Monday, 02 March 2026
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मालाणा -III और धांचो परियोजनाओं की आर्बिट्रेशन भी हारी सरकार

  • 8,41,04,572 रुपए 15% ब्याज सहित अदा करने के हुये आदेश
  • कंपनी के 21 जनवरी 2019 के आग्रह पर कोई कारवाई क्यों नही हुई?
  • आर्बिट्रेशन की पेशी में हाजिर न होने से एकतरफा हुआ फैसला

शिमला/शैल। वित्तीय संकट से जूझती प्रदेश सरकार विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं में चली आर्बिट्रेशन लिटिगेशन प्रोसिडिंग में अब तक कई करोड़ों का नुकसान उठा चुकी है। प्रदेश का बिजली बोर्ड इस समय करीब दो हजार करोड़ के घाटे में चल रहा है। लेकिन प्रदेश सरकार इस सबको नजरअन्दाज करते हुये वित्तीय खुशहाली के लिये जल विद्युत परियोजनाओं पर भरोसा जता रही है उससे सरकार की नीयत और नीति दोनों को लेकर गंभीर सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि जब भी कोई जल विद्युत परियोजना विज्ञापित होती है तब उसके लिये निविदाएं आमंत्रित की जाती हैं। निविदा भेजने के लिये तय अपफ्रन्ट प्रीमियम साथ भेजना होता है। जिस भी कंपनी की निविदाये शर्तों और मानकों पर पूरी उतरती है उसे परियोजना आवंटित कर दी जाती है। इस तरह परियोजना आवंटित होने के बाद संबंधित निष्पादन कंपनी को भी यह हक हासिल रहता है कि वह आवंटित परियोजना का अपने तौर पर भी आकलन और मूल्यांकन करवा कर उसकी व्यवहारिकता के बारे में संतुष्ट हो जाये। क्योंकि उसने परियोजना के लिये करोड़ों का निवेश और उसका प्रबन्ध करना होता है। यदि इस आकलन और मूल्यांकन के बाद आवंटी को यह लगे कि परियोजना व्यवहारिक न होकर घाटे का सौदा है तो उस स्थिति में वह विद्युत बोर्ड/निविदा जारी करने वाले को भी लिखित में आग्रह कर सकता है कि उसका आवंटन रद्द कर दिया जाये। ऐसा आग्रह आने पर निविदा जारी करने वाले को भी यह हक हासिल है कि वह आवंटी को परियोजना के बारे में पूरी तरह तर्क पूर्ण तरीके से संतुष्ट करवाये और उसके बाद दोनों पक्ष आपसी सहमति से अगला फैसला लें। लेकिन निविदा जारीकर्ता को यह हक हासिल नही है कि वह आये हुए आग्रह का महीनों तक कोई संज्ञान ही न ले। जब संबद्ध अधिकारी महीनों तक ऐसे आग्रह का संज्ञान न लें तो ऐसी स्थिति आवंटी को आर्बिट्रेशन में जाने के लिये बाध्य कर देती है। बल्कि कई बार तो अधिकारी आर्बिट्रेशन प्रोसिडिंग का भी संज्ञान नहीं लेते हैं और ऐसी स्थिति ही आर्बिट्रेशन में हार का कारण बनती हैं। 