Monday, 02 March 2026
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प्रदेश में बेरोजगारों का आंकड़ा हुआ चौदह लाख से पार

  • करीब बारह लाख युवा इस बार मतदान में भाग लेंगे
  • सरकार के विभिन्न विभागों में 70,000 पद खाली
  • लेकिन 2023 में 4751 हीविज्ञापित हुये और भरे केवल 257
  • निजी क्षेत्र में 11681 नौकरियां घोषित हुई और भरी केवल 6933
शिमला/शैल।  हिमाचल में इस बार करीब बारह लाख युवा जो तीस वर्ष के आयु वर्ग में आते है। चुनाव में मतदान करने जा रहे है। बारह लाख का यह आंकड़ा चुनाव परिणामों को कोई भी दिशा दशा दे सकता है क्योंकि प्रदेश में बेरोजगारों का आंकड़ा भी 1 जनवरी 2023 को चौदह लाख के पार हो चुका है। यह जानकारी विधानसभा में विधायक केवल सिंह पठानिया के एक प्रश्न के उत्तर में आयी है। यह भी जानकारी दी गई है कि वर्ष 2021-22 और 22-23 में केवल 39779 को ही रोजगार मिल पाया है। वर्ष 2023 में सरकारी क्षेत्र में 4751 नौकरियां विज्ञापित की गयी जिसमें से केवल 257 को ही दिसम्बर 2023 तक सरकारी नौकरी मिल पायी है इसमें किन्नौर और लाहौल स्पीति जिलों में एक भी युवा को सरकारी नौकरी नहीं मिल पायी है। इसी अवधि में प्राइवेट सेक्टर में 11681 नौकरियां घोषित हुई लेकिन केवल 6933 को ही नौकरी मिल पायी है। वर्ष 2023 में 1,09083 प्रदेश के विभिन्न रोजगार कार्यालयों में पंजीकरण करवाया लेकिन नौकरी केवल 257 को ही मिल पायी है। वर्ष 2024 के बजट सत्र में रोजगार को लेकर जितने भी प्रश्न पूछे गये उनमें हरेक में यही जवाब दिया गया है कि अभी सूचना एकत्रित की जा रही है। रोजगार को लेकर यह आंकड़े विधानसभा में दी गई जानकारी और आर्थिक सर्वेक्षणों में दर्ज आंकड़ों पर आधारित है। प्रदेश में बेरोजगारी की दर में 4 ़4प्रतिशत की दर से प्रति वर्ष बढ़ोतरी हो रही है। हिमाचल में सरकार ही रोजगार का सबसे बड़ा साधन है यदि एक लाख के पंजीकरण पर केवल 257 को नहीं सरकार नौकरी दे पाये तो चौदह लाख को नौकरी मिलने में कितना समय लगेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। आंकड़ों के इस आईने को सामने रखकर यह सवाल उठना स्वभाविक है कि पांॅच लाख लोगों को नौकरी देने की गारंटी पूरी करने में कितने दशक लगेंगे। इस सरकार ने जब सत्ता संभाली थी तब प्रदेश के विभिन्न सरकारी विभागों में खाली पदों का आंकड़ा लेने के लिये मंत्रियों की एक कमेटी बनाई थी। इस कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार सरकार में कर्मचारी के 70000 पद खाली चल रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि 70000 पद खाली होते हुये 4751 ही क्यों विज्ञापित किये गये और फिर केवल 257 ही गये। इसमें सरकार की नियत और नीति दोनों पर सवाल उठ जाते हैं। सरकार विकास के नाम पर करीब हर माह कर्ज ले रही है यदि यह कर्ज लेकर किया गया विकास बेरोजगार युवाओं को न तो सरकार में और न ही प्राइवेट सेक्टर में रोजगार दे पाये तो उसे क्या लाभ । सरकार बेरोजगार युवाओं को एक हजार प्रति माह और विकलांगों को1500 रुपये बेरोजगारी भता दे रही है। लेकिन यह भता केवल 2 वर्ष के लिये दिया जा रहा है। लेकिन क्या 2 वर्ष तक बेरोजगारी भत्ता लेने वालों को इसी अवधि में रोजगार भी मिल पा रहा है। इसी तरह कौशल विकास भत्ते की स्थिति है। सरकार भताा दे रही है लेकिन उसके परिणामों की कोई जानकारी है। इस परिदृश्य में यह सवाल पूछा जाना आवश्यक हो जाता है कि जब सरकार में इतने पद खाली है और उनके भरने की गति 257 1 वर्ष में है तो क्या सरकार अपरोक्ष में सरकारी सेवा को आउटसोर्स में बदलने जा रही है। क्योंकि सरकार ने जिस तरह से अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड को भंग किया है और उसके स्थान पर पहले लोक सेवा आयोग को ही यह जिम्मेदारी सौंपने का फैसला लिया और बाद में अलग से एक और अदारा बनाने का निर्णय लिया जिस काम करने की स्थिति तक पहुंचने में अभी समय लगेगा। हिमाचल में बेरोजगारी की एक बड़ी समस्या बनती जा रही है और सरकारों की सोच की गति से ऐसा नहीं लगता है कि उसके प्रति गंभीर भी है। ऐसे में यह बारह लाख युवा मतदान इस चुनाव में बेरोजगारी को कितना बड़ा मुद्दा बना पाते हैं क्या देखना रोचक होगा।
 

