शिमला/शैल। प्रदेश के एसएमसी शिक्षक हड़ताल पर है। ऐसे मौसम में भी शिमला में धरने पर बैठे हैं। इनकी मांग है कि इनको नियमित किया जाये। नवम्बर में जेबीटी अध्यापकों के रिक्त पदों को भरने के लिये कॉउंसलिंग हुई थी। इसके तहत 1161 पद भरे जाने थे। प्रदेश में जेबीटी के 4000 पद खाली हैं। लेकिन नवम्बर में हुई इस काउंसलिंग के परिणाम अब तक घोषित नहीं हुये हैं। अब इस वर्ग में भी रोष व्याप्त हो गया है। यह लोग भी सड़क पर आने के लिये बाध्य हो रहे हैं। शास्त्री अपना रोष व्यक्त करते हुये विरोध मार्च निकाल चुके हैं। एसएमसी के करीब 2550 अध्यापक प्रदेश में कार्यरत हैं। धूमल के शासनकाल में एसएमसी के माध्यम से यह लोग भर्ती किये थे। एसडीएम और स्कूल के प्रधानाचार्य इसका साक्षात्कार लेने वालों में शामिल रहे हैं। धूमल के बाद वीरभद्र और जयराम की सरकारें भी आकर चली गयी। लेकिन किसी ने भी इनको नियमित करने के लिये कोई कदम नहीं उठाये हैं। सुक्खु सरकार आने के बाद इनके मामले सुलझाने के लिये तीन मंत्रियों की एक कमेटी बनाकर उनसे तीन माह में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया था। लेकिन सरकार को 13 माह बाद भी इस कमेटी की रिपोर्ट नहीं मिली है क्योंकि कमेटी की कोई बैठक ही नहीं हो पायी है। क्या मुख्यमंत्री की जानकारी के बिना ऐसा हो सकता है।
स्मरणीय है कि सुक्खु सरकार ने विभिन्न विभागों में रिक्त पदों की जानकारी हासिल करने के लिए एक तीन मंत्रियों की कमेटी बनाई थी। इस कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक सरकार में कर्मचारियों के 70000 पद खाली हैं। इनमें अकेले शिक्षा विभाग में ही बीस हजार से ज्यादा पद रिक्त हैं। स्कूलों में अध्यापकों के रिक्त पदों के मामले हर सरकार में उच्च न्यायालय तक पहुंचे हैं और अदालत ने इस पर चिंता व्यक्त करते हुये प्रशासन की निंदा भी की है। कई जगह तो अभिभावकों ने स्कूलों पर ताले तक भी लगा दिये हैं। जयराम सरकार के दौरान मण्डी में ही ऐसा घट चुका है। स्कूलों में कम्प्यूटर शिक्षण अभी भी शायद आउटसोर्स के माध्यम से ही चल रहा है।
शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे क्षेत्र हैं जहां शिक्षकों और ड्राइवर के पद खाली रहने का संबद्ध समाज पर गंभीर असर पड़ता है। आज शिक्षा विभाग में गेस्ट शिक्षकों की भर्ती की योजना बनाई जा रही है। क्योंकि शिक्षकों की कमी है। इसी कमी के कारण एसएमसी शिक्षक भर्ती किये गये थे। जो आज आन्दोलन के लिये विवश हो गये हैं। कल को यह गैस्ट शिक्षक भी इसी मुकाम पर पहुंच जायेंगे। सरकार नियमित भर्तियां इसलिये टालती जा रही हैं क्योंकि उसके पास धन का अभाव है। लेकिन दूसरी और भाजपा शासन में अटल आदर्श विद्यालय खोले गये थे और आज उसी तर्ज में राजीव गांधी डे बोर्डिंग स्कूल घोषित किये जा रहे हैं। हर विधानसभा क्षेत्र में एक-एक राजीव गांधी डे बोर्डिंग स्कूल खोलने की योजना है। इन स्कूलों को बनाने में ही करोड़ों का खर्च हो जायेगा और उससे लाभ बहुत ही कम लोगों को मिल पायेगा। जबकि इसी खर्च के साथ स्कूलों की वर्तमान दशा को सुधारा जा सकता है। शिक्षकों के सारे खाली पदों को भरा जा सकता है। लेकिन राजीव गांधी डे बोर्डिंग स्कूल