Thursday, 15 January 2026
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क्या मुर्गा और समोसा मुख्य मुद्दों से ध्यान हटा पायेंगे?

शिमला/शैल। क्या मुर्गे और समोसे प्रकरणों को चर्चा का केन्द्र बनाकर प्रदेश के मुख्य मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाया जा सकता है? क्या प्रशासन सरकार को सही राय नही दे रहा है? या मुख्यमंत्री किसी की सुनते ही नहीं हैं? यह सारे सवाल 11 दिसम्बर को बिलासपुर में सरकार की दूसरी वर्षगांठ मनाने के बाद घटे मुर्गा प्रकरण के बाद उभरे हैं। जब बिलासपुर में समारोह चल रहा था तो उसी समय विपक्ष शिमला में राज्यपाल को सरकार के दो वर्षों का काला चिठ्ठा सौंप रहा था। इस काले चिट्ठे में दर्ज आरोपों के परिणाम गंभीर होंगे। इन आरोपों को हल्के में लेकर नजरअन्दाज कर देना आसान नहीं होगा। यह आरोप आने वाले समय में हर व्यक्ति की जुबान पर होंगे। हर घर में चर्चा का विषय बनेंगे। फिर बिलासपुर के समारोह में संगठन और सरकार के रिश्ते भी खुलकर सामने आ गये हैं। बिलासपुर के समारोह में समोसा प्रकरण को लेकर जिस भाषा और तर्ज में प्रशासन को चेताया गया है उसके भी राजनीतिक मायने कुछ अलग हो जाते हैं। नादौन हमीरपुर में पांच माह पहले हुई आयकर और ई डी की छापेमारी के बाद इस संबंध में ई डी में मामला दर्ज होने के बाद कुछ लोगों की गिरफ्तारियां तक हो चुकी हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान कांगड़ा केन्द्रीय सरकारी बैंक को लेकर एक ऑडियो वायरल हुआ था। अब इस ऑडियो के आधार पर सीबीआई में मामला दर्ज होने के कगार पर पहुंच गया है। कुछ आलोचकों पर दबाव बनाने के लिये एक समय दायर किया गया मानहानि का मामला शायद अब लोकसभा अदालत में पहुंच गया है। इसके परिणाम भी आने वाले समय में सुखद रहने की संभावना नहीं है। इस तरह के परिदृश्य के आईने में बिलासपुर समारोह के बाद घटा मुर्गा प्रकरण अपने में ही कुछ अलग अर्थ और अहमियत ले लेता है। क्योंकि यह प्रकरण 13 दिसम्बर को घटता है। इसमें वाकायदा मैन्यू जारी हुआ जिसमें आईटम नम्बर 12 पर जंगली मुर्गा दर्ज है। इसमें यह सवाल उठता है कि क्या सरकार गांव के द्वार कार्यक्रम के आयोजकों को यह जानकारी नहीं थी कि जंगली मुर्गा संरक्षित वन्य प्राणियों में आता है और इसको मारना अपराध की श्रेणी में आता है। इसलिये यह नहीं माना जा सकता है कि जंगली मुर्गा बिना विचार के ही मैन्यू का हिस्सा बना दिया गया। विश्लेष्कों की नजर में या तो यह प्रकरण राजनीतिक घटनाक्रम से ध्यान हटाने की नीयत से किया गया था आयोजकों ने अनचाहे ही असहज स्थिति में ला खड़ा करने की कवायत कर डाली। कुछ भी हो यह प्रकरण मुख्यमंत्री को भविष्य में सजग रहने की चेतावनी है क्योंकि इस तरह के मुद्दे सामने आना यह दर्शाता है कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

क्या यह आयोजन सरकार और संगठन की एकजुटता का संदेश दे पाया है?

