शिमला/शैल। पिछले दिनों जिस तरह के ट्वीट
कांग्रेस विधायको राजेंद्र राणा और सुधीर शर्मा के आये हैं उससे राजनीतिक हल्कों और प्रशासनिक गलियारों में जो चर्चाएं चल निकली हैं यदि उन्हें अधिमान दिया जाए तो निश्चित रूप से सुक्खू सरकार सियासी संकट में फंस चुकी है। क्योंकि आठ माह में सुक्खू अपने मंत्रिमंडल के तीन रिक्त स्थानों को नहीं भर पाये हैं। विधानसभा उपाध्यक्ष का भी एक पद खाली चला आ रहा है। इन खाली पदों को एक समय सुक्खू का मास्टर स्ट्रोक कुछ लोगों ने माना था । लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में जब सुक्खू ने मंत्रिमंडल के विस्तार से पहले ही छः मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति कर ली तब यह स्पष्ट हो गया था कि मुख्यमंत्री और उनकी सरकार एक कूटनीति की शिकार हो गई है और कभी भी निष्पक्ष निर्णय नहीं ले पाएगी । क्योंकि मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां संविधान के अनुरूप नहीं है। इन नियुक्तियों को एक दर्जन भाजपा विधायकों सहित तीन याचिकाओं के माध्यम से उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। यह फैसला जब भी आएगा इनके खिलाफ ही आएगा। पहले भी उच्च न्यायालय ऐसी नियुक्तियों को रद्द कर चुका है। सर्वोच्च न्यायालय भी इन्हें असंवैधानिक करार दे चुका है।कानून की यह जानकारी होने के बावजूद भी ऐसी नियुक्तियां करना क्या दर्शाता है यह अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकसभा चुनावों से पूर्व यहफैसला आना तय है।शिमला/शैल। शिमला के मिडल बाजार स्थित हिमाचल रसोई रेस्तरां
में 18 जुलाई शाम को 7ः00 बजे हुये धमाके की जांच अब एन.एस.जी. के पास पहुंच गयी है। इस धमाके में एक कारोबारी अवनीश सूद की मौत हो गयी थी और 13 लोग जख्मी हुये थे। धमाका इतना जोरदार था कि इसमें मिडल बाजार और माल रोड की 25 दुकानों और घरों के शीशे चटक गये थे। घटनास्थल पर पहुंची पुलिस के मुताबिक यह धमाका गैस सिलैण्डर के फटने से हुआ है। लेकिन स्थल पर सबसे पहले पहुंचे फायर ऑफिसर ने वहीं से दो सिलैण्डर बाहर निकाल कर रख दिये थे। उसके मुताबिक कोई सिलैण्डर नहीं फटा था। घटनास्थल पर कोई आग भी नहीं लगी थी। परन्तु जब पुलिस अधीक्षक ने ही एक पत्रकार वार्ता में धमाके का कारण सिलैण्डर फटना बताया तो उससे एक भ्रान्ति की स्थिति बन गई। इस धमाके से जिन लोगों के आवास और दुकानें प्रभावित हुई हैं वह भी इसे सिलैण्डर फटना नहीं मान रहे हैं। पुलिस ने धारा 336, 337 और 304 (A) के तहत एफ.आई.आर दर्ज करके धमाके के कारणों की जांच शुरू कर दी है। फॉरैन्सिक टीम ने भी घटनास्थल का दौरा करके मौके से साक्ष्य जुटाकर अपनी जांच शुरू कर दी है। लेकिन अभी कोई रिपोर्ट नहीं आयी है। ऐसे में जब घटनास्थल पर कोई सिलैण्डर न फटने पर भी इसे गैस सिलैण्डर फटना कहा गया तब स्वतः ही एक भ्रांति और सन्देह का वातावरण बन गया। इस सन्देह को दूर करने के लिये स्थानीय विधायक हरीश जनारथा के आग्रह पर मुख्यमंत्री और डी.जी.पी. ने केन्द्र से आग्रह करके एन.एस.जी. को यह जांच सौंपी है। एन.एस.जी. की 16 सदस्यों की जांच टीम ने 5 दिन बाद आकर घटनास्थल का निरीक्षण करके मौके से साक्ष्य जुटाये हैं। एन.