शिमला/शैल। साल पूरा होने जा रहा है इस अवसर पर सरकार धर्मशाला में एक कार्यक्रम का आयोजन करने जा रही है। इसके लिये मुख्यमंत्री केंद्रीय नेताओं को आमंत्रित भी कर आये हैं क्योंकि एक बड़ा आयोजन होने जा रहा है। लेकिन सरकार के इस आयोजन की कोई औपचारिक जानकारी पार्टी की प्रदेश अध्यक्षा सांसद प्रतिभा सिंह को नहीं दी गयी है। प्रतिभा सिंह ने सरकार द्वारा कोई जानकारी न दिये जाने की बात सार्वजनिक रूप से स्वीकारी है। कांग्रेस संगठन की अपनी ही सरकार द्वारा इस तरह की नजरअन्दाजी प्रदेश के राजनीतिक हल्कों में गंभीर चर्चा का विषय बनी हुयी है। क्योंकि अभी-अभी तो कांग्रेस को तीन राज्यों में हार का झटका लगा है। ऐसे में प्रदेश सरकार और संगठन के इस टकराव को विश्लेषक अलग नजर से देख रहे हैं। सरकार संगठन की अनदेखी करती आ रही है इस आश्य की शिकायतें हाईकमान तक पहुंचती रही हैं। सरकार की कार्यशैली से क्षेत्रीय असंतुलन उस सीमा तक पहुंच गया है जहां उसे अब संतुलित कर पर पाना मुख्यमंत्री के लिये भी असंभव होता जा रहा है। क्योंकि यह असंतुलन मित्रों को स्थापित करने के कदमों का प्रतिफल है। जो सरकार कर्ज के आंकड़ों के दस्तावेजी प्रमाणों को भी झुठलाने का साहस करें उससे उसकी बजटीय समझ पर भी सवाल उठते हैं। आज एक वर्ष के अवसर पर यदि सरकार की उपलब्धियों की चर्चा की जाये तो सबसे बड़ी उपलब्धि लेने की ही आती है। जो गारंटीयां चुनावों में जनता को परोसी थी उनकी पूर्णता की ओर चरणबद्ध तरीके से पूरा करने के आश्वासन के अतिरिक्त और कुछ भी सरकार के पास कहने और देने को नहीं है। इस परिदृश्य में आने वाले लोकसभा चुनाव में शायद पार्टी को चारों सीटों के लिये प्रत्याशी तय करना भी आसान नहीं होगा। राजनीतिक पंडित जानते हैं कि विधानसभा चुनाव जीतने में स्व. वीरभद्र की विरासत का विशेष योगदान रहा है। इस विरासत की अनदेखी चुनावी राजनीति में महंगी पड़ेगी। क्योंकि सरकार का अपना कुछ भी उसके पक्ष में नहीं है। अभी सरकार के सिर पर मुख्य संसदीय सचिवों के मामले की तलवार लटकी हुई है। यदि कहीं इन लोगों को अदालत ने विधायकी से भी आयोग्य घोषित कर दिया तो सरकार का बना रह पाना कठिन हो जायेगा। हालात नये चुनावों तक पहुंच सकते हैं। क्योंकि भाजपा की राजनीतिक आवश्यकता होगी कि वह इस सरकार को अपने ही भार से गिरने के कगार पर लाकर खड़ा कर दे। जब कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर कमजोर हो रही हो तो ऐसे समय में एक मुख्यमंत्री द्वारा अपने ही प्रदेश अध्यक्ष और संगठन की अनदेखी के प्रयासों को विश्लेषक राजनेताओं की नीयत से जोड़कर देखने को विवश हो जायेंगे। क्योंकि इस तरह के प्रयास किसी भी गणित से पार्टी हित नहीं माने जा सकते। यदि सरकार और संगठन का यह टकराव सरकार की बलि लेने के कगार पर पहुंच जाता है तो इसकी सीधी जिम्मेदार कांग्रेस हाई कमान की होगी।