  • हाईकमान के किसी भी बड़े नेता का न आना सवालों में
  • विपक्ष ने काला चिट्ठा सौंपकर खोला मुद्दों का पिटारा

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने सत्ता में दो वर्ष पूरे होने पर बिलासपुर में राज्य स्तरीय रैली का आयोजन किया है। इस रैली में तीस हजार लोगों के आने का लक्ष्य तय किया था। इस लक्ष्य के आईने में यह रैली बहुत सफल रही मानी जा सकती है। फिर इन दो वर्षों में सुक्खू सरकार जिस तरह के राजनीतिक वातावरण का सामना करते हुए इस मुकाम तक पहुंची है उसके आईने में भी इस आयोजन को एक सफल आयोजन करार दिया जा सकता है। लेकिन क्या इस रैली के बाद कांग्रेस संगठन और कांग्रेस सरकार अपने कार्यकर्ताओं तथा रैली में आई हुई जनता को अपनी एकजुटता का सन्देश दे पाये हैं ? क्या इस आयोजन के बाद विपक्ष के पास सरकार के खिलाफ कोई सवाल नहीं रह गये हैं जिनका जवाब आना शेष हो ? यह सवाल इसलिये महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि इन दो वर्षों में प्रदेश सरकार पहले दिन से ही केन्द्र पर राज्य को वांछित सहयोग न देने का आरोप लगाती आयी है और विपक्ष सरकार को गारंटीयों के नाम पर घेरती आयी है। इस रैली में कांग्रेस हाईकमान की ओर से कोई भी नेता शामिल नहीं हो पाया है जबकि आमन्त्रण सारे शीर्ष नेताओं को था। इस आयोजन के मुख्यअतिथि प्रदेश प्रभारी राजीव शुक्ला थे जबकि यह आयोजन प्रभारी होने के नाते उनके अपने कार्यकलाप की भी परीक्षा था।
इन बिन्दुओं पर यदि इस आयोजन का मूल्यांकन किया जाये तो इस अवसर पर रैली मैदान को लेकर जो सवाल पूर्व मंत्री रामलाल ठाकुर ने उठाये हैं वह अपने में बहुत कुछ ब्यान कर जाते हैं। इस आयोजन में जिस तरह से प्रदेशाध्यक्ष प्रतिभा सिंह को स्टेज पर बोलते हुये रोका गया उससे उन आशंकाओं को स्वतः ही बल मिल जाता है कि होली लॉज को डिसलॉज करने का प्रयास किया जा रहा है। यहां यह उल्लेखनीय हो जाता है कि जब प्रतिभा सिंह ने भाजपा सरकार के कार्यकाल में मण्डी के लोकसभा का उपचुनाव जीता था तो वह स्व.वीरभद्र सिंह की विरासत के नाम पर ही संभव हो पाया था। इसी विरासत के कारण विधानसभा चुनावों के समय भी किसी एक को नेता घोषित नहीं किया गया था। बाद में मुख्यमंत्री पद के लिये शायद सुखविंदर सिंह सुक्खू इसलिये नामित हुये क्योंकि वही एकमात्र नेता थे जो कांग्रेस संगठन की तीनों इकाइयों छात्र, युवा और मुख्य संगठन के अध्यक्ष रह चुके थे। लेकिन सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री पर जिस तरह से अपने ही मित्रों के गिर्द केन्द्रित होकर रह जाने के आरोप लगने शुरू हुये उनके कारण वीरभद्र कार्यकाल में सक्रिय रहे कार्यकर्ता मुख्य धारा से बाहर होते चले गये। लेकिन जिन मित्रों को मुख्यमंत्री आगे लाये वह न तो सरकार में ही कोई महत्वपूर्ण योगदान दे पाये और न ही मुख्यमंत्री के संकट मोचक हो पाये।
इस रैली के बाद अब तक उपेक्षित चले आ रहे कार्यकर्ताओं को स्व. वीरभद्र सिंह के नाम पर इकट्ठे होने का अवसर मिल जायेगा। क्योंकि विपक्ष ने जिस तरह का सौ पन्नों का सरकार का काला चिट्ठा राज्यपाल को सौंपा है उससे भाजपा के हर कार्यकर्ता से लेकर नेता तक हर आदमी के पास सरकार के खिलाफ सवाल उठाने के लिये मैटिरियल मिल जायेगा। क्योंकि इस कच्चे चिट्ठे में लगभग सभी मंत्रियों और विभागों के खिलाफ कुछ न कुछ दस्तावेजी प्रमाणों के साथ दर्ज है। आने वाले दिनों में इस कच्चे चिट्ठे के आरोप हर दिन चर्चा का विषय रहेंगे। यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री के मित्र इस काले चिट्ठे का जवाब कैसे देते हैं। काले चिट्ठे में जिस तरह के आरोप दर्ज हैं उनसे यह संभावना बलवती हो गई है कि शायद कुछ मामलों में सीबीआई तक सक्रिय हो जाये। ई डी पहले ही सक्रिय है। इस परिदृश्य में रैली के भरे मंच से संगठन और सरकार में तीव्र मतभेद होने का खुला संदेश जाना किसी भी गणित से सरकार के लिये हितकर नहीं हो सकता। अब इस मामले की प्रदेश प्रभारी किस तरह की रिपोर्ट हाईकमान के सामने रखते हैं और हाईकमान उसका कैसे संज्ञान लेता है इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं। क्योंकि जिस तरह की वित्तीय स्थितियों से प्रदेश गुजर रहा है और प्रधानमंत्री स्वयं इसको मुद्दा बना चुके हैं उसके आईने में इस रैली का औचित्य स्वयं ही सवालों में आ जाता है। नेता प्रतिपक्ष ने इस आयोजन पर सवाल उठाने शुरू कर ही दिये हैं।