एस.जी. ने पुलिस और फॉरैन्सिक टीम से भी मंत्रणा की है। घायलों से मिलकर उनके ब्यान भी लिये हैं। अब एन.एस.जी. की जांच रिपोर्ट आने का इन्तजार है। जब पुलिस और फॉरैन्सिक टीम की भी रिपोर्ट आ जायेगी तब तीनों जांच रिपोर्टों के बाद इस धमाके के कारणों का खुलासा हो पायेगा। लेकिन आम आदमी के मन में उठते सन्देहों के निराकरण के लिये केन्द्रीय टीम का लाया जाना आवश्यक था। इसके लिये विधायक और सरकार के प्रयासों की सराहना की जा रही है।
शिमला/शैल। विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा जब प्रदेश विधानसभा के चुनाव हार गयी थी तब इस हार के कारणों का आकलन करके उसके परिणामों को सार्वजनिक नहीं कर पायी थी। क्योंकि उस आकलन में यह सामने आना था कि चूक पन्ना प्रमुखों और त्रिदेवों के स्तर पर हुई थी या इन्हें गढ़ने वाले उच्च देवों के स्तर पर। कारण और परिणाम जो भी रहे हों लेकिन यह स्पष्ट हो गया है कि पन्ना प्रमुखों और त्रिदेवों का प्रयोग तब तक सफल नहीं हो पायेगा जब तक सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे हुकमरान अपने को इस अवधारणा से बाहर निकलकर आम आदमी के प्रति अपनी जवाबदेही की प्रतिबद्धता पर व्यवहारिक रूप से अमल नहीं करते हैं। क्योंकि जिन लाभार्थियों को वोट बैंक का डिपॉजिट माना जा रहा था उनकी गिनती शायद इन्हीं पन्ना प्रमुखों और त्रिदेवों से शुरू होकर इन्हीं पर खत्म हो जाती है। इस त्रिदेवों की अवधारणा को पुराने कार्यकर्ताओं के स्थान पर नयों का आगे लाने के लिये प्रयोग किया जा रहा है। इस प्रयोग से पुराने कार्यकर्ताओं और नयों के बीच एक ऐसी दीवार खड़ी होती जा रही है जो आने वाले समय में संगठन के लिये एक बड़ी समस्या खड़ी हो जायेगी। पिछले दिनों जब संगठन मंत्री सिद्धार्थन सोलन में पार्टी टिफिन बैठक में पहुंचे तो उस बैठक में 120 लोगों में से केवल 20 ही भाजपा के सदस्य थे और शेष वह लोग थे जो पहली बार किसी बैठक में देखे गये। शायद बैठक में कुछ आंगनवाड़ी कार्यकर्ता भी बुला लिये गये थे। सोलन मण्डल के भी पूरे पदाधिकारी बैठक में नहीं थे। महिला मोर्चा, एससी मोर्चा, किसान मोर्चा और अन्य प्रकोष्ठों के लोगों को बैठक की सूचना तक नहीं थी। शायद बैठक में योजनाओं के लाभार्थियों को ही वरिष्ठ कार्यकर्ता के रूप में पेश किया गया। इस बैठक से यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी के भीतर पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करके लाभार्थी रहे त्रिदेवों और पन्ना प्रमुखों द्वारा ही पार्टी पर कब्जा करने की कवायद शुरू हो गयी है। सोलन की इस बैठक के बाद ही प्रदेश पदाधिकारियों की सूचीयां जारी हुई है। इन सूचियों का अवलोकन करने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि शायद अध्यक्ष यह पदाधिकारियों की सेना चुनने में पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं रहे हैं। जिला अध्यक्षों से प्रदेश पदाधिकारियों की जो सूचियां जारी हुई है उनमें विभिन्न धड़ों को प्रसन्न रखने का प्रयास ज्यादा नजर आ रहा है। ऐसा लगता है कि यह मानकर यह चयन किया गया है कि हिमाचल में हर बार सत्ता तो बदल ही जाती है। इस नाते अगली बार भाजपा की बारी है इसलिये किसी न किसी तरह संगठन पर कब्जा किया जाये।