और अटल आदर्श विद्यालय खोलकर अपने-अपने आकांओं को तो खुश किया जा सकता है परन्तु उससे स्कूलों की वर्तमान दशा को नही सुधारा जा सकता। इस दशा को सुधारने के लिये आम आदमी के नजरिये से सोचने की आवश्यकता है। आज एसएमसी शिक्षक धरने पर हैं और कोई भी उनसे बात करने का साहस नहीं कर पा रहा है। लेकिन आने वाले समय में इसका आकार क्या रूप ले लेगा उसकी ओर कोई भी सोच नहीं पा रहा है। जबकि हर गांव इससे प्रभावित हो रहा है।
शिमला/शैल। सुक्खु सरकार इस वर्ष पूर्ण राज्यत्व दिवस पर प्रदेश के कर्मचारियों और पैन्शनरों को कोई भी आर्थिक लाभ देने की घोषणा नहीं कर पायी है। इससे कर्मचारियों और पैन्शनरों में स्वभाविक रूप से रोष पनपना नाजायज नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यदि सरकार को प्रदेश की वित्तीय स्थिति ऐसा करने से रोक रही है तो उसे उसी अनुपात में अपने अनुत्पादक खर्चों पर रोक लगाने से शुरुआत करनी होगी। सरकारी अफसरशाही की सचिवालय में इतनी बड़ी संख्या में उपलब्धता के बावजूद एक दर्जन से अधिक सलाहकारों और विशेष कार्यधिकारियों की फौज खड़ी कर लेना अब हर आदमी को चुभने लग गया है। इसकी आवश्यकता मुख्यमंत्री को अपने विशेष कारणों से तो हो सकती है लेकिन शायद प्रदेश की जनता को नहीं है। यही स्थिति मुख्य संसदीय सचिवों की है। इन सारी नियुक्तियों के आईने में कठिन वित्तीय स्थिति का तर्क किसी के भी गले नहीं उतर रहा है।
इस समय अधीनस्थ सेवा चयन आयोग को भंग कर दिये जाने से प्रभावित हुये बेरोजगार युवा धरने प्रदर्शन पर आ गये हैं। संस्कृत और संस्कृति संरक्षण के बैनर तले युवा आक्रोश रैली निकाल चुके हैं। डॉक्टर एन.पी.एस. की मांग को लेकर कई दिनों से विरोध प्रदर्शन में लगे हुये हैं। सरकार अब तक उनके साथ कोई बातचीत नहीं कर पायी है। यह अपनी मांगों को लेकर कभी सड़कों पर उतर सकते हैं। ऐसा होने पर स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रतिकूल असर पडना स्वभाविक है। अब सचिवालय एवं अन्य संवद्ध पैन्शनर वैल्फेयर संगठन के प्रधान मदन लाल शर्मा और उप प्रधान भूपराम वर्मा ने एक वक्तव्य जारी करके आन्दोलन की चेतावनी दी है। इन लोगों ने आरोप लगाया है कि सरकार ने 25 जनवरी, 15 अप्रैल, 15 अगस्त एवं दिवाली पर प्रदेश के कर्मचारियों को महंगाई भत्ते की तीन किस्ते 12 प्रतिशत महंगाई भत्ते के साथ जारी नहीं की है। इसी के साथ संशोधित वेतनमानों का बकाया 1-1-2016 से 31-12-2021 तक जारी नहीं किया है। जबकि 2022 के बाद सेवानिवृत हुये कर्मचारियों को यह दिया जा चुका है।
इन लोगों ने मुख्यमंत्री के विधानसभा में दिये इस ब्यान की निंदा की है जिसमें कहा गया था कि यह भुगतान दो वर्ष बाद 2026 में होगा। कर्मचारी नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार ने अपने अधीनस्थ कार्यालयों और कोषागार को निर्देश दिये हैं कि जिन केसों में उच्च न्यायालय ने 6 प्रतिशत ब्याज के साथ बकाये के भुगतान के आदेश किये हैं वह भुगतान न करके इसकी अपील की जाये। सरकार के इस फरमान पर कर्मचारियों ने प्रशासनिक ट्रिब्यूनल खोलने के फैसले और सरकार द्वारा अब तक 13000 करोड़ से ज्यादा कर्ज लेने पर भी गंभीर सवाल उठाये हैं। लोकसभा चुनावों से पहले उभरती यह तस्वीर सरकार के लिये घातक मानी जा रही है।