भाजपा के विरोध प्रदर्शन का अंतिम परिणाम क्या होगा

  • क्या इस विरोध प्रदर्शन से ई.डी का रास्ता आसान हो जायेगा

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार के सत्ता में दो साल पूरे होने जा रहे हैं। सरकार इस अवसर पर एक समारोह का आयोजन करने जा रही है। लेकिन भाजपा इस आयोजन के औचित्य पर सवाल उठाते हुये पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन का आयोजन करते हुये समारोह के दिन राज्यपाल को एक ज्ञापन सौंपने जा रही है। वैसे तो सत्ता पक्ष और विपक्ष में आयोजन तथा विरोध एक सामान्य राजनीतिक रस्म अदायगी मानी जाती है। लेकिन राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य और हिमाचल में राज्यसभा चुनाव के बाद जिस तरह के रिश्ते सत्तापक्ष और विपक्ष में बन चुके हैं उसके परिपेक्ष में भाजपा के इस विरोध प्रदर्शन के मायने गंभीर हो जाते हैं। राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के छः विधायक और तीन निर्दलीय भाजपा में शामिल हो गये। इन नौ स्थानों पर लोकसभा के साथ ही विधानसभा के लिये उपचुनाव हुये। कांग्रेस लोकसभा की चारों सीटें हार गयी परन्तु विधानसभा के लिये छः सीटों पर जीत गयी। विधायकों के इस तरह पाला बदलने में धन बल की भूमिका का पता लगाने के लिये पुलिस में मामला दर्ज करवाया गया। जो अब तक लंबित चल रहा है। पाला बदलने वाले कुछ विधायकों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ मामले दर्ज करवा रखे हैं। इन्हीं मामलों के साथ ई.डी. और आयकर विभाग भी प्रदेश में दस्तक देकर छापेमारी कर चुके हैं। छापेमारी के बाद ई.डी. कुछ लोगों की गिरफ्तारी भी कर चुकी है और भी गिरफ्तारीयां होने की संभावना है। मामले के तार सहारनपुर तक पहुंच चुके हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान एक ऑडियो वायरल हुआ था। इस मामले में केन्द्र की सीआरपीएफ की एक आदमी को सुरक्षा तक उपलब्ध हो चुकी है। कुछ अधिकारियों और राजनेताओं तक ई.डी. के पहुंचने की संभावना बन गयी है। ई.डी. का इस तरह का दखल प्रदेश में पहली बार हुआ है।
इसी के साथ राज्यसभा चुनाव के बाद प्रदेश की वित्तीय स्थिति भी चर्चा में आ गयी है। हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनाव में हिमाचल सरकार की परफॉरमैन्स को प्रधानमंत्री ने स्वयं मुद्दा बनाकर उछाला है। इसी बीच प्रदेश उच्च न्यायालय के कुछ फैसलों ने सरकार के वित्तीय प्रबंधन और समझदारी पर गंभीर सवाल उठा दिये हैं। स्वयं राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के समारोह में बागवानी मंत्री की उपस्थिति में वित्तीय