शिमला/शैल। निर्दलीय विधायकों के त्यागपत्र मतगणना से एक दिन पहले ही विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप पठानिया द्वारा स्वीकार कर लिये गये हैं। स्मरणीय है कि प्रदेश विधानसभा में तीन निर्दलीय विधायक जीत कर आये थे और पहले दिन से ही सुक्खू सरकार को समर्थन दे रहे थे। लेकिन इस बीच राजनीतिक परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ लिया कि राज्यसभा चुनाव में इन लोगों ने कांग्रेस के छः बागियों के साथ भाजपा के पक्ष में वोट कर दिया। राज्यसभा में कांग्रेस की हार के बाद छः बागियों को दलबदल कानून के तहत कारवाई करके निष्कासित कर दिया। इस निष्कासन के बाद इन निर्लदलीयों ने भी विधानसभा की सदस्यता से 22 मार्च को त्यागपत्र दे दिया। त्यागपत्र देने के बाद इन्होंने भाजपा की सदस्यता भी ग्रहण कर ली। सदस्यता ग्रहण करने के साथ ही भाजपा ने इन्हें भी उनके क्षेत्र से उपचुनाव के लिए बागियों की तर्ज पर अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। कांग्रेस के बागियों के निष्कासन के बाद उनके क्षेत्र तो रिक्त घोषित हो गये और उनके उपचुनाव भी हो गये। लेकिन इन निर्दलीयों के उपचुनाव बागियों के साथ ही न हो जायें इसलिये इनके त्यागपत्रों की प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया गया। यह प्रश्न चिन्ह दो कांग्रेस विधायक संजय अवस्थी और भुवनेश गौड की शिकायत के आधार पर लगाया गया। यह आरोप लगा कि यह लोग भाजपा के पास बिक गये हैं और दबाव में आकर त्यागपत्र दिये हैं। इस आश्य की बालूगंज थाना में एक एफआईआर भी दर्ज हो गयी। इसमें हमीरपुर के आजाद विधायक आशीष शर्मा और गगरेट से कांग्रेस के बागी चैतन्य शर्मा के पिता राकेश शर्मा सेवानिवृत्ति मुख्य सचिव उत्तराखण्ड को पार्टी बनाया गया। जांच के दौरान कई तरह के पुख्ता परिणाम इनके खिलाफ मिलने के दावे किये गये। इन्हीं दावों के बीच राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी ने भी अध्यक्ष के पास एक याचिका दायर कर इन निर्दलीयों के खिलाफ दल बदल कानून के तहत कारवाई करने की गुहार लगा दी। पूरे चुनाव प्रचार में इन लोगों को बिकाऊ विधायक करार देकर इन्हें हराने की अपील की गयी। यह दावा मुख्यमंत्री ने किया कि उनके बिकने के कई सबूत सरकार को मिल गये हैं। लेकिन पूरे चुनाव प्रचार में एक भी सबूत जनता में नहीं रखा गया।
निर्दलीयों और कांग्रेस के बागियों के पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ में बिकने के आरोप लगाये गये। इन आरोपों पर मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानि के मामले तक दर्ज हुये हैं। अब जब विधान सभा अध्यक्ष ने इन निर्दलीयों द्वारा दिये गये त्यागपत्रों को बिना किसी दबाव और स्वेच्छा से दिये गये मानकर उनके खिलाफ दल बदल कानून के तहत कारवाई न करके त्यागपत्रों को स्वीकार कर लिया गया है। अध्यक्ष के इस फैसले से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी जांच में इनके बिकने या दबाव में होने के कोई प्रमाण नहीं आये हैं। अध्यक्ष के फैसले के बाद