शिमला/शैल। चुनाव के दौरान में आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें चुनाव आयोग में आना एक स्वभाविक प्रतिक्रिया है। चुनाव के दिनों में सारा प्रशासन कुछ अर्थों में चुनाव आयोग के नियंत्रण में चला जाता है। ताकि चुनाव आयोग प्रशासन की निष्पक्षता सुनिश्चित कर सके। इसीलिए फील्ड में तैनात प्रशासनिक अधिकारियों को लेकर यह आदेश किया जाता है कि जिन अधिकारियों की तैनाती एक स्थान पर तीन वर्ष से अधिक की हो गयी है उन्हें वहां से बदल दिया जाये। चुनाव अधिकारी उसी चुनाव क्षेत्र का मतदाता नहीं होना चाहिये यह भी शायद नियम है। यह भी देखा जाता है कि कौन सा अधिकारी अपनी तैनाती के कारण मतदाता को ज्यादा से ज्यादा प्रभावित कर सकता है। इस समय शिमला सोलन और सिरमौर में तैनात जिलाधीश संयोगवश शिमला लोकसभा क्षेत्र के ही मतदाता हैं। शिमला में तैनात एसपी भी इसी क्षेत्र से मतदाता है। यह मतदाता होने का संज्ञान लेकर प्रदेश भाजपा ने चुनाव आयोग से इनकी शिकायत करके उन्हें यहां से तुरन्त बदलने का आग्रह किया। यह शिकायत एक माह पहले की गई थी। लेकिन इस पर अब तक कोई कारवाई नहीं हो पायी है और न ही भाजपा की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है। जबकि जब यह शिकायत की गई थी तो इस शिकायत की प्रति प्रैस को भी जारी की गयी थी। इस शिकायत के बारे में जब मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यकाल से जानकारी मांगी गई तो बताया गया कि यह शिकायत चुनाव आयोग को भेजी गयी है और वहां विचाराधीन है। चुनाव अधिसूचना जारी होने तक इस बारे में कोई फैसला हो पायेगा या नहीं इसको लेकर मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय कुछ नहीं कह पाया। इसी तरह एक शिकायत चुनाव आयोग को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के बद्दी में तैनात मुख्य अभियंता प्रवीण गुप्ता को लेकर पहुंची थी। आरोप लगाया गया है कि यह अधिकारी लम्बे अरसे से इसी क्षेत्र में तैनात है और प्रभावशाली है। इस पर चुनाव आयोग ने प्रदेश मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से रिपोर्ट मांगी थी। इस शिकायत पर निर्वाचन कार्यालय ने बताया कि प्रवीण गुप्ता चुनाव के किसी भी कार्य में संबद्ध नहीं है इसलिए उनको लेकर कोई कारवाई नहीं की गयी है।
शिमला/शैल। कांग्रेस अभी तक प्रदेश के दो लोकसभा क्षेत्रों और तीन विधानसभा क्षेत्रों के लिए उम्मीदवारों का चयन नहीं कर पायी है। इस चयन में हो रही देरी अब कांग्रेस की रणनीति के बजाये उसकी हताशा और भीतरी बिखराव करार दी जाने लगी है। क्योंकि हमीरपुर लोकसभा क्षेत्र से ही मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री आते हैं। हमीरपुर से मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी का नाम भी एक बार उम्मीदवार के रूप में चर्चा में आया और उन्होंने सेेरा विश्राम गृह में चार दिन का प्रवास करके लोगों से मिलकर इस संबंध में फीडबैक भी लिया। इस फीडबैक के बाद कमलेश ठाकुर के नाम की चर्चा वहीं पर रुक गयी। उसके बाद ऊना के पूर्व विधायक सतपाल रायजादा का नाम चर्चा में आया। रायजादा के नाम की चर्चा चल ही रही थी कि इसी बीच उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री और उनकी बेटी डॉ. आस्था अग्निहोत्री दोनों के नाम चर्चा में आ गये। दोनों को अलग-अलग ब्यान देकर इस संभावित उम्मीदवारी से इन्कार करना पड़ा। हमीरपुर सीट को लेकर यहां जो कुछ घटा उससे यही संदेश गया की हमीरपुर में कोई भी बड़ा नेता अनुराग ठाकुर को सही में चुनौती देने में समर्थ नहीं है। जबकि अनुराग ठाकुर राहुल गांधी के खिलाफ सबसे बड़े हमलावर हैं। अनुराग ठाकुर ने कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र को मुस्लिम लीग का घोषणा पत्र करार दिया है। लेकिन सुक्खू और उनका कोई भी मंत्री अनुराग को जवाब देने का साहस नहीं कर पाया। बल्कि कांग्रेस की हमीरपुर में ए और बी टीम चर्चा में आ गई। इससे अनचाहे या संदेश चला गया है कि कांग्रेस हमीरपुर में अनुराग ठाकुर को वाकओवर देना चाहती है।
