Monday, 02 March 2026
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बागियों ने पूछा फाइव स्टार होटल में रुकने का राज

  • मौजूदा स्थिति के लिये मुख्यमंत्री को ठहराया जिम्मेदार
  • समझौते के दरवाजे हुए बन्द

शिमला/शैल। छः असंतुष्ट नेताओं और तीन निर्दलीय विधायकों ने पहली बार एक साथ संयुक्त ब्यान जारी करके मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू पर जबरदस्त हमला बोला है। इन नेताओं राजेंद्र राणा, सुधीर शर्मा, इंद्र दत्त लखनपाल, रवि ठाकुर, देवेंद्र भुट्टो, चैतन्य शर्मा, होशियार सिंह, आशीष शर्मा और के.एल.ठाकुर ने कहा है कि मुख्यमंत्री को दूसरों पर कीचड़ उछालने से पहले अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि मौजूदा स्थिति के लिए असली गुनहगार कौन है और किसने यह स्थितियां पैदा की।
इन नेताओं ने कहा कि एक तरफ मुख्यमंत्री बार-बार उनसे किसी भी सूरत में समझौता कर लेने की एप्रोच कर रहे हैं और दूसरी तरफ नागों और भेड़ों से उनकी तुलना कर रहे हैं, जिससे उनकी मानसिक स्थिति का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों की भेड़ बकरियों से तुलना करना हिमाचल की गौरवपूर्ण संस्कृति के खिलाफ है। इन नेताओं ने कहा कि कोई भी व्यक्ति हर चीज से समझौता कर सकता है लेकिन स्वाभिमान से समझौता कतई नहीं कर सकता और वे स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं।
इन नेताओं ने संयुक्त ब्यान में कटाक्ष करते हुये यह भी पूछा है कि अगर मुख्यमंत्री इतने ही पाक साफ हैं तो उन्हें प्रदेश की जनता को यह हकीकत भी बतानी चाहिये कि वह चंडीगढ़ के अपने आधिकारिक दौरे के दौरान हिमाचल भवन में बने सीएम सूट में रुकने की बजाये फाइव स्टार होटल में क्यों रुकते थे और सिक्योरिटी वालों को भी आगे पीछे क्यों कर देते थे। इसके पीछे मुख्यमंत्री का क्या एजेंडा और क्या राज रहता था। यह राज प्रदेश की जनता को भी मालूम होना चाहिए। परदे के पीछे वह क्या खेल खेलते थे, इसकी जानकारी जनता को देने का नैतिक साहस भी उन्हें दिखाना चाहिए।
इन नेताओं ने कहा कि सरकार विधायकों के समर्थन से चलती है लेकिन मुख्यमंत्री सुक्खू अपनी मित्र मंडली को तरजीह देकर चुने हुए विधायकों को पिछले सवा साल से जलील कर रहे थे। जिन लोगों ने विधानसभा क्षेत्र में चुनावों में हमारा खुलकर विरोध किया था, उन्हें मुख्यमंत्री अपने सरआंखों पर बिठाकर हमें हर पल नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे थे। उन्हें ओहदों से नवाजा जा रहा था। उनकी मित्र मंडली विधायकों के ऊपर हावी हो रही थी और मुख्यमंत्री से बार-बार इस बारे आग्रह भी किया गया था लेकिन वे तानाशाह की तरह रवैया अपनाए रहे। इन नेताओं ने कहा कि चुने हुये विधायक अगर जनता के काम नहीं करेंगे तो वह जनता के बीच कैसे जाएंगे।
इन नेताओं ने कहा कि प्रदेश की जनता यह भी भलीभांति जानती है कि ‘कैबिनेट रैंक प्राप्त मित्र’ इस सरकार में क्या गुल खिला रहे हैं और कितनी लूट मचा रखी है। साथ ही इन नेताओं ने मुख्यमंत्री से यह भी सवाल किया है कि प्रदेश में सरकार के गठन में उनके इन मित्रों का क्या योगदान है, यह भी जनता को बताया जाना चाहिए और जनता के खजाने से इन पर कितने पैसे लुटाये जा रहे हैं, यह हकीकत भी जनता के सामने रखनी चाहिए। इन नेताओं ने करारा तंज करते हुये कहा कि जनता के चुने हुए विधायकों को नजरअन्दाज करके मित्रों को खुली छूट देने, रेवड़ियों की तरह उन्हें कैबिनेट रैंक से नवाजने और विधायकों को जलील करने को ही क्या व्यवस्था परिवर्तन कहा जाता है?
उन्होंने कहा कि हिमाचल के स्वाभिमान से किसी भी सूरत में समझौता नहीं किया जा सकता और मुख्यमंत्री को प्रदेश की जनता को यह भी बताना होगा कि जो व्यक्ति हिमाचल प्रदेश के हितों के खिलाफ हमेशा लड़ता रहा हो, उसे पार्टी का टिकट देकर राज्यसभा में भेजने के पीछे क्या मंशा थी और क्या मजबूरी थी।
इन नेताओं ने कहा कि इस सरकार में जो लोग स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनमें से 9 तो खुलकर बाहर आ गये हैं लेकिन कुछ तो मंत्री और विधायक होने के बावजूद सुक्खू की सरकार में घुटन महसूस कर रहे हैं। व्यवस्था परिवर्तन वाली इस सरकार में स्थिति ऐसी हो गयी ही है कि मंत्रिमंडल की बैठकों से भी मंत्री रोते हुये बाहर आ रहे हैं। इसके पीछे उनकी क्या मजबूरी है, यह वही बेहतर बता सकते हैं।
इन नेताओं ने कहा कि अपने भाषणों में आरोप लगाने से सच्चाई छुपने वाली नहीं है और मुख्यमंत्री को प्रदेश की जनता को यह भी साफ-साफ बताना चाहिये कि ऐसी परिस्थितियां पैदा होने के पीछे असली गुनहगार मुख्यमंत्री खुद हैं या हाईकमान है या कोई और है।
इन नेताओं ने कहा कि पूरे देश में कांग्रेस ताश के पत्तों की तरह बिखर रही है लेकिन रस्सी जल गयी पर बल नहीं गया वाली कहावत भी कांग्रेस नेतृत्व पर ही चरितार्थ होती है।