उनके खिलाफ बालूगंज थाना में दर्ज हुई एफआईआर पर इसका क्या असर पड़ता है यह देखना रोचक होगा। क्योंकि इस फैसले के बाद कोई भी इन्हें बिकाऊ होने का संबोधन नहीं दे पायेगा। इसी के साथ इस फैसले से मुख्यमंत्री के खिलाफ दायर हुए मानहानि के मामलों पर क्या प्रभाव पड़ता है यह देखना भी रोचक होगा। मतगणना से पहले आये इस फैसले के राजनीतिक अर्थ बहुत गंभीर हो जाते हैं क्योंकि यह फैसला मुख्यमंत्री के सारे दावों के उलट माना जा रहा है।
शिमला/शैल। प्रदेश में हुये लोकसभा और छः विधानसभा उपचुनाव प्रचार के दौरान कुटलैहड से भाजपा प्रत्याशी बने देन्वेद्र भूट्टो और उनके बेटे करण के खिलाफ चार आपराधिक मामले दर्ज हुये हैं। पहला मामला जब देहरा में दर्ज हुआ था तब उस समय देवेन्द्र भूट्टों ने यह जवाब दिया था कि वह प्रदेश उच्च न्यायालय से इस मामले में पहले ही जीत चुके हैं और उसका रिकॉर्ड पुलिस में पेश कर दिया जायेगा। इसके बाद भी इनके खिलाफ तीन और अलग-अलग मामले दर्ज हुये हैं। स्मरणीय है कि इस चुनाव प्रचार में जब मुख्यमंत्री कुटलैहड गये थे तब उन्होंने जनता से कहा था की ‘‘भुट्टों को कुट्टो’’। मुख्यमंत्री के इस ब्यान का भाजपा ने कड़ा संज्ञान लेते हुये इसकी चुनाव आयोग में शिकायत भी की है। इसी के साथ और भी कानूनी कारवाई की गयी है। भुट्टो दिसम्बर 2022 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतकर विधायक बने थे। अब राज्यसभा चुनाव के दौरान वह कांग्रेस से बगावत करके विधानसभा से निष्कासित होकर भाजपा में शामिल हो गये। करीब पन्द्रह माह तक कांग्रेस के वफादार सिपाही बनकर मुख्यमंत्री का समर्थन करते रहे हैं। भुट्टो ठेकेदार हैं और एक स्टोन क्रेशर भी चला रहे हैं। लोक निर्माण विभाग और अन्य सरकारी विभागों में अरसे से ठेकेदारी करते आ रहे हैं। यह ठेकेदारी विधायक बनने से बहुत पहले से चल रही है। लेकिन विभाग की शिकायतों पर पहली बार उनके खिलाफ इस तरह के मामले दर्ज हुये हैं। यह मामले दर्ज होने पर उभरी प्रतिक्रियाओं में यह कहा जा रहा है कि क्या चुनाव के दौरान ही यह धोखाधड़ी विभाग के संज्ञान में आयी है। जब पन्द्रह महीने तक भट्टो कांग्रेस के विधायक थे तब वह पाक साफ थे और भाजपा में शामिल होते ही अपराधी हो गये हैं। इस चुनाव प्रचार के दौरान मुख्यमंत्री और उनके सहयोगियों ने कांग्रेस के छः बागियों के भाजपा में शामिल होने को बिकाऊ होने की संज्ञा देते हुये पूरा चुनाव इसी मुद्दे पर केंद्रित करने का प्रयास किया है। इसी प्रयास में इन बागियों को भू-माफिया और खनन माफिया तक करार दिया है। धर्मशाला में सुधीर शर्मा को भू -माफिया करार देते हुये मुख्यमंत्री ने यहां तक आरोप लगाया है कि सुधीर शर्मा ने 82 संपत्तियों में अपने ड्राइवर के नाम पर निवेश किया है। मुख्यमंत्री के इन आरोपों का जवाब देते हुये पलटवार करके जो आरोप सुक्खू पर दस्तावेजी प्रमाणों के साथ लगाये हैं वह बहुत गंभीर है। बागियों को बिकाऊ करार देने को लेकर मुख्यमंत्री के खिलाफ आपराधिक मानहानि के मामले दायर हैं। आने वाले दिनों में यह मामले किस हद तक कैसे आगे बढ़ते हैं इस पर सब की नज़रें लगी रहेंगी। सुधीर शर्मा ने जो आरोप मुख्यमंत्री के खिलाफ लगाये हैं उनके दस्तावेजी प्रमाण और पूरा खुलासा जनता में किस तरह सामने आता है यह देखना रोचक होगा। लेकिन यह तय है कि इस चुनाव प्रचार में दोनों पक्ष जिस हद तक जनता के सामने आ गये हैं उससे पीछे हटना किसी के लिये भी संभव नहीं होगा।