डॉ राजीव बिंदल की टीम में युवा और महिला मोर्चा के अध्यक्षों के अतिरिक्त नौ उपाध्यक्ष तीन महामंत्री सात सचिव, दस प्रवक्ता, एक मीडिया प्रभारी और सात सह मीडिया प्रभारी हैं। यह इस टीम की जिम्मेदारी होगी कि वह कार्यकर्ताओं को आने वाले लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनावों में जीत के लिये क्या मंत्र देते हैं। आम कार्यकर्ताओं की यह प्रतिक्रिया है कि इस टीम का चयन जे.पी. नड्डा और पवन राणा के दबाव में किया गया है। यह आरोप लग रहा है कि इस टीम में नौ लोग ऐसे हैं जो पिछले विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी थे और खुद अपना ही चुनाव हार गये हैं। यदि यह लोग अपना चुनाव जीत गये होते तो आज प्रदेश में भाजपा की सरकार होती। छः सात पदाधिकारी ऐसे कहे जा रहे हैं जिनके अपने खिलाफ विधानसभा चुनावों में अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ काम करने के आरोप हैं। जिन पदाधिकारियों के खिलाफ पिछली बार संगठन की लुटिया डुबाने के आरोप लगते रहे उन्हें इस बार भी पदों से नवाजा गया है। यहां तक कहा जा रहा है कि संघ से आये तिलक राज शर्मा एक धीर गंभीर प्रवृति के व्यक्ति हैं। पिछली बार वह सभी मोर्चा के समन्वयक थे। उन्हें अब डिमोशन करके युवा मोर्चा का अध्यक्ष बना दिया गया है। देखने में वह प्रौढ़ लगते हैं इसलिये यह सवाल उठ रहा है कि युवा उन्हें कैसे स्वीकार कर पायेंगे।
इस तरह जो टीम डॉ बिंदल सामने लाये हैं और उस पर संगठन के भीतर ही दबी जुबान से जो सवाल उठने लग पड़े हैं उससे यह लगता है कि यह टीम मैरिट का नहीं समझौतों का चयन ज्यादा है। आने वाले दिनों में जब यह दबी जुबान से उठ रहे सवाल पूरी मुखरता के सामने आयेंगे तो अध्यक्ष के लिये स्थितियां संभालना कठिन हो जायेगा।
शिमला/शैल। प्रदेश के लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह मंत्रिमण्डल के सबसे युवा मंत्री है और एक ऐसे बाप के बेटे हैं जो छः बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। इस नाते उन्हें एक समृद्ध राजनीतिक विरासत धरोहर के रूप में मिली हुई है। इस विरासत को वह कितना संभाल कर रख पाते हैं और कितना आगे बढ़ा पाते हैं यह आने वाला समय ही तय करेगा। अभी दूसरी बार विधायक बने हैं। युवा मंत्री होने के नाते वह अपने ब्यानों में इतनी बेबाक और स्पाट बातें बोल जाते हैं जिससे उनके राजनीतिक प्रतिद्वन्दी कई बार परेशान होना शुरू हो जाते हैं। इसलिए उनके ब्यानों पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है क्योंकि राजनेताओं की जगह कर्मचारी नेता को उन्हें जवाब देने और उन पर हमला करने के लिये उतारा गया है। स्मरणीय है कि जब कांग्रेस ने चुनाव के दौरान पुरानी पैन्शन बहाल की बात की थी तब उसी नेता ने सोलन में एक पत्रकार वार्ता करके इस पर सवाल उठाये थे। आज विक्रमादित्य सिंह और प्रतिभा सिंह के खिलाफ ई.डी. और सी.बी.