शिमला/शैल। सरकार के हर वर्ग के कर्मचारी/अधिकारी अपने सेवा स्थान पर सरकारी आवास पाने के पात्र हैं। यह सुविधा प्राप्त करने की शर्त है कि संबंधित अधिकारी कर्मचारी के पास सेवा स्थान पर अपने नाम या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम पर कोई आवास नहीं होना चाहिए। आवास आवंटन के समय इस आश्य की जानकारी एक स्व हस्ताक्षरित प्रपत्र पर ली जाती है। यदि यह जानकारी किसी भी समय गलत पायी जाये तो संबंधित अधिकारी/कर्मचारी के खिलाफ नियमानुसार कारवाई की जाती है। लेकिन क्या ऐसी कारवाई करने के लिये मामला संज्ञान में आने के बाद छः माह से भी अधिक का समय लग जाना चाहिये। जबकि मामला मुख्य सचिव के भी संज्ञान में हो और संबंधित विभागों के प्रभारी मंत्री स्वयं मुख्यमंत्री हो। यह स्थिति प्रशासन को लेकर ऐसे सवाल खड़े कर देती है जिसमें प्रशासन की नीयत और नीति दोनों कटघरे में आ जाते हैं।
स्मरणीय है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य अभियंता पी.सी. गुप्ता को 2022 में आवास आबंटित हुआ था और उन्होंने 3-3-2022 को इसका कब्जा भी ले लिया था। इससे पहले यही आवाज उनकी पत्नी डॉ. रचना गुप्ता के नाम पर आबंटित था। डॉ. गुप्ता लोक सेवा आयोग में सदस्य थीं जिन्हें आयोग का अध्यक्ष बनाने की अधिसूचना भी जारी हो गयी थी। लेकिन डॉ. गुप्ता ने अपने निजी कारणों से अध्यक्ष पद सरकार नहीं किया और सदस्य के रूप में ही आयोग से सेवानिवृत हो गयी। इस सेवानिवृत्ति के कारण उन्हें सरकारी आवास छोड़ना था। परंतु उनके पति के नाम पर कोई सरकारी आवास नहीं था और सरकार ने उन्हें वही मकान आबंटित कर दिया जो उनकी पत्नी के नाम था। नियम ऐसे आबंटन की अनुमति देते हैं। यक आबंटन लेते समय पी.सी. गुप्ता को लिखित में विभाग को यह सूचित करना पड़ा की उनके अपने नाम या परिवार के किसी सदस्य के नाम शिमला में अपना कोई भवन नहीं है। लेकिन किसी देवाशीष ने उनके खिलाफ यह शिकायत कर दी की पी.सी. गुप्ता के नाम पर तो शिमला में भवन है।
यह शिकायत आने पर पी.सी. गुप्ता से फिर उनके नाम भवन होने की जानकारी मांगी गयी। इस पर पी.सी. गुप्ता ने जानकारी देते हुये स्वीकार किया कि उनके नाम पंथाघाटी शिमला में मकान है जो 1-9-21 से उन्होंने 61040 रुपये मासिक किराया पर दे रखा है। गुप्ता की इस सवीकारोक्ति के बाद विभाग को उनके खिलाफ तुरंत प्रभाव से नियमानुसार कारवाई करनी थी। लेकिन अक्तूबर 2023 से अब तक यह कारवाई पत्राचार के स्तर से आगे नहीं बढ़ी है। आम कर्मचारियों और अधिकारियों में इन दिनों यह चर्चा का विषय बना हुआ है। इससे सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि इसमें ‘‘समर्थ को नहीं दोस्त गोसाईं’’ की कहावत ही चरितार्थ होगी।

शिमला/शैल। नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री ठाकुर जयराम ने मण्डी में एक पत्रकारवार्ता में खुलासा किया है कि प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य सिंह ने कांग्रेस के बागीयों को उकसाया और बाद में खुद पलट गये। जयराम के अनुसार इन लोगों ने पहले तो मुख्यमंत्री और सरकार को ब्यान देकर कमजोर किया और फिर पलट गये। जयराम के इस ब्यान को लेकर वाकायदा प्रैस नोट जारी हुआ है। जयराम के इस ब्यान से प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक क्षेत्र में नई अटकलों का दौर शुरू हो गया है। स्मरणीय है कि कांग्रेस के बागीयों ने अपने रोष को 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग करके मूर्त रूप दे दिया और कांग्रेस यह चुनाव हार गयी। इस हार के बाद बागी सदन से निष्कासित भी हो गये और उनके क्षेत्रों में उपचुनाव भी घोषित हो गया। यह लोग भाजपा में शामिल हो गयेे और पार्टी ने इन्हें उपचुनाव के लिये अपना उम्मीदवार भी नामित कर दिया। 