शिमला/शैल। प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के कार्य प्रणाली पर अब सवाल उठने शुरू हो गये हैं। क्योंकि जो प्राइवेट कंपनियां सरकार के लिए विभिन्न स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान कर रही थी उन्होंने अपनी सेवाओं को बन्द करना शुरू कर दिया है। क्योंकि सरकार उनके बिलों का भुगतान नहीं कर पा रही है। कई कंपनियां सेवाएं बन्द कर चुकी हैं और कई ने काम बन्द करने का अल्टीमेटम दे रखा है। यह आरोप है नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री ठाकुर जय राम का। जयराम के मुताबिक कल्लू के क्षेत्रीय अस्पताल में चल रही डायलिसिस सेवाएं सेवा प्रदाता कंपनी ने बंद कर दी है। लोगों को निजी अस्पताल में सेवाएं लेनी पड़ रही है क्योंकि सरकार कंपनी को भुगतान नहीं कर पायी है। इससे जिन लोगों को अब तक निःशुल्क इलाज मिल रहा था उन्हें अब हजारों रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। जयराम ठाकुर ने आरोप लगाया है कि हिम केयर के तहत ईम्पैनल्ड अस्पतालों का भुगतान नहीं किया जा रहा है। हिम केयर के तहत विभिन्न चिकित्सा सामान उपलब्ध करवाने वाली कंपनियों ने सप्लाई रोक दी है क्योंकि उनका भुगतान नहीं हो पा रहा है। इससे आप्रेशन प्रभावित हो रहे हैं। ऑक्सीजन प्लांट बन्द पड़े हैं। इस तरह प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह से चरमरा गयी है।
नेता प्रतिपक्ष की इसी चिन्ता के बीच यह भी सामने आया है कि प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग ने 17-1-2022 के लिए एक टैण्डर जारी किया था। इस पर कोई फैसला न हो पाने के कारण इसे रद्द कर दिया गया। इसके 28-4-2022 के लिये पुनः जारी किया गया और फिर रद्द हो गया। तीसरी बार 8-7-2022 को जारी किया गया। 19-10-2022 और 9-11-2022 को सैंपल और डैमोन्सट्रेशन भी हो गया परन्तु इसके बाद रद्द कर दिया गया। चौथी बार 18-5-2023 को फिर आमंत्रित हुआ और निविदायें आयी परन्तु फिर रद्द हो गया। पांचवीं बार 14-9-2023 को आमंत्रित हुआ। इस बार पांच निविदायें आयी। इसमें भी कई निविदा दाताओं के दस्तावेजों पर प्रश्न चिन्ह लग चुके हैं। इस बार यह टैण्डर फाईनल हो पाता है या नहीं यह रोचक बना हुआ है।
ऐसे में स्वभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि जो विभाग करीब दो वर्ष में एक टैण्डर को फाइनल न कर पा रहा हो वह प्रदेश की जनता को क्या और कैसी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवा रहा होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। क्या इस तरह की स्थिति स्वास्थ्य मंत्री और मुख्यमंत्री के संज्ञान में नहीं आयी होगी? उनके स्तर पर क्या संज्ञान लिया गया होगा? क्योंकि स्वास्थ्य विभाग यदि कोई खरीद कर रहा होगा तो निश्चित रूप से उसका ताल्लुक आम आदमी के स्वास्थ्य से रहा होगा। यदि ऐसे टैण्डर भी दो वर्ष में फाइनल न हो पाये तो संबंधित विभाग ही नहीं पूरी सरकार सवालों के घेरे में आ जाती है।
कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष विनोद कुमार ने लिखा पत्र
