शिमला/शैल। नगर निगम शिमला परिक्षेत्र में हो रहे निर्माणों की वैधता के लिये नगर निगम प्रशासन ही पूरी तरह जिम्मेदार है। क्योंकि निर्माण संबंधी कोई भी नक्शा निगम प्रशासन के अनुमोदन के बिना व्यवहारिक रूप नहीं ले सकता। यहां तक की सरकारी निर्माण को भी टीसीपी अधिनियम के प्रावधान के मुताबिक इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। धर्मशाला के मकलोड़गंज प्रकरण में सर्वाेच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया हुआ है ऐसे में किसी भी निर्माण के लिए आये नगरों की सारी औपचारिकताओं की जानकारी नगर निगम या दूसरे संबंधित निकाय के पास होना अनिवार्य है। ऐसी जानकारी को कोई भी व्यक्ति आरटीआई के तहत हासिल कर सकता है। जब से एनजीटी ने शिमला में निर्माण को लेकर कुछ प्रतिबंध और कुछ शर्ते लगायी हैं तब से यहां के निर्माण पर आम आदमी का ध्यान भी केंद्रित होना शुरू हो गया है। ऐसे में अगर निगम किसी आरटीआई आवेदन का तय समय पर जवाब न दे और अपील अधिकारी को इसके लिये संबंधित सूचना अधिकारी को कड़ा पत्र लिखना पड़ जाये तो स्वभाविक रूप से संद्धर्भित निर्माण और संबंधित निगम प्रशासन को लेकर शंकाएं उभरेगी ही। स्मरणीय है कि एक आरटीआई एक्टीविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य ने शिमला के मैहली क्षेत्र में बने एक निर्माण की फोटो के साथ नगर निगम से उसके संबंध में कुछ जानकारियां मांगी। यह जानकारियां 18-10-2023 को मांगी गयी थी। जब इनका जवाब तय समय के भीतर नहीं आया तो देवाशीष ने इसकी अपील दायर कर दी। इस अपील पर 12-12-2023 को संबंधित अपील अधिकारी का फैसला आया। जिसमें अपील अधिकारी ने आवेदक को निशुल्क जानकारी उपलब्ध करवाने के निर्देश दिये हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि जब आरटीआई आवेदनों पर तय समय के भीतर सूचना न दिये जाने पर आवेदक अपील में जाने के लिये बाध्य कर दिया जाता है तो उस आरटीआई की अवधारणा को ही आघात पहुंचता है। इस संबंध में डाली गयी आरटीआई और उस पर अपील अधिकारी के निर्देश पाठकों के सामने यथास्थिति रखे जा रहे हैं।



शिमला/शैल। क्या कोई व्यक्ति आर.टी.आई. के माध्यम से उसके बारे में जुटाई गयी जानकारी के सोशल मीडिया या प्रिंट मीडिया मंच पर सार्वजनिक होने से बदनाम हो सकता है? क्या ऐसे आर.टी.आई. एक्टिविस्ट के खिलाफ कोई अदालत यह स्थाई प्रतिबन्ध लगा सकती है कि अमुक व्यक्ति किसी अमुक व्यक्ति या उसके परिजनों के खिलाफ सोशल मीडिया या प्रिंट मीडिया में ष्।दल ेजंजउमदज व िंदल दंजनतमष् नहीं लिख सकता है। यह सारे सवाल आर.टी.आई. एक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य बनाम रचना गुप्ता मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय में चर्चा में आये हैं। उच्च न्यायालय ने ऐसे आदेश को 12-12-2023 को संशोधित करते हुये स्पष्ट किया है कि ऐसा स्थायी गैग आदेश कानून सम्मत नहीं है उच्च न्यायालय ने पुराने आदेश को संशोधित करते हुये कहा है कि देवाशीष अपने लेखन के लिये स्वतंत्र है। बशर्त कि ऐसा लेखन असत्य और अप्रमाणित न हो। स्मरणीय है कि 2019 में लोकसेवा आयोग की सदस्य डॉ. रचना गुप्ता ने देवाशीष भट्टाचार्य के खिलाफ एक करोड़ की मानहानि का मुकद्दमा दायर किया था जो अब तक लंबित है। लेकिन 2020 में इस मानहानि के मामले के लंबित होते हुये रचना गुप्ता उच्च न्यायालय की एकल पीठ से देवाशीष भट्टाचार्य के खिलाफ एक गैग ऑर्डर पाने में सफल हो गयी थी। देवाशीष ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी और 12-12-2023 को यह संशोधित फैसला आ गया जिसमें गैग ऑर्डर को निरस्त करते हुये यह शर्त लगायी गयी की लेखन असत्य और अप्रमाणित नहीं होना चाहिये। जब यह गैग आदेश आया था तब इससे यह संदेश गया था कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ आर.