शिमला/शैल। क्या 18 जुलाई 2022 को शिमला के माल रोड के साथ लगता मिडल बाजार स्थित हिमाचल रसोई में हुए ब्लास्ट में आरडीएक्स का इस्तेमाल हुआ है? इस ब्लास्ट की जांच एस पी शिमला की पुलिस ने की थी और इसमें जुन्गा स्थित फारैन्सिक लैब का भी सहयोग लिया गया था। इस जांच में इसे गैस सिलैण्डर लीक होने के कारण हुआ धमाका करार दिया गया था। इसी जांच के दौरान दिल्ली से एनएसजी के विशेषज्ञों की टीम भी घटनास्थल पर आयी थी और जांच करके चली गयी थी। इस जांच में धमाके का कारण क्या पाया गया है इसका अधिकारिक खुलासा आज तक सामने नहीं आया है। लेकिन इस धमाके के बाद जब पालमपुर के एक कारोबारी निशान्त शर्मा का एक झगड़ा एक वरिष्ठ वकील और एक पूर्व आईपीएस अधिकारी तथा इसी मामले में वर्तमान डीजीपी कुण्डू की भूमिका को लेकर चर्चा में आया और निशान्त शर्मा की शिकायत का स्वतः संज्ञान लेते हुये याचिका दायर कर कारवाई शुरू की तब इस मामले में भी यह मोड़ आया है।
स्मरणीय है कि निशान्त शर्मा की शिकायत पर स्वतः संज्ञान लेते हुये यह मामला दो बार उच्च न्यायालय और दो ही बार सुप्रीम कोर्ट तक हो आया है। उच्च न्यायालय ने पहली बार उसके सामने एसपी कांगड़ा और एसपी शिमला की रिपोर्टों के माध्यम से सामने आये तथ्यों की विवेचना करते हुये डीजीपी और एसपी कांगड़ा को उनके पदों से हटाने के निर्देश जारी किये थे। इन निर्देशों पर अमल करते हुये प्रदेश सरकार ने डीजीपी को प्रधान सचिव आयुष तैनात कर दिया था। एसपी कांगड़ा को लेकर कोई आदेश जारी नहीं हुये थे। उच्च न्यायालय के इस फैसले को डीजीपी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी कुण्डू को राहत देते हुये ट्रांसफर आदेश को स्टे करके उन्हें फिर से उच्च न्यायालय में जाने और पहले फैसले को रिकॉल करने की याचिका दायर करने के निर्देश दिये। इन निर्देशों पर डीजीपी कुण्डू ने उच्च न्यायालय में रिकॉल याचिका दायर कर दी। उच्च न्यायालय ने इस रिकॉल याचिका को अस्वीकार करते हुये बहुत सारे तथ्य भी रिकॉर्ड पर ला दिये। इस पर कुण्डू दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गये। इस बार कुण्डू ने अपनी याचिका में यह आरोप लगाया की जिस एसपी शिमला ने उनके खिलाफ उच्च न्यायालय में स्टेटस रिपोर्ट दायर की है वह द्वेषपूर्ण है। क्योंकि एसपी शिमला ने हिमाचल रसोई में हुये धमाके को लेकर गैस सिलैण्डर लीक होने की जो रिपोर्ट सौंपी है वह सही नहीं है। उन्होंने इसकी रिपोर्ट को लेकर सरकार को पत्र लिखे हैं। एनएसजी की रिपोर्ट में ब्लास्ट का कारण आरडीएक्स पाया गया है। यह सब कुछ सुप्रीम कोर्ट के बारह जनवरी के फैसले में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखने के लिये कोई उपलब्ध नहीं था। इसलिए हिमाचल रसोई में हुये ब्लास्ट का जो कारण डीजीपी ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट को बताया है उसे ही मानना पड़ेगा।
लेकिन इस स्थिति में नये सवाल उभर कर सामने आते हैं क्या उन्हें आसानी से नजर नजरअंदाज किया जा सकता है। हिमाचल रसोई में ब्लास्ट 18 जुलाई को हुआ था जिसमें मौतें तक हुई हैं। पुलिस ने इसे गैस सिलैण्डर लीक करार दिया था। इसमें आरडीएक्स इस्तेमाल हुआ होने की बात पहली बार सर्वाेच्च न्यायालय में करीब सात माह बाद सामने आयी है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि निशान्त शर्मा कुण्डू प्रकरण सर्वाेच्च न्यायालय न पहुंचता तो क्या तब भी हिमाचल रसोई प्रकरण में आरडीएक्स इस्तेमाल होने की खुलासा हो पाता? इसी के साथ यह भी सवाल उठता है कि यदि एसपी शिमला की जांच पर सवाल खड़े करते हुये डीजीपी ने सरकार को पत्र लिखे हैं तो उन पर सरकार ने कोई कारवाई क्यों नहीं की? केंद्रीय जांच एजैन्सी की रिपोर्ट को आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? इस रिपोर्ट पर जुन्गा की फारैन्सिक लैब से सवाल क्यों नहीं किये गये? यदि हिमाचल रसोई प्रकरण में जुन्गा की रिपोर्ट अविश्वसनीय है तो अन्य मामलों में विश्वसनीय कैसे हो सकती है? यह सवाल इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि इनसे सरकार के पूरे तंत्र पर कई गंभीर प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं?
शिमला/शैल। क्या किसी ऐसे भवन में सरकारी कार्यालय हो सकता है जिसके निर्माण पर अवैधता के आरोप लगे हों और नगर निगम ने दो मंजिलों को गिराने का नोटिस जारी किया हो यह स्थिति लोअर पंथाघाटी स्थित हरि विश्राम भवन की है। जिसमें फूड कमिश्न का कार्यालय कार्यरत है। इस भवन के बारे में आरटीआई एक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य ने नगर निगम से इसके मालिक और क्या इस भवन का नक्शा आवासीय उद्देश्य के लिये पारित है या व्यावसायिक के लिये 18-10-2023 को मांगी गयी सूचना का 200 पन्नों से अधिक का जवाब 10-01-2024 को प्राप्त हुआ है। इस जवाब के मुताबिक इसके मालिक प्रवीण गुप्ता और रचना गुप्ता हैं। प्रवीण गुप्ता प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में मुख्य अभियन्ता है और रचना गुप्ता प्रदेश लोक सेवा आयोग की सदस्य हैं। रचना गुप्ता के पास शायद सरकारी आवास भी है जिसके लिये शायद यह शपथ पत्र पड़ता है कि प्रार्थी के नाम पर कोई अपना निजी आवास नहीं है। इस परिप्रेक्ष में हरी विश्राम भवन को लेकर आयी सूचना का प्रभाव क्षेत्र बढ़ जाता है।
नगर निगम आयुक्त द्वारा 31-12-2015 को अतिरिक्त सचिव शहरी विकास विभाग को लिखे पत्र के मुताबिक पार्किंग फ्लोर की कोई योजना न तो भेजी ही गयी थी और न ही स्वीकृत की गयी है। इसी पत्र में इनके द्वारा एक और मंजिल का निर्माण कार्य शुरू कर दिये जाने का उल्लेख जिसकी स्वीकृति नहीं है। इस अवैधता पर इनको नोटिस जारी किये जाने का भी जिक्र है। पत्र में इनके खिलाफ निगम आयुक्त के अदालत में इस अवैध निर्माण को न गिरने पर कारवाई चलाने की भी उल्लेख है। इस पत्र से पहले भी इन्हें छठी मंजिल को गिराने के आदेश दो बार नगर निगम से 2014 और 2015 में जारी हुये हैं।
नगर निगम द्वारा भेजे गये दस्तावेजों से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस भवन की पांचवी और छठी मंजिल को लेकर अवैधता के नोटिस इन्हें भेजे गये थे। इसको लेकर निगमायुक्त की अदालत में कारवाई चलने का भी विवरण है। लेकिन नगर निगम से 18-10-2023 को यह पूछा गया था कि क्या यह भवन आवासीय अनुमोदित है या व्यवसायिक। अब जनवरी 24 में आये जवाब में नगर निगम का इस पर मौन यही इंगित करता है कि यह मामला अभी भी लंबित चल रहा है या नगर निगम किसी दबाव में इसका स्पष्ट उत्तर नहीं दे पा रहा है। ऐसे में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि जिस भवन के निर्माण पर अवैधता के आरोप लगाते हये नगर निगम उसे तोड़ने का नोटिस दे रहा हो क्या उसी भवन की उन्हीं मंजिलों में सरकारी कार्यालय खोला जा सकता है।
यह है दस्तावेज




शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुक्खू अपने नवनियुक्त मंत्रियों को अभी तक विभागों का आवंटन नहीं कर पाये हैं। बारह दिसम्बर को राजेश धर्माणी और यादवेन्द्र गोमा को मंत्री बनाया गया था। इतने अरसे तक इन्हें विभाग क्यों नहीं दिये जा सके हैं। इसको लेकर अब चर्चाएं उठाना शुरू हो गयी हैं। यह सवाल उठने लग पड़ा है कि क्या कांग्रेस किसी गहरे संकट से गुजर रही है? क्या सरकार को अपरोक्ष में कोई बड़ा खतरा खड़ा होता दिखाई दे रहा है? क्योंकि जब मंत्री बना ही दिये गये हैं तो उन्हें विभाग देने में इतना समय लगने का कोई तर्क सामने नहीं आ रहा है। फिर इस मुद्दे पर कांग्रेस हाईकमान से लेकर प्रदेश तक हर नेता चुप बैठा हुआ है। जबकि मुख्यमंत्री को राय देने के लिये एक दर्जन के करीब सलाहकारों और विशेष कार्यअधिकारियों की टीम मौजूद है। मंत्रियों को विभाग देने में ही देरी नहीं की जा रही है बल्कि पुलिस में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से लौटे एक वरिष्ठ अधिकारी को भी पोस्टिंग नहीं दी जा सकी है। यह कुछ ऐसे सवाल बनते जा रहे हैं जिन पर हर आदमी का ध्यान जाना शुरू हो गया है। वैसे ही कांग्रेस को लेकर यह धारणा है कि उसकी सरकारों को कुछ अफसरशाह चलाते हैं। जबकि भाजपा की सरकारों को संघ और कार्यकर्ता चलाते हैं।
आने वाले दिनों में लोकसभा के चुनाव होने हैं और चुनावों में सरकार की उपलब्धियां और योजनाएं चर्चा और आकलन में आती है। हिमाचल सरकार की इस एक वर्ष में ऐसी कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है जिसके आधार पर आने वाले लोकसभा चुनाव जीतने का दावा किया जा सके। क्योंकि कांग्रेस द्वारा चुनावों के दौरान दी गयी गारंटीयों को पूरा न कर पाना विपक्षी भाजपा का सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार है। सरकार की जो वित्तीय स्थिति चल रही है उसके मध्यनजर 31 मार्च तक महिलाओं को 1500 रूपये प्रतिमाह देने की गारंटी पर अमल कर पाना संभव नहीं है। जबकि इन चुनावों में महिला वोटरों की संख्या 29 लाख के लगभग रहने की संभावना है। इसलिये यह 1500 रूपये प्रतिमाह देने की गारंटी ही सारे राजनीतिक गणित को बिगाड़ कर रख देगी। इसी के साथ युवाओं को घोषित रोजगार न देना दूसरा बड़ा मुद्दा है। कठिन वितीय स्थिति और प्रदेश में आयी प्राकृतिक आपदा के आवरण में भी इन मुद्दों को इसलिये नहीं ढका जा सकेगा क्योंकि सरकार ने अपने खर्चों पर कोई लगाम नहीं लगायी है। भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरैन्स के दावों पर भी सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर यू टर्न ले चुकी है। बल्कि भ्रष्टाचार को संरक्षण देने के आरोप लगने शुरू हो गये हैं। व्यवस्था परिवर्तन के कारण ही प्रशासन में कोई बड़ा फेरबदल नहीं हो पाया है। आपदा में केन्द्र द्वारा प्रदेश की उचित सहायता न कर पाने के आरोप को नड्डा ने यह कहकर धो दिया कि आपदा का पैसा अपनी जेब में गया है। केंद्रीय सहायता के जो आंकड़े अब नड्डा ने और पहले अनुराग तथा डॉ. बिन्दल ने जारी किये हैं उनका कोई सशक्त प्रति उत्तर सरकार और संगठन की ओर से नहीं आ पाया है। इस परिदृश्य में जब राजनीतिक सवाल भी सरकार के अपने ही व्यवहार से खड़ा हो जाये तो क्या उसे विपक्ष को परोस कर देने की संज्ञा नहीं कहा जायेगा। हाईकमान की प्रदेश की स्थिति पर चुप्पी ने इन सवालों को और भी गंभीर बना दिया है।