शिमला/शैल। तीनों हिंदी भाषा राज्यों में कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत ने सारे राजनीतिक समीकरणों को पलट कर रख दिया है। इसका हिमाचल में इस कदर प्रभाव पड़ा है की पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष ठाकुर जय राम ने सरकार पर ऐसा हमला बोला है जिसके परिणाम दुरगामी और बहुत व्यापक होंगे। जयराम ठाकुर ने यह बड़ा आरोप लगाया है कि छत्तीसगढ़ में पिछले दिनों जितने घोटाले सामने आये जिनमें कोयला, शराब, गोबर और महादेव ऐप विशेष चर्चित रहे इन घोटालों का पैसा हिमाचल के चुनावों में चुनावी फण्ड के रूप में इस्तेमाल हुआ और इसकी जांच होनी चाहिए। हिमाचल में छत्तीसगढ़ मॉडल लागू किये जाने के सुक्खू सरकार के दावों और प्रयासों पर हमला बोलते हुये सवाल किया कि क्या यह सरकार इन घोटालों पर अमल करने जा रही है। उन्होंने सरकार से छत्तीसगढ़ मॉडल का खुलासा प्रदेश की जनता के सामने रखने की मांग की है।
राजस्थान की बात करते हुये जय राम ने खुलासा किया कि वहां एक लाल डायरी का जिक्र है जिसमें वहां की सरकार के एक मंत्री ने सरकार के सभी को घोटालों को अपनी एक डायरी में लिख रखा था। यह बात बाहर आते ही उस मंत्री को सरकार से निकाल दिया गया। राजस्थान में कांग्रेस के शासन में 19 पेपर लीक के मामले होने का जय राम ने जिक्र उठाया है। नेता प्रतिपक्ष ने यह भी खुलासा किया कि सुक्खू सरकार द्वारा दस गारंटीयों को लेकर बोले जा रहे हैं झूठ को भी उन्होंने तीन राज्यों में बेनकाब किया और उसका परिणाम इन नतीजों के रूप में सामने आया है। जय राम ने सरकार द्वारा एक वर्ष पूरा होने के उपलक्ष में मनाये जा रहे जश्न के औचित्य पर भी गंभीर सवाल उठाये हैं।
जय राम द्वारा लगाये गये आरोप भले ही सीधे तौर पर प्रदेश सरकार के खिलाफ नहीं है। लेकिन इन आरोपों का जवाब देना सुक्खू सरकार की जिम्मेदारी हो जाती है। अब कांग्रेस के पास हिंदी भाषा राज्यों में केवल हिमाचल ही रह जाता है। इसलिए ऐसे उठने वाले सवालों का जवाब देने की बड़ी जिम्मेदारी यहां के नेतृत्व पर आ जाती है। क्योंकि हिमाचल से केंद्र में एक महत्वपूर्ण मंत्री अनुराग ठाकुर आते हैं। यही नहीं भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा भी हिमाचल से ही ताल्लुक रखते हैं। परंतु पिछले एक वर्ष के कार्यकाल पर नजर डालें तो ऐसा कुछ भी रिकॉर्ड पर नहीं आता है कि हिमाचल सरकार या संगठन के किसी बड़े नाम ने केंद्र पर कभी कोई सवाल उठाया हो। बल्कि ऐसा लगता रहा है कि केंद्र सरकार पर कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व द्वारा उठाये जा रहे सवालों से प्रदेश सरकार का कोई वास्ता ही न हो।
ऐसे में आज जो आरोप नेता प्रतिपक्ष जय राम ठाकुर ने उठाये हैं वह छत्तीसगढ़ और राजस्थान के साथ ही कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व पर भी आ जाते हैं। इन सवालों पर प्रदेश सरकार का आचरण कैसा रहता है यह देखना रोचक होगा।
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने पिछले दिनों कांगड़ा से ताल्लुक रखने वाले राजा अवस्थी को दिल्ली में सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया है। यह नियुक्ति आउटसोर्स के माध्यम से की गयी है। आउटसोर्स की प्रक्रिया को प्रदेश की इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ने अंजाम दिया है। निगम ने राजा अवस्थी का नाम सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को उसकी सहमति के लिये भेजा। विभाग ने इसे स्वीकार करके राजा अवस्थी को दिल्ली में