Monday, 02 March 2026
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क्या डॉक्टरों की नियुक्तियों पर फिर उठेगा एन.पी. ए. का मुद्दा? डॉक्टरों और मुख्यमंत्री की वार्ता के बाद उभरी आशंका

  • स्वास्थ्य मंत्री और विभाग के अन्य लोगों को फैसले की जानकारी ही न होने का अर्थ क्या है?
  • क्या यह फैसला विभाग से बाहर लिया गया था?
  • नौकरी चाहिये या एन.पी.ए. यह मोल तोल की भाषा क्यों ?
  • क्या कोई अदृश्य हाथ चला रहा है सरकार

शिमला/शैल। हिमाचल सरकार द्वारा डॉक्टरों का एन.पी.ए- बन्द कर देने की अधिसूचना जैसे ही चर्चा में आयी तो प्रदेश की मेडिकल ऑफिसरज एसोसिएशन ने इसका संज्ञान लेते हुये हड़ताल पर जाने का फैसला कर लिया। क्योंकि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री से लेकर स्वास्थ्य सचिव तक हर संबद्ध अधिकारी ने इस फैसले पर अनभिज्ञता प्रकट की। स्वभाविक है कि जब फैसले को लेकर हर संबद्ध व्यक्ति जानकारी न होने की बात करेगा तो प्रभावित डॉक्टरों के पास सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिये हड़ताल पर जाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जाता था। इसी वस्तुस्थिति में डॉक्टर हड़ताल पर चले गये और मामले को सुलझाने के लिये मुख्यमंत्री को स्वयं वार्ता में शामिल होना पड़ा। डेढ़ घंटा तक चली इस वार्ता के बाद डॉक्टरों ने मुख्यमंत्री के आश्वासन पर हड़ताल समाप्त कर दी और प्रभावित स्वास्थ्य सेवाएं फिर से नॉर्मल हो गयी। मुख्यमंत्री के साथ हुई इस वार्ता में प्रदेश में बन रही मेडिकल कॉरपोरेशन से लेकर अन्य सभी मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई है और हर मुद्दे पर संतोषजनक आश्वासन भी मिले हैं।
लेकिन इस वार्ता के बाद जो प्रैस नोट जारी हुये हैं उसमें कहा गया है कि एन.पी.ए. बंद नहीं किया गया है बल्कि इसे रोका गया है। यह भी कहा गया है कि भविष्य में डॉक्टरों की होने वाली नियुक्तियों के समय में इस पर विचार किया जायेगा। मुख्यमंत्री के इस आश्वासन से स्वतः ही यह संदेश और संकेत चला जाता है कि इस हड़ताल को अभी सिर्फ टाला गया है। यह मसला स्थाई तौर पर हल नहीं हुआ है। क्योंकि यह पहले ही चर्चा में आ गया है कि नौकरी चाहिये या एन.पी.ए.। यह भी सामने आ चुका है कि कुछ लोगों ने यह कहा है कि नौकरी और एन.पी.ए. दोनों ही चाहिये। इस तरह के दोहरे वक्तव्यों से यह स्पष्ट हो जाता है कि बेरोजगारी को आने वाले समय में किस तरह से भुनाया जायेगा और उसका कालान्तर में प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं पर किस तरह का असर पड़ेगा। क्योंकि सामान्यतः सरकार से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह बेरोजगारी को ऐसा हथियार बनायेगी।
इस समय प्रदेश के स्वास्थ्य संस्थानों में डॉक्टरों और अन्य सहायक कर्मचारियों के सैकड़ों पद खाली चल रहे हैं। कई जगहों के मामले तो अदालत तक पहुंच चुके हैं और अदालत को निर्देश देने पड़े हैं कि सरकार खाली पदों को शीघ्र भरें। प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों का तो व्यवहारिक रूप से संचालन ही प्रशिक्षु डॉक्टरों के हाथों में रहता है। ऐसे में जब यह प्रशिक्षु और रेजिडेंट डॉक्टर आने वाले समय में नयी नियुक्तियों के वक्त पर एन.पी.ए. या नौकरी चुनने की बाध्यता पर आयेंगे तो उस समय किस तरह की वस्तुस्थिति खड़ी हो जायेगी उसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। इसी के साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि जब सरकार की ओर से एन.पी.ए. को लेकर अधिसूचना जारी हो गयी थी तो इस पर स्वास्थ्य मंत्री से लेकर विभाग के अन्य संबद्ध लोगों ने अनभिज्ञता क्यों जताई? क्या सही में यह फैसला स्वास्थ्य विभाग से बाहर लिया गया था ? क्योंकि जब डॉक्टर हड़ताल पर चले गये और स्वास्थ्य मंत्री ने फैसले को लेकर अनभिज्ञता जताई तब नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर की एक प्रतिक्रिया आयी थी। जयराम ठाकुर ने कहा था कि कुछ बड़े आई.ए.एस. अधिकारी नहीं चाहते कि कुछ लोगों का वेतन इनसे ज्यादा हो जाये।
पूर्व मुख्यमंत्री की यह प्रतिक्रिया अपने में बहुत महत्वपूर्ण है और इसके राजनीतिक मायने भी गंभीर हैं। क्योंकि स्वास्थ्य विभाग को लेकर एक महत्वपूर्ण नीतिगत फैसला हो जाता है। डॉक्टर हड़ताल पर चले जाते हैं। स्वास्थ्य मंत्री को फैसले की जानकारी नहीं होती है। मुख्यमंत्री को स्वयं वार्ता में बैठना पड़ता है। नौकरी या एन.पी.ए. में चुनाव करने के संकेत दिये जाते हैं। स्वभाविक है कि जब कोई विश्लेषक इन सारी कड़ियों को एक साथ रखकर परखने का प्रयास करेगा तो उसके सामने सारी तस्वीर ही बदल जायेगी। क्योंकि कोई भी सरकार एक ही वक्त में डॉक्टरों और प्रदेश की जनता दोनों को एक साथ अंगूठा दिखाने का साहस नहीं कर सकती। निश्चित है कि यह सब किसी बड़ी योजना को अंजाम देने के लिये जमीन तैयार की जा रही है।