शिमला/शैल। इन चुनावों के चुनाव प्रचार का आकलन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने इसमें छः विधानसभा उपचुनावों को लोकसभा चुनाव से ज्यादा अधिमान दिया है। क्योंकि विधानसभा उपचुनाव का आने वाले समय में सरकार की सेहत पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। इस संभावित प्रभाव के साये में चल रही कांग्रेस ने जहां शिमला मण्डी में रणनीतिक भूलें की वहीं पर हमीरपुर और कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशियों के खिलाफ रस्मी आक्रामकता से आगे नहीं बड़े। जबकि हमीरपुर में अनुराग के खिलाफ दिल्ली में वृन्दा करात द्वारा उठाया गया मामला अपने में अभी भी गंभीर बना हुआ है। लेकिन पूरे चुनाव प्रचार में इस मुद्दे का एक बार भी कहीं जिक्र तक नहीं आया। इसी तरह कांगड़ा में केंद्रीय सहकारी बैंक द्वारा ऊना की एक ब्रांच के माध्यम से लाहौल-स्पीति में दिया गया ऋण एक बड़ा मुद्दा रहा है। इस मुद्दे की आंच तो एक समय शान्ता कुमार तक पहुंच गई थी। यह मुद्दे मुख्यमंत्री से लेकर नीचे तक हर प्रमुख कांग्रेस नेता के संज्ञान में रहे हैं। लेकिन चुनाव प्रचार में इस पर किसी ने सवाल तक नहीं उठाया। बल्कि कांगड़ा में आनन्द शर्मा की स्वीकार्यता बनाने के लिए मुख्यमंत्री को यह कहना पड़ा कि यदि नरेन्द्र मोदी बनारस से चुनाव लड़ सकते हैं तो आनन्द कांगड़ा से क्यों नहीं। कांगड़ा और हमीरपुर में कांग्रेस का चुनाव प्रचार आक्रामक होने की बजाये रक्षात्मक रहा है और यही नुकसानदेह होने की प्रबल संभावना है। दूसरी ओर इन दोनों क्षेत्रों में हो रहे विधानसभा चुनाव के लिये पूरी आक्रामकता के साथ मुख्यमंत्री ने यह परोसा की यह लोग पन्द्रह-पन्द्रह करोड़ में बिक गये हैं। इस पर मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानि के मामले दायर हो गये हैं। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुये मुख्यमंत्री ने सुधीर शर्मा को भू-माफिया की संज्ञा देते हुये यह आरोप लगा दिया कि उसने अपने ड्राइवर के नाम पर 10 करोड़ की 82 संपत्तियां खरीदी है। लेकिन इस आरोप के कोई प्रमाण जारी नहीं किये। इसके जवाब में सुधीर शर्मा ने पूरे दस्तावेजी प्रमाणों के साथ मुख्यमंत्री के खिलाफ हमला बोला है। सुधीर शर्मा के आरोपों के परिणाम दूरगामी और गंभीर होंगे। यही नहीं बड़सर में 55 लाख रुपये मिलने के एक मामले को मुख्यमंत्री ने अपने ब्यानों में यहां तक उछाला है कि इस कथित कैश को लखनपाल के नाम तक लगा दिया। मुख्यमंत्री द्वारा यह आरोप लगाये जाने के बाद नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर बड़सर गये। जयराम ठाकुर ने जनसभा में यह कहा कि उन्होंने यह कथित 55 