Monday, 02 March 2026
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आवास आबंटन को लेकर अधिकारियों का उच्च न्यायालय पहुंचना प्रशासनिक पकड़ पर प्रश्न चिन्ह

शिमला/शैल। सुक्खु सरकार के दो आई.ए.एस. अधिकारी सरकारी आवास आबंटन को लेकर उच्च न्यायालय पहुंच गये है। उच्च न्यायालय ने संबद्ध पक्षों को नोटिस आवास आमंत्रण को लेकर अधिकारियों का उच्च न्यायालय पहुंचना प्रशासनिक पकड़ पर प्रश्न चिन्ह भी जारी कर दिये हैं। दोनों ही अधिकारी मुख्यमंत्री के विश्वास पात्र माने जाते हैं क्योंकि एक निदेशक सूचना एवं जनसंपर्क है तो दूसरा सोलन का जिलाधीश। मामला सिर्फ इतना भर है कि जिलाधीश सोलन आठ अप्रैल तक शिमला में ही कार्यरत थे। आठ अप्रैल को बतौर डीसी सोलन ट्रांसफर किया गया। जहां पर अब तक कार्यरत है। लेकिन शिमला में जो सरकारी आवास उनके पास था उसे उन्होंने अभी तक खाली नहीं किया है। जबकि यह आवास जुलाई में निदेशक सूचना एवं जनसंपर्क को आबंटित हो चुका है। जिलाधीश सोलन आवास को खाली नहीं कर रहे हैं और इसी पर यह प्रकरण उच्च न्यायालय पहुंच गया है। जबकि आवास आबंटन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित कमेटी करती है। यदि कोई अधिकारी, कर्मचारी स्थानान्तरण के बाद भी आवास खाली नहीं करता है तो उसे खाली करवाने की जिम्मेदारी संपदा निदेशालय की होती है। इसके लिए यदि अदालत तक भी जाना पड़ता है तो संपदा निदेशालय जाता है। लेकिन इस मामले में निदेशक सूचना एवं जनसंपर्क को अदालत से यह गुहार लगानी पड़ी है कि जिलाधीश सोलन अवैध कब्जाधारी है।
दो अधिकारियों के बीच आवास को लेकर उभरा विवाद सचिवालय की दहलीज लांघकर अदालत के आंगन में जा पहुंचे तो आम आदमी की सरकार को लेकर क्या धारणा बनेगी। क्या मुख्य सचिव के स्तर पर यह मामला नहीं सुलझ पाया? क्या अदालत पहुंचने की नौबत आने से पहले इसे मुख्यमंत्री के संज्ञान में नहीं लाया गया होगा? क्या इस तरह यह मामला प्रशासनिक अराजकता का प्रमाण नहीं बन जाता है।

प्रतिभा सिंह कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की स्थाई आमंत्रित सदस्य बनी

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा सांसद प्रतिभा सिंह पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की स्थाई आमंत्रित सदस्य बना दी गयी है। इस राष्ट्रीय कार्यकारिणी में हिमाचल से दो ही सदस्य हैं। दूसरे सदस्य पूर्व केंद्रीय मंत्री आनन्द शर्मा हैं। प्रतिभा सिंह का स्थाई आमंत्रित सदस्य बनना प्रदेश के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना मानी जा रही है। क्योंकि जब से सुक्खू सरकार बनी है तभी से संगठन और सरकार में उचित तालमेल न होने के आरोप लगते आये हैं। स्थिती यहां तक पहुंच गयी कि प्रतिभा सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष खड़गे से मिलकर यह कहना कि वह उपेक्षित महसूस कर रहे हैं और पार्टी के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को उचित मान सम्मान नहीं मिल रहा है। कार्यकर्ताओं की अनदेखी होने की बात पूर्व अध्यक्ष विधायक कुलदीप राठौर भी लगा चुके हैं। पार्टी विधायकों राजेन्द्र राणा और सुधीर शर्मा भी अपने को किस कदर उपेक्षित महसूस कर रहे हैं यह पिछले दिनों आये उनके ट्वीट स्पष्ट कर चुके हैं। पूर्व विधायक नीरज भारती तो मुख्यमंत्री के व्यवस्था परिवर्तन के सूत्र पर जिस तरह का तंज कस चुके हैं वह भी अपने में बहुत कुछ कह जाता है।
सरकार ने अभी शिमला की पराला मण्डी में पन्द्रह लोगों की तैनाती की है। इन पन्द्रह में से ग्यारह हमीरपुर से ताल्लुक रखते हैं। इन नियुक्तियों से स्थानीय युवाओं में भारी रोष देखने को मिला है। स्थानीय युवाओं ने विधायक कुलदीप राठौर के सामने नारे लगाकर अपना रोष प्रकट किया है। ऐसी और भी कई घटनाएं हैं जहां बेरोजगार युवा अपना रोष प्रकट कर चुके हैं। इस तरह पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर बेरोजगार युवाओं के बीच सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर रोष पनपता जा रहा है। अभी राशन डिपुओं में सस्ते राशन की दरों में भी काफी बढ़ौतरी की जा रही है। इस तरह सरकार के खिलाफ नाराज लोगों की संख्या अनचाहे ही बढ़ते जा रही है।
ऐसे समय में प्रतिभा सिंह का राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनना इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है कि इससे आम आदमी की पीड़ा और नाराजगी को हाईकमान के पास पहुंचाने का एक सशक्त माध्यम कार्यकर्ताओं और आम आदमी को मिल जाता है। इस नियुक्ति से उन भ्रांतियां को भी विराम मिल जायेगा जिनके माध्यम से प्रतिभा सिंह को ही प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाये जाने की चर्चाओं को प्रचारित किया जा रहा था।