यह आवासीय आबंटन बना चर्चा का विषय

शिमला/शैल। सरकार के हर वर्ग के कर्मचारी/अधिकारी अपने सेवा स्थान पर सरकारी आवास पाने के पात्र हैं। यह सुविधा प्राप्त करने की शर्त है कि संबंधित अधिकारी कर्मचारी के पास सेवा स्थान पर अपने नाम या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम पर कोई आवास नहीं होना चाहिए। आवास आवंटन के समय इस आश्य की जानकारी एक स्व हस्ताक्षरित प्रपत्र पर ली जाती है। यदि यह जानकारी किसी भी समय गलत पायी जाये तो संबंधित अधिकारी/कर्मचारी के खिलाफ नियमानुसार कारवाई की जाती है। लेकिन क्या ऐसी कारवाई करने के लिये मामला संज्ञान में आने के बाद छः माह से भी अधिक का समय लग जाना चाहिये। जबकि मामला मुख्य सचिव के भी संज्ञान में हो और संबंधित विभागों के प्रभारी मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री हो। यह स्थिति प्रशासन को लेकर ऐसे सवाल खड़े कर देती है जिसमें प्रशासन की नीयत और नीति दोनों कटघरे में आ जाते हैं।
स्मरणीय है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य अभियंता पी.सी. गुप्ता को 2022 में आवास आबंटित हुआ था और उन्होंने 3-3-2022 को इसका कब्जा भी ले लिया था। इससे पहले यही आवाज उनकी पत्नी डॉ. रचना गुप्ता के नाम पर आबंटित था। डॉ. गुप्ता लोक सेवा आयोग में सदस्य थीं जिन्हें आयोग का अध्यक्ष बनाने की अधिसूचना भी जारी हो गयी थी। लेकिन डॉ. गुप्ता ने अपने निजी कारणों से अध्यक्ष पद सरकार नहीं किया और सदस्य के रूप में ही आयोग से सेवानिवृत हो गयी। इस सेवानिवृत्ति के कारण उन्हें सरकारी आवास छोड़ना था। परंतु उनके पति के नाम पर कोई सरकारी आवास नहीं था और सरकार ने उन्हें वही मकान आबंटित कर दिया जो उनकी पत्नी के नाम था। नियम ऐसे आबंटन की अनुमति देते हैं। यक आबंटन लेते समय पी.सी. गुप्ता को लिखित में विभाग को यह सूचित करना पड़ा की उनके अपने नाम या परिवार के किसी सदस्य के नाम शिमला में अपना कोई भवन नहीं है। लेकिन किसी देवाशीष ने उनके खिलाफ यह शिकायत कर दी की पी.सी. गुप्ता के नाम पर तो शिमला में भवन है।
यह शिकायत आने पर पी.सी. गुप्ता से फिर उनके नाम भवन होने की जानकारी मांगी गयी। इस पर पी.सी. गुप्ता ने जानकारी देते हुये स्वीकार किया कि उनके नाम पंथाघाटी शिमला में मकान है जो 1-9-21 से उन्होंने 61040 रुपये मासिक किराया पर दे रखा है। गुप्ता की इस सवीकारोक्ति के बाद विभाग को उनके खिलाफ तुरंत प्रभाव से नियमानुसार कारवाई करनी थी। लेकिन अक्तूबर 2023 से अब तक यह कारवाई पत्राचार के स्तर से आगे नहीं बढ़ी है। आम कर्मचारियों और अधिकारियों में इन दिनों यह चर्चा का विषय बना हुआ है। इससे सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि इसमें ‘‘समर्थ को नहीं दोस्त गोसाईं’’ की कहावत ही चरितार्थ होगी।