स्थिति पर सवाल उठाये हैं। स्वभाविक है कि जब कोई सरकार वित्तीय मुहाने पर ऐसे विवादित हो जाये तब विपक्ष को सरकार को घेरन के लिये एक बहुत ही गंभीर मुद्दा मिल जाता है। इसी सबका परिणाम है कि सरकार के छः पूर्व मुख्य संसदीय सचिवों की विधायकी पर संशय बना हुआ है। इसी संशय के परिदृश्य में भाजपा के नौ विधायकों पर सदन की अवमानना का जो मामला लंबित चल आ रहा है उसको इसी अवसर पर उछाल कर उनके खिलाफ भी निष्कासन की कारवाई की तलवार लटकी होने की चर्चा ताजा हो गयी है ।
यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिये जनता को दस गारंटीयां दी थी इन गारंटी को पूरी तरह लागू कर पाना वर्तमान वित्तीय परिदृश्य में संभव ही नहीं है। इन गारंटीयों में से पांच को लागू कर दिये जाने का ब्यान हाईकमान के लिये तो सही हो सकता है लेकिन भुक्तभोगी जनता के लिये नहीं। फिर कांग्रेस संगठन के पुनर्गठन का काम भी इसी बीच होना है। उसके लिये पहली बार पर्यवेक्षक नियुक्त किये गये हैं। स्वभाविक है कि कार्यकर्ताओं पर टिप्पणी करने के साथ ही यह लोग सरकार पर भी टिप्पणियां करेंगे ही। क्योंकि सरकार बनने के बाद संगठन सरकार के फैसलों को ही जनता में ले जाता है। कार्यकर्ता की सक्रियता सरकार की सक्रियता पर निर्भर करती है। सरकार पर जब हर माह कर्ज लेने का सच सामने आयेगा तो कार्यकर्ता उसे कैसे झुठलायेगा। इसलिये इस समय सरकार के जश्न पर भाजपा का विरोध भारी पड़ने की संभावना लगातार बढ़ती जा रही है। फिर ई.डी ने जब कुछ गिरफ्तारियां कर ही रखी है तो उस मामले को अंतिम परिणाम तक पहुंचाने के लिये यदि कुछ अधिकारियों और राजनेताओं तक पहुंच जाती है तो उसके बाद एकदम सारी स्थितियां बदल जायेगी। जब सरकार जशन मना रही होगी तो उस समय भाजपा सरकार की नाकामियां जनता में रख रही होगी। जनता गारंटीयों का सच जानती है। क्योंकि भुक्त भोगी है। ऐसे परिदृश्य में ई.डी. की किसी भी कारवाई पर जनता में कोई प्रतिकूल संदेश नहीं जायेगा। बल्कि भाजपा का यह विरोध प्रदर्शन उसके लिए जमीन तैयार करेगा।

नादौन में अदालत के स्टे के बावजूद छुट्टी के दिन प्रशासन की कारवाई बनी चर्चा का विषय

  • नादौन में सरकार बना रही है बड़ा होटल और कॉम्पलैक्स
  • एशियन विकास बैंक से लिया जा रहा है बड़ा कर्ज
  • जिस जमीन पर यह निर्माण प्रस्तावित है उसमें हिस्सेदारों में बंटवारे का झगड़ा चल रहा है
  • झगड़े के कारण निर्माण पर भी अदालत का स्टे चल रहा है
  • कुछ पर्यटन संपत्तियों को प्राइवेट को देने के लिए नौ अप्रैल को चण्डीगढ़ के होटल हयात में हुई बैठक में नादौन का यह होटल भी एजैण्डे में था