भ्रष्टाचार के आरोपों पर धारा 505(2) का दुरुपयोग महंगा पड़ सकता है।

  • मीणा की एफ आई आर से उभरी चर्चा
  • क्या 505(2) के प्रयोग से भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती आवाजों को दबाने का प्रयास हो रहा है
  • प्रवीण गुप्ता की एफ आई आर की जांच रिपोर्ट कहां है

शिमला/शैल। प्रदेश पावर कॉरपोरेशन की कार्यप्रणाली को लेकर जारी हुआ दूसरा पत्र बम्ब वायरल होकर चर्चा में आने के बाद कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक हरिकेश मीणा ने इस पर पुलिस में शिकायत दर्ज करवाते हुए इसमें मामला दर्ज किये जाने की मांग की है। मीणा ने पत्र में दर्ज आरोपों को झुठ करार देते हुये इसे उनकी छवि खराब करने का प्रयास कहा है। पुलिस ने मीणा के आग्रह पर अज्ञात लोगों के खिलाफ आई.पी.सी. की धारा 500 और 505(2) के तहत मानहानि का मामला दर्ज कर लिया है। इसमें लगायी गयी धारा 505(2) से यह मामला अपने में ही रोचक बन गया है। क्योंकि यह धारा तब लगती है जब विभिन्न समुदायों के बीच शत्रुता, घृणा या वैमनस्य की भावनायें पैदा करने के आशय से पूजा के स्थान आदि में झूठे ब्यान या भाषण देना आदि हो। ये गैर जमानती और संज्ञेय अपराध है। यदि धारा 505(2) न लगायी जाये तो धारा 500 में यह पुलिस का एफ आई आर दर्ज करने का योग्य मामला बनता ही नहीं है। धारा 505(2) को लेकर मुंबई उच्च न्यायालय का 65-2022 को याचिका संख्या 2954 व्थ् 2018 में आया फैसला विस्तार से इसे स्पष्ट कर देता है। यह याचिका भी एक पुलिस अधिकारी द्वारा एक पत्रकार के खिलाफ ही दायर किया गया था। इस मामले की सुनवाई के दौरान सर्वाेच्च न्यायालय के भी कई फैसले प्रसंग में आये हैं। इस फैसले में मुंबई उच्च न्यायालय ने धारा 505(2) की विस्तृत व्याख्या करते हुये कड़ी टिप्पणी के साथ एफ आई आर को रद्द किया है।

वर्तमान संदर्भ में यह चर्चा इसलिये उठाई जा रही है कि भ्रष्टाचार के मामलों पर प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष उठती आवाजों को दबाने के प्रयास में हिमाचल पुलिस धारा 505(2) के तहत अंसज्ञेय मामलों को संज्ञेय बनाने की नीति पर चल रही है। कानून के जानकारों के मुताबिक पावर कारपोरेशन को लेकर जो पत्र वायरल हुये हैं उनमें किसी भी गणित से धारा 505(2) पिक्चर में आयी ही नहीं है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है की क्या हिमाचल पुलिस का थाने तक का स्टाफ इस धारा को लेकर अपने में स्पष्ट नहीं है या ऊपर के निर्देशों पर मामलों को दबाने के प्रयासों में ऐसा किया जा रहा है। क्योंकि जयराम सरकार कार्यकाल में भी प्रवीण गुप्ता द्वारा थाना सदर शिमला में इसी धारा के तहत मामला दर्ज किया गया था जिसका जांच परिणाम आज तक सामने नहीं आया है।
वैसे तो पुलिस में किसी भी मामले की जांच करने के लिये सोर्स रिपोर्ट का भी प्रावधान है। क्योंकि कई बार शिकायतकर्ता नामतः सामने आने का साहस नहीं कर पाता है। अभी जो मामला पावर कारपोरेशन का वायरल पत्रों के माध्यम से चर्चा में आया है अब उसमें यह एफ आई आर दर्ज होने के बाद पत्रों में संदर्भित अधिकारियों/कर्मचारियों और राजनेताओं के ब्यान दर्ज करना और संबंधित रिकार्ड की जांच करना आवश्यक हो जायेगा। क्योंकि दर्ज हुई एफ आई आर का निपटारा तो अदालत में ही होना है चाहे उसमें चालान दायर हो या कैंसलेशन रिपोर्ट। अब यह मामले जन संज्ञान में आ चुके हैं। फिर पावर कारपोरेशन में जो पटेल इंजीनियरिंग कंपनी के संदर्भ में है वह पहले से ही सीबीआई के रॉडार पर चल रही है। ऐसा माना जा रहा है कि जिस एफ आई आर के माध्यम से आवाज दबाने का प्रयास किया गया है वह अब कई लोगों के गले की फांस बन जायेगी क्योंकि पत्रों में दर्ज आरोपों की जांच किया जाना आवश्यक हो जायेगा। धारा 505 (2) का दुरुपयोग महंगा पड़ सकता है।

