से दो हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से ही है। अनुराग ठाकुर यहां के सांसद है तो केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा भी इसी क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। इस वस्तुस्थिति में यह उपचुनाव अनुराग और नड्डा के लिये भी चुनौती होंगे।
तीनों उपचुनावों में निर्दलीयों की उम्मीदवारी बहाल रखना भाजपा के लिये बना चुनौती
संभावित विरोध और विद्रोह को शांत रखना होगी बड़ी चुनौती
नड्डा और अनुराग पर भी आयेगी जिम्मेदारी
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश को केंद्रीय मंत्री परिषद में इस बार कोई स्थान नहीं मिला है जबकि प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की है। हिमाचल से ताल्लुक रखने वाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा इस समय गुजरात से राज्यसभा सांसद हैं और केंद्रीय मंत्री परिषद में स्वास्थ्य मंत्राी बनाये गये हैं। उनके मंत्री बनने से प्रदेश को प्रतिनिधित्व न मिलने का मुद्दा भले ही भाजपा में बड़ा सवाल नहीं बना है लेकिन सतारूढ़ कांग्रेस ने इस पर सवाल अवश्य खड़े किये हैं। प्रदेश की राजनीति में यह सवाल बराबर बना हुआ है कि अनुराग ठाकुर को इस बार मंत्री परिषद में स्थान क्यों नहीं मिल पाया। इसके संभावित कारणों पर दबी जुबान से यह आवश्यक सुनने को मिल रहा है कि जब भाजपा लोकसभा की चारों सीटों पर जीत दर्ज करने में सफल रही है तो फिर विधानसभा के लिये हुये छः उपचुनावों में से चार पर कैसे हार गयी? जबकि जिन चार स्थानों पर कांग्रेस विधानसभा के लिये जीत गयी और उन्हीं स्थानों पर लोकसभा के लिये भाजपा जीती है। एक ही विधानसभा में एक ही समय में इस तरह का अलग मतदान कई सवाल खड़े कर रहा है। भाजपा की ओर से विधानसभा उपचुनाव हारने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। इन उपचुनावों में चार तो ऊना और हमीरपुर जिलों में ही है जो कि अनुराग ठाकुर का अपना लोकसभा चुनाव क्षेत्र है। विधानसभा के लिये हुये उपचुनावों की स्थिति राज्यसभा के चुनाव में कांग्रेस के बागियों द्वारा भाजपा के पक्ष में क्रॉस वोटिंग करने के कारण पैदा हुई थी। क्योंकि क्रॉस वोटिंग के बाद यह बागी भाजपा में शामिल हो गये थे। कांग्रेस ने भाजपा के इस आचरण की सुक्खू सरकार को गिराने के लिए ऑपरेशन लोटस की संज्ञा दी थी। पूरे चुनाव प्रचार में भाजपा पर धनबल से सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगा। इस पूरे प्रकरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस कथित लोटस ऑपरेशन की व्यूह रचना में भाजपा हाईकमान की पूरी सहमति रही है। क्योंकि भाजपा हाईकमान ने इन बागियों और तीनों निर्दलीयों को विधानसभा उपचुनाव के लिये अपना उम्मीदवार भी घोषित कर दिया था। इन लोगों को उम्मीदवार बनाना भाजपा को अपनी विश्वसनीयता बनाये रखने के लिए आवश्यक था। स्वभाविक है कि इस सबके लिये प्रदेश भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी अवश्य विश्वास में लिया गया होगा। अनुराग ठाकुर उस समय केंद्र में मंत्री थे। इस नाते यह सब कुछ उनके संज्ञान में भी अवश्य रहा होगा। फिर अनुराग या प्रदेश के किसी भी अन्य नेता ने इस दल बदल पर कभी कोई सवाल भी नहीं उठाया है। लेकिन अन्त में हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र में ही चार में से तीन स्थान हार जाना अपने में कई सवाल तो पैदा करता ही है। क्योंकि चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह अपनी चुनावी सभाओं में सुक्खू सरकार के भविष्य पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगा चुके हैं। इस परिदृश्य में आने वाले दिनों में प्रदेश भाजपा के समीकरणों में भी कई बदलाव देखने को मिले तो इनमें आश्चर्य नहीं होगा। अब प्रदेश के तीनों निर्दलीयों के क्षेत्रों में भी उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है। इन निर्दलीयों के भाजपा में शामिल होते ही हाईकमान ने उन्हें उपचुनाव के लिये उम्मीदवार भी घोषित कर दिया था। लेकिन पिछले कुछ समय से इन क्षेत्रों में भी भाजपा के पुराने लोगों में निर्दलीयों को प्रत्याशी बनाये जाने पर रोष पनपने के समाचार लगातार सामने आ रहे हैं। यह भी फैल रहा है की संभावित विद्रोह को देखते हुये शायद इन लोगों को प्रत्याशी बनाने पर पुनः विचार हो। क्योंकि इस तरह के समाचारों का प्रदेश भाजपा नेतृत्व की ओर से कोई खण्डन भी नहीं आया है। ऐसे में इन तीन उपचुनाव में इन निर्दलीयों की उम्मीदवारी कायम रखना और उनके खिलाफ पार्टी में कोई विरोध या विद्रोह न उभरने देना प्रदेश नेतृत्व की कसौटी बन जायेगा। संयोगवश इन तीन उपचुनावों में से दो हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से ही है। अनुराग ठाकुर यहां के सांसद है तो केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा भी इसी क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। इस वस्तुस्थिति में यह उपचुनाव अनुराग और नड्डा के लिये भी चुनौती होंगे।
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