मुख्यमंत्री और बागी आये आमने सामने

  • नादौन में विलेज कामन लैंड की खरीद बेच पर बड़े धमाके की संभावना
  • क्या नादौन में लैंड सीलिंग एक्ट की अनदेखी हो रही है?
शिमला/शैल। कांग्रेस के बागीयों द्वारा राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग करके पार्टी के उम्मीदवार को हराने से प्रदेश की राजनीति एक बहुत ही नायक मोड पर पहुंच गई है। क्योंकि इन बागीयों को कांग्रेस ने विधानसभा से निष्कासित करवाकर इनके किसी भी दूसरे दल में जाने का रास्ता आसान कर दिया। परिणामस्वरुप यह लोग निष्कासन के बाद भाजपा में शामिल भी हो गए और उपचुनाव के लिए भाजपा के उम्मीदवार की नामित हो गए। उनके उम्मीदवार नामित होने से भाजपा में जो रोष के स्वर उभरे थे वह भी शांत होते जा रहे हैं। अब केवल भीतरघात की अटकलें ही शेष रह गई है और ऐसी आटकलों से कांग्रेस भी अछूती नहीं है । क्योंकि कांग्रेस भी भाजपा में सेंधमारी के प्रयासों में लग गई है और यह प्रयास भी सार्वजनिक हो गये जबकि इनका कोई परिणाम सामने नहीं आ पाया है। कांग्रेस अभी तक अपने उम्मीदवारों का चयन नहीं कर पायी है ऐसे में उम्मीदवारों के घोषित हुए बिना ही मुख्यमंत्री को चुनाव प्रचार की शुरुआत करनी पड़ी है। यह शुरुआत कुटलैहड़ विधानसभा क्षेत्र से की गई क्योंकि यहां भी उपचुनाव होना है। यहां से देवेन्द्र भूटो बागी होकर भाजपा के उम्मीदवार नामित हो चुके हैं ।
मुख्यमंत्री ने यहां से चुनावी शंखनाद फुंकते हुए देवेंद्र भूटो को कुटो का आह्वान करके साथ ही बागीयों के पन्द्रह पन्द्रह करोड़ में का आरोप लगा दिया । "भूटो को कुटो " का असर मतदाताओं पर कोई अच्छा नहीं पड़ा है क्योंकि यह परिवार पिछले बीस वर्षों से क्षेत्र के सार्वजनिक जीवन में है । परिवार से तीन लोग पंचायत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं । देवेंद्र भूटो प्रदेश के सबसे कम आयु के बीडीसी अध्यक्ष रह चुके हैं और इसी पृष्ठभूमि के आधार पर कांग्रेस को बीस वर्ष बाद कुटलैहड़ की विधानसभा जीत कर दे पाये थे । इस पृष्ठभूमि के साथ इनके ऊपर लगाये जा रहे हैं आरोपों का क्षेत्र की जनता पर क्या असर पड़ेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । लेकिन कुटलैहड़ के मंच से बागीयों पर पन्द्रह पन्द्रह करोड़ में बिकने का आरोप लगाकर मुख्यमंत्री ने इन लोगों को आक्रामक होने का जो न्योता दिया है उसके परिणाम दूरगामी होंगे। क्योंकि संयोगवश मुख्यमंत्री का अपना विधानसभा क्षेत्र इन चारों से भूटो , लखनपाल, आशीष शर्मा और राजेंद्र राणा के चुनाव क्षेत्र से घिरा हुआ है। इस कारण नादौन की एक एक गतिविधि पर सब की नजर लगी हुई है।