30 मैगावाट का मलाणा-III और 12 मैगावाट की धांचों परियोजनाओं में ऐसा ही हुआ है और बोर्ड के खिलाफ 8,41,04,572 रुपए का अवार्ड 15% ब्याज सहित अदायगी का आदेश हो गया है।
स्मरणीय है कि यह परियोजनाएं 4-5-2011 को उत्तर प्रदेश के गौतमबद्ध नगर स्थित एक बीएमडी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को आवंटित हुई और 26-05-2011 को कंपनी ने 8.40 करोड़ का अपफ्रन्ट जमा करवा दिया। इसके बाद कंपनी ने विभिन्न सरकारी अदारां से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करके परियोजना की डी.पी.आर. सौंपी और उसका तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन विशेषज्ञों द्वारा करवाया। इस आकलन में यह रिपोर्ट आयी की परियोजना की लागत 12 करोड़ प्रति मैगावाट आयेगी। लेकिन कंपनी को हस्ताक्षरित पी.आई.ए. के अनुसार केवल 2.50 से तीन रूपये प्रति यूनिट मिलने थे। इस आकलन पर जब बैंकों और दूसरे वित्तीय संस्थानों ने कंपनी को वित्तीय सहयोग देने से मना कर दिया तो 21 जनवरी 2019 को कंपनी ने यह आवंटन रद्द करने का आग्रह कर दिया। इसका कोई जवाब देने की बजाये सरकार ने 3 अक्तूबर 2019 को यह आवंटन रद्द कर दिया और अपफ्रन्ट राशि जब्त कर ली। इस पर कंपनी आर्बिट्रेशन में चली गयी। आर्बिट्रेशन की पेशी 20 जनवरी 2020 को तय हुई। लेकिन सरकार आर्बिट्रेशन की कारवाई में ही शामिल नही हुई और इसके खिलाफ उच्च न्यायालय में चली गयी। उच्च न्यायालय ने 2 जून 2022 को सरकार की याचिका खारिज कर दी। इस तरह सरकार के खिलाफ 8,41,04,572 रुपए 15% ब्याज सहित अदा करने के आदेश आ गये हैं।
इस मामले को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि संबद्ध अधिकारियों के गैर जिम्मेदाराना आचरण से यह नुकसान हुआ है। इस पर भी बड़ा आश्चर्य तो यह है कि सरकार में किसी ने भी इसका संज्ञान नही लिया और न ही किसी की कोई जिम्मेदारी तय हुई है। आर्बिट्रेशन के मामलों में एक अरब से अधिक का नुकसान हो चुका है जिसके लिये कोई जिम्मेदार नही ठहराया गया है। क्या यह अपने में एक बड़ा नियोजित भ्रष्टाचार नहीं है।