शिमला/शैल। हिमाचल के सुक्खु सरकार ने राम मन्दिर के प्राण प्रतिष्ठा अवसर पर प्रदेश में सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया था। इस अवसर पर सुक्खु के लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह अयोध्या इस आयोजन में शामिल होने भी गये थे। विधायक सुधीर शर्मा और चैतन्य शर्मा भी इस आयोजन में शामिल रहे हैं। इस आयोजन को लेकर मुख्यमंत्री सुक्खु और कांग्रेस अध्यक्षा प्रतिभा सिंह और दूसरे मंत्रियों और नेताओं के जिस तर्ज में इस आयोजन पर ब्यान रहे हैं उससे लगता था कि हिमाचल की पूरी सरकार इस मौके पर अयोध्या होगी। लेकिन शायद जब केन्द्र में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने इस आयोजन को संघ/भाजपा का आयोजन करार देकर इसमें शामिल होने से मना कर दिया तब हिमाचल सरकार ने भी अपना फैसला बदला। फिर भी इस कार्यक्रम से अपने मानसिक जुड़ाव को प्रदर्शित करते हुये इस अवसर पर जो योजनाएं और कार्यक्रम घोषित कर सकते थे वह सब कुछ किया है। राज्य सरकार और उसके नेताओं के इस आचरण का विपक्षी एकता के गठबंधन ‘‘इन्डिया’’ पर क्या प्रभाव पड़ेगा इसका पता तो आने वाले दोनों में चलेगा। कांग्रेस हाईकमान भी इस सबको कैसे लेती है यह देखना भी दिलचस्प होगा।
अभी लोकसभा के चुनाव शायद अप्रैल में होने जा रहे हैं। हिमाचल में कांग्रेस की सरकार होने के नाते कितनी सीटों पर पार्टी जीत हासिल कर पाती है यह सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
इस समय सुक्खु सरकार की वित्तीय स्थिति ठीक नहीं है। सरकार को हर माह एक हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज लेना पड़ रहा है। जो सरकार विधायक विकास निधि का भुगतान विधायकों को न कर पायी हो। कुछ निगमो/बोर्डों के कर्मचारीयों को समय पर वेतन और पैन्शन का भुगतान न कर पा रही हो। जिसे पत्रकारों के मकानों का किराया पांच गुना बढ़ाना पड़ा हो। जो संशोधित वेतनमानों के बकाये का भुगतान न कर पायी हो उसके विकास संबंधी दावों और अन्य घोषणाओं पर कितना विश्वास कोई कर पायेगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। इस परिदृश्य में सरकार और उसके नेताओं के आचरण को लेकर राजनीतिक अटकलें लगाया जाना स्वभाविक हो जाता है। क्योंकि केन्द्र की सरकार पर अपनी जांच एजैन्सियों ई.डी.,सी.बी.आई. और आयकर आदि के इस्तेमाल से राज्य सरकारों में दखल देने के आरोप पहले दिन से ही लगते आये हैं। फिर संयोगवश हिमाचल सरकार के कई मंत्री और दूसरे नेता ठेकेदारी/बिल्डरों की भूमिका से ताल्लुक रखते हैं। फिर राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की हार से वैसे ही मनोबल गिरा हुआ है। ऊपर से सरकार के सिर पर गारंटीयों की ऐसी तलवार लटकी हुई है जिसका कोई समाधान सामने नहीं है। फिर व्यवस्था परिवर्तन के जुमले से जनता को और अंधेरे में रख पाना संभव नहीं होगा। स्थिति यहां तक पहुंच जायेगी की नेता अपनी ही जनता का सामना नहीं कर पायेंगे। चुनावों में हर दावे और योजना की सच्चाई सामने आ जायेगी।