सरकार सत्ता में रहने का नैतिक अधिकार खो चुकी हैःभाजपा नेतृत्व

शिमला/शैल। राज्यसभा में हारने के बाद सरकार सदन के पटल पर गिरने के कगार पर पहुंच गयी थी। इसलिये 27 फरवरी को राज्यसभा चुनाव के बाद बजट का पारण 29 तारीख को होना था और 28 फरवरी को कटौती प्रस्तावों के दौरान सरकार गिरने की संभावना बलवती हो गयी थी। इससे बचने के लिये 28 फरवरी को भाजपा के 15 विधायकों को निलंबित करके उसी दिन बजट पास करवाकर सत्रावसान कर दिया गया। इसी के साथ 28 फरवरी को ही कांग्रेस के छः बागियों की दल बदल कानून के तहत सदन से सदस्यता समाप्त कर दी गयी। ऐसा करने से कांग्रेस की संख्या 34 रह गयी और विधानसभा की सीटें भी 62 रह गयी। ऐसे में 62 के सदन में जहां कांग्रेस की संख्या 34 रह गयी वहीं पर भाजपा के पास 25 और 3 निर्दलीयों के साथ सरकार के विरोधियों की संख्या 28 हो गयी। ऐसे में न्यायालय में कांग्रेस के छः निष्कासितों को राहत मिल जाती है तो फिर 68 के सदन में कांग्रेस और विरोधी 34-34 पर पहुंच जाते हैं। लेकिन सरकार चलाने के लिए 35 का आंकड़ा चाहिये। इस गणित में कांग्रेस अल्पमत में आ जाती है।
इस स्थिति से बचने के लिये अब भाजपा के भी सात विधायकों को विशेषाधिकार हनन के तहत नोटिस जारी करके उनकी भी सदस्यता रद्द करने की चाल चल दी गयी है। इसी के साथ फील्ड में कांग्रेस के बागियों और तीन निर्दलीयों को खिलाफ रोष प्रदर्शन उनके होर्डिंग पर कालिख पोतने आदि की गतिविधियां शुरू हो गयी हैं। भाजपा अध्यक्ष डॉ. बिंदल ने तो यहां तक आरोप लगाया है इन नौ विधायकों के खिलाफ पुलिस और प्रशासन का डंडा चलाने का काम शुरू हो गया है। उनके घरों पर छापे मारना उनके बिजनेस आउटलेट्स पर छापे मारने का काम शुरू हो गया है। उनके घरों के रास्ते रोकना उनको डराना धमकाना उनसे जुड़े लोगों पर कारवाइयां करके प्रदेश में भय का वातावरण पैदा किया जा रहा है। बिंदल और जयराम ने इसकी घोर निंदा करके सरकार पर आरोप लगाया है कि सुक्खू सरकार अल्पमत में आने के कारण इस तरह के हथकण्डों पर उतर आयी है। भाजपा नेताओं ने स्पष्ट कहा है कि यह सब सहन नहीं किया जायेगा।
विश्लेषको के मुतबिक जो कुछ प्रदेश में घट रहा है ऐसा कभी नहीं हुआ है। यदि यह स्थिति ऐसे ही बढ़ती रही तो इसका अंतिम परिणाम राष्ट्रपति शासन ही होगा। क्योंकि जिस तरह से विधानसभा अध्यक्षों का आचरण विभिन्न राज्यों में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है तो हिमाचल को भी उसी गिनती में शामिल होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।