क्या प्रदेश भाजपा जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभा रही है

  • वितीय संकट पर चुप्पी से उठे सवाल
  • क्योंकि इस संकट के लिये पूर्व सरकार के कुप्रबंधन को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है
  • क्या केन्द्र ने जानबूझकर कर्ज सीमा में कटौती करके संकट को बढ़ाया है
  • भाजपा पर उठते इन सवालों का जवाब कौन देगा

शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा लगातार पिछले तीन चुनाव हार चुकी है। जिसमें पहले चार उपचुनाव, फिर विधानसभा चुनाव और अन्त में नगर निगम शिमला शामिल है। लेकिन इस हार के कारणों पर आज तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया पार्टी की ओर से नहीं आयी है। जबकि राजनीतिक हल्कों में यह सवाल बराबर उठता रहा कि पार्टी को जो सफलता मण्डी में मिली है उसी अनुपात में प्रदेश के दूसरे हिस्सों में क्यों नहीं मिल पायी? क्या मण्डी के बाहर दूसरे जिलों में नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं तक में यह धारणा बन चुकी थी कि हार निश्चित है इसलिये ज्यादा सक्रियता से कोई लाभ मिलने वाला नहीं है। कोई औपचारिक प्रतिक्रिया न आने से चुनाव से पहले मंत्रिमण्डल में फेरबदल कुछ मंत्रियों की छुट्टी और कुछ के विभागों में परिवर्तन किये जाने को लेकर उठते सवाल भी अभी हाशिये पर चले गये हैं हो सकता है कि कुछ समय बाद यह सवाल फिर जवाब मांगे। क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी हिमाचल के बाद जिस तरह कर्नाटक हारी है उससे ‘‘मोदी है तो मुमकिन है’’ पर पहली बार प्रश्न चिन्ह लगा है। यह प्रश्न चिन्ह लगने के बाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा पहली बार अपने गृह राज्य हिमाचल आये। हिमाचल आकर नड्डा ने जिस तरह जनता और कार्यकर्ताओं की नब्ज टटोलने के उपक्रम में प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा में रैली का आयोजन करवाया और उसमें जिस तरह सारे प्रयासों के बावजूद सबसे कम भीड़ जुटी उससे यह प्रमाणित हो गया है कि भाजपा के प्रति लोगों की उदासीनता अभी भी बरकरार है। विधानसभा चुनाव के बाद जब पूर्व मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर प्रोटैम स्पीकर के हाथों ही विधायकों की शपथ से पहले ही नेता प्रतिपक्ष बन गये और उस समय भी भाजपा के ही कुछ हलकों में इस पर हैरत जताई गयी थी। क्योंकि कुछ दूसरे नेता भी नेता प्रतिपक्ष होने की इच्छा पाले हुये थे लेकिन उन्हें अपनी इच्छा जताने तक का मौका भी नहीं मिल पाया। इसी परिदृश्य में जब सरकार ने पूर्व सरकार के अन्तिम छः माह के फैसले बदलते हुये करीब 900 संस्थान बन्द कर दिये तब भाजपा ने इसके खिलाफ पूरे प्रदेश में धरने प्रदर्शनों का क्रम शुरू कर दिया। अन्त में इस संबंध में एक याचिका भी प्रदेश उच्च न्यायालय में डाल दी। लेकिन याचिका डालने के बाद इस मुद्दे पर शान्त होकर बैठ गयी। इसी तरह मुख्य संसदीय सचिवों को लेकर भी उच्च न्यायालय में याचिका तो डाल दी गयी है लेकिन प्रदेश की जनता को इस पर जानकारी नही दी गयी कि मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां गलत क्यों है। उस पर शान्त होकर बैठ जाना भी पार्टी के भीतर की एकजुटता पर सवाल खड़े करता है। इस समय प्रदेश वित्तीय संकट से गुजर रहा है। इस संकट के लिये सुक्खू सरकार पूर्व की जयराम की सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन को जिम्मेदार ठहरा रही है। इसी के साथ केन्द्र सरकार पर प्रदेश की कर्ज लेने की सीमा कटौती राज्य सरकार को वित्तीय संकट में डालने का आरोप लगाया जा रहा है। वित्तीय संकट के लिये भाजपा पर लगते यह आरोप गंभीर हैं। क्योंकि प्रदेश की आम जनता को इससे नुकसान हो रहा है। लेकिन इन आरोपों का कोई तथ्य पूरक जवाब भाजपा की ओर से अभी तक नहीं आ पाया है। बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के यह कहने से कि केन्द्र के सहयोग के बिना राज्य सरकार एक कदम नहीं चल सकती इन आरोपों की अपरोक्ष में पुष्टि हो जाती है। वित्तीय संकट का प्रभाव पूरे प्रदेश पर पड़ रहा है इसलिये बतौर जिम्मेदार विपक्ष यह भाजपा का नैतिक दायित्व बन जाता है कि वह इस पर स्थिति स्पष्ट करे। यह सही है कि राजनीतिक प्रतिद्वन्दी होने के नाते भाजपा को अपना राजनीतिक हित भी सुरक्षित रखना है। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यदि भाजपा अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करती है तो उस पर जिम्मेदार विपक्ष न होने का आरोप लगना तय है।

 

क्या प्रदेश वित्तीय आपात की ओर बढ़ रहा है?

  • खजाना खाली होने से उठी चर्चा
  • भाजपा ने सरकार के हर मोर्चे पर फेल होने का जड़ा आरोप
  • हालात न संभले तो सरकार आ जायेगी संकट में