फिर इस समय हिन्दी पट्टी में कांग्रेस के पास केवल हिमाचल की ही सरकार बची हुई है। इस सरकार को ढोये रखना जहां कांग्रेस की आवश्यकता है तो इस गणित में सरकार को अस्थिर करना भाजपा की राजनीतिक आवश्यकता है। इसके लिये ठेकेदार और बिल्डर पृष्ठभूमि के नेताओं को साधने के लिये ई.डी. से बड़ा हथियार और क्या हो सकता है। विश्लेष्कांे के मुताबिक जब पत्र बम्ब संस्कृति के तहत कुछ पत्र जारी हुये थे उनसे ई.डी. के दखल की जमीन तैयार की गई थी। इसमें कुछ शीर्ष अफसरशाहों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन्हीं के सहयोग से कांग्रेस के कुछ विधायक मंत्री और दूसरे नेता केन्द्रीय एजैन्सियों के राडार पर चल रहे हैं। राजनीतिक तौर पर मुख्यमंत्री सुक्खु अभी भी राजनीतिक असन्तुलन के लग रहे आरोपों को साधने के लिये कोई गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं। कर्मठ कार्यकर्त्ताओं को अभी सरकार में कोई समायोजन नहीं मिल रहा है। इसी परिदृश्य में जब मार्च में मुख्य संसदीय सचिवों को लेकर उच्च न्यायालय का फैसला आयेगा तब राजनीतिक समीकरण और गड़बड़ायेंगे। अभी तक सरकार की योजनाओं को लेकर कोई सवाल नहीं उठे हैं। लेकिन जब इन योजनाओं की व्यवहारिकता पर सवाल उठेंगे तब पता चलेगा कि जमीनी हकीकत क्या है। इस समय यह सरकार अपने की भार से दम तोड़ने के कगार पर पहुंच चुकी है। क्योंकि चुनावों में यह आंकड़े सामने रखने होंगे कि कितने लोगों को स्थाई रोजगार मिल पाया है? कितने युवा सोलर यूनिट लगा पाये हैं? कितने युवाओं को ई-टैक्सी योजना में उपदान मिल पाया है? सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिये आम आदमी पर महंगाई का बोझ डाले बिना क्या उपाय किये हैं। कठिन वित्तिय स्थिति के चलते अपने खर्चे कितने काम किये हैं? कर्ज के खर्च का ब्योरा भी इन्हीं चुनावों में पूछा जायेगा। इसलिये माना जा रहा है कि इस दौरान सरकार को लेकर अवश्य कुछ घटेगा। क्योंकि सरकार और संगठन दोनों ही मोदी सरकार पर तथा भाजपा संघ पर मौन साधे चले हुये हैं। यह मौन ही आने वाले घटनाक्रम का एक बड़ा संकेत माना जा रहा है।
शिमला/शैल। केन्द्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश को पिछले एक वर्ष में 33000 करोड़ दिये हैं। आपदा में भी केन्द्र ने प्रदेश सरकार को 3000 करोड़ दिये यह दावा पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सुलह के विधायक विपिन सिंह परमार ने एक ब्यान में किया है। परमार भाजपा के कांगड़ा चम्बा के प्रभारी हैं। परमार से पूर्व भाजपा अध्यक्ष डॉ.राजीव बिन्दल ने भी केन्द्रीय सहायता के विस्तृत आंकड़े जारी किये। हमीरपुर के सांसद केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा भी इस आश्य के आंकड़े जारी करते रहे हैं। लेकिन भाजपा नेताओं के इन दावों का प्रमाणिक खण्डन करने की बजाये केन्द्र पर हिमाचल की सहायता न करने का आरोप सुक्खू सरकार के मंत्री और कांग्रेस नेता लगाते आ रहे हैं। केंद्रीय सहायता को जिस तरह से मुद्दा बनाकर परोसने का काम किया जा रहा है उससे यह लग रहा की आने वाले लोकसभा चुनाव इसी मुद्दे के गिर्द केन्द्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। इस परिदृश्य में पूरी वस्तुस्थिति का आकलन करना आवश्यक हो जाता है। पूर्व सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन और प्रदेश को कर्ज में डूबने के आरोप लगाते हुये सुक्खू सरकार वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र लेकर भी आयी है। इस श्वेत पत्र के अनुसार जयराम सरकार सुक्खू सरकार पर 92000 करोड़ की देनदारियां छोड़ गयी है। कुप्रबंधन के कई आंकड़े और तथ्य इस श्वेत पत्र में दर्ज हैं। लेकिन इस कुप्रबंधन के लिये किसी को भी चिन्हित नहीं किया गया है। जब कोई विशेष रूप से चिन्हित ही नहीं है तो किसी के भी खिलाफ कोई कारवाई किए जाने का प्रश्न ही नहीं उठा। कुप्रबंधन के साथ ही केन्द्र सरकार पर यह आरोप है की प्रदेश के कर्ज लेने की सीमा में भी केन्द्र ने कटौती कर दी है। विदेशी सहायता पर भी सीमा लगा दी गयी है। किसी भी राज्य को कर्ज जीडीपी के एक तय अनुपात के अनुसार मिलता है। जिन राज्यों में इस नियम की अनुपालना नहीं हुई है वह इसके विरुद्ध अदालत में गये हैं। लेकिन हिमाचल ने ऐसा नहीं किया है। इसी के साथ जब राजीव बिन्दल ने सुक्खू सरकार द्वारा लिये गये कर्ज के आंकड़े आरटीआई के माध्यम से सूचना लेकर जारी किये तो स्थिति एकदम बदल गयी। इस सरकार पर प्रति माह 1000 करोड़ से भी अधिक का कर्ज लेने का खुलासा सामने आ गया।
इस वस्तुस्थिति में यह देखना रोचक हो गया है की क्या सुक्खू सरकार और कांग्रेस संगठन केन्द्र की अनदेखी को प्रमाणिकता के साथ चुनावी मुद्दा बन पायेंगे? क्योंकि इस सरकार ने पहले दिन से ही कर्ज लेना शुरू कर दिया है। कर्ज के साथ आवश्यक सेवाओं और वस्तुओं के दामों में भी बढ़ौतरी की है। राजस्व वृद्धि के दावों के साथ यह प्रश्न लगातार अनुतरित रह रहा है कि सरकार चुनावों में दी हुई गारंटीयों को पूरा करने की दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठा पा रही है? आज बेरोजगार युवाओं को आश्वासनों के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिल पा रहा है। यह युवा सरकार के खिलाफ अपना रोष सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने पर मजबूर क्यों होते जा रहे हैं। आने वाले लोकसभा चुनावों में सरकार का कर्ज़ के खर्च और गारंटीयों पर घिरना तय माना जा रहा है।
शिमला/शैल। क्या 18 जुलाई 2022 को शिमला के माल रोड के साथ लगता मिडल बाजार स्थित हिमाचल रसोई में हुए ब्लास्ट में आरडीएक्स का इस्तेमाल हुआ है? इस ब्लास्ट की जांच एस पी शिमला की पुलिस ने की थी और इसमें जुन्गा स्थित फारैन्सिक लैब का भी सहयोग लिया गया था। इस जांच में इसे गैस सिलैण्डर लीक होने के कारण हुआ धमाका करार दिया गया था। इसी जांच के दौरान दिल्ली से एनएसजी के विशेषज्ञों की टीम भी घटनास्थल पर आयी थी और जांच करके चली गयी थी। इस जांच में धमाके का कारण क्या पाया गया है इसका अधिकारिक खुलासा आज तक सामने नहीं आया है। लेकिन इस धमाके के बाद जब पालमपुर के एक कारोबारी निशान्त शर्मा का एक झगड़ा एक वरिष्ठ वकील और एक पूर्व आईपीएस अधिकारी तथा इसी मामले में वर्तमान डीजीपी कुण्डू की भूमिका को लेकर चर्चा में आया और निशान्त शर्मा की शिकायत का स्वतः संज्ञान लेते हुये याचिका दायर कर कारवाई शुरू की तब इस मामले में भी यह मोड़ आया है।