यह नियुक्ति दे दी। इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन को राजा अवस्थी का नाम शिमला की एक आउटसोर्स कंपनी द्वारा प्रेषित किया गया है। इस नियुक्ति से यह इंगित होता है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के कुछ कार्यांे को सरकार आउटसोर्स कंपनियों को सौंपना चाहती है। जिसमें दिल्ली में सोशल मीडिया के साथ कोऑर्डिनेट करना भी शामिल है। वैसे दिल्ली में विभाग का क्षेत्रीय कार्यालय भी कार्यरत है। लेकिन सरकार ने विभाग को सक्षम न मानकर दिल्ली में यह काम एक आउटसोर्स कंपनी को दिया है। सुक्खू सरकार ने सत्ता में आने के बाद आउटसोर्स के माध्यम से कोविड काल में स्वास्थ्य विभाग में रखे गये 1800 से अधिक कर्मचारियों को बाहर निकाला भी है। इस निष्कासन से उठे विवाद के बाद आउटसोर्स योजना पर कुछ विचार विमर्श भी हुआ है। राजा अवस्थी की नियुक्ति से आउटसोर्स की प्रासंगिकता तो प्रमाणित हो जाती है और यही सवाल खड़ा होता है कि इसके माध्यम से अपने ही लोगों को भर्ती करने का साधन बनाया जाये। आउटसोर्स के माध्यम से रखें कर्मियों को भी सरकार में भर्ती करने का प्रावधान रखा जाये। इस समय जो 35000 के करीब आउटसोर्स के माध्यम से रखे गये कर्मचारी है उनके भविष्य को लेकर भी सरकार को सोचना चाहिये। इस नियुक्ति की चयन प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों के साथ सरकार की मीडिया पॉलिसी पर उसकी नीयत और नीति दोनों ही अलग से प्रशनित हो गये हैं। दिल्ली में सोशल मीडिया के लिये कोआर्डिनेटर नियुक्त किया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार सोशल मीडिया मंचों की भूमिका और प्रासंगिकता दोनों को स्वीकार करती है। दिल्ली स्थित सोशल मीडिया मंचों तक सरकार का प्रश्न रखना और उसे प्रचारित प्रसारित करवाने की जिम्मेदारी इस सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर की होगी। इस सरकार का पक्ष दिल्ली स्थित हाईकमान तक तो पहुंच जायेगा। लेकिन क्या वही पक्ष प्रदेश की जनता के सामने उसी क्लेवर में आ पायेगा और जनता उस पर विश्वास कर पायेगी? क्योंकि प्रदेश की जनता के सामने तो सरकार का व्यवहारिक पक्ष यथास्थिति मौजूद रहेगा। फिर शिमला स्थित मीडिया के कुछ वर्ग को जिस तरह सरकार ने उत्पीड़ित करना शुरू किया हुआ है उसके परिदृश्य में सरकार कुछ समय के लिये हाईकमान को तो प्रभावित कर लेगी परन्तु प्रदेश की जनता के सामने उसकी स्थिति और हास्यस्पद हो जायेगी। दिल्ली में सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर बिठाने से सरकार स्वतः ही एक अन्तर विरोध का शिकार हो गयी है।

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने पिछले दिनों कांगड़ा से ताल्लुक रखने वाले राजा अवस्थी को दिल्ली में सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया है। यह नियुक्ति आउटसोर्स के माध्यम से की गयी है। आउटसोर्स की प्रक्रिया को प्रदेश की इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ने अंजाम दिया है। निगम ने राजा अवस्थी का नाम सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को उसकी सहमति के लिये भेजा। विभाग ने इसे स्वीकार करके राजा अवस्थी को