आपदा काल में सुरक्षित सरकारी भवन से कार्यालयों को निजी भवनों में ले जाना कितना सही

  • यू एस क्लब से सरकारी कार्यालयों की शिफ्टिंग क्यों?

शिमला/शैल। प्रदेश में राज्य आपदा घोषित है क्योंकि जान माल का अकल्पनीय नुकसान हुआ है। इसकी भरपाई करने में लम्बा समय लगेगा। सरकार वित्तीय संकट से जूझ रही है। मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की चेतावनी दी है। स्वभाविक है कि ऐसी चेतावनी सचिवालय में बैठी वरिष्ठ अफसरशाही द्वारा दिये गये फीडबैक पर आधारित रही होगी। इस वित्तीय चेतावनी के परिदृश्य में ही नये संसाधन जुटाने के उपाय सोचे गये होंगे। जल-उपकर के लिये अध्यादेश तक लाया गया। डीजल पर दो बार वैट बढ़ाया गया। बिजली-पानी और कूड़े तक के रेट बढ़ाये गये। मंदिरों में वी.आई.पी दर्शन की सुविधा के लिये 1100रू का शुल्क तक लगा दिया। बसों में सामान ले जाने के लिये अतिरिक्त किराया लगाने का फैसला लिया गया। अधिकारियों/कर्मचारियों तक के तबादले नहीं किये गये। ताकि सरकार पर कोई खर्च का बोझ न पड़े। मुख्यमंत्री ने निजी भवनों में चल रहे सरकारी कार्यालय को सरकारी भवनों में शिफ्ट करने के निर्देश दिये ताकि खर्च कम किया जा सके।
ऐसे संकट पूर्ण हालत में सरकार ने यू.एस.क्लब स्थित पांच सरकारी कार्यालयों को शिफ्ट करने के निर्देश दिये हैं। इन्हें कहा गया है कि वह अपने लिये स्थान का प्रबंध करें। स्वभाविक है कि इन्हें निजी भवनों में ही अपने लिये जगह तलाशनी होगी। शायद पर्यटन विभाग ने तो इन आदेशों की अनुपालना के लिए कदम भी उठा लिए हैं। सरकार के इस आदेश के बाद पहली आशंका तो इस ओर जाती हैं की कहीं यू.एस. क्लब भी सरकारी रिपोर्टों में अनसेफ भवनों की श्रेणी में तो नहीं आ गया है। जिससे वहां स्थित कार्यालय को दूसरी जगह शिफ्ट करने की आवश्यकता खड़ी हो गयी है। लेकिन सरकार के आदेशों के बाद जो चर्चाएं सामने आयी हैं उनके मुताबिक यू.एस. क्लब से सरकारी कार्यालयों को शिफ्ट करके वहां पर अधिकारियों के लिए क्लब की व्यवस्था की जायेगी। क्योंकि यह स्थान माल रोड के निकट है और गाड़ियों की पार्किंग आदि की सुविधा भी उपलब्ध है। इस क्लब में अधिकारियों के लिये क्लब बनाने के प्रयास पिछली सरकारों के दौरान भी हुये हैं लेकिन किसी भी मुख्यमंत्री ने ऐसा करने की अनुमति नहीं दी है। जयराम सरकार के समय भी वरिष्ठ अफसरशाही ने ऐसा प्रयास किया था लेकिन मुख्यमंत्री इसके लिये नहीं माने थे।
लेकिन अब आपदा काल में जिस तरह से यह फैसला आया है उससे सरकार की संवेदनशीलता पर गहरे सवाल उठने शुरू हो गये हैं। यह सवाल उठ रहा है कि क्या ऐसे फैसला मंत्री परिषद की बैठक में लिया गया है। क्या मुख्यमंत्री के अपने स्तर पर यह फैसला लिया गया है या अधिकारियों ने अपने स्तर पर ही ऐसा फैसला यह मानकर ले लिया होगा कि मुख्यमंत्री के स्तर पर कोई सवाल नहीं उठाये जाएंगे। वैसे मुख्यमंत्री या उनके सहयोगी किसी भी मंत्री की कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। आपदा काल में इस तरह के फैसले लिये जाना कठिन वितीय स्थिति और आपदा में सरकारी तंत्र की गंभीरता पर गहरे सवाल छोड़ जाता है। यह चर्चा चल पड़ी है कि सरकार का अफसरशाही पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। क्योंकि सरकार इस आपदा में हर एक से सहयोग मांग रही है। यदि आम आदमी का सहयोग ऐसे ही कार्यों पर निवेशित होना है तो फिर सहयोग से पहले उसकी पात्रता पर सवाल उठेंगे यह तय है।

