शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने अभी सस्ते राशन के नाम पर मिलने वाले आटे के दाम 2.70 पैसे और चावल 3 रूपये किलो बढ़ा दिये हैं। सीमेंट के दाम दस रूपये बढ़ा दिये हैं। नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा है कि इस कांग्रेस सरकार के शासन में सीमेंट के दाम 70 रूपये प्रति बैग बढ़ाये गये हैं। नेता प्रतिपक्ष ने यह भी कहा है कि जितना कर्ज उन्होंने पूरे कार्यकाल में लिया था उतना इस सरकार ने पौने दो साल में ही ले लिया है। जिस सरकार को सस्ते राशन के दाम बढ़ाने पड़ जाये उसकी हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है। सरकार प्रतिमाह एक हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज ले रही है। इतना कर्ज लेने के बाद भी सरकार कर्मचारियों, पैन्शनरों के देह भते और संशोधित वेतनमान के एरियर नहीं दे पायी है। इंजीनियरिंग कॉलेजों में बच्चों को पढ़ाने के लिये अध्यापक नहीं है। बच्चों को अपने आप पढ़ने के लिए कहा गया है। जब तकनीकी शिक्षा मंत्री राजेश धर्माणी से इस बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि टीचर भर्ती करने में डेढ़ वर्ष लगेगा। क्योंकि सरकार के पास पैसा नहीं है। जब संबंधित विभाग का मंत्री यह कहेगा तो उससे पूरी सरकार की कथनी और करनी का पता चल जाता है। कड़ी मेहनत कर प्रवेश परीक्षा में मैरिट के आधार पर बच्चों को सरकारी कॉलेजों में दाखिला मिला है और मंत्री यह कहे कि सरकार ने बच्चों को दाखिला लेने के लिये नहीं कहा था तो इससे सरकार की युवाओं के प्रति संवेदनशीलता और उसकी घोषणाओं का व्यवहारिक सच सामने आ जाता है।
सरकार ने विभिन्न सेवाओं और वस्तुओं के दाम बढ़ाकर पांच हजार करोड़ से अधिक का राजस्व जुटाने का दावा किया है। कर्ज और दाम बढ़ाने के बाद भी जो सरकार कॉलेज में अध्यापकों का प्रबन्ध करने को प्राथमिकता न माने उसके बारे में आम आदमी क्या राय बनायेगा इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। ऐसी वस्तुस्थिति में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि आखिर इस पैसे का निवेश हो कहां रहा है? कांग्रेस का हर नेता इस पर चुप है क्योंकि हाईकमान का डर है। विपक्ष सरकार की इस स्थिति पर केवल रस्म अदायगी के लिये ब्यानबाजी कर रहा है। गंभीर मुद्दों पर विपक्ष की चुप्पी सन्देहास्पद है। सरकार ने जब पिछले छः माह के फैसले पलटते हुये सैकड़ो संस्थान बन्द कर दिये थे तब उस पर पूरे प्रदेश में हंगामा खड़ा करने के बाद उच्च न्यायालय में इस संद्धर्भ में याचिका दायर की थी। उसके बाद मुख्य संसदीय सचिवों के मामले में भाजपा के एक दर्जन नेताओं ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इस याचिका पर लम्बे समय से फैसला सुरक्षित चल रहा है। भाजपा नेताओं को याचिकाकर्ता होने के नाते यह हक हासिल है कि यह फैसला शीघ्र सुनाये जाने की अदालत से गुहार लगाये। लेकिन भाजपा चुप है क्यों? यही नहीं विधानसभा उपचुनावों के दौरान सुधीर शर्मा ने नादौन एचआरटीसी द्वारा बनाये जा रहे ई-बस स्टैंड की जमीन खरीद का मामला उठाया था लेकिन अब पूरी भाजपा इस पर चुप है। देहरा में भाजपा प्रत्याशी होशियार सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी कमलेश ठाकुर के चुनाव शपथ पत्र पर गंभीर शिकायत दर्ज कराई थी। इस पर होशियार सिंह और पूरा भाजपा नेतृत्व खामोश है। जबकि इन मामलों की गंभीरता समझने वाले जानते हैं कि इनके उठने से प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल जायेगा।