लाख पकड़े जाने की घटना का मीडिया और प्रशासन के माध्यम से यह जानकारी जुटाने का प्रयास किया कि किस से यह 55 लाख किस अधिकारी ने पकड़े हैं। किस थाने में इसको लेकर मामला दर्ज हुआ है। जयराम ठाकुर ने भरी सभा में यह कहा है कि उनको मिली जानकारी के अनुसार ऐसी कोई घटना घटी ही नहीं है। जयराम ने मुख्यमंत्री के इस आरोप को कोरा झूठ करार दिया है। जयराम का यह खुलासा पूरे प्रदेश में फैल गया है। चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री के नाम पर नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा कोरा झूठ बोलने का आरोप लगना सारे परिदृश्य को ही बदल देता है। सुधीर के आरोपों के साथ जयराम ठाकुर का यह खुलासा पूरे चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है।क्या विधानसभा उपचुनावों के लिये सरकार और कांग्रेस भी बराबर की जिम्मेदार नहीं है
शिमला/शैल। चुनाव प्रचार अन्तिम चरण में पहुंच चुका है। कांग्रेस और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व प्रदेश में चुनावी रैलियां संबोधित कर गया है। इससे दोनों पार्टियों के राष्ट्रीय एजेंडे सामने आ चुके हैं। लेकिन क्या प्रदेश में राष्ट्रीय एजेंडे कहीं चुनाव का मुद्दा बन भी पाये हैं यह अपने में बड़ा सवाल हो गया है। क्योंकि प्रदेश में लोकसभा के साथ ही विधानसभा के लिये हो रहे छः उपचुनाव ने चुनावी एजेंडे को ही बदल दिया है। विधानसभा के लिये हो रहे छः उपचुनावों पर प्रदेश सरकार का भविष्य टिका हुआ है। यह छः उपचुनाव राज्यसभा में चुनाव में कांग्रेस के छः और तीन निर्दलीयों द्वारा भाजपा के पक्ष में वोटिंग करने से उत्पन्न स्थिति के कारण हो रहे हैं। इन नौ लोगों के भाजपा के पक्ष में वोट करने से राज्यसभा में कांग्रेस और भाजपा के 34-34 वोट हो गये थे और पर्ची के माध्यम से चुनाव परिणाम का फैसला होने से यह निर्णय भाजपा के पक्ष में आ गया। इस परिणाम के बाद कांग्रेस ने अपने छः लोगों को दल बदल कानून के तहत सदन की सदस्यता से बाहर कर दिया। लेकिन तीन निर्दलीयों को कानूनी दाव पेचों में उलझाकर आज तक उनके त्यागपत्र स्वीकार नहीं किये हैं। जबकि छः कांग्रेसियों ने अपने निष्कासन और तीनों निर्दलीयों ने त्यागपत्र देने के बाद भाजपा ज्वाइन कर ली थी। भाजपा ने सभी नौ लोगों को उपचुनाव के लिए अपना उम्मीदवार भी बना दिया था। यदि निर्दलीयों की तर्ज पर ही कांग्रेस के छः लोगों के खिलाफ भी कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेकर उनके भाजपा में जाने को लटका दिया जाता तो शायद यह छः उपचुनाव न हो रहे होते। लेकिन ऐसा इसीलिये नहीं किया गया क्योंकि उनके जाने से सरकार को कोई खतरा नहीं था। आज इन छः का भाजपा में जाना चुनाव का कांग्रेस की ओर से मुख्य मुद्दा बना हुआ है। यदि कांग्रेस के पास यह मुद्दा न आता तो किन मुद्दों पर लोकसभा चुनाव लड़ा जाता। निश्चित रूप से तब सरकार की पन्द्रह माह की परफारमैन्स और विधानसभा चुनाव में दी गयी गारंटीयां इस समय बड़े सवाल होते। सरकार द्वारा पन्द्रह माह में दिया गया कर्ज चर्चा का विषय