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार वितिय मोर्चे पर जिस तरह से फेल होती जा रही है उससे विपक्षी दल भाजपा को सरकार के खिलाफ एक बड़ा हथियार मिल गया है। सरकार इस असफलता के लिए केन्द्र सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है कि उसने कर्ज लेने की सीमा में कटौती करके यह हालात पैदा कर दिये हैं। लेकिन दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने यह खुलासा करके की सुक्खू सरकार अब तक सात हजार करोड़ का कर्ज ले चुकी है एक अलग ही तस्वीर लोगों के सामने रख दी है जिसका सरकार कोई जवाब नहीं दे पा रही है। क्योंकि कर्ज सीमा कटौती करने से पहले यह सीमा 14,500 करोड़ की थी। अभी सरकार को बने हुये कुल छः माह का समय हुआ है। सुक्खू सरकार अभी पहला ही बजट लायी है और इसी के पहले दो माह में खजाना खाली होने, कई कर्मचारियों को वेतन न मिल पाने और कोषागार हर रोज एक घन्टा बन्द रखने के हालात पैदा हो जाये तो इसके लिये केन्द्र पर दोष देने की बजाये अपने वित्तीय प्रबंधको की नीयत और नीति पर ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि जितना कर्ज इसी दौरान ले लिया गया है उससे स्पष्ट हो जाता है कि यह सरकार केवल कर्ज पर ही आश्रित होकर चल रही थी। जिस तरह से इस सरकार ने पहले ही दिन डीजल के दाम बढ़ाने का तोहफा जनता को दिया था उसी से स्पष्ट हो गया था कि सरकार ईमानदार सलाहकारों के हाथ में नहीं है। क्योंकि इन्हीं सलाहकारों की राय पर श्रीलंका जैसे हालात पैदा होने की चेतावनी दी गयी थी जबकि सरकार का अपना एक भी कदम इस चेतावनी के अनुरूप नही था।
आज वित्तीय संकट का जो आकार हो चुका है उसके अनुरूप संसाधन जुटाने का एक भी प्रयास नही है। जिन परियोजनाओं में हिस्सेदारी बढ़ाकर संसाधनों की उम्मीद की जा रही है वह सारे मामले अदालतों तक पहुंचेंगे यह स्वभाविक है। जिन संसाधनों से बिना किसी दूसरे के दखल के पैसा जुटाया जा सकता है उस ओर कोई सलाहकार सोच ही नही पा रहा है। मौद्रीकरण का जो सूत्र केन्द्र ने पकड़ा था उस ओर प्रदेश में कोई ध्यान ही नही दिया जा रहा है। इस परिदृश्य में विपक्ष सरकार पर लगातार हावी होता जायेगा।
वित्तीय प्रबंधन की असफलता का सारा आरोप सरकार पर लगता जायेगा। अन्त में स्थिति वितीय आपात तक बढ़ जायेगी और तब चयनित सरकार का अपना भविष्य प्रश्नित हो जाता है। राज्यपाल को दखल देने का अवसर मिल जाता है। क्योंकि जब छोटे कर्मचारियों और अन्यों को समय पर वेतन नहीं मिल पायेगा तथा दूसरे भुगतान नहीं हो पायेंगे तो स्थितियां एकदम बिगड़ जायेंगी। प्रभावितों के पास सड़कों पर आने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचेगा।
भाजपा स्वभाविक रूप से इस स्थिति को राजनीतिक मुद्दा बनायेगी क्योंकि सरकार को गारंटियां पूरी करनी है जो कर्ज लिये बिना हो नही पायेगी। जब इस सरकार को स्वयं कर्ज लेना पड़ेगा तो भाजपा पर प्रदेश को कर्ज में डूबाने का आरोप स्वतः ही खारिज हो जायेगा। वितीय कुप्रबंधन का आरोप मुख्य संसदीय सचिवों और कैबिनेट रैंक के सलाहकारों की नियुक्तियों में दब जाता है। ऐसे में यदि सुक्खू सरकार ने शीर्ष प्रशासन में जयराम की तर्ज पर परिवर्तन न किये तो सरकार के लिये कार्यकाल पूरा कर पाने तक संकट आ जायेगा।

 

मुख्यमन्त्री की चुनौती पर पत्र बम्ब पहुंचा ई.डी. में

  • जयराम और बिंदल ने की थी जांच की मांग
  • सुक्खू ने कहा था ई.डी. से करवा ले जांच
  • प्रबोद्ध सक्सेना है पावर कारपोरेशन के अध्यक्ष और मीणा हैं एम.डी.
  • शांग-टांग का काम कर रही पटेल इंजीनियरिंग पहले से ही चल रही है ई.डी के निशाने पर