शिमला/शैल। मुख्य संसदीय सचिवों के मामले में प्रदेश उच्च न्यायालय ने उनको मंत्रियों के समकक्ष मिलने वाली सुविधाओं और मंत्रियों की तर्ज पर काम करने की सुविधाओं पर रोक लगा दी है। यह आदेश आने पर ऐसा लगा था कि शायद अब इनसे कार्यालय और सरकारी कार्यालय की सुविधायें छिन जायेगी। परन्तु ऐसा कुछ हुआ नहीं है। क्योंकि वर्तमान मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां इस आश्य के 2006 में बने एक्ट के तहत हुई है। उस एक्ट में इन सारी सुविधाओं का प्रावधान है और वह एक्ट अभी तक अदालत द्वारा निरस्त नहीं किया गया है। वैसे इस एक्ट को भी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है। लेकिन जब तक एक्ट बना रहेगा तब तक यह लोग अपने पदों पर बने रहेंगे। वैसे यह एक्ट संविधान में मंत्रियों की संख्या को सीमित करने के आश्य के हुये संशोधन के मुलतः उल्लंघना है। इसलिये माना जा रहा है की अन्तिम फैसले में सरकार का 2006 का एक्ट निरस्त होगा ही। लेकिन इस परिदृश्य में यह राजनीतिक सवाल खड़ा होता है कि भाजपा ने जब मुख्य संसदीय सचिवों को मंत्रियों के समकक्ष मिलने वाली सुविधाओं पर रोक लगाने की मांग की है तब इस मांग से पहले इस एक्ट को निरस्त करने की मांग क्यों नहीं की? क्या इन भाजपा विधायकों को 2006 के एक्ट के प्रभाव की जानकारी नहीं थी या इसके पीछे निहित कुछ और है। इस समय जो फैसला आया है इसमें मुख्य संसदीय सचिवों का कोई अहित नहीं हुआ है। परन्तु इस फैसले पर कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों की कोई प्रतिक्रियाएं नहीं आयी हैं इससे भी कुछ अलग ही संदेश जा रहा है। स्मरणीय है कि संविधान में संशोधन करके मंत्रियों की सीमा तय करने के पीछे सरकारों की फिजूल़ खर्ची रोकना सबसे बड़ा उद्देश्य था और इसीलिये मुख्य संसदीय सचिवों और संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को रद्द करते हुये असम के संद्धर्भ में यह फैसला दिया था कि विधायिका को इस तरह का एक्ट पास करने का अधिकार ही नहीं है। असम के मामले के साथ ही हिमाचल की एसएलपी संलग्न थी। जुलाई 2017 में आये इस फैसले के कारण ही जयराम सरकार के कार्यालय में ऐसी नियुक्तियां नहीं की गयी थी। मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां 2006 के एक्ट के तहत हुयी है और जब तक यह एक्ट निरस्त नहीं होता तब तक यह पदों पर बने भी रहेंगे। लेकिन उनके बने रहने से क्या नैतिक सवाल भी हल हो जायेगा? क्या उनके बने रहने से प्रदेश की वित्तीय स्थिति सुधर जायेगी? क्या सरकार को कर्ज नहीं लेना पड़ेगा? यह सारे सवाल नैतिकता से जुड़े हुये हैं? इस समय सरकार ने बहुत सारी नियुक्तियां कैबिनेट रैंक में कर रखी हैं। कैबिनेट रैंक में नियुक्तियों का अर्थ है कि ऐसे व्यक्ति को कैबिनेट रैंक के मंत्री के समकक्ष सुविधायें मिलेगी। भले ही ऐसी नियुक्तियों को अदालत में कोई चुनौती नहीं दी गयी है लेकिन प्रदेश जिस तरह की वित्तीय स्थिति से गुजर रहा है उसमें आने वाले दिनों में यह मुद्दे स्वतः ही चर्चा में आ जायेंगे। क्योंकि चुनाव में वायदे करते हुये मतदाताओं से यह नहीं कहा गया था कि उन्हें पूरा करने के लिये कर्ज लिया जायेगा। पिछली सरकार में जब मुख्य सचेतक और सचेतकों की नियुक्तियां की गयी थी तब उस एक्ट को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी जो अब तक लम्बित है। अब शायद यह सरकार भी ऐसी नियुक्तियां करने जा रही है। ऐसे में जो वातावरण निर्मित होता जा रहा है उसमें सरकार पर वैधानिक सवालों की जगह नैतिक सवालों का दायरा बढ़ने जा रहा है।