टी.आई. सूचनाओं के आधार पर कलम उठाना कठिन है। लेकिन संशोधित आदेश से स्पष्ट हो गया कि कानून के आगे कोई भी प्रभावशाली नहीं है। इस आदेश से प्रशासन को भी यह संदेश गया कि आर.टी.आई. के माध्यम या अन्य प्रमाणिक दस्तावेजों के माध्यम से सार्वजनिक हुई जानकारीयों को नजर अन्दाज करना सही नहीं होगा।
यह रहा उच्च न्यायालय का आदेश
This appeal has been preferred by the appellant defendant against interim injunction order dated 03.01.2020, passed in OMP No.574 of 2019 in COMS No.20 of 2019, titled as Dr.Rachna Gupta vs.Dev Ashish Bhattacharya The operative portion of the impugned order is as under:-
" In these circumstances taking into consideration the above mentioned circumstances, the application is allowed and the non - applicant (defendant) is restrained from posting or publishing any statement of any nature, against the applicant, her husband and her family members on facebook or on any other social media, including print or electronic media, till the disposal of the main suit Accordingly, the application is disposed of.”
2. The main ground for assailing the impugned order is that appellant-defendant has been restrained from posting or publishing “any statement of any nature” against the respondent- plaintiff, her husband and her family members. It has been contended that such blanket gag order is not permissible under law.
3. The passing of aforesaid injunction order against the appellant-defendant has been justified by learned counsel for the respondent-plaintiff by referring documents filed with the plaint as well as with application CMP No.18474 of 2023 in this appeal.
4. Taking into consideration averments in the pleadings, documents placed on record, case law referred in impugned order and submissions made by learned counsel for the parties and also balancing the rights and reasonable restriction with reference to Article 19 of the Constitution of India, interim injunction order is modified as under:- “Taking into consideration the facts and circumstances, the non- applicant (defendant) is restrained from posting or publishing any defamatory, scandalous, untrue and/or unverified statement, directly or indirectly, against the applicant/plaintiff, her husband and her family members on facebook or on any other social media, including print or electronic media, till the disposal of the main suit.”
5. Appeal is disposed of in aforesaid terms, so also pending application(s), if any