शिमला/शैल।  जिस बेनामी पत्र बम्ब ने प्रदेश की राजनीति को पिछले दिनों हिला कर रख दिया था उसकी जांच करवाये जाने की मांग नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमन्त्री जयराम ठाकुर और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राजीव बिंदल ने अलग-अलग ब्यानों में की थी। इस मांग की प्रतिक्रिया में मुख्यमन्त्री सुक्खू ने भी खुली चुनौती देते हुये कहा था कि भाजपा चाहे तो इसकी जांच ई.डी. या सी.बी.आई. से करवा ले। यह बेनामी पत्र प्रधानमन्त्री को संबोधित था। इसमें अन्य आरोपों के साथ किन्नौर में निर्माणाधीन चल रही 450 मेगावाट की शांग टांग परियोजना में भ्रष्टाचार होने की भी आरोप है। वर्ष 2012 से इस परियोजना का निर्माण कार्य पटेल इंजीनियरिंग कम्पनी के पास है। यह काम जयराम सरकार के कार्यकाल में ही पूरा हो जाना चाहिये था लेकिन हो नहीं पाया। क्योंकि शायद कम्पनी परियोजना में कुछ डेविएशन चाहती थी। इस डेविएशन के कारण निर्माण लागत में बढ़ौतरी होनी थी इसलिए यह मामला तब कानूनी राय के लिये शायद अधिवक्ता भोगल के पास भेजा गया था। इस पर शायद कानूनी राय यह आयी थी कि इसकी शर्तों में बदलाव नहीं किया जा सकता और यह मामला उसी स्टेज पर रूक गया था।
अब सरकार बदलने के बाद यह मामला फिर उठा। डेविएशन और उसके कारण लागत बढ़ने तथा परियोजना पूरी होने का समय बढ़ाने का प्रकरण फिर चर्चा में आया। कहा जा रहा है कि कानूनी राय को नजरअन्दाज करते हुये कम्पनी के आग्रह पर डेविएशन और लागत बढ़ने की स्वीकृति प्रदान कर दी गयी है। यह होने के बाद कम्पनी को दो सौ करोड़ की राशि भी जारी कर दिये जाने की चर्चा है। यह डेविएशन किस स्तर पर हुई और इससे निर्माण लागत में कितनी बढ़ौतरी होगी तथा परियोजना पूरी होने में और कितना समय लगेगा यह सब जांच के विषय हैं। स्मरणीय है कि पटेल इंजीनियरिंग कम्पनी पर जम्मू कश्मीर में चल रही कीरु परियोजना को लेकर उठी कुछ शिकायतों पर ई.डी. पहले ही छापेमारी कर चुकी है। शायद इस परियोजना पर सत्यपाल मलिक ने बतौर राज्यपाल अपने कार्यकाल में कुछ सवाल उठाये थे और मामला ई.डी. तक जा पहुंचा था। इसी पृष्ठभूमि में अब-जब शांग-टांग परियोजना को लेकर यह सवाल उठे हैं कि कानूनी राय को नजरअन्दाज करके डेविएशन अनुमोदित कर दी गयी है तो मामला स्वतः ही गंभीर हो जाता है।
फिर इस मामले में तो स्वयं मुख्यमंत्री ने जयराम को चुनौती दी है कि वह चाहे तो ई.डी. से जांच करवा ले। मुख्यमंत्री की इस ललकार के बाद प्रधानमन्त्री से यह मामला ई.डी. तक जा पहुंचा है। इस पर किसी राजनीतिक ज्यादती का भी आरोप नहीं लगाया जा सकता। इस जांच में पावर कारपोरेशन की पूरी कार्यप्रणाली पहले दिन से लेकर आज तक जांच के दायरे में आ जायेगी। यही नहीं पत्र बम्ब में लगे अन्य आरोपों की जांच से पूरी सरकार की कार्यप्रणाली केन्द्र में आ जायेगी और विपक्ष को फिर एक मुद्दा मिल जायेगा। क्योंकि पत्र में लगाये गये आरोपों के घेरे में मुख्यमंत्री के अपने कार्यालय और विभाग आ जाते हैं। ई.डी. के शिमला कार्यालय तक पहुंच चुके इस मामले से प्रशासन में कई लोगों के हाथ पांव फूलना शुरू हो गये हैं।

क्या शिमला को मिली राजनीतिक हिस्सेदारी स्वर्गीय वीरभद्र का प्रभाव कम करने का प्रयास है?

