Monday, 02 March 2026
Blue Red Green

ShareThis for Joomla!

भुट्टो और राजेन्द्र राणा के स्टोन क्रेशर क्या अभी अवैध हुये?

  • जब यह लोग कांग्रेस में अनुशासित सिपाही थे तब क्या इनकी अवैधताएं जायज थी?
  • क्या राज्यसभा क्रॉस वोटिंग 34-34 करने तक ही थी?
  • क्या तब सत्ता पक्ष ने दो वोट मैनेज करके सरकार को गिरने से नहीं बचाया?
  • जब दो वोट मैनेज हो सकते थे तो छः क्यों मैनेज नहीं किये गये?
  • विधानसभा चुनाव 0.6%के अन्तराल से जीती है कांग्रेस। क्या इस गैप को कवर कर पायी है सरकार?
  • छोटे दल किसका खेल बिगाड़ेंगे?

शिमला/शैल। नामांकन वापसी के बाद चुनाव प्रक्रिया अब अंतिम चरण में दाखिल हो चुकी है। अब चुनाव मैदान में कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त निर्दलीयों के साथ कुछ अन्य दल भी है। इन दलों की मौजूदगी इसलिये महत्वपूर्ण हो जाती है की विधानसभा चुनाव कांग्रेस केवल 0.6 प्रतिशत वोट के अन्तराल से ही जीत हासिल कर पायी है। उस समय भी कांग्रेस के चुनावी हथियारों में कर्मचारियों को ओ.पी.एस. और महिलाओं को 1500 रूपये प्रति माह और युवाओं को पांच लाख रोजगार देने के वायदे उपलब्ध थे। अब सरकार को सत्ता में आये पन्द्रह माह का समय हो गया है। इस पन्द्रह माह के कार्यकाल में क्या सुक्खू सरकार 0.6 प्रतिशत के अन्तराल को फांन्द कर अपने पक्ष में दो-चार प्रतिशत की बढ़ौतरी अर्जित कर पायी है। यह सवाल इन चुनावों में एक बड़ा सवाल बनकर कांग्रेस के आम कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्षा तक सबसे बराबर जवाब मांग रहा है। क्योंकि ओ.पी.एस को लेकर कई निगमों बोर्डांे के कर्मचारी अपना रोष व्यक्त कर चुके हैं। 2016 में हुये वेतनमान संशोधन के बकाया का भुगतान न हो पाने के कारण कई पैन्शन संगठन चुनावों के बहिष्कार तक की धमकी दे चुके हैं। लाहौल-स्पीति की 803 महिलाओं के बाद बाकी प्रदेश में अभी पन्द्रह सौ पाने के लिये केवल फॉर्म भरवाने का ही काम चल रहा है। फिर पन्द्रह सौ पाने की पात्रता के लिये जितनी शर्तें लगा दी गयी हैं उसके बाद यह लाभ व्यवहारिक रूप से मिल पाना अपने में प्रश्नित होकर रह गया है। यही स्थिति रोजगार के क्षेत्र में युवाओं की होती जा रही है। सरकार में 70 हजार पद खाली चल रहे हैं। इनमें से पन्द्रह माह में सरकार कितने भर पायी है इस आश्य के हर सवाल के जवाब में आंकड़े एकत्रित करने की ही सूचना दी गयी है। यह सवाल उठ रहा है कि जो सरकार पन्द्रह माह में परफॉर्म नहीं कर पायी है वह शेष बचे कार्यकाल में कैसे परफॉर्म कर पायेंगी?