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार प्रशासनिक ट्रिब्यूनल फिर से खोलने का प्रयास कर रही है। यह ट्रिब्यूनल भारत सरकार की अनुमति से ही खुल सकता है और केंद्र सरकार की अनुमति के लिए इस आश्य का प्रस्ताव भेजा जा चुका है। लेकिन यह ट्रिब्यूनल दोबारा खोलने की चर्चा जैसे ही सामने आई उसी के साथ इसके विरोध के स्वर भी मुखर होने लग गये हैं। अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष विनोद कुमार और उनके साथियों ने इसके विरोध का मोर्चा खोल दिया है। इन कर्मचारी नेताओं का मानना है कि कर्मचारियों के मामले में न्याय के लिये प्रदेश उच्च न्यायालय से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता है। इनका कहना है पहले भी यह ट्रिब्यूनल कर्मचारियों के प्रस्ताव पर ही बंद किया गया था। उन्होंने तर्क दिया है कि पंजाब और हरियाणा में कर्मचारियों और उनके मामलों की संख्या दो गुणी है परन्तु वहां पर तो कोई ट्रिब्यूनल नहीं है और उच्च न्यायालय के माध्यम से ही त्वरित न्याय मिल रहा है। कर्मचारी नेताओं का आरोप है कि हिमाचल में यह ट्रिब्यूनल कुछ सेवानिवृत नौकरशाहों और अन्यों की शरण स्थली से अधिक कुछ साबित नहीं हुआ। विनोद कुमार ने खुलासा किया है कि पूर्व में भी जब यह ट्रिब्यूनल बन्द करने की मांग की गई थी तब भी दो नौकरशाह श्रीकांत बाल्दी और मनीषा नन्दा कि इसमें नियुक्तियां फाइनल हो गई थी तब ट्रिब्यूनल को भंग करने की मांग न करने के लिए उन्हें कहा गया था। लेकिन कर्मचारी हित में वह मांग पर कायम रहे और परिणाम स्वरूप ट्रिब्यूनल भंग हो गया। विनोद कुमार ने जोर देकर कहा कि इस फैसले का विरोध करने के लिए वह राज्यपाल से लेकर केंद्र सरकार तक भी अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने सुक्खू सरकार को सलाह दी है कि वित्तीय संकट से जूझ रहे प्रदेश पर 100 करोड़ का अतिरिक्त बोझ कुछ नौकरशाहों के लिए न डाला जाये।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश एक कठिन वित्तीय स्थिति से गुजर रहा है यह चेतावनी मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खु ने प्रदेश की सत्ता संभालते ही जनता को दे दी थी। यह दूसरी बात है की जयराम सरकार के समय जब वह विधायक थे तब उन्हें इस स्थिति का अन्दाजा नहीं हो पाया था। यहां तक कि जब कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिये दस गारंटियां प्रदेश की जनता को दी थी तब भी ऐसी वित्तीय स्थिति का कोई इंगित तक नहीं हो पाया था। इस कठिन वित्तीय स्थिति के नाम पर ही प्रदेश में सेवाओं और वस्तुओं के दाम बढ़ाये गये। संवैधानिक प्रावधान न होते हुये भी प्रदेश में छः मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां की गयी और उन्हें महंगी गाड़ियों से नवाजा गया। इसी वित्तीय स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिये हजारों आउटसोर्स कर्मियों को सेवा से निकला गया। ऐसे दर्जनों फैसले हैं जो कठिन वित्तीय स्थिति के नाम पर जनता पर लादे गये हैं। कई गैर विधायकों को ताजपोशीयों से नवाजा गया है। कठिन वित्तीय स्थिति के परिदृश्य में ही जनता गारंटीयों की मांग नहीं कर रही है।
ऐसी कठिन वित्तीय स्थिति से गुजर रही सरकार पर जब प्राकृतिक आपदा ने भी अपना योगदान दिया तब सही में प्रभावितों को पता चला कि आपदा का दंश क्या होता है और ऐसे समय में जब सरकार का खजाना खाली हो तो तब पता चलता है कि इसका व्यवहारिक प्रभाव क्या पड़ रहा है। सुक्खु सरकार ने दिसम्बर में सत्ता संभाली थी और आपदा का प्रकोप जुलाई से शुरू हुआ। लेकिन सरकार ने डीजल पर वैट मंत्रिमंडल विस्तार से पहले ही बढ़ा दिया था। इस आपदा में 500 से अधिक लोग मारे गये हैं या गुम हुये हैं। सरकारी अनुमानों के अनुसार 12000 करोड़ का नुकसान इस आपदा में हुआ है। स्वभाविक है कि इतने बड़े नुकसान कि राज्य सरकार अपने ही संसाधनों से भरपाई नहीं कर सकती है। उसके लिये केंद्र सरकार की सहायता चाहिये थी। आपदा के इस आकार पर राज्य सरकार ने इसे राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग की थी। जोशीमठ और भुज की त्रासदी की तर्ज पर सहायता की मांग की थी। इस आपदा की में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी प्रदेश के दौरे पर आये थे और प्रदेश को 300 करोड़ की सहायता की घोषणा की थी। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर तो प्रदेश से ताल्लुक रखनेे के नाते केंद्र सरकार की पूरी सहायता प्रदेश को मिलने की बात कह चुके हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने तो शिमला में सरकार से बैठक करके कहा था की प्रदेश सरकार जो भी मांगेगी उसे वह सब मिलेगा। नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर तो वाकायदा आंकड़े गिनाकार यह बता रहे थे कि सुक्खु सरकार ने जो 4500 करोड़ का राहत पैकेज घोषित किया है वह केंद्रीय सहायता पर ही आधारित है।
लेकिन सुक्खु सरकार लगातार यह कह रही है कि केंद्र सरकार से कोई सहायता प्रदेश को नहीं मिल पायी है। 4500 करोड़ का राहत पैकेज सरकार में अपने ही संसाधनों से दिया है। इसके लिये विधायकों की क्षेत्रीय विकास निधि में कटौती की गयी है। विभागों के बजट में कटौती की है। 1000 करोड़ मनरेगा से लिया गया है। इस समय केंद्रीय सहायता का सच आपदा से बड़ा सवाल बनता जा रहा है। क्योंकि केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और हिमाचल से ताल्लुक रखने वाले नड्डा, अनुराग ने एक बार भी जयराम द्वारा परोसे जा रहे आंकड़ों पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया है। जयराम प्रदेश में जहां भी जा रहे हैं वह जनता को केंद्रीय सहायता के बारे में बराबर जानकारी दे रहे हैं। दूसरी और सुखविंदर सिंह सुक्खु लगातार केंद्रीय सहायता मिलने से इनकार कर रहे हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष इस सरकार द्वारा दस माह में ही दस हजार करोड़ का कर्ज लेने की बात कह रहे हैं और कर्ज लेने में इस आंकड़े का कोई खंडन नहीं कर पा रहा है। ऐसे में यह सवाल अलग से खड़ा होता जा रहा है की यह कर्ज कहां खर्च किया जा रहा है? मुख्यमंत्री हर सहायता की राशि दो गुनी करने की घोषणा करते आ रहे हैं ऐसे में अब वह समय आता जा रहा है जब मुख्यमंत्री और उनकी सरकार की घोषणाओं का व्यवहारिक सच आने वाले दिनों में जनता के सामने आयेगा ही।
इस समय केंद्रीय सहायता पर जिस तरह का वाकयुद्ध सुक्खु और जयराम में चल निकला है उस पर स्वतः ही यह सवाल खड़ा हो गया है की इन दोनों शीर्ष नेताओं में से कोई एक तो झूठ बोल ही रहा है। दो बार के मुख्यमंत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे शान्ता कुमार ने ऐसे समय में यह सवाल उठाया है कि प्रदेश में इतनी बड़ी त्रासदी पर भी मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री जब जनता में इस तरह की ब्यानबाजी पर आ गये हैं तो प्रदेश का इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता है।
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार ने पत्रकारों को मिले सरकारी आवासों का किराया पांच गुणा से भी अधिक बढ़ा दिया है। किराया बढ़ाने के साथ ही पत्रकारों से उनका आयु प्रमाण पत्र और शिमला में उनका अपना कोई मकान है या नहीं इसकी भी जानकारी मांगी है। इसी के साथ संबंधित समाचार पत्र की प्रदेश में प्रसार संख्या और शैक्षणिक योग्यता का भी संशोधित नियमों में उल्लेख किया है। मैंने पिछले अंक में सम्पादकीय लिखा था जिस पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं और सवाल पाठकों की ओर से आये हैं। प्रतिक्रियाएं और सवाल जानने की नीयत से ही यह लेख लिखा गया था। इसलिये उनके प्रति उत्तर के तौर पर यह लेख लिखना आवश्यक समझ रहा हूं। मैं 