शिमला/शैल। कांग्रेस की सुक्खू सरकार अपने एक वर्ष के कार्यकाल में 14000 करोड़ का कर्ज ले चुकी है। इतना कर्ज लेने के बावजूद चुनावों में दी हुई गारंटीयां पूरी करने में कोई बड़ा कदम नहीं उठा पायी है। लाहौल और स्पीति की महिलाओं को 1500 रूपये देने की घोषणा पर जनवरी 2024 से अमल होगा। पुरानी पैन्शन बहाल कर देने के बाद कर्मचारियों के भुगतान के मामले उच्च न्यायालय के आदेशों के बाद ए.जी. ऑफिस में भुगतान के लिये लंबित है। कांग्रेस का विपक्ष में पूर्व जयराम सरकार के खिलाफ यही बड़ा आरोप था की इस सरकार ने प्रदेश को कर्ज के गर्त में डाल दिया है। ऐसे में जब कांग्रेस की सरकार भी उसी कर्ज के रास्ते पर पहले से भी ज्यादा गति से चल पड़े तो स्वभाविक है कि यह सवाल उठेगा ही कि कहीं यह सरकार भी वित्तीय कुप्रबंधन और फिजूल खर्ची का शिकार तो नहीं हो रही है। इस सवाल को समझने के लिये वर्ष 2022-23 के बजट को देखना पड़ेगा क्योंकि सुक्खू सरकार को यह बजट जयराम से विरासत में मिला है।
इस बजट को पूरा करने के लिये सुक्खू सरकार ने जनवरी 2023 से कर्ज लेना शुरू किया और वित्तिय वर्ष के अन्त मार्च 2023 तक 6700 करोड़ का कर्ज ले लिया। जयराम सरकार ने वर्ष 2022-23 के लिये 51364.75 करोड़ का बजट सदन में पारित करवाया था। इस वित्तीय वर्ष में 6170 करोड़ का राजकोषीय घाटा रहने का अनुमान था और मुख्यमंत्री सुक्खू ने भी अपने बजट भाषण में इसे स्वीकारा है।
यदि सुक्खू सरकार ने जयराम शासन के अंतिम छः माह के लिये गये फैसलों को रद्द करके 600 से अधिक संस्थानों को बन्द न किया होता तो यह घाटा और भी बढ़ जाता। इसीलिये 13141.07 करोड़ की अनुपरक मांगे सदन में लाने के बाद भी अन्तिम राजकोषीय घाटा 6170 करोड़ ही रहा। इस घाटे का अर्थ है 2022-23 के बजट को पूरा करने के लिये 6170 करोड़़ का ही कर्ज लेने की आवश्यकता थी। लेकिन आर.टी.आई. सूचना के अनुसार सुक्खू सरकार ने जनवरी 23 से मार्च 23 तक 6700 करोड़ का कर्ज़ क्यों ले लिया। यह सवाल इसलिये उठ रहा है कि जब आर.टी.आई. में इस कर्ज के दस्तावेज सामने आये तो यह कहा गया कि 6700 करोड़ का कर्ज तो वित्तीय वर्ष 2022-23 के खर्चों को पूरा करने के लिये लिया गया। जब इस वर्ष की आवश्यकता ही 6170 करोड़ की थी तो इसके लिये 6700 करोड़ कर्ज क्यों लिया गया इसका कोई जवाब नहीं आया है।
सुक्खू सरकार का केन्द्र सरकार पर यह आरोप है कि उसने राज्य सरकार की कर्ज लेने की सीमा में कटौती कर दी है और अब वह एक वर्ष में केवल 6000 करोड़ का ही कर्ज ले सकती है। लेकिन यह सरकार 2023-24 की इस कर्ज सीमा से अधिक का कर्ज इस वित्तीय वर्ष में दिसंबर तक ही ले चुकी है। क्योंकि इस सरकार द्वारा लिये गये कुल कर्ज का आंकड़ा करीब चौदह हजार करोड़ हो चुका है। जिसका अर्थ है कि अगले तीन माह में नियमानुसार यह सरकार कोई नया कर्ज नहीं ले पायेगी। दूसरी ओर सरकार को 1500 रूपये महिलाओं को देने की गारंटी भी जनवरी से पूरी करने के वायदे को अन्जाम देना है। ऐसे में जब सरकार के पास वित्तीय संसाधन ही नहीं होंगे तो इन गारंटीयों को पूरा करने पर स्वतः ही प्रश्न चिन्ह लग जाता है।

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार की पहली ही सालगिरह पर राहुल और प्रियंका गांधी के न आने को नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर ने जिस तरह से अपने विरोध प्रदर्शन पर जनता के सामने रखा है उससे प्रदेश के सियासी हल्कों में सारे समीकरण गड़बड़ा गये हैं। क्योंकि जयराम ने दावा किया है कि ‘‘हमने पहले ही कह दिया था कि अगर उनमें थोड़ी भी शर्म होगी तो नहीं आयेंगे।’’ सरकार की पहली ही सालगिरह पर इन केंद्रीय नेताओं का न आना अपने में ही बहुत कुछ कह जाता है। फिर जिस तरह से जयराम ने इस न आने को पेश किया है वह उसका सबसे बड़ा सियासी
स्ट्रोक माना जा रहा है। क्योंकि हिमाचल सरकार की पहले साल की असफलताओं को ही भाजपा ने तीनों चुनावी राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में खूब प्रचलित किया था और आज हिमाचल भाजपा इन राज्यों में कांग्रेस की असफलता को इस प्रचार का प्रतिफल मान रही है। जयराम के इस दावे से अनचाहे ही यह संकेत और संदेश चला गया है कि हिमाचल सरकार में सब अच्छा नहीं चल रहा है। जयराम के इस कथन से प्रदेश कांग्रेस का हर कार्यकर्ता और प्रदेश का हर आदमी यह सोचने लग जायेगा कि क्या सही में कांग्रेस हाईकमान प्रदेश सरकार के कामकाज से प्रसन्न नहीं है।
अभी अभी कांग्रेस तीन राज्यों में चुनाव हारी और उस हार में हिमाचल सरकार कि परफॉरमैन्स को भी एक कारण माना गया है। ऐसे में आने वाले लोकसभा चुनावों में प्रदेश सरकार और संगठन का मनोबल गिराने के लिए राहुल- प्रियंका और खड़गे का न आना उस समय तो और भी गंभीर हो जाता है जब उनके आने का प्रचार किया जा रहा हो। भाजपा सरकार की गारंटीयों पर पहले से ही आक्रामक चल रही है। आरटीआई के माध्यम से प्रमाण जुटाकर जनता के सामने रख रही है। जबकि सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर भाजपा काल से चले आ रहे प्रशासन को ही अभी तक यथास्थिति रख कर चली आ रही है। हिमाचल कांग्रेस का कोई भी बड़ा छोटा नेता अभी तक भाजपा की नीतियों पर कोई सवाल तक नहीं कर पाया है। राहुल ने ही जिन मुद्दों पर प्रधानमंत्री और भाजपा को घेरा है उनको भी प्रदेश कांग्रेस के नेता आगे नहीं बढ़ा पाये हैं।
इस वस्तुस्थिति में सरकार के पहले ही समारोह में केंद्रीय नेतृत्व का न आ पाना प्रदेश की कांग्रेस को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है जिसका कोई आसान जवाब दे पाना संभव नहीं होगा। जयराम द्वारा पैदा किये सन्देह का परिणाम दूरगामी होगा। इसका जवाब देने के लिये जो तथ्यात्मक आक्रामकता अपेक्षित है शायद उसके लिए सरकार, उसका तंत्र और सलाहकार कोई भी तैयार नहीं लगता। यह तय है कि जो बीज आज विपक्ष ने इस अनुपस्थिति पर बीज दिये हैं उनके फल भयंकर होंगे।
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार का सत्ता में एक वर्ष पूरा हो गया है। इस अवसर पर सरकार धर्मशाला में एक राज्य स्तरीय समारोह का आयोजन करने जा रही है। इस आयोजन में यह स्वभाविक है कि सरकार इसमें अपनी एक वर्ष की उपलब्धियां और भविष्य की योजनाओं का प्रारूप जनता के सामने रखेगी। जनता सरकार से कितना संतुष्ट है इसका प्रमाण तो आने वाले लोकसभा चुनाव के परिणाम ही होंगे यह तय है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के लिये इस दौरान जो कुछ घटा है इसका व्यवहारिक आकलन करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि चुनावी फ्रंट पर सबसे बड़ी घटना सोलन नगर निगम के महापौर और उप महापौर पदों का चुनाव है। इस निगम में पार्षदों का बहुमत कांग्रेस का है यानि जनता ने चुनाव में कांग्रेस पर भरोसा किया था। लेकिन अब जनता के इस भरोसे को कांग्रेस के ही पार्षदों ने संतुष्ट और असंतुष्ट खेमे में बांटकर तोड़ दिया है। पार्षदों की यह खेमेबाजी बड़े अरसे से चर्चा में थी और तब खुलकर सामने आ गयी थी जब कांग्रेस के ही पार्षद भाजपा के साथ मिलकर अविश्वास प्रस्ताव लाये थे। उस समय यदि इसका गंभीर संज्ञान ले लिया जाता तो शायद अब हार का मुख न देखना पड़ता। सोलन जिला से दो मुख्य संसदीय सचिव हैं जबकि सोलन के विधायक मंत्री हैं। इस चुनाव में सहमति बनाने के लिये दो और मंत्रियों की जिम्मेदारी भी लगाई गयी थी लेकिन सबके प्रयास असफल रहे। पार्षद पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ता माने जाते हैं यदि ऐसे लोगों ने पार्टी के फैसले पर नाराजगी जताते हुए इस तरह का आचरण किया है तो इसको गंभीरता से लिया जाना चाहिये। कहीं सरकार और संगठन में पूरे प्रदेश में ही ऐसी स्थिति तो नहीं बनती जा रही है। लोकसभा चुनावों से पूर्व सोलन की यह हार बहुत कुछ इंगित करती है क्योंकि हर कार्यकर्ता भी नेताओं पर नजर रख रहा है।