फोरलेन निर्माता कंपनियों के खिलाफ आयी शिकायत पर कारवाई कब

  • क्या इन निर्माणों में पर्यावरण इम्पैक्ट असैसमैन्ट अथॉरिटी की भी कोई भूमिका है
  • क्या इन निर्माता कंपनियों के साथ निगरान तंत्र की भी भूमिका नहीं है
शिमला/शैल। परमाणु-सोलन और किरतपुर-मनाली फोर लेन पर इस वर्षा के कारण जितना नुकसान हुआ है क्या उसके लिये इन फोर लेन निर्माता कंपनीयों को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए? क्योंकि जिस तरह का भूस्खलन हुआ है उसका कारण पहाड़ों का अवैज्ञानिक कटान माना जा रहा है। परमाणु-सोलन में जाबली के पास एक पूरा गांव नष्ट हो गया है। मण्डी-कुल्लू में भी पहाड़ से पत्थर गिरने के कारण मौतें हुई हैं। अवैज्ञानिक कटान आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आता है और दण्डनीय अपराध है। परमाणु- सोलन निर्माण पर सवाल उठाते हुये शिमला के पूर्व उप महापौर सी.पी.एम. नेता टिकेन्द्र पंवर ने परमाणु पुलिस के पास निर्माता कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा कर कंपनी के खिलाफ अपराधिक मामला दर्ज किये जाने की मांग की है। मण्डी में भी सी.पी.एम. नेताओं ने किरतपुर-मनाली फोर लेन निर्माता कंपनी के खिलाफ मामला दर्ज किये जाने की मांग की है। पुलिस द्वारा अभी तक यह सामने नहीं आया है कि उसने इन शिकायतों पर क्या कारवाई की है। लेकिन इस संबंध में आये हर अध्ययन में यह माना गया है कि इस नुकसान का बड़ा कारण अवैज्ञानिक कटान रहा है।
निर्माता कंपनियों के खिलाफ आयी शिकायतों के साथ ही यह सवाल भी खड़ा हो गया है कि क्या इसके लिये केवल यह निर्माता कंपनियां ही जिम्मेदार हैं या प्रदेश सरकार के तंत्र की भी इसमें कोई जिम्मेदारी बनती है। क्योंकि पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को देखने के लिए प्रदेश में पर्यावरण विभाग स्थित है। जब भी किसी नई परियोजना के निर्माण का प्रस्ताव सरकार के पास आता है तो उसकी स्वीकृति दिये जाने से पहले पर्यावरण इम्पैक्ट असैसमैन्ट रिपोर्ट ली जाती है और रिपोर्ट देने के लिये इस आश्य की एक अथॉरिटी भी गठित है। इस अथॉरिटी की रिपोर्ट के बिना किसी भी योजना की अनुमति नहीं मिल पाती है चाहे कोई उद्योग लगाना हो कोई सड़क निर्माण होना हो या कोई विद्युत परियोजना का प्रस्ताव हो।
इस अथॉरिटी की रिपोर्ट के बाद जब निर्माण शुरू हो जाता है तो समय-समय पर यह देखना की निर्माण में तय मानकों की अनदेखी तो नहीं हो रही है। ऐसे में जब फोर लेन निर्माता कंपनियों पर अवैज्ञानिक कटान के आरोप लग रहे हैं तब क्या सारी निगरान एजैन्सियों की भूमिका भी स्वतः ही जांच के दायरे में नहीं आ जाती है? अब जब सी.पी.एम. नेताओं ने निर्माता कंपनियों के खिलाफ शिकायत करके जांच किये जाने की मांग उठा दी है तो क्या उसी तर्ज पर संबद्ध निगरान एजैन्सियों की भी जांच नहीं हो जानी चाहिये।

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