आज जब सरकार को संपन्नता के नाम पर आम आदमी की सुविधाओं में कटौती करनी पड़ रही है तब क्या यह सवाल विपक्ष को नहीं पूछना चाहिये की आखिर पैसे का निवेश हो कहां रहा है? क्या सरकार सही में फिजूल खर्ची कर रही है? जनता के मुद्दों पर विपक्ष की चुप्पी का अर्थ है सरकार को अघोषित समर्थन। यदि भाजपा द्वारा अदालत तक पहुंचाये गये मुद्दे सही में उसकी नजर में अर्थहीन है तो उन्हें तुरन्त प्रभाव से वापस लेकर सरकार को बिना किसी रुकावट के काम करने देना चाहिये। यदि भाजपा अपने में बंटी हुई है तो उसे यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लेना चाहिये। यह सही है कि विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने सामूहिक नेतृत्व के नाम पर लड़ा था। इसलिये जनता कांग्रेस को सत्ता में लायी थी। आज कांग्रेस का नेतृत्व किस तरह से परफारम कर रहा है उसे झेलना जनता की मजबूरी है लेकिन जनता की इस मजबूरी का स्वभाविक लाभ भाजपा को ही मिलेगा इसे गारंटी नहीं समझा जाना चाहिये। आज इस वित्तीय वर्ष के सात माह शेष बचे हैं अगले दो माह में सरकार की कर्ज लेने की सीमा भी पूरी हो जायेगी। उसके बाद सरकार कैसे चलेगी यह इस समय का गंभीर मुद्दा है। क्या इस मुद्दे पर इस विधानसभा सत्र में चर्चा हो पायेगी इस पर पूरे प्रदेश की निगाहें लगी रहेगी।
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालते ही प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी दी थी। प्रदेश की जनता ने इस चेतावनी पर कोई सवाल नहीं उठाये। सरकार ने इस चेतावनी का कवर लेकर प्रदेश की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिये जो कदम उठाये उन कदमों के तहत मध्यम वर्ग को मिल रही सुविधाओं पर कटौती की जाने लगी। जो आज सस्ते राशन के दाम बढ़ाने तक पहुंच गयी है। इस कटौती के साथ ही प्रदेश पर कर्ज भार भी बढ़ने लगा। लेकिन इन सारे कदमों के साथ सरकार अपने खर्चों पर लगाम नहीं लगा पायी। सरकार के बड़े अधिकारियों के खिलाफ बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगे। लेकिन कोई जांच नहीं हुई। उल्टा जब मीडिया ने इन मामलों को उठाया तो मीडिया को ही डराने धमकाने का चलन शुरू हो गया। भ्रष्टाचार की जो शिकायतें मुख्यमंत्री के पास भी पहुंची उन पर भी कोई कारवाई नहीं हुई। कुल मिलाकर हालात यहां तक पहुंच गये की सरकार पर मित्रों की सरकार होने का तगमा लग गया। यह स्वभाविक है कि जब परिवार संकट में होता है तो सबसे पहले परिवार का मुखिया अपने खर्चों में कटौती करता है तब परिवार उसकी बात पर विश्वास करता है। लेकिन सुक्खू सरकार इस स्थापित नियम पर न चलकर कर्ज लेकर घी पीने के रास्ते पर चल पड़ी।