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार में तीन मन्त्री पद और एक विधानसभा उपाध्यक्ष का पद खाली चल रहा है। यही नहीं विभिन्न निगमों बोर्डों में भी कार्यकारी संचालन समितियों का भी गठन अभी तक होना है। ब्लॉक, जिला और राज्य स्तर पर जिन कमेटियों का गठन होता था वह भी अभी तक नहीं हो पाया है। यहां तक कि भाजपा सरकार के दौरान विभिन्न निगमों/ बोर्डों में जो अधिवक्ता तैनात किये गये थे उनको अभी तक हटाया नहीं गया है और न ही उनके स्थान पर नये लोग तैनात हो पाये हैं। जब राजनीतिक सतांए बदलती है तब पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों को ऐसी ताजपोशीयां देकर तैनातियां दी जाती हैं। प्रशासन में बड़े स्तर पर फेरबदल करके सत्ता के बदलाव का संकेत दिया जाता है। लेकिन सुक्खू सरकार में छः माह के समय में ऐसा कोई कदम उठाकर किसी बदलाव का व्यवहारिक संदेश नहीं दिया है। केवल प्रदेश उच्च न्यायालय में कुछ अधिवक्ताओं को अवश्य तैनात किया गया है लेकिन शायद सर्वोच्च न्यायालय में तो यह भी बहुत देरी से हुआ है। पार्टी अध्यक्षा शायद हाईकमान तक भी कार्यकर्ताओं को सरकार में सम्मानजनक ताजपोशीयां दिये जाने की बात रख चुकी है। लेकिन मुख्यमन्त्री अभी तक ऐसा कर नहीं पाये हैं और अब यह देरी अटकलों और चर्चाओं का विषय बनती जा रही है। क्योंकि जिस व्यवस्था परिवर्तन को अपनी सरकार का केन्द्र बिंदु बनाने का प्रयास मुख्यमन्त्री कर रहे हैं उस पर उन्हीं के मन्त्री चन्द्र कुमार के पुत्र पूर्व विधायक नीरज भारती ने यह कहकर तंज कसा है कि व्यवस्था बदलने से पहले अवस्था बदलनी पड़ती है। पार्टी के भीतरी हलकों में इस चल रही यथास्थिति को लेकर रोष उभरने लग पड़ा है। यदि इस स्थिति को समय रहते न सुलझाया गया तो स्थितियां कभी भी विस्फोटक हो सकती हैं। प्रदेश की वित्तीय स्थिति की श्रीलंका से तुलना करने के बाद संसाधन बढ़ाने के लिये जो भी प्रयास किये जा रहे हैं उनके व्यवहारिक परिणाम इसी कार्यकाल में आ पाने की संभावनाएं बहुत कमजोर नजर आ रही है। वाटर सैस लगाकर जो उम्मीद लगाई गयी थी वह अब इस मामले के अदालत में जा पहुंचने के बाद बड़े दूर की बात हो गयी है। शानन परियोजना का मामला भी अदालत तक पहुंचेगा यह तय माना जा रहा है। अन्य परियोजनाओं से जो ज्यादा हिस्सा लेने की बात की जा रही है वह भी लंबी कानूनी लड़ाई के बिना संभव नहीं हो पायेगा। प्रदेश की जनता पर मंत्रिपरिषद की हर बैठक के बाद महंगाई का बोझ आता जा रहा है। लेकिन जनता के सहन करने की भी एक सीमा होती है और उस सीमा का अतिक्रमण नुकसानदेह हो जाता है यह तय है। इसी समय यह आम चर्चा चल पड़ी है कि इस सरकार को सही राय नहीं मिल रही है। शिमला को जितनी राजनीतिक हिस्सेदारी दे दी गयी है उसे स्वर्गीय वीरभद्र के प्रभाव को कम करने की दिशा में उठा पहला कदम माना जा रहा है।

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