इन्हीं नजरों का परिणाम है कि बागीयों ने मुख्यमंत्री के आरोप के जवाब में मानहानि का नोटिस देते हुए स्टोन क्रेशर और एडीबी के प्रोजेक्ट की ओर इशारा किया है । नादौन में एडीबी से वित्त पोषित करीब 1200 करोड़ का पर्यटन एवं अन्य गतिविधियों के परिसर का निर्माण किया जा रहा है । एक ओर इसके लिए एडीबी से कर्ज लिया जा रहा है दूसरी ओर इसके लिए निवेशक तलाशने के लिए चंडीगढ़ में इन्वेस्टर मीट आयोजित की जा रही है जिस पर सुधीर शर्मा ने एतराज उठाया है। चर्चा है कि जहां पर यह परिसर प्रस्तावित है उसके आसपास विलेज कामन लैंड है जिसे कुछ प्रभावशाली लोगों ने खरीद रखा है और यह खरीद बेच ही अपने में एक बड़ा मुद्दा है। स्मरणीय है कि नादौन विधानसभा क्षेत्र किसी समय राजा नादौन की रियासत था। यह रियासत क्षेत्र के 329 गांवों में फैली हुई थी और 1897 में राजा नादौन को जालंधर कमिश्नर की ओर से जागीर के रूप में मिली थी। लेकिन राजा की मलकियत बनने के बाद साथ ही इस पर स्थानीय लोगों के बर्तनदारी के अधिकार भी सुरक्षित रखे गए थे । इन अधिकारों के कारण ही यह राजस्व रिकॉर्ड में विलेज कामन लैंड बनी। जब हिमाचल में लैंड सीलिंग अधिनियम लागू हुआ तब यह जमीने सरप्लस घोषित होकर सरकार में विहित कर दी गयी । राजा नादौन को केवल 316 कनाल का एक यूनिट ही मिला। इस तरह इस जागीर की करीब 1,59,486 कनाल सीलिंग में सरकार के पास आ गयी। 22-11_75 को इस संबंध में अदालत का अंतिम फैसला भी आ गया। इस पर लोगों के बर्तनदारी हक भी सुरक्षित रहे लेकिन बर्तनदार इन जमीनों के मालिक नहीं बने ।
लेकिन लैंड सीलिंग अधिनियम लागू होने और 22-11-75 को अदालत का फैसला आने के बाद भी आज तक राजा नादौन के नाम से ऐसी जमीनों की खरीद बेच चालू है। कुछ लोगों ने तो लैंड सीलिंग सीमा से अधिक खरीददारी कर रखी है । अब जब हिमाचल सरकार ने लैंड सीलिंग एक्ट में संशोधन किया तब यह नादौन का मामला कुछ लोगों के संज्ञान में आया है। इस पर यह सवाल उठने लगे हैं कि जब प्रदेश में कोई व्यक्ति 316 कनाल या 161 बीघा से अधिक का मालिक ही नहीं हो सकता तो वह इस सीमा से अधिक जमीन खरीद कैसे हो गया। राजस्व अधिकारी ऐसे मामलों में क्यों खामोश बैठे हुए थे । फिर जब यह जमीन विलेज कामन लैंड की श्रेणी में आती थी तब इनकी खरीद बेच कैसे हो गयी। राजनीतिक नेतृत्व को इसका पता क्यों नहीं चला। क्या यह सब प्रशासन के सहयोग से हो रहा था। सूत्रों के मुताबिक यह कांग्रेस के बागी इस मुद्दे पर काम कर रहे हैं और शीघ्र कोई बड़ा धमाका करने वाले हैं ।