स्मरणीय है कि निशान्त शर्मा की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुये यह मामला दो बार उच्च न्यायालय और दो ही बार सुप्रीम कोर्ट तक हो आया है। उच्च न्यायालय ने पहली बार उसके सामने एसपी कांगड़ा और एसपी शिमला की रिपोर्टों के माध्यम से सामने आये तथ्यों की विवेचना करते हुये डीजीपी और एसपी कांगड़ा को उनके पदों से हटाने के निर्देश जारी किये थे। इन निर्देशों पर अमल करते हुये प्रदेश सरकार ने डीजीपी को प्रधान सचिव आयुष तैनात कर दिया था। एसपी कांगड़ा को लेकर कोई आदेश जारी नहीं हुये थे। उच्च न्यायालय के इस फैसले को डीजीपी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी कुण्डू को राहत देते हुये ट्रांसफर आदेश को स्टे करके उन्हें फिर से उच्च न्यायालय में जाने और पहले फैसले को रिकॉल करने की याचिका दायर करने के निर्देश दिये। इन निर्देशों पर डीजीपी कुण्डू ने उच्च न्यायालय में रिकॉल याचिका दायर कर दी। उच्च न्यायालय ने इस रिकॉल याचिका को अस्वीकार करते हुये बहुत सारे तथ्य भी रिकॉर्ड पर ला दिये। इस पर कुण्डू दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गये। इस बार कुण्डू ने अपनी याचिका में यह आरोप लगाया की जिस एसपी शिमला ने उनके खिलाफ उच्च न्यायालय में स्टेटस रिपोर्ट दायर की है वह द्वेषपूर्ण है। क्योंकि एसपी शिमला ने हिमाचल रसोई में हुये धमाके को लेकर गैस सिलैण्डर लीक होने की जो रिपोर्ट सौंपी है वह सही नहीं है। उन्होंने इसकी रिपोर्ट को लेकर सरकार को पत्र लिखे हैं। एनएसजी की रिपोर्ट में ब्लास्ट का कारण आरडीएक्स पाया गया है। यह सब कुछ सुप्रीम कोर्ट के बारह जनवरी के फैसले में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखने के लिये कोई उपलब्ध नहीं था। इसलिए हिमाचल रसोई में हुये ब्लास्ट का जो कारण डीजीपी ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट को बताया है उसे ही मानना पड़ेगा।
लेकिन इस स्थिति में नये सवाल उभर कर सामने आते हैं क्या उन्हें आसानी से नजर नजरअंदाज किया जा सकता है। हिमाचल रसोई में ब्लास्ट 18 जुलाई को हुआ था जिसमें मौतें तक हुई हैं। पुलिस ने इसे गैस सिलैण्डर लीक करार दिया था। इसमें आरडीएक्स इस्तेमाल हुआ होने की बात पहली बार सर्वाेच्च न्यायालय में करीब सात माह बाद सामने आयी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि निशान्त शर्मा कुण्डू प्रकरण सर्वाेच्च न्यायालय न पहुंचता तो क्या तब भी हिमाचल रसोई प्रकरण में आरडीएक्स इस्तेमाल होने की खुलासा हो पाता? इसी के साथ यह भी सवाल उठता है कि यदि एसपी शिमला की जांच पर सवाल खड़े करते हुये डीजीपी ने सरकार को पत्र लिखे हैं तो उन पर सरकार ने कोई कारवाई क्यों नहीं की? केंद्रीय जांच एजैन्सी की रिपोर्ट को आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? इस रिपोर्ट पर जुन्गा की फारैन्सिक लैब से सवाल क्यों नहीं किये गये? यदि हिमाचल रसोई प्रकरण में जुन्गा की रिपोर्ट अविश्वसनीय है तो अन्य मामलों में विश्वसनीय कैसे हो सकती है? यह सवाल इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि इनसे सरकार के पूरे तंत्र पर कई गंभीर प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं?