शिमला/शैल। अरनी विश्वविद्यालय के चांसलर विवेक सिंह उच्च शिक्षा को एक नया आयाम प्रदान कर रहे हैं यह दावा किया है अरनी विश्वविद्यालय ने एक प्रेस ब्यान में। इस विश्वविद्यालय को 2009 में यूजीसी की मान्यता प्राप्त हुई थी और तब यहां पर विद्यार्थियों की संख्या केवल 200 थी जो आज बढ़कर 2023 में 2000 तक पहुंच गयी है। इस समय में प्रदेश में निजी क्षेत्र में खुले कुछ विश्वविद्यालय बन्द होने की कगार पर पहुंच गये हैं। उच्च शिक्षा नियामक आयोग कई विश्वविद्यालयों को अपने निरीक्षण के बाद जुर्माना तक लगा चुका है। बहुत सारे विश्वविद्यालयों ने कोविड के कारण उस दौरान विद्यार्थियों की संख्या कम होने का तर्क दिया है और उसका प्रभाव अब तक चले आने की बात की है। ऐसे में यदि किसी विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या लगातार बढ़ रही है तो यह स्वतः प्रमाणित हो जाता है कि वह अपने समकक्षों से कुछ तो बेहतर सेवाएं प्रदान कर रहा होगा। यूजीसी के मानकों की अनुपालना न होने के कोई आरोप इस विश्वविद्यालय के खिलाफ अब तक सामने नहीं आये हैं। इसका श्रेय विश्वविद्यालय के चांसलर को दिया जा रहा है। दावा किया गया है कि कुलपति विवेक सिंह एक दशक पहले यहां आये थे उन्होंने विश्वविद्यालय में नए शिक्षण तकनीकों साफ्ट स्किल्ज और आधुनिक पाठयक्रमों पर ध्यान केंद्रित किया और विश्वविद्यालय को उत्तर भारत में विद्यार्थियों के आकर्षण का केंद्र बना दिया। यहां आधुनिक युग के पाठयक्रम प्रस्तुत किये जा रहे हैं जिनमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डाटा साईंस, सस्टेनेबल डेवलपमेंट जैसे विकसित होने वाले क्षेत्र शामिल हैं। जो विद्यार्थियों को तेजी से बढ़ते जॉब मार्केट के लिये तैयार करते हैं। विश्वविद्यालय इन्टर डिविजनरी लर्निंग को बढ़ावा देता है जिससे छात्रों को व्यक्तित्व विकास में बढ़ावा मिलता है। विश्वविद्यालय के इस प्रसार का श्रेय चांसलर विवेक सिंह को दिया जा रहा है।
शिमला/शैल। नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सुक्खू सरकार पर आरोप लगाया है कि इसमें आपसी तालमेल का गंभीर अभाव है। क्योंकि सरकार द्वारा दोपहर को लिये फैसले शाम को ही बदल दिये जा रहे हैं। जयराम ठाकुर ने यह आरोप तब लगाया जब सरकार ने शनिवार को दोपहर में यह अधिसूचना जारी की पटवारी और कानूनगो अब से राज्य सरकार के कर्मचारी होंगे। यह अधिसूचना आने पर संबधित कर्मचारियों ने एक दूसरे को शुभकामनाएं देनी शुरू कर दी। लेकिन थोड़ी देर बाद दूसरी अधिसूचना आ गयी और इसमें पहले को खारिज कर दिया गया। इससे पहले परिवहन निगम लग्गेज पॉलिसी लायी और बुजुर्गों की दवाई से लेकर बच्चों के खेलने के समान पर भी किराया वसूला। विशेष पथकर लगाकर प्रदेश की पर्यटन को तबाह कर दिया। जब जनता में रोष पनपा तो इन फैसलों को भी बदलना पड़ा। स्टोन क्रेशर बंद करने और फिर खोलने का फैसला भी सोच विचार के अभाव को ही दिखता है। माध्यमिक शिक्षा में पहले गेस्ट शिक्षक योजना की बातें की गयी और बाद में उसे बदल दिया गया।
इस तरह फैसले लेने और उन पर अमल से पहले ही उन्हें बदल देना यही दिखता है कि बिना व्यापक विचार विमर्श के फैसले लिये जा रहे हैं। सरकार में आपस में तालमेल का गहरा संकट चल रहा है। इस तरह की कार्य प्रणाली का आम जनता पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ रहा है। ऐसे बिना सोच विचार लिये जा रहे फैसलों से जनता में यही संदेश जा रहा है कि सरकार पैसा इकट्ठा करने के लिये कोई भी फैसला ले रही है। लेकिन फैसलों की यह व्यवहारिकता नहीं देखी जा रही है कि उनका आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। आज सरकार हरित ऊर्जा के नाम ई-वाहन खरीद योजना पर 50ः तक अनुदान देने की घोषणा कर रही है। लेकिन इस घोषणा के बाद भी लोग आगे नहीं आ रहे हैं। इससे यह स्पष्ट संकेत जाता है कि लोग इस योजना की पहाड़ी क्षेत्र में सफलता को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। फिर आज प्रदेश जिस तरह के वित्तीय संकट में चल रहा है उसमें यह सवाल और भी अहम हो जाता है कि क्या कर्ज लेकर ऐसी योजनाओं को लाना आवश्यक है।

शिमला/शैल। देवी देवताओं के आशीर्वाद और जनता की दुआओं से स्वस्थ होकर लौटे मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का शिमला पहुंचने पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं मंत्रिमण्डलीय सहयोगियों और जनता ने जोरदार स्वागत किया है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें कुछ समय आराम करने और समय पर खाना खाने की सलाह दी है। लेकिन मुख्यमन्त्री ने स्पष्ट किया कि वह अपने कर्तव्यों का भी निर्वहन करते रहेंगे क्योंकि चार वर्षों में प्रदेश को आत्मनिर्भर और दस वर्षों में देश का सबसे समृद्ध राज्य बनाना है। मुख्यमंत्री का यह संकल्प प्रदेश सरकार और कांग्रेस पार्टी के लिये एक बड़ी चुनौती होगा क्योंकि कांग्रेस ने चुनाव से पहले जो दस गारंटीयां प्रदेश की जनता को दी थी उन पर अब तक कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाये जा सके हैं। बल्कि इन गारंटीयों के बाद सरकार के सौ दिन पूरे होने पर कुछ और वायदे भी प्रदेश की जनता से मार्च माह में किये गये हैं। इस समय भाजपा इन गारंटीयों को लेकर सुक्खू सरकार के खिलाफ पूरी तरह आक्रामक हुई पड़ी है। भाजपा का हर नेता इसे मुद्दा बना कर हर दिन उछाल रहा है। चुनावी राज्यों में भी यह गारंटीयां मुद्दा बनी हुई है।
दूसरी और सुक्खू सरकार को पूर्व भाजपा सरकार से 9200 करोड़ की देनदारियां विरासत में मिली है। केन्द्र सरकार ने प्रदेश सरकार के कर्ज लेने की सीमा में भी काफी कटौती की है। यह आरोप राज्य सरकार द्वारा प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर लाये गये श्वेत पत्र में दर्ज है। ऐसी कठिन वित्तीय स्थिति से गुजरती हुई सरकार अब तक 11000 करोड़ का कर्ज ले चुकी है और 800 करोड़ लेने की प्रक्रिया में है। ऐसी हालत में भी मुख्यमंत्री का यह दावा करना की शेष बचे चार वर्षों में प्रदेश को आत्मनिर्भर और दस वर्षों में देश का सबसे समृद्ध राज्य बना देने का वायदा कितनी व्यवहारिक शक्ल ले पायेगा इसको लेकर साथ ही सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि सरकार की कार्यशैली और उसकी अब तक की घोषित योजनाओं पर नजर रख रहे विश्लेष्कांे का मानना है कि मुख्यमंत्री का यह वायदा पूरा हो पाना संभव नहीं है। क्योंकि इस समय प्रदेश में रोजगार की उपलब्धता सबसे बड़ा सवाल है। प्रदेश का युवा वर्ग रोजगार न मिल पाने से पूरी तरह आक्रोषित और हतोत्साहित है। सरकार का एक वर्ष का कार्यकाल पूरा होने जा रहा है। सरकार में सौ दिन पूरा होने पर सरकारी और प्राइवेट सैक्टर में जो रोजगार की उपलब्धता का आंकड़ा जारी किया था वह वायदा कागजी आश्वासन से आगे नहीं बढ़ पाया है।
इस वस्तुस्थिति में स्वास्थ्य लाभ लेकर लौटे मुख्यमंत्री से इतना बड़ा और वायदा करवा देना विपक्ष को एक और मुद्दा देना बन जायेगा। स्वभाविक है कि सलाहकारों द्वारा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा ऐसा ब्यान जारी करवा देना अपने में ही कई सवाल खड़े कर देता है। क्योंकि अब तक की कार्यप्रणाली से यह स्पष्ट हो गया है की सरकार को हर माह एक हजार करोड़ का कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसे में कर्ज लेकर वायदों को पूरा करना किसी भी गणित में से प्रदेश हित में नहीं कहा जा सकता। आने वाले दिनों में लोकसभा चुनावों का सामना करना पड़ेगा। उस समय यह कर्ज और वायदे जनता के सबसे बड़े सवाल होंगे। विपक्ष इनको लेकर पूरी तरह हमलावर होगा। क्या कांग्रेस का आम कार्यकर्ता इन सवालों का जवाब दे पायेगा? विश्लेष्कों का मानना है कि जो जनता मुख्यमंत्री के स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थनाएं कर रही थी उसके सामने फिर ऐसे वायदे परोसने का कोई औचित्य नहीं था। इन वायदों पर प्रदेश संगठन और हाईकमान तक को जवाबदेह होना पड़ेगा यह तय है।
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार दस माह में 11300 करोड़ का कर्ज ले चुकी है और यदि कर्ज लेने की यही गति जारी रही तो पांच साल में इस सरकार के नाम 60,000 करोड़ के कर्ज का रिकॉर्ड बन जायेगा। यह आरोप प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ राजीव बिंदल ने आर.टी.आई. के माध्यम से मिली जानकारी के आधार पर लगाया है। दूसरी और सुक्खू सरकार में उपमुख्यमन्त्री मुकेश अग्निहोत्री और राजस्व एवं बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी ने एक संयुक्त ब्यान में आरोप लगाया है कि केन्द्र सरकार ने प्रदेश भाजपा नेताओं के इशारे पर 4950 करोड़ की आपदा सहायता राशि रोक रखी है। इन मंत्रियों ने खुलासा किया है कि केंद्र सरकार की ओर से टीमें प्रदेश में आपदा का आकलन करने आयी थी और प्रदेश सरकार ने 10 अगस्त को 6746 करोड़ का पहले प्रस्ताव सहायता के लिए भेजा था। इसके बाद 10 अक्तूबर को 9900 करोड़ की सहायता का दूसरा प्रस्ताव भेजा था। इस तरह 4950 करोड़ प्रस्ताव का 50% प्रदेश का हक बनता था जो जारी नहीं किया गया है और इसके लिये प्रदेश भाजपा नेतृत्व जिम्मेदार है। दूसरी ओर प्रदेश भाजपा के नेता सुक्खू सरकार की गारंटीयों को पांच राज्यों के चुनाव में मुद्दा बनाकर उठा रहे हैं। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने तेलंगाना में एक चुनावी जनसभा में इन गारंटीयों की सूची दिखाते हुए आरोप लगाया है कि हिमाचल में एक वर्ष में इस पर अमल करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है न ही किसी किसान से 100 रूपये लीटर दूध खरीद गया है और न ही 2 रूपये किलो गोबर। गारंटीयों के नाम पर प्रदेश सरकार का पक्ष बहुत कमजोर है और शायद इसीलिये इस सरकार का कोई भी मंत्री इन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए नहीं जा पाया है। यह बढ़ता कर्ज और गारंटीयों पर अमल की दिशा में कोई कदम न उठा पाना सुक्खू सरकार के लिए आने वाले दिनों में कई बड़े मुद्दे होंगे। क्योंकि इस समय भाजपा और कांग्रेस के लिए यह विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव अस्तित्व का सवाल बनने जा रहे हैं। इंडिया गठबंधन बनने से पहले टूटने के संकेत देने लग गया है और इसके लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आज कांग्रेस ही मोदी-भाजपा के लिये सबसे बड़ी चुनौती है।