सरकार और कर्मचारी एक दूसरे का पूरक होते हैं। फिर आज तो कर्मचारियों का हर वर्ग संगठित है। कर्मचारियों में भी सचिवालय के कर्मचारी तो पूरे तंत्र का मूल होते हैं। क्योंकि सरकार का हर फैसला सचिवालय में ही शक्ल लेता है। सचिवालय का कर्मचारी रूल्स ऑफ बिजनेस का जानकार होता है। इस कर्मचारी को सरकार की वित्तीय स्थिति और फिजूल खर्ची दोनों की एक साथ जानकारी रहती है। जब सचिवालय के कार्यरत कर्मचारी यह देखता है कि अफसरशाही और राजनेताओं के खर्चों में तो कोई कटौती नहीं हो रही है बल्कि पहले से ज्यादा बढ़ गये हैं और उसके जायज देय हकों की अदायगी करने के लिये कठिन वित्तीय स्थिति का तर्क दिया जा रहा है। तब वह सारे हालात पर अलग से सोचने पर मजबूर हो जाता है। आज सचिवालय कर्मचारी संघ सरकार की कथनी और करनी के अन्तर देखकर अपनी मांगों के लिये आवाज उठाने पर विवश हुआ है। सचिवालय के कर्मचारियों के पास हर मंत्री और अधिकारी की तथ्यात्मक जानकारी रहती है। इसी कर्मचारी ने सरकार की फजूल खर्ची का आंकड़ों सहित खुलासा आम आदमी के सामने रखा है। इसी कर्मचारी के माध्यम से यह बाहर आया है कि आपदा राहत का 114 करोड़ रूपया लैप्स हो गया है। आपदा राहत के नाम पर प्रदेश सरकार केंद्र पर किस तरह हमलावर थी यह पूरा प्रदेश जानता है। यदि 114 करोड़ लैप्स होने का खुलासा सही है तो इससे सरकार की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लग जाता है।
मंत्रियों के कार्यालयों पर करोड़ों रुपए खर्च करने का खुलासा इसी सचिवालय कर्मचारियों ने किया है। कमरे के फोटो तक बाहर आये हैं। जब मंत्रियों के कार्यालय पर खर्च हो रहा है तो उसी कड़ी में मुख्यमंत्री कार्यालय पर भी 19 करोड़ खर्च करने का खुलासा इसी सचिवालय कर्मचारी संघ ने सामने रखा है। महंगी गाड़ियों और दूसरे खर्चों पर पूरी बेबाकी से इन कर्मचारियों ने खुलासा सामने रखा है। जो कुछ सरकार की फजूल खर्ची को लेकर कहा गया है वह पूरे प्रदेश में हर आदमी तक पहुंच गया है। सरकार की ओर से फिजूल खर्ची के आरोपों पर कोई स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। ऐसा पहली बार हुआ है कि कर्मचारी आंदोलन की शुरुआत सचिवालय कर्मचारी संघ से हुई है। लेकिन सरकार ने वार्ता के लिये सचिवालय कर्मचारियों को न बुलाकर दूसरे कर्मचारी नेताओं को बुलाया है। क्या सरकार इस तरह कर्मचारियों को विभाजित कर पायेगी इसका पता तो आने वाले दिनों में लगेगा। सचिवालय कर्मचारी संघ विधानसभा सत्र के बाद किस तरह की रणनीति अपनाते हैं यह भी आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जायेगा। लेकिन कर्मचारियों ने सरकार की फिजूल खर्ची पर आंकड़ों सहित जो आरोप लगाये हैं वह पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गये हैं। यदि सरकार ने अपने खर्चों पर क्रियात्मक रूप से कटौती न की तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
शिमला/शैल। प्रदेश में हुए नौ विधानसभा उपचुनावों में छः पर जीत दर्ज करके कांग्रेस जिस तरह से नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर पर आक्रामक हुई है उससे प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में अलग तरह की चर्चाएं चल पड़ी हैं। कांग्रेस का हर नेता यह तंज कस रहा है की जय राम अब सरकार गिरने की तारीखों की भविष्यवाणी नहीं कर रहे हैं। यह उपदेश दिया जा रहा है कि उन्हें सरकार को रचनात्मक सहयोग देना चाहिए। कांग्रेस यह नॉरेटिव उस समय प्रसारित कर रही है जब सरकार के वित्तीय संकट को लेकर हर दिन स्थितियां गंभीर होती जा रही है। मुख्यमंत्री और लोक निर्माण मंत्री दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और भूतल परिवहन मंत्री से मिलकर विभिन्न मुद्दों में प्रदेश को वित्तीय सहायता देने की गुहार लगा चुके हैं। इस गुहार पर केंद्र से क्या मिलता है इसका पता आने वाले दिनों में लगेगा। यदि केंद्र से कोई अतिरिक्त सहायता नहीं मिल पाती है तो सरकार को अपने कर्मचारियों को वेतन और पैन्शन का नियमित भुगतान कर पाना कठिन हो जाएगा। इस वित्तीय संकट के लिए पूर्व सरकार को दोषी ठहराया जा रहा है। लेकिन यह दोष सिद्धांत के रूप से आगे नहीं बढ़ पा रहा है क्योंकि यह सरकार पूर्व सरकार के ऐसे कार्यों को चिन्हित नहीं कर पार्यी है जिन्हें अनावश्यक कर्ज लेकर पूरा किया गया हो और वास्तव में उनकी व्यवहारिक आवश्यकता ही नहीं थी।
एक ओर केंद्र से सहायता की गुहार लगाई जा रही है तो दूसरी और धनबल के सहारे ऑपरेशन लोटस चलाकर सुक्खू सरकार को गिराने के प्रयासों का आरोप लगाया जा रहा है। ऑपरेशन लोटस की जांच को जिस तेजी के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है उसके दस्तावेजी प्रमाण यदि सुक्खू सरकार सही में खोज लायी और अदालती परीक्षा में प्रमाणित कर पायी तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा और केंद्र सरकार की ऐसी फजियत होगी कि उसके नुकसान की भरपाई कर पाना भाजपा के लिए संभव नहीं रह जाएगा। इस परिप्रेक्ष में यदि वर्तमान राजनीतिक स्थितियों का निष्पक्ष आकलन किया जाये तो कुछ इस तरह के प्रश्न उभरते हैं। पहला प्रश्न आता है कि जब प्रदेश की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है तो यह सरकार अपने खर्चों पर अंकुश क्यों नहीं लगा पा रही है? इस समय मुख्य संसदीय सचिवों की व्यवहारिक रूप से आवश्यकता ही कहां है। इसी के साथ इतने सलाहकारों और ओएसडी की आवश्यकता कैसे है। इस समय हिमाचल भवन दिल्ली में आधा दर्जन से अधिक ऐसे लोग बिठा दिए गए हैं जिनकी वहां आवश्यकता ही नहीं है। सरकार जब तक अपने खर्चों पर अंकुश नहीं लगाएगी तब तक उसकी जन विश्वसनीयता नहीं बन पाएगी। कुशल राजनीतिक प्रबंधन से अर्जित की गई चुनावी सफलता विश्वसनीयता का पर्याय नहीं बन पाती है। यह एक स्थापित सच है। इसलिए उपचुनावों की जीत से वास्तविक समस्याएं हल नहीं हो जाती हैं।
इस समय इसी चुनावी जीत के दौरान ईडी और आयकर एजैन्सियों ने प्रदेश में दखल दिया है। जिन कारोबारियों के यहां छापेमारी हुई है वह ईडी के बुलावे पर सूत्रों के मुताबिक अगली जांच कारवाई में शामिल नहीं हो पाये हैं। मेडिकल भेज कर अगला टाइम मांगा जा रहा है। ऐसा शायद इसलिए हो रहा है कि आकाओं ने भरोसा दिलाया है कि सारा प्रबंध हो जाएगा। ऐसा वहां पर सुनने को मिल रहा है। जो कुछ छापेमारी में मिलने की चर्चाएं हैं उनके अनुसार इसका आकार बहुत बड़ा है। इसमें कुछ विभागों के अधिकारियों के स्तर पर ढील बरते जाने की भी चर्चाएं हैं। ऐसे में यह तय है कि जब ईडी ने छापेमारी करके रिकार्ड कब्जे में लिया तो उसको खंगालने के बाद ईडी आगे बढ़ेगी ही। यह भी स्पष्ट है कि जिस जमीन के राजस्व अन्दराज में ताबे हकूक बर्तन-बर्तनदारान दर्ज हो और जमीन गैर मुमकिन दरिया या खड्ड हो तो ऐसी जमीन की खरीद बेच स्वतः ही सवालों के घेरे में आ जाती है। इसलिए नादौन और हमीरपुर में हुई छापेमारी के अंतिम परिणाम गंभीर होंगे। उसकी आंच राजनेताओं तक पहुंचाने की संभावनाओं से इन्कार नहीं किया जा सकता। फिर राज्यसभा चुनाव में हुई क्रॉस वोटिंग के दौरान कांग्रेस के रिश्तों की संख्या पन्द्रह तक होने की चर्चाएं मीडिया में लंबे समय से उठती आ रही है। अभी मुख्य संसदीय सचिवों के मामले का फैसला उच्च न्यायालय से आना ही है। यह फैसला घोषित होने में जितना ज्यादा समय लग रहा है इसको लेकर उठ रही चर्चाओं का आकार भी उतना ही बढ़ता जा रहा है।