प्रतिभा-विक्रमादित्य सिंह को लेकर आये जयराम के ब्यान ने बदले राजनीतिक समीकरण

  • जयराम के ब्यान से भाजपा की मुश्किलें बढ़ेगी
  • सरकार गिराने के दावों पर भी आयेगा प्रश्न चिन्ह
  • इस ब्यान से मण्डी में कांग्रेस की स्थिति होगी मजबूत
शिमला/शैल। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री ठाकुर जयराम ने मण्डी में एक पत्रकारवार्ता में खुलासा किया है कि प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह ने कांग्रेस के बागीयों को उकसाया और बाद में खुद पलट गये। जयराम के अनुसार इन लोगों ने पहले तो मुख्यमंत्री और सरकार को ब्यान देकर कमजोर किया और फिर पलट गये। जयराम के इस ब्यान को लेकर वाकायदा प्रैस नोट जारी हुआ है। जयराम के इस ब्यान से प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में नई अटकलों का दौर शुरू हो गया है। स्मरणीय है कि कांग्रेस के बागीयों ने अपने रोष को 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करके मूर्त रूप दे दिया और कांग्रेस यह चुनाव हार गयी। इस हार के बाद बागी सदन से निष्कासित भी हो गये और उनके क्षेत्रों में उपचुनाव भी घोषित हो गया। यह लोग भाजपा में शामिल हो गयेे और पार्टी ने इन्हें उपचुनाव के लिये अपना उम्मीदवार भी नामित कर दिया। 27 फरवरी के बाद करीब एक माह तक यह लोग हिमाचल से बाहर रहे। इस बाहर रहने का सारा प्रबन्ध करने का आरोप भाजपा पर लगा है। धन बल से सरकार गिराने का आरोप भाजपा पर लग रहा है। कांग्रेस के दो विधायकों ने इस आश्य की शिकायत भी बालूगंज पुलिस थाना में करवा रखी है। जिसकी जांच चल रही है। प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता के दौर के लिये भाजपा को कोसा जा रहा है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री से लेकर नीचे तक हर नेता आरोप लगा रहा है कि जयराम धन बल के सहारे मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में है। कांग्रेस के इन आरोपों का जयराम यह कहकर जवाब दे रहे हैं कि मुख्यमंत्री अपने विधायकों को संभाल कर नहीं रख पाये और दूसरों को दोष दे रहे हैं। इसी के साथ जयराम यह दावा करना भी नहीं भूल रहे हैं कि चुनाव के बाद सुक्खू सरकार गिर जायेगी। सरकार अल्पमत में आ गयी है यह कहना भी नहीं भूल रहे हैं। इस परिदृश्य में जयराम का प्रतिभा-विक्रमादित्य को लेकर आया ब्यान राजनीतिक पंडितों के लियेे एक रोचक विषय बन गया है। क्योंकि इस समय सदन में कांग्रेस की संख्या 34 रह गयी है जबकि भाजपा की 25 ही है। यदि निर्दलीयों के क्षेत्र में भी उपचुनाव हो जाये और भाजपा सभी नौ स्थानों पर जीत जाये तो भाजपा की संख्या कांग्रेस के बराबर आती है और तब सदन में सरकार के अल्पमत में आने से गिरने की संभावना बनती है। ऐसे में जयराम का इस तरह का ब्यान इस समय आना अपने में महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रदेश में जो कुछ घटा है वह भाजपा प्रायोजित है इसमें किसी को संदेह नहीं है। यह भी स्पष्ट है कि प्रदेश सरकार को गिराना भाजपा की आवश्यकता बन गया है। इसके लिये कांग्रेस में और तोड़फोड़ करना पहला कदम होगा। आज केन्द्र विपक्ष की सरकारें गिराने के लिये केन्द्रीय एजैन्सियों के दुरुपयोग के आरोप झेल रहा है। लेकिन जयराम के ब्यान के बाद क्या कांग्रेस और नहीं संभल जायेगी। क्योंकि जयराम का ब्यान उस समय आया है जब विक्रमादित्य सिंह को मण्डी से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने के संकेत आ रहे हैं। विक्रमादित्य सिंह निश्चित रूप से भाजपा की कंगना रनौत से सौ प्रतिश्त बेहतर प्रत्याशी है। फिर जब प्रतिभा सिंह जयराम की सरकार के समय मण्डी का उपचुनाव जीत गयी थी तो अब कांग्रेस की सरकार में विक्रमादित्य सिंह की जीत की संभावनाएं ज्यादा प्रबल हो जाती हैं। इस क्षेत्र की हार जीत का सीधा प्रभाव जयराम के राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ेगा यह स्पष्ट है। इस राजनीतिक परिदृश्य में जयराम के इस ब्यान को शीघ्रता में दिया गया ब्यान माना जा रहा है। क्योंकि इस ब्यान के साथ जयराम का सरकार के गिरने का दावा कमजोर पड़ जाता है। वर्तमान परिदृश्य में इस ब्यान को भ्रामकता पैदा करने का असफल प्रयास माना जा रहा है। क्योंकि प्रतिभा और विक्रमादित्य के सोनिया गांधी को मिलने के बाद यह माना जा रहा है कि प्रदेश पर कांग्रेस हाईकमान नजर रख रही है।

प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे परिवारों का आंकड़ा हुआ 2,66,304

  • चुनावों की पूर्व संध्या पर बढ़ाये बिजली पानी और कूड़े के रेट
  • बिजली दरें बढ़ने के बाद भी बिजली बोर्ड की कठिनाई बढ़ेंगी