1974 से शैल का सम्पादन और प्रकाश्न लगातार करता आ रहा हूं। एक साप्ताहिक पत्र के लिये आज की भीड़ में अपना स्थान बनाना कितना चुनौती पूर्ण होता है यह मैं जानता हूं। क्योंकि समाचार पत्रों के जगत में एक साप्ताहिक अपने बेबाक विश्लेषण से ही अपना स्थान बना सकता है और बेबाक विश्लेषण सत्ता में बैठे किसी भी राजनेता और बड़े नौकरशाह को अच्छा नहीं लगता है। इसी कारण से सरकारों से टकराव एक सामान्य नीयती बन जाती है क्योंकि अपना भ्रष्टाचार उजागर होता किसी को भी अच्छा नहीं लगता। इसलिये हर सरकार ऐसे समाचार पत्रों को कुचलने दबाने के लिये सब कुछ करती है। इस कड़ी में सबसे पहला हथियार विज्ञापन बन्द करना और यदि आवास आदि की सुविधा भी मिली हुई है तो उसे भी किसी न किसी बहाने छीनना। क्योंकि हिमाचल में कोई भी राजनेता अपने ही दम पर सत्ता का विरोध आज तक नहीं कर पाया है। इसमें अग्रणी भूमिका अखबारों ने ही निभाई है। हिमाचल में तो भ्रष्टाचार कतई बर्दाशत न करने की घोषणा करके भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की भूमिका निभाने में आ गयी है सरकारें। वर्तमान सरकार भी व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का किरदार ही निभा रही है। इसलिये पत्रकार साथियों से यही आग्रह है कि आप अपनी भूमिका स्वयं तय करें। अब सवाल है नियमों की अनुपालना का। 2023 में ही कितने मान्यता प्राप्त पत्रकार है इन्हें किन नियमों के तहत मान्यता दी गई थी? उन नियमों में संशोधन करने की आवश्यकता कैसे महसूस की गयी? क्या उसके लिये सरकार के किसी अधिकारी ने पत्रकारों से सामूहिक रूप से कोई विचार विमर्श किया? ऐसे विचार विमर्श में समाचार पत्रों के प्रकाशकां से भी विचार विमर्श किया गया? पत्रकारों की योग्यता तय होनी चाहिए। लेकिन क्या यह काम सरकार करेगी या प्रेस परिषद। शायद योग्यता तय करना पत्रकारिता का कोर्स करवाने वाले संस्थाओं और विश्वविद्यालय का है। सरकार अपने यहां सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी नियुक्त करने के लिए तो योग्यता तय कर सकती है लेकिन किसी समाचार पत्र को ऐसा करने के लिए निर्देशित नहीं कर सकती। फिर जिन नियमों में आज संशोधन किया जा रहा है उन्हें पिछली तारीख से लागू नहीं किया जा सकता यह एक सामान्य नियम है। ऐसे में जब सरकार पूर्व से इन संशोधनों को लागू करने का प्रयास करेगी तो तय है कि कुछ इन लोगों को नियतम दंडित करने की मंशा है। सरकार पत्रकारों को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिये बाध्य कर रही है। अपने यहां व्यापक भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद पर नियंत्रण पाने की जगह पत्रकारों पर नियंत्रण करने का प्रयास कर रही है। पत्रकार को सरकारी कर्मचारी बनाने का प्रयास करना गलत होगा। आज पड़ोसी राज्य पत्रकारों को सुविधाएं देते हुये पैन्शन तक दे रहे हैं। लेकिन हिमाचल सरकार उनके विज्ञापन बन्द करने और आवास छीनने का प्रयास कर रही है। यदि सरकार की नीयत साफ होती तो जैसे पहले पत्रकारों को आवासीय कॉलोनी दी गयी है उसी तर्ज पर आज दो-दो बिस्वा जमीन देकर उनको घर बनाने की सुविधा देती जैसे अन्यों के लिए अभी किया है। जिन पत्रकारों के पास अपने घर है उन्हें सरकारी आवास सरकार ने दिये ही क्यों? जो लोग आज सरकार में हैं वह शायद बीस वर्ष पहले भी इसी विधानसभा के सदस्य थे तब उनकी सोच क्या थी? सरकार को समझना होगा कि विज्ञापन बन्द कर देने और सुविधाएं छीनने से आप किसी का लिखना बन्द नहीं कर सकते। वैसे भी यह कहावत है कि शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फैंकते।