इस सबको एक साथ रखकर देखने से जो तस्वीर उभर रही है उसमें यह स्वभाविक होगा कि इस समय सबसे ज्यादा चिंताएं और चर्चाएं कांग्रेस के अपने अंदर दिल्ली से लेकर शिमला तक उठ रही होगी क्योंकि इसका हर तरह का पहला असर कांग्रेस पर ही होना है। यह एक ऐसी स्थिति बनती जा रही है जहां पर यदि भाजपा नेतृत्व भी बचाव में खड़ा हो जाए तो भी यह सब रुकेगा नहीं बल्कि अपनों का ध्यान बंटाने के लिए नेता प्रतिपक्ष पर तंज कसना और मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चाएं चलाना एक ध्यान बंटाने की रणनीति से अधिक कुछ नहीं होगा। बल्कि यह संभव है कि कल को नेता प्रतिपक्ष और पूरा भाजपा नेतृत्व ईडी प्रकरण पर कारवाई तेज करके सिर्फ फैसले तक पहुंचाने की मांग करने लग जाये और तब सरकार के गिरने की तारीखों से स्थिति आगे निकल जाये। क्योंकि जिस मामले के दस्तावेज साक्ष्य एक से अधिक स्थानों पर उपलब्ध हो तो उसके परिणाम स्वतः ही गंभीर हो जाते हैं।
शिमला/शैल। लोकसभा चुनावों के साथ प्रदेश विधानसभा के लिये छः उपचुनाव हुये थे। यह उपचुनाव दो हमीरपुर दो ऊना एक कांगड़ा के धर्मशाला और एक लाहौल स्पिति में हुआ था। लोकसभा की चारों सीटें हारने के बावजूद विधानसभा की छः में से चार पर कांग्रेस की जीत हुई थी। अब एक माह के भीतर ही विधानसभा के लिये तीन उपचुनाव हुये हमीरपुर, देहरा और नालागढ़ में। इनमें देहरा और नालागढ़ में कांग्रेस तो हमीरपुर में भाजपा की जीत हुई है। देहरा में मुख्यमंत्री की पत्नी कमलेश ठाकुर कांग्रेस की उम्मीदवार थी और पूरा चुनाव सरकार बनाम होशियार सिंह हो गया था। इस चुनाव के दौरान ही प्र्रदेश सरकार में मंत्रिमण्डल की बैठक में देहरा में एस.पी. ऑफिस और लोक निर्माण विभाग का अधीक्षण अभियन्ता कार्यालय खोलने का फैसला लेकर देहरा की जनता को यह सफल सन्देश दे दिया था कि मुख्यमंत्री की पत्नी को सफल बनाकर देहरा में विकास के दरवाजे खुल जायेंगे। कमलेश ठाकुर ने भी स्पष्ट ऐलान किया कि यदि नादौन में सौ रूपये खर्च होंगे तो देहरा में एक सौ एक खर्च होंगे। इन सन्देशों का वांच्छित प्रभाव पड़ा और देहरा में शानदार जीत हासिल हुई।
लेकिन इसी के साथ अपने ही गृह जिला के मुख्यालय हमीरपुर की सीट कांग्रेस नहीं जीत पायी। हमीरपुर भाजपा के खाते में गया। आशीष शर्मा फिर सफल हो गये। इस तरह हमीरपुर में हुये तीन उपचुनावों में से दो में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। लोकसभा में भी मुख्यमंत्री सुक्खू अपने चुनाव क्षेत्र नादौन में कांग्रेस को बढ़त नहीं दिला पाये हैं। नालागढ़ में अगर सैणी ने भाजपा से नाराज होकर निर्दलीय चुनाव न लड़ा होता तो शायद यहां भी कांग्रेस को जीत न मिल पाती। फिर इसी उपचुनाव में भाजपा के शीर्ष नेता पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने भाजपा के इस फैसले का समर्थन नहीं किया कि इन उपचुनावों में कांग्रेस के बागियों और निर्दलीय विधायकों को भाजपा में शामिल करके उनका चुनाव में प्रत्याशी बनाया जाता। इससे भाजपा देहरा में रमेश ध्वाला और रविंद्र रवि को सक्रिय रूप से चुनाव प्रचार में नहीं उतार पायी। इससे भाजपा में अनचाहे ही भीतरघात की परिस्थितियां पैदा हो गयी।