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस अभी तक लोकसभा और विधानसभा के उपचुनावों के लिये अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं कर पायी है। कांग्रेस और विधायकी छोड़कर जो बागी भाजपा में शामिल हुये हैं उनका सरकार के खिलाफ बड़ा आरोप रहा है कि यह सरकार विधानसभा चुनावों के दौरान जनता को दी गारंटीयां पूरी करने की ओर कोई कदम नहीं उठा पायी है। युवाओं को जो नौकरियां देने का वायदा किया था उस वायदे को पूरा करने के बजाये उस बोर्ड को ही भंग कर दिया जिसके माध्यम से नौकरियां दी जाती थी। आज यह सरकार 1,36,000 कर्मचारीयों को पुरानी पैन्शन योजना के तहत लाने का श्रेय ले रही है लेकिन इसमें अभी तक केवल 3899 कर्मचारियों के मामले ए.जी. ऑफिस को भेजे गये हैं। यह जानकारी विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी गयी है। यह सरकार एक वर्ष में कितने लोगों को सरकार और इसके उपक्रमों में नौकरियां दे पायी हैं? इस आश्य के हर सवाल के जवाब में कहा गया की सूचनाएं एकत्रित की जा रही है। अभी चुनावों से पहले महिलाओं को 1500 रूपये प्रति माह देने की अधिसूचना जारी की गई थी। इस अधिसूचना के साथ वह फॉर्म भी संलग्न है जो आवेदक को भर कर देना है। लेकिन इस फॉर्म में आवेदन के लिये जो राइडर दर्ज है उनके अनुसार यह लाभ पाने वाले व्यवहारिक रूप से बहुत कम रह जायेंगे। जबकि प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या 2020-21 में 2,58,852 के आंकड़े से बढ़कर 2023-24 में 2,66,304 परिवार हो गयी है। यह आंकड़ा भी विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में आया है। इसका सीधा सा अर्थ है कि इस सरकार के कार्यकाल में गरीबी बढ़ी है।
इस सरकार ने सत्ता संभालने के बाद प्रदेश की कठिन वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुये डीजल पर वैट बढ़ाया बिजली पानी के रेट बढ़ाये। कूड़ा शुल्क की दरें बढ़ाई। अब फिर इन दरों में दस प्रतिश्त की दर से वृद्धि कर दी गई है। कांग्रेस ने चुनावों में 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने की घोषणा की थी क्योंकि पिछली सरकार 125 युनिट बिजली मुफ्त दे रही थी इसलिए उससे बड़ी घोषणा करनी थी। लेकिन सत्ता संभालने के बाद यह कहा गया कि पहले एक हजार मेगावाट का नया उत्पादन पैदा करेंगे और फिर तीन सौ यूनिट बिजली मुफ्त देंगे। इस आश्य का भी बजट सत्र में एक प्रश्न आया था जिसके उत्तर में कहा गया है कि अभी तक कोई भी नया समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित नहीं हुआ है। अब विद्युत नियामक आयोग ने चुनावों की पूर्व संध्या पर बिजली की नयी दरें घोषित कर दी है। यह नयी दरें उपभोक्ता से वसूलने की बजाये इसका बोझ सरकार उठाकर इसकी क्षतिपूर्ति बिजली बोर्ड को करने का फैसला लिया गया है। इसी के साथ बिजली बोर्ड सरकार को मिल रही 12% मुफ्त बिजली सरकार से 2.57 पैसे प्रति यूनिट खरीदता था वह सुविधा बोर्ड से वापस ले ली गयी है जिसके कारण बोर्ड को खुले बाजार से महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ेगी। इस समय बोर्ड की आय और व्यय में करीब डेढ़ सौ करोड़ का अन्तर है। सरकार के फैसले से बोर्ड का वित्तीय प्रबंधन और बिगड़ेगा क्योंकि सरकार अभी 125 यूनिट मुफ्त बिजली की क्षतिपूर्ति ही बोर्ड को नहीं कर पायी है। नये बोझ से यह क्षतिपूर्ति 2000 करोड़ वार्षिक से भी बढ़ जायेगी। इस समय बोर्ड पर 1600 करोड़ से अधिक की देनदारी खड़ी है। इस तरह सरकार के ऐसे फैसलों से न तो संस्थाओं का भला हो पा रहा है न ही आम जनता का।
इस समय चुनावों की पूर्वसंध्या पर बिजली पानी और कूड़े के शुल्क बढ़ाना जानबूझकर आम आदमी पर बोझ डालने जैसा हो जायेगा। क्योंकि जिस अनुपात में सरकार आवश्यक सेवाओं और वस्तुओं के दाम बढ़ा रही है उसी अनुपात में आम आदमी की क्रय शक्ति नहीं बढ़ रही है। जब सरकार की योजनाओं का लाभ प्रतिफल गरीबी रेखा से नीचे का आकड़ा बढ़ने के रूप में सामने आये तो इन योजनाओं पर स्वतः ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है।

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