राजनीतिक फलक से हटकर यदि वित्तीय मुहाने की बात की जाये तो सरकार ने सत्ता संभालते ही प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी दी थी। पूर्व सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का आरोप लगाया था। इस आश्य का श्वेत पत्र भी जनता के सामने रखा। लेकिन यह श्वेत पत्र जानकारी से आगे नहीं बढ़ा। लेकिन कठिन वित्तीय स्थिति के परिदृश्य में सरकार को जो लगाम अपने खर्चों पर लगानी चाहिये थी वह नहीं लग सकी। मुख्य संसदीय सचिवों से लेकर जो दूसरी राजनीतिक नियुक्तियां की गयी हैं उनका औचित्य जनता के सामने भ्रामकता से अधिक कुछ नहीं बन पाया है। अब सचेतक और उप सचेतक के पदों को भरने की चर्चा शुरू हो गयी है जबकि यह मामला भी प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित है। इसका फैसला आये बिना इन पदों को भरना फिर विवाद का विषय बनेगा। इसी तरह प्रशासनिक ट्रिब्यूनल की बहाली भी आम आदमी में अनुचित मानी जा रही है। किसी भी कर्मचारी संगठन ने इसकी मांग नहीं की है। फिर प्रशासनिक ट्रिब्यूनल में सरकार के फैसलों को ही तो कर्मचारी चुनौती देते हैं। यदि सरकार फैसला ही गलत न करें और उनको अपने ही स्तर पर सुलझा ले तो फिर ट्रिब्यूनल में जाने की नौबत ही नहीं आयेगी। ऐसे में आज ट्रिब्यूनल की बहाली को कुछ सेवानिवृत लोगों को रोजगार देने से अधिक नहीं देखा जा रहा है।
इस समय प्रदेश में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। सरकार ने सौ दिन पूरे होने पर भी सरकारी क्षेत्र में तीस हजार और प्राइवेट क्षेत्र में 90,000 रोजगार देने का वायदा किया था। इसी सरकार की अपनी ही रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में सरकारी विभागों में 70,000 पद खाली हैं। अकेले शिक्षा विभाग में ही 22,000 पद खाली हैं और सरकार अगले सत्र से अंग्रेजी माध्यम में सरकारी स्कूलों में शिक्षण देने और प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में राजीव गांधी डे-बोर्डिंग स्कूल खोलने की घोषणा कर रही है। क्या विभाग में इतने पद खाली होते हुए ऐसे कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक अन्जाम दिया जा सकेगा है इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है। युवाओं को रोजगार देने के लिये ई-टैक्सी परमिट और सोलर पॉवर परियोजनाओं की शुरुआत एक अच्छा और सराहनीय फैसला माना जा रहा है। लेकिन लोस चुनावों से पहले यह कितनी व्यवहारिक शक्ल ले पाता है इस पर सबकी नज़रें लगी हुई हैं। एक वर्ष में जितने आरोप विभिन्न पत्रों के माध्यम से प्रशासन पर लगे हैं उनकी चर्चा आने वाले चुनावों में विपक्ष अवश्य उठायेगा इसका जवाब सरकार कैसे देगी इस पर भी सबकी निगाहें रहेंगी। सरकार और संगठन में तालमेल कैसे बैठ पाता है यह भी बड़ा मुद्दा रहेगा। क्योंकि तालमेल का अभाव पहले ही चर्चा में आ चुका है। ऐसे में एक वर्ष के आकलन में सरकार की कारगुजारी औसत से अधिक नहीं आंकी जा सकती। यह सही है कि आपदा ने सरकार के गणित को बुरी तरह प्रभावित किया है लेकिन इस आपदा से पहले ही सरकार ने अपना भार इतना बढ़ा लिया जिसकी आवश्यकता ही नहीं थी। इसी भार के कारण सरकार का क्षेत्रिय सन्तुलन गड़बड़ाया है।