दिल्ली में यह नियुक्ति दे दी। इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन को राजा अवस्थी का नाम शिमला की एक आउटसोर्स कंपनी द्वारा प्रेषित किया गया है। इस नियुक्ति से यह इंगित होता है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के कुछ कार्यांे को सरकार आउटसोर्स कंपनियों को सौंपना चाहती है। जिसमें दिल्ली में सोशल मीडिया के साथ कोऑर्डिनेट करना भी शामिल है। वैसे दिल्ली में विभाग का क्षेत्रीय कार्यालय भी कार्यरत है। लेकिन सरकार ने विभाग को सक्षम न मानकर दिल्ली में यह काम एक आउटसोर्स कंपनी को दिया है। सुक्खू सरकार ने सत्ता में आने के बाद आउटसोर्स के माध्यम से कोविड काल में स्वास्थ्य विभाग में रखे गये 1800 से अधिक कर्मचारियों को बाहर निकाला भी है। इस निष्कासन से उठे विवाद के बाद आउटसोर्स योजना पर कुछ विचार विमर्श भी हुआ है। राजा अवस्थी की नियुक्ति से आउटसोर्स की प्रासंगिकता तो प्रमाणित हो जाती है और यही सवाल खड़ा होता है कि इसके माध्यम से अपने ही लोगों को भर्ती करने का साधन बनाया जाये। आउटसोर्स के माध्यम से रखें कर्मियों को भी सरकार में भर्ती करने का प्रावधान रखा जाये। इस समय जो 35000 के करीब आउटसोर्स के माध्यम से रखे गये कर्मचारी है उनके भविष्य को लेकर भी सरकार को सोचना चाहिये। इस नियुक्ति की चयन प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों के साथ सरकार की मीडिया पॉलिसी पर उसकी नीयत और नीति दोनों ही अलग से प्रशनित हो गये हैं। दिल्ली में सोशल मीडिया के लिये कोआर्डिनेटर नियुक्त किया गया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि सरकार सोशल मीडिया मंचों की भूमिका और प्रासंगिकता दोनों को स्वीकार करती है। दिल्ली स्थित सोशल मीडिया मंचों तक सरकार का प्रश्न रखना और उसे प्रचारित प्रसारित करवाने की जिम्मेदारी इस सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर की होगी। इस सरकार का पक्ष दिल्ली स्थित हाईकमान तक तो पहुंच जायेगा। लेकिन क्या वही पक्ष प्रदेश की जनता के सामने उसी क्लेवर में आ पायेगा और जनता उस पर विश्वास कर पायेगी? क्योंकि प्रदेश की जनता के सामने तो सरकार का व्यवहारिक पक्ष यथास्थिति मौजूद रहेगा। फिर शिमला स्थित मीडिया के कुछ वर्ग को जिस तरह सरकार ने उत्पीड़ित करना शुरू किया हुआ है उसके परिदृश्य में सरकार कुछ समय के लिये हाईकमान को तो प्रभावित कर लेगी परन्तु प्रदेश की जनता के सामने उसकी स्थिति और हास्यस्पद हो जायेगी। दिल्ली में सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर बिठाने से सरकार स्वतः ही एक अन्तर विरोध का शिकार हो गयी है।



शिमला/शैल। भाजपा कांग्रेस द्वारा विधानसभा चुनावों में दी गारंटीयों का पूरा करने में सुक्खू सरकार द्वारा अब तक कोई भी प्रभावी कदम न उठाये जाने को लेकर लगातार आक्रामक होती जा रही है। भाजपा जितना आक्रमक होती जा रही है उसी अनुपात में कांग्रेस का जवाब कमजोर होता जा रहा है। बल्कि सुक्खू सरकार पर क्षेत्रीय असन्तुलन का आरोप ज्यादा गंभीर होता जा रहा है। मंत्रिमण्डल में चले आ रहे तीनों खाली पदों को न भर पाना अब सुक्खू सरकार का नकारात्मक पक्ष गिना जाने लगा है। इस समय कांगड़ा