27 फरवरी के बाद करीब एक माह तक यह लोग हिमाचल से बाहर रहे। इस बाहर रहने का सारा प्रबन्ध करने का आरोप भाजपा पर लगा है। धन बल से सरकार गिराने का आरोप भाजपा पर लग रहा है। कांग्रेस के दो विधायकों ने इस आश्य की शिकायत भी बालूगंज पुलिस थाना में करवा रखी है। जिसकी जांच चल रही है। प्रदेश के वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता के दौर के लिये भाजपा को कोसा जा रहा है। कांग्रेस में मुख्यमंत्री से लेकर नीचे तक हर नेता आरोप लगा रहा है कि जयराम धन बल के सहारे मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में है। कांग्रेस के इन आरोपों का जयराम यह कहकर जवाब दे रहे हैं कि मुख्यमंत्री अपने विधायकों को संभाल कर नहीं रख पाये और दूसरों को दोष दे रहे हैं। इसी के साथ जयराम यह दावा करना भी नहीं भूल रहे हैं कि चुनाव के बाद सुक्खू सरकार गिर जायेगी। सरकार अल्पमत में आ गयी है यह कहना भी नहीं भूल रहे हैं। इस परिदृश्य में जयराम का प्रतिभा-विक्रमादित्य को लेकर आया ब्यान राजनीतिक पंडितों के लियेे एक रोचक विषय बन गया है। क्योंकि इस समय सदन में कांग्रेस की संख्या 34 रह गयी है जबकि भाजपा की 25 ही है। यदि निर्दलीयों के क्षेत्र में भी उपचुनाव हो जाये और भाजपा सभी नौ स्थानों पर जीत जाये तो भाजपा की संख्या कांग्रेस के बराबर आती है और तब सदन में सरकार के अल्पमत में आने से गिरने की संभावना बनती है। ऐसे में जयराम का इस तरह का ब्यान इस समय आना अपने में महत्वपूर्ण हो जाता है। प्रदेश में जो कुछ घटा है वह भाजपा प्रायोजित है इसमें किसी को संदेह नहीं है। यह भी स्पष्ट है कि प्रदेश सरकार को गिराना भाजपा की आवश्यकता बन गया है। इसके लिये कांग्रेस में और तोड़फोड़ करना पहला कदम होगा। आज केन्द्र विपक्ष की सरकारें गिराने के लिये केन्द्रीय एजैन्सियों के दुरुपयोग के आरोप झेल रहा है। लेकिन जयराम के ब्यान के बाद क्या कांग्रेस और नहीं संभल जायेगी। क्योंकि जयराम का ब्यान उस समय आया है जब विक्रमादित्य सिंह को मण्डी से कांग्रेस का उम्मीदवार बनाने के संकेत आ रहे हैं। विक्रमादित्य सिंह निश्चित रूप से भाजपा की कंगना रनौत से सौ प्रतिश्त बेहतर प्रत्याशी है। फिर जब प्रतिभा सिंह जयराम की सरकार के समय मण्डी का उपचुनाव जीत गयी थी तो अब कांग्रेस की सरकार में विक्रमादित्य सिंह की जीत की संभावनाएं ज्यादा प्रबल हो जाती हैं। इस क्षेत्र की हार जीत का सीधा प्रभाव जयराम के राजनीतिक भविष्य पर भी पड़ेगा यह स्पष्ट है। इस राजनीतिक परिदृश्य में जयराम के इस ब्यान को शीघ्रता में दिया गया ब्यान माना जा रहा है। क्योंकि इस ब्यान के साथ जयराम का सरकार के गिरने का दावा कमजोर पड़ जाता है। वर्तमान परिदृश्य में इस ब्यान को भ्रामकता पैदा करने का असफल प्रयास माना जा रहा है। क्योंकि प्रतिभा और विक्रमादित्य के सोनिया गांधी को मिलने के बाद यह माना जा रहा है कि प्रदेश पर कांग्रेस हाईकमान नजर रख रही है।शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस अभी तक लोकसभा और विधानसभा के उपचुनावों के लिये अपने उम्मीदवारों की घोषणा नहीं कर पायी है। कांग्रेस और विधायकी छोड़कर जो बागी भाजपा में शामिल हुये हैं उनका सरकार के खिलाफ बड़ा आरोप रहा है कि यह सरकार विधानसभा चुनावों के दौरान जनता को दी गारंटीयां पूरी करने की ओर कोई कदम नहीं उठा पायी है। युवाओं को जो नौकरियां देने का वायदा किया था उस वायदे को पूरा करने के बजाये उस बोर्ड को ही भंग कर दिया जिसके माध्यम से नौकरियां दी जाती थी। आज यह सरकार 1,36,000 कर्मचारीयों को पुरानी पैन्शन योजना के तहत लाने का श्रेय ले रही है लेकिन इसमें अभी तक केवल 3899 कर्मचारियों के मामले ए.