कांगड़ा में रघुवीर बाली, आशा कुमारी, जगजीवन पाल, केवल सिंह पठानिया के नाम चर्चा में आये। रघुवीर बाली विधानसभा का चुनाव सबसे ज्यादा अंतर से जीते और मुख्यमंत्री के विश्वस्तों में गिने जाते हैं। इसलिए पर्यटन विभाग की जिम्मेदारी कैबिनेट रैंक में संभाल रहे हैं। लेकिन कांगड़ा से लोकसभा का उम्मीदवार होने के लिये वह भी तैयार नहीं हो पाये। इसके लिये राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम एक सार्वजनिक पत्र लिख बैठे। एक संभावित उम्मीदवार के इस तरह के पत्र के राजनीतिक मायने क्या होते हैं इस पर पार्टी में किसी की भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी। इसी बीच कांगड़ा से ही ताल्लुक रखने वाले ओबीसी के बड़े चेहरे और सबसे वरिष्ठ मंत्री चंद्र कुमार का एक ब्यान वायरल होकर बाहर आ गया। इस ब्यान में चंद्र कुमार ने पार्टी के मौजूदा संकट के लिये मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री दोनों को बराबर का जिम्मेदार ठहराया है। चुनाव के दौरान वायरल हुये इस ब्यान के राजनीतिक मायने समझे जा सकते हैं। क्योंकि कांग्रेस के बागी और भाजपा भी यही आरोप लगा रहे हैं कि मुख्यमंत्री अपने कुनबे को संभाल कर नहीं रख पाये हैं। इस पृष्ठभूमि में कांगड़ा से कोई सशक्त उम्मीदवार कैसे सामने आ पायेगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
यही नहीं तीन विधानसभा क्षेत्रों के लिये कांग्रेस ने जिन उम्मीदवारों की घोषणा की है उन में गगरेट और सुजानपुर में उन लोगों को उम्मीदवार बनाया है जिन्होंने अभी भाजपा छोड़कर कांग्रेस का हाथ पकड़ा है। यदि भाजपा में गये कांग्रेस के बागियों को भाजपा ने उम्मीदवार बनाया है तो कांग्रेस ने भी भाजपा का ही अनुसरण किया। यदि भाजपा में इस पर बगावत हो सकती है तो उसी गणित में कांग्रेस में क्यों नहीं। कुटलैहड से विवेक शर्मा को शायद इसलिये उम्मीदवार बनाया गया कि पिछले चुनाव में भूट्टो के लिए प्रचार करने के बजाये उन्होंने पूरे चुनाव में मुख्यमंत्री के क्षेत्र नादौन में ही काम किया था और कुटलैहड में वोट डालने ही आये थे। इस तरह इन टिकटों के आबंटन में कांग्रेस अपने ही तर्क में खुद फंसकर रह गयी है। माना जा रहा है की बडसर, धर्मशाला और लाहौल स्पीति में इसलिये चयन कठिन हो रहा है कि संगठन से कोई चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं हो रहा है।


शिमला/शैल। हमीरपुर लोकसभा सीट पर लम्बे अरसे से भाजपा का कब्जा चला आ रहा है। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर वहां से भाजपा सांसद हैं। अनुराग ठाकुर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के प्रखर और मुखर आलोचकों में गिने जाते हैं। इस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और इसके मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू हमीरपुर के नादौन क्षेत्र से आते हैं। उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ऊना के हरोली क्षेत्र से आते हैं। पिछले विधानसभा चुनावों में हमीरपुर से भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पायी थी। लेकिन अब जो राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस में बगावत उभरी उसका केन्द्र भी हमीरपुर और ऊना जिले ही रहे हैं। दोनों जिलों में कांग्रेस के दो-दो विधायकों ने राज्यसभा में क्रॉस वोटिंग करके बगावत को अंजाम दे दिया। हमीरपुर में तो निर्दलीय विधायक ने भी राज्यसभा में कांग्रेस के खिलाफ वोट कर दिया। इस क्रॉस वोटिंग के कारण राज्यसभा में मिली हार के बाद कांग्रेस के यह चारों विधायक दल-बदल कानून के तहत निष्कासित हो गये हैं। यह सब भाजपा में शामिल हो गये हैं भाजपा ने कांग्रेस के सभी बागियों को उपचुनाव में अपना उम्मीदवार भी नामजद कर दिया है।