आई. के मामले में प्रधानमन्त्री से कार्यवाही की मांग की जा रही है। जबकि यह मामले इस समय अदालतों में विचाराधीन चल रहे हैं। शायद गवाहीयों के दौर से गुजर रहे हैं। यहां पर यह उल्लेख करना भी आवश्यक हो जाता है कि आने वाले संसद सत्र में जिन 49 कानूनों को केंद्र सरकार निरस्त करने जा रही है उनमें मनी लॉंडरिंग भी शामिल है। अब इनसे जेल की सजा के बदले केवल जुर्माने का ही प्रावधान रखा जा रहा है। इसलिये इन मामलों में कारवाही की मांग करना केवल राजनीति रह जाता है। विक्रमादित्य सिंह ने यू.सी.सी. का समर्थन किया था और कहा था कि एक देश में एक ही कानून होना चाहिए। संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में इस आश्य का निर्देश मौजूद है लेकिन इसे लागू करने के लिए धारा 371 में भी संशोधन करना होगा। इस संशोधन से गुजरात महाराष्ट्र समेत एक दर्जन राज्य प्रभावित होते हैं। राजनीतिक विश्लेषक जानते हैं कि मोदी सरकार में यह संशोधन लाने का साहस नहीं है। विक्रमादित्य ने यही प्रश्न किया था कि नौ वर्षों में मोदी सरकार को यह विधेयक लाने से कौन रोक रहा था। लेकिन इस ब्यान के भी मायने बदलने का पूरा प्रयास किया गया। विक्रमादित्य के ब्यान में यह कहीं नहीं था कि वह पार्टी की लाइन से हटकर कोई अपना अलग कदम उठाएंगे। अभी विक्रमादित्य सिंह ने इस बाढ़ और भूस्खलन के लिये अवैध खनन को कारण बताया था। इस अवैध खनन के ब्यान पर उद्योग मंत्री हर्षवर्धन चौहान ने यह कहा है कि अवैध खनन कुछ जगह पर कारण हो सकता है लेकिन सभी जगह नहीं। उन्होंने विक्रमादित्य सिंह के ब्यान को बचकाना करार दिया है। लेकिन यह कहने से ही यह विवाद बढ़ कर राजनीतिक आकार लेने लग पडा है। जहां तक निर्माण संबंधी अवैधताओं का प्रश्न है तो इसके लिए प्रदेश उच्च न्यायालय एन.जी.टी. और सर्वोच्च न्यायालय के दर्जनों आदेश निर्देश इसकी पुष्टि करते हैं कि प्रदेश में अवैध निर्माणों के कारण पर्यावरण को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचा है। एन.जी.टी. ने तो शिमला से कार्यालयों को दूसरे स्थानों पर ले जाने तक निर्देश दे रखे हैं। इसलिए मंत्रियों के ब्यानों को लेकर खड़ा किया जा रहा विवाद अपने में कोई मायने नहीं रखता है। क्योंकि इस आपदा ने बहुत कुछ साफ कर दिया है। थुनाग के बाजार में बहती मिली लकड़ी पर जांच आदेशित होना बहुत कुछ साफ कर देती है। लेकिन इन ब्यानों से विवाद का असर प्रदेश के सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों पर पड़ेगा यह तय है। इस समय लोकसभा की 2014 और 2019 के चुनावों में चारों सीटें भाजपा के पास रही हैं। मण्डी उपचुनाव में प्रतिभा सिंह ने जयराम सरकार को हराकर इस सीट पर कब्जा किया है। अब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है इसलिए हाईकमान चारों सीटों की उम्मीद करेगा। इसके लिए समय-समय पर आकलन भी किए जाएंगे। यही अपेक्षा भाजपा हाईकमान को भी यहां से है। क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष और एक केन्द्रीय मन्त्री प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में ऐसे ब्यानों और उन पर उभरी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से प्रदेश की राजनीति में नये समीकरण उभारने का प्रयास किया जायेगा यह तय है।
यह है अनूप दत्ता की शिकायत