100 करोड़ की पर्यटन संपत्ति 1.5 करोड़ की वार्षिक लीज पर क्यों?

  • इस लीज के समय बोर्ड के चेयरमैन रामसुभग सिंह और एम डी प्रबोध सक्सेना थे
  • मनाली और मण्डी में अलग-अलग नियम क्यों अपनाये गये
  • क्या ऐसा किसी बड़े दबाव के कारण हुआ था या कोई अन्य कारण थे
  • अब मुख्यमन्त्री सुक्खू के फैसले पर लगी निगाहें

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग की 100 बीघा जमीन पर मनाली के बड़ाग्रां में 45 करोड़ से निर्मित संपत्ति को 1.5 करोड़ की वार्षिक लीज पर दिया जाना क्या भ्रष्टाचार की परिभाषा में आता है। यह सवाल इसलिये उठ रहा है क्योंकि जिस समतल 100 बीघा जमीन पर 28 कमरों, 52 दुकानो, रेस्तरां, डॉरमीट्री, वॉच टावर और पार्किंग स्पेस बना है उस जमीन की अपनी कीमत ही सौ करोड़ कही जाती है। जब यह परिसर बनकर तैयार हुआ और प्राइवेट प्लेयर को लीज पर देने की बात आयी तब इस परिसर को एचपीआईडीबी को दे दिया गया। तब इस इंफ्रास्ट्रक्चर बोर्ड के चेयरमैन राम सुभाग सिंह थे और एमडी प्रबोध सक्सेना थे। उस समय इस परिसर को एक दीपा साही को 16 वर्ष की लीज पर डेढ़ करोड़ प्रतिवर्ष की दर पर दे दिया गया। यह लीज आगे भी बढ़ाई जा सकती है यह शर्त भी साथ थी। यह लीज देने के लिये Quality Cost Based  System का नियम अपनाया गया।
इसमें जो निविदायें आयी उनके मूल्यांकन के लिए एस.डी.एम. की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन हुआ जिसमें तकनीकी पक्ष के लिए 80% अंक और वित्तीय पक्ष के लिए 20% अंक रखे गये। इस कमेटी के सामने जब निविदादाता तकनीकी पक्ष की प्रस्तुति देने गये तो उसी में दीपा साही को 35 अंक और अन्य को दस या उससे भी कम अंक मिले और इस तरह अन्य मानक गौण होकर रह गये। जबकि कन्सल्टैन्सी और अन्य सेवाएं लेने के लिये भारत सरकार द्वारा जो मैन्यूल जारी किया गया है उसके पैरा 3.9 के अनुसार Quality Cost Based  System सामान्य मामलों में लागू नहीं किया जाता जहां संपत्ति को लीज पर दिया जाना हो। मण्डी के कन्वैंशन सैन्टर और जंजैहली स्थित पर्यटन संपत्तियों को देने में दूसरा नियम लागू किया गया है। अब चर्चा है कि दीपा साही ने पिछले कुछ अरसे से 1.5़ करोड़ देना भी बन्द कर दिया है। दीपा शाही अब लीज की शर्तों में इस तरह का परिवर्तन चाहती है ताकि वह इसी सरकारी संपति पर ऋण ले सके।
अब इस आश्य का केस बनाकर शायद मुख्यमंत्री तक भेजा जा रहा है ताकि उनकी संस्तुति भी हासिल की जा सके। संयोगवश जिस समय यह लीज साईन हुई थी कुछ समय प्रबोध सक्सेना हिमाचल इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड के एम.डी. थे और आज मुख्य सचिव होने के नाते इसी बोर्ड के अध्यक्ष हैं। मनाली का यह परिसर स्पैन रिजॉर्ट के साथ लगता है। इसलिये यह सवाल उठ रहे हैं कि उस समय किसके दबाव में इस इतनी बड़ी प्राइम प्रॉपर्टी को इतने कम पर लीज पर दिया गया। यही नहीं मनाली की प्रॉपर्टी को इतने कम पर लीज पर देने के लिये अलग नियम अपनाया गया और मण्डी व जन्जैहली की संपत्तियों के लिये अलग एक ही पर्यटन विभाग की दो संपत्तियों को लीज पर देने के लिए दो अलग-अलग नियम क्यों अपनाये गये? क्या यह संपत्तियां प्राइवेट सैक्टर को देने के लिये ही कर्ज लेकर बनायी गयी थी।

क्यों होनी चाहिये पत्र बम्ब की जांच क्योंकि.......

  • पटेल इंजीनियरिंग कंपनी पर किरु परियोजना को लेकर 21 जुलाई 2022 में सीबीआई कर चुकी है छापेमारी
  • हिमाचल आने के लिये नया केस दर्ज करने की नहीं होगी आवश्यकता
  • शांग-टांग में हो रही देरी से 2000 करोड़ का प्रतिवर्ष हो रहा नुकसान
  • बैराज क्यों नहीं हो पाया है डिजाईन
  • अखबारों के विज्ञापनों को लेकर जयराम के कार्यकाल में आये सवाल पर अब तक चुप्पी क्यों?
  • एक महिला अधिकारी द्वारा लगाये यौन शोषण के आरोपों पर सरकार चुप क्यों?