से एक ही मंत्री का सरकार में होना शान्ता जैसे वरिष्ठतम नेता को यह कहने पर मजबूर कर गया है कि कांगड़ा को मंत्री नहीं मुख्यमंत्राी के लिये लड़ाई लड़नी चाहिए। क्योंकि प्रदेश में सरकार बनाने का फैसला सबसे बड़ा जिला होने के नाते कांगड़ा ही करता है। शान्ता के इस सुझाव का कांगड़ा के राजनेताओं पर कितना और क्या असर पड़ता है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन शान्ता के इस उपदेश के बाद ही कांगड़ा से एकमात्र मंत्री चंद्र कुमार का मंत्रिमण्डल विस्तार को लेकर ब्यान आया है। इसी उपदेश के बाद ही मुख्यमंत्री का भी विस्तार को लेकर ब्यान आया है। इन ब्यानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह क्षेत्रीय असन्तुलन का आरोप लोकसभा चुनावों में अवश्य असर दिखायेगा।
क्षेत्रीय असन्तुलन तो मंत्रिमण्डल से बाहर हुई राजनीतिक ताजपोशीयों में भी पूरी नग्नता के साथ प्रदेश के सामने आ गया है। इस समय मुख्यमंत्री की सहायता के लिये सलाहकारों विशेष कार्यकारी अधिकारियों की नियुक्तियों में करीब 90% की हिस्सेदारी अकेले जिला शिमला की हो गयी है। इसी बड़ी हिस्सेदारी के कारण ही सुक्खू सरकार को कुछ विश्लेष्कों ने मित्रों की सरकार का उपनाम दे दिया है। इस उपनाम का व्यवहारिकता में जवाब देने का साहस किसी कार्यकर्ता में नहीं हो पा रहा है। बल्कि कुछ विश्लेष्क मुख्यमंत्री की कार्यशैली का इस तरह विश्लेष्ण कर रहे है कि सुक्खू अपनी पूरी राजनीतिक कुशलता के साथ मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गये हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद शिमला नगर निगम के चुनाव आये और उसमें भी शिमला वासियों को कुछ वायदे करके जिनमें एटिक को रिहाईसी बनाना और बेसमैन्ट को खोलना आदि शामिल थे के सहारे यह चुनाव भी जीत गये। अब लोकसभा चुनावों की हार जीत में तो पार्टी की राष्ट्रीय नीतियों की ही भूमिका रहेगी। फिर लोकसभा चुनाव तो स्वर्गीय वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में भी हारे हैं। विधानसभा में कोई भी मुख्यमंत्री स्व.वीरभद्र सिंह से लेकर शान्ता, धूमल और जयराम तक कोई रिपीट नहीं कर पाया है। इसमें सुक्खू के नाम कोई दोष नहीं आयेगा। लेकिन इस दौरान जिन मित्रों को वह राजनीतिक लाभ दे पायेंगे वह पार्टी के अन्दर उनका एक प्रभावी तबका बन जायेगा। इसलिये सुक्खू को लेकर जो यह धारणा फैलाई जा रही है कि वह किसी की नहीं सुनते और अपनी ही मर्जी करते हैं इसके पीछे पार्टी के अन्दर आने वाले वक्त के लिये अपना एक स्थाई वर्ग खड़ा करना है।
इस समय कांग्रेस गारंटीयां पूरी नहीं कर पायी है इस आरोप का एक बड़ा हिस्सा पिछले दिनों आयी आपदा में छुप जाता है। जहां तक लोकसभा चुनावों का प्रश्न है उसके लिये सुक्खू की राजनीति को समझने वालों के मुताबिक वह कांगड़ा, हमीरपुर और शिमला से मंत्रियों या वरिष्ठ विधायकों को चुनावी उम्मीदवार बनवाने का प्रयास करेंगे। क्योंकि सुक्खू की अस्वस्थता के दौरान यही लोग महत्वपूर्ण भूमिकाओं में थे। ऐसे में लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय असन्तुलन और आर्थिक कठिनाइयों का यदि सरकार जवाब न दे पायी तो यह चुनाव जीत पाना कठिन हो जायेगा।