जी. ऑफिस को भेजे गये हैं। यह जानकारी विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में दी गयी है। यह सरकार एक वर्ष में कितने लोगों को सरकार और इसके उपक्रमों में नौकरियां दे पायी हैं? इस आश्य के हर सवाल के जवाब में कहा गया की सूचनाएं एकत्रित की जा रही है। अभी चुनावों से पहले महिलाओं को 1500 रूपये प्रति माह देने की अधिसूचना जारी की गई थी। इस अधिसूचना के साथ वह फॉर्म भी संलग्न है जो आवेदक को भर कर देना है। लेकिन इस फॉर्म में आवेदन के लिये जो राइडर दर्ज है उनके अनुसार यह लाभ पाने वाले व्यवहारिक रूप से बहुत कम रह जायेंगे। जबकि प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या 2020-21 में 2,58,852 के आंकड़े से बढ़कर 2023-24 में 2,66,304 परिवार हो गयी है। यह आंकड़ा भी विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में आया है। इसका सीधा सा अर्थ है कि इस सरकार के कार्यकाल में गरीबी बढ़ी है।
इस सरकार ने सत्ता संभालने के बाद प्रदेश की कठिन वित्तीय स्थिति का हवाला देते हुये डीजल पर वैट बढ़ाया बिजली पानी के रेट बढ़ाये। कूड़ा शुल्क की दरें बढ़ाई। अब फिर इन दरों में दस प्रतिश्त की दर से वृद्धि कर दी गई है। कांग्रेस ने चुनावों में 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने की घोषणा की थी क्योंकि पिछली सरकार 125 युनिट बिजली मुफ्त दे रही थी इसलिए उससे बड़ी घोषणा करनी थी। लेकिन सत्ता संभालने के बाद यह कहा गया कि पहले एक हजार मेगावाट का नया उत्पादन पैदा करेंगे और फिर तीन सौ यूनिट बिजली मुफ्त देंगे। इस आश्य का भी बजट सत्र में एक प्रश्न आया था जिसके उत्तर में कहा गया है कि अभी तक कोई भी नया समझौता ज्ञापन हस्ताक्षरित नहीं हुआ है। अब विद्युत नियामक आयोग ने चुनावों की पूर्व संध्या पर बिजली की नयी दरें घोषित कर दी है। यह नयी दरें उपभोक्ता से वसूलने की बजाये इसका बोझ सरकार उठाकर इसकी क्षतिपूर्ति बिजली बोर्ड को करने का फैसला लिया गया है। इसी के साथ बिजली बोर्ड सरकार को मिल रही 12% मुफ्त बिजली सरकार से 2.57 पैसे प्रति यूनिट खरीदता था वह सुविधा बोर्ड से वापस ले ली गयी है जिसके कारण बोर्ड को खुले बाजार से महंगी दरों पर बिजली खरीदनी पड़ेगी। इस समय बोर्ड की आय और व्यय में करीब डेढ़ सौ करोड़ का अन्तर है। सरकार के फैसले से बोर्ड का वित्तीय प्रबंधन और बिगड़ेगा क्योंकि सरकार अभी 125 यूनिट मुफ्त बिजली की क्षतिपूर्ति ही बोर्ड को नहीं कर पायी है। नये बोझ से यह क्षतिपूर्ति 2000 करोड़ वार्षिक से भी बढ़ जायेगी। इस समय बोर्ड पर 1600 करोड़ से अधिक की देनदारी खड़ी है। इस तरह सरकार के ऐसे फैसलों से न तो संस्थाओं का भला हो पा रहा है न ही आम जनता का।
इस समय चुनावों की पूर्वसंध्या पर बिजली पानी और कूड़े के शुल्क बढ़ाना जानबूझकर आम आदमी पर बोझ डालने जैसा हो जायेगा। क्योंकि जिस अनुपात में सरकार आवश्यक सेवाओं और वस्तुओं के दाम बढ़ा रही है उसी अनुपात में आम आदमी की क्रय शक्ति नहीं बढ़ रही है। जब सरकार की योजनाओं का लाभ प्रतिफल गरीबी रेखा से नीचे का आकड़ा बढ़ने के रूप में सामने आये तो इन योजनाओं पर स्वतः ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है।