विधानसभा के छः उपचुनाव छः बागियों द्वारा राज्यसभा में भाजपा प्रत्याशी हर्ष महाजन के पक्ष में क्रॉस वोटिंग करने के कारण उभरी राजनीतिक स्थिति का प्रतिफल है। इन बागियांे पर जनता के विश्वास को भाजपा की मण्डी में नीलाम करने का आरोप हर छोटे बड़े मंच से कांग्रेस के हर नेता द्वारा लगाया जा रहा है। इस संबंध में कांग्रेस के दो विधायकों द्वारा बालूगंज थाना में एक एफ.आई.आर. भी दर्ज करवाई गई है। जिसकी जांच रिपोर्ट अभी तक नहीं आयी है। इस एफ.आई.आर को रद्द करवाने की याचिका भी दूसरे पक्ष द्वारा प्रदेश उच्च न्यायालय में दायर है और अभी लंबित चल रही है। न तो एफ.आई.आर. की जांच पूरी हुई है और न ही इसे रद्द करवाने की याचिका पर कोई फैसला अब तक आ पाया है। सब कुछ लंबित चलते हुये जिस तरह से विधायकों के बिकने का आरोप हर मंच से दोहराया जा रहा है उससे स्पष्ट हो जाता है कि इस मामले में राजनीति से हटकर कुछ नहीं हो रहा है। क्योंकि इसी प्रकरण में एक और बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या भाजपा ने राज्यसभा में सारा खेल कांग्रेस-भाजपा दोनों के 34-34 वोट बराबर होने के लिये खेला था? सामान्य राजनीतिक समझ भी 34-34 वोट बराबर होने के तर्क को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है। क्योंकि यदि पर्ची कांग्रेस के पक्ष में निकल जाती तो भाजपा को क्या लाभ मिलता। इसलिये यह गेम 34 की जगह 36 करने की थी जिसे सत्ता पक्ष नेे दो संभावित क्रॉस वोट मैनेज करके भाजपा का खेल बिगाड़ दिया। क्योंकि यदि भाजपा के पक्ष में 36 वोट पड़ जाते तो कांग्रेस के 32 वोट ही रह जाते और सरकार तभी गिर जाती। इसलिये दो वोट मैनेज करके सरकार को सदन में ही गिरने से बचा लिया गया। इस पर यह सवाल भी उठ रहा है कि जब दो वोट कंट्रोल करके सरकार बचा ली गयी तब छः बागी क्यों कंट्रोल नहीं किये गये? क्या इसलिये कि उनके जाने से सरकार को कोई खतरा नहीं था। यह सवाल चर्चा में भी नहीं आ पाया जबकि इस खेल का अपने में यह केंद्रीय प्रश्न है।
इसी तरह अब बागियों को बिकाऊ और भू-माफिया तथा खनन माफिया करार दिया जा रहा है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि राजेन्द्र राणा और भूट्टों अपने क्रेशरों का काम लेकर ही मुख्यमंत्री के पास आते थे। भूट्टों और उसके बेटे के खिलाफ देहरा में एक एफ.आई.आर. भी दर्ज करवा दी गयी है। मुख्यमंत्री जो आरोप लगा रहे हैं संभव है कि उन में कुछ सच्चाई भी हो। परन्तु यह आरोप आज भूट्टों और राजेन्द्र राणा से ज्यादा तो मुख्यमंत्री से जवाब मांग रहे हैं। क्योंकि यह आरोप इनके बागी होने के बाद ही अब क्यों उठ रहे हैं। जब तक यह लोग कांग्रेस में थे और मुख्यमंत्री के साथ थे तब इन पर यह आरोप नहीं थे क्यों? क्या तब इनका सारा कारोबार वैध था? क्या कांग्रेस में रहते हुये सारी अवैधताएं दोष नहीं थी? क्या यह स्टोन क्रेशर बागी होने के बाद लगाये गये या अब इनके माध्यम से इन्हें परेशान करने के लिये प्रशासन को सक्रिय किया गया है। ऐसा लग रहा है कि मुख्यमंत्री के सलाहकार उन्हें अब भी सही राय देने के लिये तैयार नहीं है। आने वाले दिनों में यह कारवाई राजनीतिक तौर पर भारी पड़ने की संभावना ज्यादा बढ़ गयी है।

लॉ फुल अथॉरिटी को की गयी शिकायत मानहानि नहीं होती

  • देवाशीष भट्टाचार्य बनाम रचना गुप्ता मामले में उच्च न्यायालय का फैसला
  • प्रभावशाली लोगों ने मानहानि को प्रताड़ना का साधन बना लिया था

शिमला/शैल। देवाशीष भट्टाचार्य बनाम रचना गुप्ता मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की एकल पीठ ने कहा है कि Exception 8 to Section 499 clearly indicates that it is not a defamation to prefer in good faith and accusation against any person to any of those who have lawful authority over that person with regard to the subject matter of accusation. इस आधार पर मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी की अदालत में रचना गुप्ता बनाम देवाशीष भट्टाचार्य मामले में चल रही कारवाई को निरस्त कर दिया है। यह मामला मुख्य न्यायिक दण्डाधिकारी की अदालत में 2021 में दायर हुआ था जिसका 9-5-2024 को उच्च न्यायालय में इस तरह निपटारा हुआ है।
स्मरणीय है कि जब डॉ. रचना गुप्ता जनवरी 2018 में प्रदेश लोकसेवा आयोग की सदस्य नियुक्त हुई थी तब उनके खिलाफ जोगिन्दर नगर की अदालत में एक आपराधिक मामला लंबित था जिसमें उस समय वह जमानत पर थी। देवाशीष भट्टाचार्य ने महामहिम राज्यपाल से इस संबंध में यह शिकायत कर दी कि रचना गुप्ता ने अपने खिलाफ आपराधिक मामला लंबित होने की सूचना राजभवन को नहीं दी है। रचना गुप्ता ने इस शिकायत पर देवाशीष भट्टाचार्य के खिलाफ आपराधिक मामला दायर कर दिया था। जिसका अब निपटारा हुआ है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि लॉ फुल अथॉरिटी के पास की गई शिकायत मानहानि नहीं होती। लोकसेवा आयोग के सदस्यों की नियुक्ति माहामहिम राज्यपाल करते हैं ऐसे में उनके पास दस्तावेज आधारित की गई शिकायत को अवमानना नहीं माना जा सकता।
इस फैसले से इस तरह के मामलों की स्थिति स्पष्ट हो गयी है। बहुत सारे ऐसे मामले भी सामने आये हैं जिनमें शिकायत की विधिवत्त जांच किये बिना ही शिकायतकर्ता को प्रताड़ित करने की घटनाएं घट चुकी हैं। बल्कि मानहानि को प्रताड़ना का हथियार बनाकर इस्तेमाल किया जा रहा था। प्रभावशाली लोग इसका खुलकर दुरुपयोग कर रहे हैं। अब इस पर रोक लगने की संभावनाएं बन गयी हैं।

जब पांच लाख से अधिक की सारी खरीद ऑनलाइन होना अनिवार्य है तो करीब 20 करोड़ की ऑफलाईन कैसे?

प्रशासनिक और राजनीतिक हल्को में जीआईसी का टैण्डर बना चर्चा का विषय
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार ने पांच लाख से अधिक के कार्यों के निष्पादन और अन्य विक्रय में पारदर्शिता लाने के लिये सारी प्रक्रिया ऑनलाइन कर रखी है। इसके लिये हिमाचल टैण्डर के नाम से एक साइट बनायी गयी है। पांच लाख से अधिक का काम इस साइट पर अपलोड करना अनिवार्य है। ऑनलाइन प्रक्रिया में संबंधित विभाग इस साइट पर अपनी डिमाण्ड अपलोड कर देता है और उसके बाद सारी प्रक्रिया ऑनलाइन स्वतः चालू हो जाती है। इस प्रक्रिया में संबंधित विभाग का दखल नहीं के बराबर रहता है। क्योंकि बोलीदाता/सप्लायर से कोई सीधा वास्ता ही नहीं रह जाता है। इसमें भ्रष्टाचार होने की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती है।
लेकिन क्या सरकारी अदारे इस नीति पर अमल कर रहे हैं। यह सवाल पिछले दिनों प्रदेश की जनरल इण्डस्ट्रीज उद्योग निगम द्वारा करीब 20 करोड़ की खरीद करने के लिये जारी किये गये ऑफलाइन टैण्डर के सामने आने से उठा है। जीआईसी ने शिक्षा विभाग के लिये चालीस हजार डैस्क खरीदने के लिये 13-3-2024 को टैण्डर जारी किया। इसमें 5-4-2024 को 2ः30 बजे तक निविदायें आमंत्रित की गयी। 19 -3-2024 को प्री बिड मीटिंग रखी गयी। इसमें हायर एजुकेशन के लिए अशोका इंटरप्राईसज के रेट मिडल रो 2685 रूपये, फ्रन्ट रो 3985 रूपये, लास्ट रो 2385 रूपये और एलिमेंट्री एजुकेशन के लिये आनन्द इंटरप्राईजस के रेट मिडल रो 2584 रूपये, फ्रन्ट रो 3884 रूपये , लास्ट रो 2384 रूपये स्वीकृत हुये हैं।
इन दिनों चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण सप्लायरों को व्यवहारिक रूप से आर्डर जारी नहीं किये गये हैं। यह टैण्डर 13-3-2024 को जारी हुआ था और 16-3-2024 को चुनावों की घोषणा के साथ ही चुनाव आचार संहिता लग गयी थी। इस टैण्डर में यह सवाल उठ रहा है कि जब पांच लाख से अधिक की हर खरीद के लिये ऑनलाइन टैण्डर अनिवार्य है तो इसमें उस नियम की अनुपालना क्यों नहीं हुई? क्या सरकार की ऑनलाइन प्रक्रिया में कोई कमी आयी है। क्या जीआईसी ने ऑफलाईन प्रक्रिया अपनाने के लिये कोई पूर्व अनुमति ले रखी है। इन दिनों क्योंकि चुनाव चल रहा है इसलिये यह प्रश्न प्रसांगिक हो जाते हैं। प्रशासनिक और राजनीतिक हल्को में यह टैण्डर गंभीर चर्चा का विषय बना हुआ है।
May be an image of text
 

क्या 25000 करोड़ का कर्ज करके 1500 की पैन्शन बांटना सही है

  • कर्ज के इस आरोप पर सरकार की चुप्पी क्यों
  • जब विभाग में आठ पैन्शन योजनाएं चल रही हैं तो नयी की आवश्यकता क्यों?

शिमला/शैल। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में महिलाओं को पन्द्रह पन्द्रह सौ रुपए प्रतिमाह देने की गारन्टी दी थी। यह गारंटी देते हुये यह नहीं बताया गया था कि वह पन्द्रह सौ कब से देने शुरू किये जाएंगे। जब इस गारन्टी पर सवाल उठने शुरू हुये तो इसे लाहौल-स्पीति से लागू कर दिये जाने की घोषणा कर दी गयी। इसी के साथ यह भी कहा गया कि बाकी प्रदेश में भी इसे शीघ्र लागू कर दिया जायेगा। इसी दौरान इस आश्य की अधिसूचना भी जारी कर दी गयी। अधिसूचना के साथ वह फॉर्म जारी किया गया जो पन्द्रह सौ पाने के लिए भरा जाना है। इस फॉर्म में पात्रता के लिये कई सारे राइटर जोड़ दिये गये हैं। इन चुनावों की घोषणा के बाद जब यह फॉर्म भरे जाने लगे तो इसकी चुनाव आयोग में शिकायत हो गयी और यह फॉर्म भरने का काम रुक गया। अब यह चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है कि भाजपा महिलाओं को यह सहायता दिये जाने का विरोध कर रही है। सरकार के पास यह सहायता दिये जाने के लिये संसाधन कहां से आयेंगे? क्या कर्ज लेकर यह सहायता दी जायेगी या आम आदमी पर करांे का बोझ डालकर यह सवाल भी चर्चा में आने लगा है। इन चुनावों में महिला मतदाताओं की संख्या करीब 28 लाख है। इसलिए पन्द्रह सौ रूपये को चुनावी मुद्दा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इसी कारण से सरकार की विभिन्न जनकल्याण योजनाओं को समझने की आवश्यकता है।
इस समय जनकल्याण के नाम पर आठ पैन्शन योजनाएं चल रही हैं। यह योजनाएं हैं वृद्धावस्था पैन्शन योजना, दिव्यांग राहत भत्ता, विधवा/परित्यक्ता/एकल नारी पैन्शन, कुष्ठ रोगी पुनर्वास योजना, ट्रांसजैण्डर पैन्शन योजना, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धावस्था (बी.पी.एल.) त्रैमासिक वित्तीय सहायता, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय विधवा पैन्शन योजना, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दिव्यांगता पैन्शन योजना। इन सारी पैन्शन योजनाओं के लाभार्थीयों की संख्या 2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 7,83,917 है। इसी सर्वेक्षण के मुताबिक 15-5-23 से लाहौल-स्पीति में दिये जा रहे 1500 रुपए के लाभार्थियों की संख्या 803 है। इन योजनाओं के तहत एक हजार, ग्यारह सौ पचास और सत्रह सौ रूपये दिये जा रहे हैं। सरकार की इन योजनाओं पर नजर डालने से यह सवाल उभरता है कि इन योजनाओं से कौन सी पात्र महिला छूट गयी होगी जिसे अब पन्द्रह सौ के दायरे में लाया जायेगा। फिर यह भी कहा गया कि सभी की पैन्शन राशि पन्द्रह सौ कर दी जायेगी। इसमें एक हजार या ग्यारह सौ पचास पाने वाले को तो पन्द्रह सौ मिलने से कुछ सहायता बढ़ जायेगी। लेकिन क्या 1700 पाने वाले के दो सौ कम कर दिये जाएंगे यह स्पष्ट नहीं है।
इस समय सरकार पन्द्रह माह के कार्यकाल में 25000 करोड़ का कर्ज ले चुकी है और 6200 करोड़ और लेने जा रहे हैं। यह आरोप भाजपा अध्यक्ष डॉ. राजीव बिंदल ने लगाया है। डॉ. राजीव बिंदल पहले भी आर.टी.आई. के माध्यम से ली गयी सूचना के आधार पर कर्ज के आंकड़े जारी कर चुके हैं। डॉ. बिंदल द्वारा जारी कर्ज के इन आंकड़ों पर सरकार की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि क्या कर्ज लेकर इस तरह की राहत पहुंचाना जायज है? क्योंकि जब कर्ज लेकर राहत बांटी जाती है तब कर्ज के कारण बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी में यह राहत अर्थहीन होकर रह जाती है। इस समय इतना कर्ज लेकर भी सरकार कर्मचारियों के बकाये की ही अदायगी नहीं कर पायी है। इसलिए कर्ज लेकर राहत बांटने के सिद्धांत पर एक सार्वजनिक बहस में फैसला लिया जाना चाहिए। क्योंकि पन्द्रह माह में 25000 करोड़ का कर्ज एक बड़ा आरोप है। सरकार की खामोशी से यह और गंभीर हो जाता है।

कांग्रेस के विद्रोह का केन्द्र हमीरपुर संसदीय क्षेत्र ही क्यों बना?

  • वित्तीय संकट के चलते सरकार अपने खर्चे क्यों कम नहीं कर पायी?
  • जब जलउपकर अधिनियम ही असंवैधानिक है तो उसी के तहत बना आयोग सही कैसे?

शिमला/शैल। कांग्रेस अभी तक धर्मशाला विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव के लिये अपना उम्मीदवार घोषित नहीं कर पायी है। पांच उपचुनाव के लिये जो उम्मीदवार घोषित किये गये हैं उसमें गगरेट और सुजानपुर में भाजपा से कांग्रेस में आये नेताओं को टिकट दिये गये हैं। बडसर, कुटलैहड और लाहौल-स्पीति में ही कांग्रेस के पुराने लोगों पर भरोसा किया गया है। किसकी जीत होगी इसका आकलन अभी करना जल्दबाजी होगी। यह सही है कि उपचुनाव सरकार का भविष्य तय करेंगे। इसलिए अभी यह चर्चा करना प्रासंगिक होगा कि इस समय प्रदेश के बड़े मुद्दे क्या हैं। क्या सरकार और विपक्ष प्रदेश के मुद्दों पर चुनाव लड़ने के लिये तैयार है या फिर इस उप चुनाव के लिये अलग से मुद्दे तैयार किये जायेंगे।
प्रदेश में सुखविंदर सुक्खू के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बने पन्द्रह माह हो गये हैं। जब सरकार ने कार्यभार संभाला था तब प्रदेश की वित्तीय स्थिति श्रीलंका जैसी होने की चेतावनी जारी की गयी थी। प्रदेश में वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप पूर्व की सरकार पर लगाया गया। वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र जारी किया। पिछली सरकार द्वारा अंतिम छः माह में खोले गये हजार के करीब संस्थान बंद कर दिये गये। हमीरपुर स्थित अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड तक भ्रष्टाचार और प्रश्न पत्र बिकने के आरोप पर भंग कर दिया गया। प्रदेश की जनता सरकार के इन फैसलों को जायज मानकर चुप रही। लेकिन जैसे ही सरकार ने मंत्रिमंडल विस्तार से पहले छः मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति कर दी और करीब डेढ़ दर्जन के करीब ओ.एस.डी. और सलाहकार कैबिनेट रैंक में नियुक्त कर दिये तब सरकार की नीयत और नीति पर सवाल उठने शुरू हुये। कांग्रेस द्वारा विधानसभा चुनावों में दी गई गारंटीयों पर सवाल उठने शुरू हुये। क्योंकि खराब वित्तीय स्थिति में कोई भी व्यक्ति, संस्थान या सरकार अवांच्छित खर्च नहीं बढा़ते। सरकार ने वित्तीय कुप्रबंधन के लिये आज तक किसी को नोटिस तक जारी नहीं किया है। कांग्रेस द्वारा चुनावों में जारी किये गये आरोप पत्र पर कोई कारवाई नहीं हुई है।
इस समय बेरोजगारी प्रदेश की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। पिछले दिनों बिलासपुर में एक युवक द्वारा नौकरी न मिलने पर आत्महत्या कर लेने का मामला सामने आया है। प्रदेश में बेरोजगारों की संख्या युवा वोटरों की संख्या से बढ़ गयी है। सरकार आय के साधन बढ़ाने के लिए परोक्ष/अपरोक्ष में टैक्स लगाने के अतिरिक्त और कुछ सोच नहीं पा रही है। सरकार ने चार हजार करोड़ का राजस्व बढ़ाने के नाम पर बिजली उत्पादन कंपनियों पर जल उपकर लगाने के लिये विधेयक पारित किया और एक जल उपकर आयोग तक स्थापित कर लिया। लेकिन जैसे ही यह मामला उच्च न्यायालय पहुंचा तो अदालत ने जल उपकर अधिनियम को असंवैधानिक करार देकर निरस्त कर दिया। परन्तु सरकार ने इसी अधिनियम के तहत स्थापित हुये आयोग को भंग नहीं किया है। इससे सरकार की नीयत पर अनचाहे ही सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि सरकार ने अपना राजस्व बढ़ाने के लिये हर सेवा और वस्तु का शुल्क बढ़ाया है। परन्तु उसी अनुपात में अपने खर्चों पर लगाम नहीं लगाई है। सरकार एक तरफ राजस्व लोक अदालतें लगाकर लोगों को राजस्व मामलों में राहत देने का दावा कर रही है और दूसरी ओर इसी राजस्व में ई-फाइलिंग, ई-रजिस्ट्रेशन आदि करके हर सेवा पहले से कई गुना महंगी कर दी है।
इस समय व्यवहारिक रूप से आम आदमी को रोजगार से लेकर किसी भी अन्य मामले में भाषणों में घोषित हुई राहतें जमीन पर नहीं मिली है। इस समय चुनावों में उम्मीदवार तलाशने में लग रहे समय से ही यह सवाल उठ गया है कि जब लोकसभा चुनाव होने तो तय ही था तो इसके उम्मीदवारों के लिये इतना समय क्यों लगा दिया गया? क्या इससे यह संदेश नहीं गया कि सरकार और संगठन में सब सही नहीं चल रहा है। इस समय मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी बागीयों पर बिकने का आरोप लगाकर उपचुनाव थोपने की जिम्मेदारी उन पर डाल रहे हैं। लेकिन जिस तरह से बागी मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानि के मामले डालकर उन्हें घेरने की रणनीति पर चल रहे हैं उससे सारी बाजी पलटने की संभावना प्रबल होती जा रही है। यह सवाल बड़ा होता जा रहा है कि इस विद्रोह का केंद्र हमीरपुर संसदीय क्षेत्र ही क्यों बना? आम आदमी यह मानने को तैयार नहीं है कि इतने बड़े विद्रोह कि कोई भी पूर्व सूचना सरकार को नहीं हो पायी? जबकि हाईकमान के संज्ञान में यह रोष बराबर रहा है। वरिष्ठ मंत्री चन्द्र कुमार ने जिस तरह से इस संकट के लिये मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री को दोषी माना है वह एक और बड़े संकट की आहट माना जा रहा है। आने वाले दिनों में यदि कांग्रेस के संकट की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पर आ गयी तो इसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे।

Facebook



  Search