इस परिदृश्य में यह कहना ज्यादा सही नहीं होगा कि जनता ने कांग्रेस सरकार की नीतियों और नेतृत्व में विश्वास जताते हुये कांग्रेस को समर्थन दिया है। यदि ऐसा होता तो हमीरपुर में तीन में से दो सीटें भाजपा को न मिलती। इसलिये कांग्रेस और विशेष रूप से मुख्यमंत्री को आत्म चिंतन करने की आवश्यकता है। क्योंकि लोकसभा चुनावों के दौरान महिलाओं को पन्द्रह-पन्द्रह सौ देने की घोषणा की गयी उसके लिये फार्म भरवाने का काम चल पड़ा। अभी यह पन्द्रह सौ देने की योजना कब अमली रूप ले पाती है यह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि अभी उपचुनावों के परिणामों से पहले ही 125 यूनिट बिजली मुफ्त दिये जाने की योजना पर राईडर लगाने का फैसला मंत्रिमण्डल में ले लिया गया। यदि ऐसा फैसला इन उपचुनावों से पहले ही ले लिया जाता तो निश्चित तौर पर चुनाव परिणाम कुछ और होते। जब सरकार को 125 यूनिट बिजली मुफ्त दिये जाने के फैसले पर ही नये सिरे से समीक्षा करके संपन्न लोगों को इससे बाहर करना पड़ा है तो तय है कि तीन सौ यूनिट बिजली मुफ्त देने की गारन्टी का व्यवहारिक परिणाम क्या होगा।
इस चालू वित वर्ष के पहले तीन माह में ही सरकार तीन हजार करोड़ का कर्ज ले चुकी है और एक वर्ष में कर्ज लेने की सीमा 6200 करोड़ हो तो यह सीमा तो पहले छः महीने में पूरी हो जायेगी तो क्या छः महीने बाद सरकार को कर्मचारियों को वेतन और पैन्शनधारी को पैन्शन दे पाना भी कठिन नहीं हो जायेगा। भाजपा पहले ही सरकार पर पच्चीस हजार करोड़ का कर्ज अब तक ले चुकने का आरोप लगा चुकी है। लेकिन इस तरह की नाजुक वित्तीय स्थिति के चलते भी सरकार अपने खर्चे कम करने का कोई प्रयास नहीं कर रही है। आम आदमी को मिल रही सुविधाओं पर राईडर लगाकर आय बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि सरकार ने अपने खर्चों पर लगाम न लगायी तो मित्रों के बोझ से सरकार इतनी दब जायेगी की उठना संभव हो जायेगा। इस समय ही देहरा की जीत से हमीरपुर की हार का आकार बड़ा हो गया है क्योंकि गृह जिला की हार है। इस राजनीतिक परिदृश्य में केंद्रीय जांच एजैन्सियों आयकर और ईडी का प्रदेश में आना सारी वस्तुस्थिति को और गंभीर बना देता है। ईडी का आना केंद्र सरकार का दखल माना जा रहा है। सुक्खू के मंत्रियों की प्रतिक्रियाओं से यह सन्देश गया है कि भाजपा इनके माध्यम से सरकार को अस्थिर करना चाहती है। लेकिन ईडी की कार्यशैली पर नजर रखने वाले जानते हैं कि बिना ठोस आधार के ईडी कदम नहीं रखता है। फिर यहां तो विलेज कामन लैण्ड और वह भी लैण्ड सीलिंग सीमा से अधिक खरीदने के दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध है। इस तरह सारी स्थितियों का यदि एक साथ आकलन किया जाये तो लगता है कि निकट भविष्य में प्रदेश में कुछ बड़ा घटने वाला है। इसलिए अफसरशाहों की एक लम्बी कतार दिल्ली जाने के जुगाड़ में लग गयी है।