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के विधानसभा क्षेत्र नादौन में सरकार एक टूरिस्ट होटल बना रही है। इस फाइव स्टार होटल के लिये एशियन विकास बैंक से कर्ज लेकर धन का प्रबंध किया गया है। यह होटल बनाकर इसको चलाने के लिये इसे प्राइवेट सैक्टर को देने की योजना है। बल्कि सरकार ने इस संबंध में नौ अप्रैल को चण्डीगढ़ के होटल हयात में कुछ टूरिस्ट संपत्तियों के सुचारू संचालन के लिये प्राइवेट सैक्टर के दिग्गजों के साथ एक बैठक का भी आयोजन किया था। इन प्रस्तावित संपत्तियों में नादौन में बनाया जा रहा यह होटल भी शामिल है। लेकिन यह होटल अभी शुरुआती स्तर पर है। क्योंकि जिस जगह पर जलाड़ी में यह बनाया जा रहा है उस जमीन पर हिस्सेदारों में झगड़ा है और अदालत से यहां पर कोई भी निर्माण या निर्माण संबंधी गतिविधियां करने पर 28-11-2022 से स्टे लगा है। लेकिन अब 1-12-24 को रविवार छुट्टी के दिन प्रशासन ने अदालत के स्टे आर्डर को नजरअन्दाज करके निर्माण गतिविधि शुरू कर दी। जिन हिस्सेदारों ने स्टे हासिल किया था उनकी प्रशासन ने कोई बात नहीं सुनी। पुलिस ने भी अदालत के स्टे ऑर्डर को कोई अधिमान नहीं दिया।
पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है कि किसके दबाव में प्रशासन ने स्टे वाली जमीन पर खोद खुदाई का काम छुट्टी वाले दिन अंजाम दिया। इसी के साथ यह भी चर्चा में आ गया है कि क्या नादौन में फाइव स्टार होटल का निर्माण सरकार द्वारा किया जाना व्यवहारिक और लाभदायक सिद्ध हो पायेगा। इस समय पर्यटन विकास निगम द्वारा चलाये जा रहे होटल जिस तरह से प्रदेश उच्च न्यायालय में चर्चा में आये हैं उससे यह प्रस्तावित निर्माण स्वतः ही सवालों में आ जाता है। क्योंकि पर्यटन विकास निगम जब अपने सेवानिवृत कर्मचारियों के देय वित्तीय लाभों का भुगतान नहीं कर पाया तब यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय में पहुंचा। निगम ने उच्च न्यायालय में जब अपनी वित्तीय स्थिति का खुलासा अदालत में रखा तब उच्च न्यायालय ने निगम से परफॉरमैन्स रिपोर्ट तलब कर ली। इस रिपोर्ट में जब यह सामने आया कि निगम के होटल लगातार घाटे में चल रहे हैं तो इसका कड़ा संज्ञान लेते हुये इन होटलों को बंद करने के आदेश सुना दिये। क्योंकि यह घाटा प्रदेश के आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा था। उच्च न्यायालय के आदेश से जब निगम में कार्यरत कर्मचारी प्रभावित हुये तब उनका संगठन इस पर गंभीर हुआ। निगम के कर्मचारी