कांग्रेस के इस संकट के लिये कौन जिम्मेदार है? सुक्खू-बागी या हाईकमान

शिमला/शैल। हिमाचल का राजनीतिक संकट कांग्रेस प्रत्याशी की राज्यसभा चुनाव में हार से शुरू हुआ है। इस हार के बाद यह सवाल जबाव मांग रहा है कि इसके लिये जिम्मेदार कौन है। स्मरणीय है कि जब सुक्खू प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे और स्व.वीरभद्र सिंह मुख्यमंत्री थे कांग्रेस पार्टी कुछ चुनाव हार गयी थी। उस हार पर बतौर पार्टी अध्यक्ष सुक्खू ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुये इसके लिये सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया था। सुक्खू का यह ब्यान वायरल होकर सामने आ चुका है। तब भी सरकार और संगठन में आज ही की तरह मतभेद थे। इसलिये चुनावी हार के लिये पहली जिम्मेदारी सरकार की ही रहती है। वर्तमान संकट के लिये भी पहली जम्मेदारी मुख्यमंत्री की ही बनती है। क्योंकि सरकार के कार्यों का ही प्रतिफल चुनावी हार जीत होता है। सुक्खू सरकार के गठन से लेकर आज तक के सरकार के कार्यों, फैसलों और योजनाओं का आकलन किया जाये तो सरकार के पक्ष में कुछ नहीं जाता। आगामी लोकसभा चुनाव के लिये हाईकमान द्वारा करवाये गये सर्वेक्षण में भी यही सामने आया था कि पार्टी चारों लोकसभा सीटें हार रही है। सरकार और संगठन में मतभेद मंत्रिमण्डल में क्षेत्रीय असन्तुलन तथा वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का सरकार में समायोजन न होने की शिकायतें लगातार हाईकमान के पास पहुंचती रही लेकिन न तो हाईकमान ने इसका गंभीर संज्ञान लिया और न ही मुख्यमंत्री ने। मुख्यमंत्री अपने मित्रों की ही ताजपोशीयों में लगे रहे और जमीनी हकीकत से दूर होते चले गये।
राजनीतिक स्थितियों का समय-समय पर आकलन करना सरकार में सीआईडी का काम होता है। सरकार के बाहर यह काम मीडिया का होता है। उसमें सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह विभाग प्रिंट और न्यूज़ चैनलों तथा सोशल मीडिया रिपोर्टों का आकलन करके उसे सरकार के पास रखता है। लेकिन सुक्खू सरकार ने उन पत्रकारों को अपना दुश्मन मान लिया जो पूरे दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ लिख रहे थे। व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर चाटुकारों से घिर कर रह गये और आज सरकार जाने के कगार पर पहुंच गयी। हमीरपुर संसदीय क्षेत्र से चार कांग्रेस के विधायक और एक निर्दलीय भाजपा के पक्ष में वोट डाल गये और सरकार के तन्त्र को इसकी पूर्ण जानकारी ही नहीं हो पायी। शैल ने इस क्रॉसवोटिंग के बारे में समय रहते लिख दिया था। ऐसे में इस हार के लिये मुख्यमंत्री के एक दर्जन से ज्यादा सलाहकार और सरकारी तन्त्र ही जिम्मेदार है। आज तो चर्चा यहां तक पहुंच गयी है कि या तो इन लोगों की निष्ठाएं संदिग्ध हैं या फिर इनमें योग्यता की कमी है। अन्यथा यह संकट इतना बड़ा नहीं था और न ही है जिसका हल न निकल सके।
इस समय सरकार टूटने के कगार पर पहुंच चुकी है। छः विधायकों के निष्कासन ने इस पर मोहर लगा दी है। क्योंकि यदि निष्कासन का फैसला अदालत में पलट जाता है तो यह बागियों की पहली जीत है और उसके बाद नेतृत्व परिवर्तन का सवाल और गंभीर हो जायेगा। अन्यथा इन निष्कासितों की सीटों पर लोकसभा चुनाव के साथ चुनाव हो जायेंगे। इन चुनावों में कांग्रेस फिर यह छः सीटें जीत जायेगी इसकी वर्तमान परिदृश्य में कोई भी संभावना नही है। यह सीटें भाजपा के पक्ष में जायेंगी और फिर दोनों साईड 34-34 की स्थिति होगी। जबकि सरकार बनाने के लिये 35 की संख्या चाहिये। इसमें स्पीकर को मतदान का अधिकार नहीं होता। उस स्थिति में कांग्रेस की संख्या 33 ही रह जायेगी और तब भी सुक्खू सरकार सत्ता में नही रह पायेगी।