शिमला/शैल। कांग्रेस ने भाजपा की कंगणा रणौत के मुकाबले लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह को मण्डी से लोकसभा प्रत्याशी बनाया है। कंगणा एक स्थापित सिने तारिका है और मण्डी से ही आती है। कंगणा का परिवार भी राजनीतिक पृष्ठभूमि वाला है लेकिन विक्रमादित्य सिंह की राजनीतिक विरासत कंगणा ही नहीं बल्कि प्रदेश के अन्य राजनेताओं से भी भारी है। विक्रमादित्य प्रदेश के छः बार मुख्यमंत्री रहे और स्व वीरभद्र सिंह और मण्डी की वर्तमान सांसद प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा प्रतिभा सिंह के बेटे हैं। कंगणा पहली बार राजनीति में प्रवेश ले रही है जबकि विक्रमादित्य सिंह दूसरी बार विधायक बनकर इस बार मंत्री भी बन गये हैं। शैक्षणिक योग्यता में भी विक्रमादित्य कंगणा पर भारी है। क्योंकि कंगणा ज्यादातर तारिकाओं की तरह स्कूल से आगे नहीं गयी है। कंगणा का सारा ज्ञान सिने पाठशाला में पढ़े और भोगे पाठों पर आधारित है और उसी के आधार पर वह सफलता के मुकाम पर पहुंची है। जबकि विक्रमादित्य सिंह की शिक्षा दीक्षा विश्वविद्यालय के प्रांगण से बाहर राजनीति की व्यवहारिक जमीन पर भी हुई है। इसलिये व्यावहारिक तौर पर विक्रमादित्य सिंह चुनावी प्रांगण में निश्चित रूप से अपने प्रतिद्वन्दीयों से कहीं भारी है। लेकिन क्या चुनाव राजनीतिक और आर्थिक समझ के मानकों पर लड़ा जायेगा? शायद नहीं। यह चुनाव शह और मात की विरासत पर लड़ा जायेगा क्योंकि यह कोई धर्म युद्ध नहीं है। विक्रमादित्य भविष्य के नेता है और यह चुनाव जीतने के बाद वह स्थापित भी हो जायेंगे । यह स्थापित होना ही उन्हें कई अपनों और प्ररायों के लिये प्रतिद्वन्दी बना देगा। इस समय भाजपा ने इस चुनाव की जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री नेता प्रतिपक्ष जयराम को सौंप रखी है। इसलिये मण्डी में नाराज चल रहे नेताओं को मनाने जयराम उनके घरों तक दस्तक दे रहे है। इसी के साथ जयराम ने प्रतिभा सिंह और विक्रमादित्य को लेकर बागी विधायकों के सन्द्धर्भ में जो यह ब्यान दिया था कि पहले इन लोगों ने बागीयों को ब्यान देकर उकसाया और बाद में पलट गये । जयराम के अतिरिक्त भाजपा के और नेताओं ने भी इस ब्यान को दोहराया है। कंगणा रणौत ने भी यह दोहराया है कि विक्रमादित्य भाजपा मुख्यालय के चक्कर लगाते रहे है। जयराम ने यह भी कहा है कि विक्रमादित्य के चुनाव लड़ने पर वह और भी खुलासा करेंगे। जयराम और भाजपा के इन संकेतों से स्पष्ट हो जाता है कि वह इस चुनाव में प्रतिभा और विक्रमादित्य को खलनायक प्रमाणित करना चाहते है। यह शुरू से ही माना जा रहा था की मण्डी लोस चुनाव लड़ने की जिम्मेदारी अन्ततः हॉलीलॉज पर ही आयेगी। राज्यसभा प्रकरण पर भी पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट में कांग्रेस के संकट के लिये जिस तरह से प्रतिभा - विक्रमादित्य को जिम्मेदार ठहराने को प्रचारित और प्रसारित किया गया था उसके पीछे भी विश्लेष्कांे को एक तय एजैन्डा नजर आया था। अब उस एजैन्डे को जयराम और भाजपा के माध्यम से आगे बढ़ाये जाने की पूरी पूरी संभावना है। क्योंकि जयराम के ब्यानों का अभी तक किसी भी कांग्रेस नेता ने कोई जवाब नहीं दिया है। ऐसे में इस चुनाव में विक्रमादित्य सिंह स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के संपर्कों को कितना और कैसे भुना पाते हैं यह देखना दिलचस्प होगा। क्योंकि भाजपा और जयराम की यह राजनीतिक आवश्यकता बनती जा रही है कि वह इन्हीं चुनाव के दौरान सरकार को गिराने में सफल हो जाये। मण्डी का चुनाव भाजपा बनाम कांग्रेस होने के स्थान पर अपरोक्ष में जयराम के माध्यम से कांग्रेस का आपसी स्कोर सैटल करने का मैदान बनता नजर आ रहा है क्योंकि सरकार के पक्ष में उपलब्धियों के नाम पर धरातल पर कुछ नहीं है।