संघ ने निगम प्रशासन द्वारा उच्च न्यायालय में रखी रिपोर्ट को एकदम नकार दिया। कर्मचारी संघ ने सीधे आरोप लगाया कि यह रिपोर्ट पर्यटन निगम की संपत्तियों को प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की नीयत से तैयार की गयी है। संघ ने निगम के उपाध्यक्ष को इस साजिश का सूत्रधार करार देते हुये उन्हें तुरंत प्रभाव से हटाने की मांग कर दी।
पर्यटन निगम के कर्मचारी संघ के सक्रिय भूमिका में आने के बाद निगम प्रबंधन ने भी इस संद्धर्भ में कदम उठाये और उच्च न्यायालय में वायदा किया कि वह सेवानिवृत कर्मचारियों के सारे वितिय लाभों का तुरंत भुगतान कर देगा। इस भुगतान के लिये टाइम फ्रेम भी अदालत में सौंपा है। अदालत ने निगम के वायदे पर 18 होटलों को बंद करने के आदेश पर रोक लगा दी है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 जनवरी को है तब पता चलेगा कि कितने सेवानिवृत्त कर्मचारीयों को भुगतान हो जाता है। पर्यटन निगम का मामला उच्च न्यायालय में पहुंचने के बाद दो मुख्य बिन्दु उभरे हैं। पहला कि निगम के होटल घाटे में चल रहे हैं और घाटे की स्थिति में यह है कि अपने सेवानिवृत कर्मचारियों को उनके लाभों का भुगतान तक नहीं कर पा रही है। दूसरा है कि निगम के होटल को प्राइवेट सैक्टर को देने की जमीन तैयार की जा रही है। सवाल उठता है कि जब निगम के पहले से चले आ रहे होटल घाटे में चल रहे हैं तो नये क्यों बनाये जा रहे हैं। पिछली सरकार के समय भी ऐसा हुआ सरकार कर्ज लेकर होटल बना रही है और उसे प्राइवेट सैक्टर को सौंप रही है। पिछली सरकार के समय यह मामला विधानसभा तक भी पहुंचा था। अधिकारियों को चिन्हित किया गया था परंतु अब सरकार बनने के बाद उस दिशा में कोई कारवाई नहीं है क्यों? दूसरा बिन्दु उभरा है कि निगम संपत्तियों को प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की भूमिका तैयार करने का इस संद्धर्भ में नादौन के प्रस्तावित होटल को लेकर हो रही गतिविधियों से यह शक पुख्ता होता है। क्योंकि नादौन में सरकार एडीबी से कर्ज लेकर यह होटल बना रही है परंतु इसे बनाकर प्राइवेट सैक्टर के हवाले करने की मंशा नौ अप्रैल को चण्डीगढ़ के होटल हयात में हुई बैठक से सामने आ जाती है। उस बैठक में नादौन की यह प्रस्तावित संपत्ति भी एजेंडा में थी। अब छुट्टी वाले दिन जिस तरह से प्रशासन ने अदालत के स्टे को अंगूठा दिखाते हुये हरकत की है उससे स्पष्ट हो जाता है कि शायद प्राइवेट सैक्टर के दबाव में ऐसा किया जा रहा है।

यह है स्टे आर्डर 



 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

क्या पर्यवेक्षक संगठन के नाम पर सरकार की रिपोर्ट तैयार करेंगे?

  • सरकार बनने के बाद व्यवहारिक तौर पर संगठन सरकार की ही परफॉरमैनस जनता के सामने रखता है

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस की पिछले दिनों प्रदेश, जिला और ब्लॉक स्तर की सारी इकाइयां भंग कर दी गई थी। अब इसकी जगह नई इकाइयां गठित होनी है। प्रदेश अध्यक्षा अभी इस पुनर्गठन की दिशा में बढ़ने ही लगी थी कि हिमाचल प्रभारी राजीव शुक्ला ने इस पुनर्गठन के लिए कुछ पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिये। संयोगवश यह सब पर्यवेक्षक हिमाचल से बाहर के हैं। यह लोग अपने-अपने क्षेत्र का दौरा करने वहां लोगों से फीडबैक लेने में कितना समय लगाते हैं और कब अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं इस सब को ध्यान में रखते हुये यह तय है कि इस पुनर्गठन में समय लगेगा। संगठन के पुनर्गठन के लिये इस तरह से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति पहली बार हिमाचल में देखने को मिल रही है। लेकिन इस कदम के साथ ही कांग्रेस के अन्दर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आयी हैं। कुछ हलकों में इस कदम को प्रदेश अध्यक्षा पर अंकुश लगाने का प्रयास माना जा रहा है। इसी के साथ कुछ हलकों में इसे मंत्रिमण्डल में फेर बदल के संकेतों के रूप में भी देखा जा रहा है। यह तय है कि इन पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट का परिणाम बहुत दूरगामी होगा। इसलिये इस पूरी प्रक्रिया का निष्पक्ष आकलन करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि कांग्रेस सत्ता में है।
प्रदेश संगठन की इकाई प्रदेश अध्यक्षता की सिफारिश पर भंग की गयी है। स्मरणीय है कि प्रदेश अध्यक्षा काफी समय से निष्क्रिय कार्यकर्ताओं और पदाधिकारी को हटाने की बात करती रही है। यह भी शिकायतें रही हैं कि वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को सरकार में उचित मान सम्मान नहीं दिया जा रहा है। हाईकमान तक यह शिकायतें पहुंची और एक समन्वय समिति गठित की गयी जो व्यवहार में प्रभावी नहीं हो पायी। विपक्ष लगातार सरकार को गारंटीयों के मुद्दे पर घेरता रहा है। इसी सब का परिणाम हुआ कि प्रदेश के चारों लोकसभा सीटें कांग्रेस हार गयी। राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी के छः विधायक पार्टी छोड़कर चले गये। प्रदेश का सह प्रभारी तक पार्टी छोड़ गया था। लेकिन हाईकमान इस सब को समझ नहीं पायी। परन्तु अब जिस तरह से सरकार के कुछ फैसले विवादित हुये और स्पष्टीकरण जारी करने की नौबत आयी। प्रधानमंत्री ने हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों जगह हिमाचल को चुनावी मुद्दा बनाया। समोसा जांच राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय समाचार बन गया। पहली बार इस तरह की विवादित छवि प्रदेश की देश भर में प्रचारित हुई।
यह एक स्थापित सच है की सरकार बनने के बाद उसकी कार्य प्रणाली और परफॉरमैन्स से ही पार्टी और सरकार का आदमी आकलन करता है। कांग्रेस चुनाव में दस गारंटीयां देकर सत्ता में आयी थी। यह गारंटीयां देते हुये इन पर कोई ‘‘किन्तु परन्तु’’ नहीं लगाये गये थे। इन गारंटीयों की व्यवहारिक स्थिति क्या है उसको आम आदमी नेताओं के भाषणों से हटकर जानता है। प्रदेश से बाहर नेता क्या बोल रहे हैं और प्रदेश के अन्दर की स्थिति क्या है उसे प्रदेश का आम आदमी बेहतर जानता है। प्रदेश के संगठन और सरकार में कैसे रिश्ते हैं इसकी जानकारी प्रदेश के लोगों को ज्यादा पता है। अभी सरकार दो वर्ष पूरे करने के अवसर पर आयोजन करने जा रही है। मुख्यमंत्री इस आयोजन का निमंत्रण केंद्रीय नेताओं को दे रहे हैं। लेकिन उन्ही का एक सहयोगी मंत्री यह कहे कि उसे ऐसे प्रस्तावित आयोजन की जानकारी मीडिया से मिल रही है तो फिर सरकार के बारे में ज्यादा कुछ बोलने को नहीं रह जाता है।
अभी जब पर्यवेक्षक संगठन के बारे में फीडबैक लेने के लिये जनता में जाएंगे तब उन्हें सरकार की परफॉरमैन्स की व्यवहारिक जानकारी मिलेगी। यह देखने को मिलेगा की कितनी महिलाओं को पन्द्रह सौ रूपये मिल रहे हैं। कितने युवाओं को व्यवहारिक तौर पर सरकार रोजगार दे पायी है। महंगाई को कितना कम कर पायी है। यह सामने आयेगा कि सरकार ने खर्च कम करने के लिये क्या-क्या किया है। जिन फैसलों के सरकार को स्पष्टीकरण जारी करने पड़े हैं उनका असली सच क्या है। प्रदेश से बाहर के पर्यवेक्षक लगाकर हाईकमान ने संगठन के नाम पर सरकार के बारे में सही जानकारी जुटाने के लिए पर्यवेक्षकों को फीडबैक लेने के लिए भेजा है। क्योंकि कोई भी संगठन केवल सरकार की परफॉरमैन्स का ही सबसे बड़ा सूत्रा होता है। ऐसे में हाईकमान ने संगठन के नाम पर सरकार की असली जानकारी जुटाने के लिये प्रदेश से बाहर के पर्यवेक्षक भेजे हैं। इसकी रिपोर्ट के बाद हाईकमान प्रदेश सरकार के बारे में ठीक व्यवहारिक और सटीक जानकारी जुटा पायेगी।

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