होता। भ्रष्टाचार न तो जयराम सरकार के समय में कोई मुद्दा रहा और न ही अब सुक्खू सरकार के समय में कोई मुद्दा है। जयराम ने भाजपा के आरोप पत्रों पर कोई कार्यवाही नहीं की। ठीक उसी तर्ज पर आज सुक्खू सरकार भी कांग्रेस के आरोप पत्र पर कोई कारवाई नहीं कर रही है। बल्कि मुख्यमंत्री जिस तरह धन बल के सहारे सरकार गिराने के प्रयास करने का आरोप भाजपा पर लगा रहे हैं उसका कोई ठोस जवाब दिया जा रहा है। अभी धर्मशाला में मुख्यमंत्री ने सुधीर शर्मा पर भू-माफिया होने के जो आरोप लगाये हैं और सुधीर शर्मा ने दस्तावेजी प्रमाणों के साथ मुख्यमंत्री को घेरा है उस पर भी भाजपा नेतृत्व की चुुप्पी अपने में बहुत कुछ बयां कर जाती है। इस चुप्पी से यह संकेत उभर रहे हैं कि दोनों पार्टियों में लोकसभा और विधानसभा को लेकर कोई अघोषित सहमति है। चारों लोकसभा सीटों पर कांग्रेस की कार्यशैली से यह संदेह पुख्ता हो जाता है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सारे वायदों के बावजूद के 0.6% के अंतर से सरकार की जीत हुई है और पन्द्रह माह में इस अन्तर को सरकार बड़ा नहीं कर पायी है।
सुक्खू के खुलासे की प्रासंगिकता पर उठने लगे सवाल
भाजपा में शामिल हुये कांग्रेस के बागीयों की राजनीतिक सुरक्षा की जिम्मेदारी अनचाहेे ही अनुराग-धूमल पर आ गयी।
सुक्खू का खुलासा कहीं बैक फायर न कर जाये उठने लगी आशंका
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह ने एक चुनावी जनसभा में खुलासा किया है की प्रेम कुमार धूमल को 2017 में एक षडयंत्र करके सुजानपुर से टिकट देकर हरवाया गया था। स्मरणीय है कि 2017 में धूमल ने सुजानपुर में राजेन्द्र राणा के खिलाफ चुनाव लड़ा था और बड़े ही कम अन्तर से यह चुनाव हार गये थे। तब वह प्रदेश के मुख्यमंत्राी थे। राजेन्द्र राणा कांग्रेस के उम्मीदवार थे। 2017 में यदि धूमल न हारते तो जयराम की जगह वह प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। सुजानपुर में धूमल के साथ क्या षडयंत्र हुआ था इसका कोई विस्तृत खुलासा तो सुखविंदर सिंह सुक्खू ने नहीं किया है। लेकिन प्रदेश के राजनीतिक हल्कों में एक ऐसी बहस को छेड़ दिया है जिसके परिणाम दूरगामी होंगे। सुक्खू भी धूमल की तरह हमीरपुर जिले से ही ताल्लुक रखते हैं। जिस राजेन्द्र राणा ने धूमल को हराकर मुख्यमंत्री की कुर्सी मण्डी जाने के हालात पैदा किये थे आज वही राणा सुक्खू के खिलाफ हुई बगावत का मुख्य किरदार है। ऐसे में राणा के प्रति सुक्खू का रोष और आक्रोश अपनी जगह जायज है। लेकिन इस खेल में धूमल को इस तरह एक चुनावी जनसभा में इंगित करना एक बहुत बड़ी राजनीतिक चाल है। क्योंकि 2017 में चुनाव हारने के बाद वह आज तक पार्टी नेतृत्व के साथ न प्रदेश में और न ही केंद्र में किसी टकराव में आये हैं। हालांकि उनके खिलाफ इस दौरान मानव भारती विश्वविद्यालय के प्रकरण को उछाला गया था। उसके परिणाम दूरगामी और घातक होते यदि दस्तावेज साक्ष्य उनके खिलाफ होते। इस प्रकरण को उछालने वालों को इन साक्ष्यों की जानकारी ही नहीं थी और उस समय जयराम प्रशासन की भी यही सबसे बड़ी भूल थी।