क्या सुक्खू सरकार युवाओं को रोजगार नहीं दे पा रही है?

  • अनुबन्ध का विकल्प तलाशने से उठी चर्चा

शिमला/शैल। कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों के दौरान जो दस गारंटीयां जनता को दी थी उनमें से एक युवाओं को रोजगार देने की थी। सरकार ने इस दिशा में पहला कदम उठाते हुए तीन मंत्रियों की एक कमेटी बनाकर सरकार में खाली पदों की जानकारी हासिल करने का प्रयास किया था। इस कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार में 70,000 पद खाली होने की जानकारी आयी थी। 2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार प्रदेश में 185698 पद नियमित 5726 अंशकालिक और 4593 दैनिक वेतन भोगी है। तदर्थ और अनुबन्ध आदि की जानकारी सर्वेक्षण में नहीं दी गयी है ऐसा क्यों है इसका कोई कारण नहीं बताया गया है। सरकार में 70,000 पद खाली होने से युवाओं में नौकरी मिलने की उम्मीद बंधी थी। लेकिन विधानसभा के इस बजट सत्र में जिस भी विधायक ने यह जानकारी मांगी है कि 15-01-24 तक सरकार कितने लोगों को रोजगार उपलब्ध करवा पायी है तो इसमें ‘‘सूचना एकत्रित की जा रही है’’ का ही जवाब आया है। सरकार इस सवाल का कोई ठोस जवाब नहीं दे पा रही है। उल्लेखनीय है कि हिमाचल सरकार ने एक समय अनुबन्ध के आधार पर सरकारी नौकरी देने का नियम बनाया था। एक तय समय अवधि के बाद ऐसे नियुक्त हुये कर्मचारी नियमित हो जाते थे। लेकिन इन्हें पूरे सेवा लाभ नहीं मिल पाते थे और यह सरकार की बचत होती थी। परन्तु पिछले दिनों तीन कान्ट्रेक्ट के अलग-अलग मामलों में यह व्यवस्था दी है कि कान्ट्रेक्ट काल सारे सेवा लाभों पदोन्नति और पैन्शन आदि में गणना में आयेगा तो उससे सरकार के लिये कठिनाई बढ़ी है। बल्कि कान्ट्रेक्ट की जगह नियमित नौकरी देने को ही बेहतर माना जा रहा है।
इस समय सरकार की जो स्थिति चल रही है उसमें प्रदेश की वरिष्ठ नौकरशाही ने कान्ट्रेक्ट का विकल्प तलाशने के लिये मुख्य सचिव की अध्यक्षता में छः फरवरी को एक बैठक बुलाई गई थी। इस बैठक में अठारह वरिष्ठ नौकरशाहों ने भाग लिया। इस बैठक में अदालती आदेशों की अनुपालना करने से बढ़ने वाले आर्थिक बोझ से बचने के लिए गुजरात मॉडल अपनाने पर चर्चा की गई। इसमें प्रधान सचिव कार्मिक को गुजरात मॉडल का अध्ययन करने और उसकी कानूनी स्थिति जांचने की जिम्मेदारी दी गई है। अफसरशाही के इस प्रयास का सीधा सा अर्थ है कि सरकार नौकरी देने के लिये ऐसी व्यवस्था लाना चाहती है जिसमें वित्तीय बोझ कम से कम पड़े। दूसरे शब्दों में अब सरकार ऐसी व्यवस्था लाना चाहती है जिसमें सरकार पर कोई बाध्यता न पड़े। कहने के लिये तो सरकारी नौकरी हो परन्तु व्यवहार में नहीं। सरकार के इस प्रयास का बेरोजगार युवाओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका पता आने वाले समय में चल जाएगा।