शिमला/शैल। क्या सुक्खू सरकार के कुछ अधिकारियों के खिलाफ एक बेनामी पत्र के माध्यम से लगाये गये भ्रष्टाचार और यौन शोषण के आरोपों की कोई जांच हो पायेगी? नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और भाजपा के मुख्य प्रवक्ता विधायक रणधीर शर्मा अलग-अलग ब्यानों में जांच की मांग कर चुके हैं। सरकार और कांग्रेस पार्टी की ओर से आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं कहा गया है। मुख्यमंत्री का यह ब्यान जरूर आया है कि जयराम जिससे चाहे जांच करवा ले। यह एक बेनामी पत्र है और ऐसे ही कई पत्र जयराम सरकार के समय में भी आये थे। जिनकी जांच नहीं करवाई गई थी। इसलिए सुक्खू सरकार को जांच करवाने की कोई आवश्यकता नहीं है। कांग्रेस के कुछ हल्कों में यह तर्क भी गढ़ा जा रहा है। जयराम के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कारवाई नहीं हुई है। यह सच है और इसी तर्क पर सुक्खू सरकार चल पड़ी है। इसका परिणाम क्या होगा यह आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन सरकारें लोक लाज़ से चलती हैं जो शायद अब बीते समय की बात हो गयी है। पत्र वायरल होकर सामने है और सार्वजनिक संपत्ति बन चुका है। इसलिये इसके तथ्यों पर सवाल उठाना आवश्यक हो जाता है।
शांग-टांग परियोजना और पटेल इंजीनियरिंग कंपनी शांग-टांग परियोजना का निर्माण कार्य अब जर्मनी की कंपनी के.एफ.डब्ल्यू से लेकर पटेल इंजीनियरिंग के पास है। इसमें 9.5% ब्याज पर पावर फाइनैन्स कारपोरेशन से ऋण लिया जा रहा है। इसके पूरा होने पर प्रतिदिन पांच करोड़ की आय होगी और देरी होने से प्रति वर्ष दो हजार करोड़ का नुकसान हो रहा है। 2025 में तो ट्रांसमिशन को लेकर पावर ग्रिड की पेमेंट भी शुरू हो जायेगी चाहे तब तक परियोजना तैयार हो न हो इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि प्रदेश की आर्थिकी के लिये यह कितनी बड़ी बात है। यह योजना काफी पहले तैयार हो जानी चाहिए थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका है। लेकिन यह देरी कंपनी के कारण हुई या अधिकारियों के कारण इसकी कोई जिम्मेदारी करने की जगह कंपनी को और समय देना परियोजना में डैवियेशन करने से लागत में वृद्धि होना ऐसे फैक्टर हैं जिनकी जांच होना आवश्यक हो जाता है। जिम्मेदारी तय करने की बजाये समय में बढ़ौती कर देने की एवज में ही भ्रष्टाचार होने के आरोप लग रहे हैं। पटेल इंजीनियरिंग कंपनी के खिलाफ जम्मू-कश्मीर के किरु जल विद्युत परियोजना को लेकर भी जुलाई 2022 में सीबीआई की छापेमारी हो चुकी है। कंपनी के इस परिदृश्य में पत्र में लगाये गये आरोपों को हल्के से नहीं लिया जा सकता। इसलिये व्यापक जनहित में सरकार को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिये।
जागरण समाचार पत्र को लेकर आरोप
जागरण समाचार पत्र की फाइल क्लीयर करने को लेकर भी आरोप लगाया गया है। इस आरेप पर स्पष्टीकरण इसलिये आवश्यक हो जाता है क्योंकि जयराम सरकार में विधानसभा में यह प्रश्न पूछा गया था कि किस अखबार को कितने-कितने विज्ञापन दिये गये हैं। इस साधारण प्रश्न का जवाब पिछली सरकार के कार्यकाल के अंतिम चार सत्रों में यही कहा गया है कि सूचना एकत्रित की जा रही है। जयराम सरकार के समय में यह सूचना विधानसभा के पटल पर नहीं आयी। अब सक्खू सरकार के बजट सत्र में यह प्रश्न आया ही नहीं। स्वभाविक है कि सदन में उसी प्रश्न का जवाब टाला जाता है जिसमें सब कुछ नियमानुसार न हो। ऐसे यह जानना आवश्यक हो जाता है कि वह तथ्य क्या थे जिन्हें सरकार पटल पर नहीं रखना चाहती थी और सुक्खू सरकार ने भी इस ओर से आंखें बन्द कर ली है। शायद कई करोड़ों का मामला था। मीडिया को लेकर सुक्खू सरकार छः माह में कोई नीति नहीं बना पायी है। जबकि इस सरकार ने तो कैबिनेट रैंक में एक मीडिया सलाहकार भी नियुक्त कर रखा है। मीडिया सलाहकार के साथ ही सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का काम देखने के लिये एक मुख्य संसदीय सचिव भी नियुक्त है। लेकिन छः माह में यह लोग सारे मीडिया के साथ एक औपचारिक बैठक तक नहीं कर पाये हैं। इसलिये एक समाचार पत्र की फाइल क्लीयर करने के लिये लग रहे आरोपों की यह सच्चाई सामने आनी ही चाहिये की वास्तविकता क्या है।
महिला अधिकारी के यौन शोषण का आरोप
इस बेनामी पत्र में एक महिला अधिकारी द्वारा उसका यौन शोषण किये जाने की शिकायत मुख्यमंत्री के यहां लंबित होने का आरोप भी दर्ज है। किसी सरकार में एक अधिकारी द्वारा ऐसा आरोप लगाया जाना और उस पर सरकार का खामोश बैठे रहना अपने में बहुत कुछ कह जाता है। क्योंकि सामान्यतः ऐसे आरोपों पर सरकारें तभी खामोश रहती हैं जब उसे यह लगे कि ऐसा आरोप लगाना अधिकारी का स्वभाव ही बन गया है। लेकिन इस पत्र के माध्यम से यह आरोप आम आदमी तक पहुंच गया है। यह धारणा बन रही है कि जिस सरकार में एक महिला अधिकारी सुरक्षित नहीं है उसमें सामान्य जन कितना सुरक्षित होगा।
आज सुक्खू सरकार के खिलाफ यह बेनामी पत्र उस समय आया है जब सरकार के उपमुख्यमंत्री और मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को अदालत में चुनौती दी जा चुकी है। कानून के जानकारों के मुताबिक संसदीय सचिवों की नियुक्तियां देर-सवेर रद्द होंगी ही। यह पत्र प्रधानमंत्री को संबोधित है। पटेल इंजीनियरिंग कंपनी के खिलाफ सीबीआई पहले ही जुलाई 2022 में छापेमारी कर चुकी है। ऐसे में यदि प्रधानमंत्री कार्यालय से यह पत्र सीबीआई तक पहुंच जाता है जो इस परिदृश्य में सीबीआई को हिमाचल आने के लिये कोई नया केस दर्ज करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। वैसे भी प्रदेश के कुछ मंत्री यह आशंका व्यक्त कर चुके हैं कि अब सीबीआई और ईडी का आना तो लगा ही रहेगा।

 

क्या मुख्य संसदीय सचिव त्यागपत्र देंगे?

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार द्वारा नियुक्त किये गये मुख्य संसदीय सचिव अपने पदों से त्यागपत्र देंगे यह सवाल इन दिनों प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में विशेष चर्चा का विषय बना हुआ है। क्योंकि इस मामले की अगली सुनवाई उच्च न्यायालय में 19 जून को तय हुई है। इसमें कोई लंबी तारीख न मिलने से यह चर्चा उठी है। स्मरणीय है कि जब संविधान संशोधन के बाद राज्यों के मंत्रीमण्डल से मंत्रियों की अधिकतम सीमा तय कर दी गयी थी तब कई राज्यों ने राजनीतिक संतुलन के उद्देश्य से मुख्य संसदीय सचिव/संसदीय सचिव नियुक्त करने के अधिनियम पारित किये थे और राज्य मंत्री/उप मंत्री के समकक्ष रखा था। इसी के साथ कुछ राजनीतिक नियुक्तियों को लाभ के पदों के दायरे से बाहर कर दिया था। हिमाचल में यह दोनों अधिनियम पारित हुये और कुछ विधायकों को मुख्य संसदीय सचिव/संसदीय सचिव नियुक्त किया गया था। कुछ लोग निगमों/बोर्डों में भी समायोजित हुये थे।
लेकिन जब ऐसे नियुक्त हुये मुख्य संसदीय सचिवों/संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी तब उन्हें उच्च न्यायालय ने गैर सवैधानिक करार देकर तुरंत प्रभाव से हटाये जाने के आदेश कर दिये थे। अदालत के आदेशों के अनुपालन में यह लोग तुरन्त पदों से हट गये थे। उच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद राज्य सरकार ने पहले तो एस.एल.पी. दायर करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। दूसरी ओर नये सिरे से अधिनियम लाये इस अधिनियम को प्रदेश उच्च न्यायालय में फिर चुनौती मिल गयी। जो अब आयी याचिकाओं में प्रमुख रूप से संलग्न हो गयी है। लेकिन जो सुप्रीम कोर्ट में एस.एल.पी. दायर हुई थी वह 2017 में असम के मामले के साथ सलग्न हो गयी। असम के मामले में जुलाई 2017 में फैसला आ गया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि राज्य की विधानसभा को इस आश्य का कानून बनाने का अधिकार ही नही है। असम के इस फैसले के साथ ही हिमाचल की एस.एल.पी. सलंगन रही है। इसलिये कानून के जानकारों के मुताबिक हिमाचल को लेकर भी यह फैसला आ चुका है। जुलाई 2017 में यह फैसला आ जाने के कारण जयराम सरकार ने ऐसी नियुक्तियां नहीं की थी।
लेकिन अब सुक्खू सरकार ने तो मंत्रिमण्डल विस्तार से पहले ही मुख्य संसदीय सचिवों को शपथ दिला दी थी। अब इन नियुक्तियों को उच्च न्यायालय में चुनौती मिल चुकी है। माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के परिपेक्ष में हिमाचल के एक्ट को वैध ठहराना संभव नहीं होगा। यह आशंका भी जताई जा रही है कि यदि असम के 2017 के फैसले के परिपेक्ष में हिमाचल की एस.एल.पी. की सलग्नता का संज्ञान लेते हुये फैसला आता है तो उसके परिणाम बहुत गंभीर होंगे और विधायकी पर भी आचं आ सकती है। इन लोगों को मिले लाभों को भी सरकारी धन का दुरुपयोग करार दिया जा सकता है। ऐसे में अदालत की अनुकंपा के मकसद से यह लोग फैसले से पहले ही पदों से त्यागपत्र दे सकते हैं।

मण्डी में जयराम के नेतृत्व के खिलाफ उठे सवाल

पूर्व विधायक जवाहर ठाकुर ने खोला मोर्चा

शिमला/शैल। कर्नाटक चुनाव में भाजपा को मिली चुनावी हार का ठीकरा जे.पी.नड्डा द्वारा गलत टिकट आवंटन पर फोड़ा जाने लगा है। इस हार के लिये सही में नड्डा कितने जिम्मेदार हैं और प्रधानमंत्री मोदी की नीतियां कितनी जिम्मेदार हैं यह खुलासा कभी सामने आयेगा या नही यह कहना कठिन है। लेकिन हिमाचल में भाजपा की हार के लिये बहुत हद तक जिम्मेदार माना जा रहा है। क्योंकि जब भी प्रदेश की जयराम सरकार पर सवाल उठे तो उन्हें नड्डा हर बार नजरअन्दाज करते चले गये। इस नजरअन्दाजी से नड्डा और जयराम के राजनीतिक रिश्तों की गहराई और गहरी होती चली गयी। लेकिन अब जिस तर्ज में जयराम के गृह जिला मंडी से जवाहर ठाकुर ने प्रदेश में हार का ठीकरा जयराम के सिर फोड़ना शुरू किया है उसे जयराम के माध्यम से नड्डा के खिलाफ आक्रोश का सामने आना माना जा रहा है। जयराम के गृह जिला से एक पूर्व पार्टी विधायक का उनके खिलाफ मुखर होना बहुत सारे संकेत दे जाता है।
हिमाचल में भाजपा को स्थापित करने में शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के योगदान को नकार पाना संभव नहीं है। दोनों दो-दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। शान्ता तो परिस्थिति वश दोनों बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये। परन्तु धूमल ने न केवल कार्यकाल ही पूरे किये बल्कि पहले कार्यकाल में तो गठबन्धन की सरकार चलाई। लेकिन जयराम की सरकार बनने पर शान्ता धूमल दोनों को ही मार्गदर्शक मण्डल में डाल कर उससे बाहर निकलकर मार्ग दर्शक बनने ही नहीं दिया गया। जयराम सरकार के तो शुरू में ही हालत यहां तक पहुंच गये कि धूमल को यहां तक कहना पड़ गया कि सरकार चाहे तो उनकी सीआईडी जांच करवा ले। मानव भारती विश्वविद्यालय प्रकरण में तो हालात और भी नाजुक दौर में जा पहुंचे थे। राजनीतिक पंडित जानते हैं कि जयराम यह सब नड्डा के सक्रिय सहयोग से ही कर पाये हैं। इसी सबके कारण पार्टी विधानसभा के चुनाव हारी है।
इस परिपेक्ष में अब अगले लोकसभा चुनावों के लिये अभी से विसात बिछना शुरू हो गयी है। क्योंकि पूर्व भाजपा विधायक के इस आरोप को झुठलाया नहीं जा सकता कि जयराम के नेतृत्व में पार्टी तीन चुनाव हार गयी है। ऐसे में यदि कर्नाटक चुनाव की हार का कोई भी नजला नड्डा पर गिरता है तो उसके कारण प्रदेश में जयराम के नेतृत्व के लिये भी संकट आ जायेगा। ऐसी स्थिति में लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा में कई नये समीकरणों के आकार लेने की संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। 

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