लेकिन आज धूमल के खिलाफ 2017 में हुये षडयंत्र का प्रसंग चुनावी जनसभा में उछाल कर सुक्खू क्या हित साधना चाहते हैं यह राजनीतिक विश्लेषकों के लिये एक बड़ा सवाल बन गया है। क्योंकि आज राजेन्द्र राणा अपने राजनीतिक भविष्य को दांव पर लगाकर भाजपा में शामिल हुये हैं। कांग्रेस में राज्यसभा चुनाव के दौरान हुआ क्रॉस वोटिंग का खेल भाजपा प्रायोजित था यह कांग्रेस का आज सबसे बड़ा आरोप और इस चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बना हुआ है। क्योंकि भाजपा ने सभी क्रॉस वोटिंग करने वालों को इस चुनाव में प्रत्याशी बनाया है। हालांकि इसके लिये प्रदेश भाजपा में थोड़ा रोष भी देखने को मिला है। भाजपा में सब केन्द्र की अनुमति के बाद हुआ है। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की किसी प्रदेश सरकार को अस्थिर करना भाजपा की राजनीतिक आवश्यकता बन गया था और इसके लिये हिमाचल सबसे उपयुक्त स्थान था। क्योंकि यहां पर विधायकों में नेतृत्व के खिलाफ रोष के स्वर सार्वजनिक होते जा रहे थे और हाईकमान के संज्ञान तक आ चुके थे। भाजपा की यह आवश्यकता इसलिये थी क्योंकि उसे व्यवहारिक रूप से कांग्रेस को अक्षम प्रमाणित करना था। इसी के लिये कांग्रेस के नेताओं को भाजपा में शामिल करवाया जा रहा था।
इस परिप्रेक्ष में यह कहना गलत होगा कि हिमाचल में जो कुछ घटा उस पर भाजपा हाईकमान की स्वीकृति और निर्देशन नही था। ऐसे में आज प्रदेश भाजपा का कोई भी बड़ा नेता केंद्र द्वारा निर्देशित किसी की योजना का विरोध करने की कल्पना भी नहीं कर सकता। निर्दलीय विधायकों के प्रकरण में आयी जटिलता के लिये प्रदेश नेतृत्व कितना जिम्मेदार है और छः बागियों के भाजपा उम्मीदवार बनने के बाद चुनाव में कौन परोक्ष/ अपरोक्ष में भीतरघात करने की जद में आता है इस पर कई स्तरों पर निगरानी चल रही है। कांग्रेस भाजपा पर धन बल के सहारे सुक्खू सरकार को गिराने के प्रयास करने के आरोप लगा रही है। लेकिन प्रदेश भाजपा के कई बड़े नेता इन आरोपों पर मौन साधकर चले हुये हैं। मुख्यमंत्री सुक्खू ने इसी मौन पर धूमल के माध्यम से प्रहार करने का प्रयास किया है ताकि भाजपा के अपने भीतर परोक्ष में एक वाकयुद्ध की स्थिति उभर जाये। वैसे आज तक सुक्खू ने धूमल-अनुराग के खिलाफ कभी जुबान नहीं खोली है और न ही धूमल-अनुराग ने सुक्खू पर कभी कोई निशाना साधा है।
ऐसे में सुक्खू के धूमल पर अपरोक्ष निशानों का असर क्या होता है यह देखने लाईक होगा। क्योंकि हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में यदि किसी भी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा को कोई परेशानी या फिर हार का सामना करना पड़ता है तो उसकी सीधी जिम्मेदारी धूमल-अनुराग पर आ जायेे इसकी पृष्ठभूमि सुक्खू के खुलासे ने तैयार कर दी है। अब तक कांग्रेस और भाजपा में हमीरपुर क्षेत्र ए बी टीमें होने के जो आरोप लगते थे सुक्खू के खुलासे ने उसे पुखता कर दिया है। क्योंकि सुक्खू के ब्यान ने भाजपा में बैठे धूमल-अनुराग विरोधियों को भी मुखर होने का मौका दे दिया है।