 

  • यह तय हुआ है अफसरशाही की बैठक में।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

कांग्रेस को सीटें जीतने के लिये मंत्रियों या उनके परिजनों को चुनाव में लड़वाना होगा

  • मंत्रियों के चुनाव लड़ने से उनको सरकार की लोकप्रियता का पता चल जायेगा
  • गारंटीयों पर सरकार के दावों की परीक्षा होंगे यह चुनाव
  • व्यवस्था परिवर्तन पर जनता की प्रतिक्रिया की व्यवहारिक जानकारी होंगे यह चुनाव

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस चुनावी सर्वेक्षण के आधार पर लोकसभा उम्मीदवारों का चयन करेगी यह कहना है प्रदेश के लिये नियुक्त स्क्रीनिंग कमेटी के अध्यक्ष पूर्व केंद्रीय मंत्री भगत चरण दास का। सभी दल प्रायः इसी सिद्धान्त पर उम्मीदवारों का चयन करते हैं। स्मरणीय है कि सर्वे इस संबंध में पहले भी हो चुका है और उसके अनुसार सीटों पर पार्टी की हालत कमजोर पायी गई है। अभी राज्यसभा की भी एक सीट के लिये एक सर्वेक्षण चर्चा में आया है जिसके मुताबिक भाजपा की जीत 67 प्रतिशत और कांग्रेस की 33 प्रतिशत आंकी की गई है जबकि कांग्रेस की सरकार है। जब कोई पार्टी सरकार में होती है और तब चुनावी सर्वेक्षण होता है तो उसमें सरकार की परफारमैन्स सरकार और संगठन में तालमेल और जनता में बन रही छवि मुख्य आधार रहते हैं। राज्य में सरकार होने की स्थिति में पार्टी की राष्ट्रीय नीतियां बहुत ज्यादा प्रभावी नहीं रहती है क्योंकि आम आदमी वक्त की सरकार से ज्यादा प्रभावित रहता है। जब केन्द्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकार होती है तब यह भी देखा जाता है कि प्रदेश की सरकार में से केन्द्र की सरकार की नीतियों पर कितनी आक्रमकता अपनायी गयी है।
सर्वेक्षण के इन मानकों पर यदि प्रदेश की सरकार का आकलन किया जाये तो सबसे पहले और बड़ा बिन्दु यह आता है कि सुक्खू सरकार के एक भी आचरण से आज तक यह लक्षित नहीं हुआ है कि प्रदेश में कोई अलग सरकार है। शासन तक में ट्रांसफर तक हुए जब चुनाव आयोग ने एक स्थान पर तीन साल पूरे कर चुके अधिकारियों को बदलने के आदेश दिये। एक तरह से पक्ष और विपक्ष रस्म अदायगीयों की औपचारिकताओं से आगे नहीं बढ़े हैं। जब सरकार अपनी ही पार्टी द्वारा चुनावों में सार्वजनिक रूप से जारी किये गये आरोप पत्र पर कोई कारवाई न कर पाये तो उसका चुनावी आकलन क्या किया जायेगा। कांग्रेस ने चुनावों के दौरान दस गारंटीयां जारी की थी उनकी पूर्ति के लिये सरकार ने क्या व्यवहारिक कदम उठाये हैं और क्या उपलब्धियां इसका राज्यपाल के अभिभाषण तक में कोई ठोस जिक्र नहीं है। अभी उपलब्धियों का जो विज्ञापन जारी किया जा गया है उसमें भी गारंटीयों का कोई उल्लेख नहीं है। आज इन गारंटीयों को लेकर कांग्रेस के अपने ही विधायक विधानसभा के अन्दर न केवल सवाल ही पूछ रहे हैं बल्कि खुला पत्र लिखने की नौबत तक पहुंच गये हैं।
शिखर सम्मेलन में विदेशी मेहमानों के लिये राष्ट्रपति द्वारा आयोजित भोज में केवल हिमाचल के ही मुख्यमंत्री शामिल हुये थे बाकी कांग्रेसी मुख्यमंत्री इससे बाहर रहे थे। अब राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा के अवसर पर भी हिमाचल सरकार ने ही सार्वजनिक अवकाश घोषित किया और इसके तीन नेता इसमें शामिल हुये। आने वाला लोकसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस में गंभीर आरोपों -प्रत्यारोपों का अखाड़ा होगा। इसमें हिमाचल कांग्रेस के नेता किस मुंह से मोदी सरकार के खिलाफ कुछ भी बोल पायेंगे। सरकार और संगठन में तालमेल की क्या स्थिति है इसको लेकर समय-समय पर प्रदेश अध्यक्षा के ब्यान ही अपने में बड़े प्रमाण हैं। कर्मचारियों के कितने वर्ग धरने प्रदर्शनों के लिये मजबूर हो चुके हैं यह सबके सामने है। इस वस्तु स्थिति में होने वाले चुनावी सर्वे के परिणाम क्या होंगे इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। आज स्थिति पार्टी में पदाधिकारी के त्यागपत्रों तक पहुंच गई है। हाईकमान के आचरण से भी यही झलक रहा है कि उसके लिए मुख्यमंत्री के दावे ही अन्तिम सच हैं या उसने हिमाचल को उसके हाल पर ही छोड़ दिया है। जबकि भाजपा इस चुनाव में साम-दाम-दण्ड और भेद के सारे सूत्र एक प्रयोग करके चल रही है। आने वाले दिनों में यदि कुछ मंत्रियों के खिलाफ भी सनसनी खेज दस्तावेजी खुलासे सामने आ जायें तो कोई हैरानी नहीं होगी।
इस समय यदि हाईकमान प्रदेश और लोकसभा चुनाव के लिये गंभीर है तो उसे चारों सीटों से किसी न किसी मंत्री को ही चुनाव में उतरना चाहिये। इससे पार्टी के प्रति इन लोगों की निष्ठाओं से ज्यादा इनकी परफारमैन्स का भी टेस्ट हो जायेगा। क्योंकि सरकार के दावों का फील्ड में व्यवहारिक सच क्या है और व्यवस्था परिवर्तन के जुमले पर आम आदमी की प्रतिक्रिया क्या है इसका इनको प्रत्यक्ष ज्ञान हो जायेगा। इस समय हमीरपुर लोकसभा सीट पर लम्बे अरसे से कांग्रेस हारती चली आ रही है। आज मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों इसी हमीरपुर क्षेत्र से ताल्लुक रखते हैं। इसलिये इस सीट से मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी से ज्यादा प्रभावी उम्मीदवार कौन हो सकता है। फिर सरकार और मुख्यमंत्री के दावों की व्यवहारिक परीक्षा भी हो जायेगी। यही नहीं कमलेश ठाकुर के प्रत्याशी बनने से प्रदेश के चुनाव में गंभीरता भी आ जायेगी। चारों सीटों पर इसी तरह का प्रयोग किया जाना चाहिये अन्यथा प्रदेश से कोई भी सीट कांग्रेस को मिल पाना संभव नहीं होगा।

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