शिमला/शैल। नगर निगम शिमला प्रदेश का एकमात्र ऐसा स्थानीय निकाय है जो तीन विधानसभा क्षेत्रों शिमला ग्रामीण, कुसुम्पटी और शिमला शहरी में एक साथ फैला हुआ है। शिमला को नगर निगम बनाने और यहां कार्यरत कर्मचारियों को राजधानी भत्ते का पात्र बनाने के लिये इसकी सीमाओं का विस्तार किया गया था। नगर निगम में जो वार्ड शिमला ग्रामीण और कुसुम्पटी विधानसभा क्षेत्रों में शामिल किये गये हैं उनमें आज भी वह सभी सुविधाएं उसी स्तर और अनुपात में उपलब्ध नहीं है जो शिमला शहरी में उपलब्ध हैं। लेकिन भवन निर्माण आदि को लेकर जो नियम शिमला शहरी में लागू है वही इन क्षेत्रों में भी लागू है। कई बार इसको लेकर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन निगम चुनावों में यह विसंगति कभी मुद्दा नहीं बन पायी है। क्योंकि इन वार्डों में से कभी कोई ऐसा नेतृत्व नहीं उभर पाया है जो स्थापित नेतृत्व के लिये चुनौती बन सके। क्योंकि यहां का नेतृत्व विधानसभा चुनाव के समय दो क्षेत्रों में एक साथ बंटकर रह जाता है और कहीं भी प्रभावी राजनीतिक गणना में नहीं आ पाता है। इस वस्तुस्थिति में यह सवाल अब उभरने लगा है कि जब शिमला ग्रामीण और कुसुम्पटी में पड़ने वाले नगर निगम के वार्ड सारी व्यवहारिकताओं के लिये नगर निगम शिमला का हिस्सा है तो फिर इन वार्डों को स्थाई रूप से शिमला शहरी विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा क्यों नहीं बना दिया जाता है। प्रशासनिक दृष्टि से यह सारे वार्ड एक ही प्रशासनिक इकाई का अंग बन जायेंगे। आज नगर निगम चुनाव में यह निगम का हिस्सा है और विधानसभा चुनाव में शिमला ग्रामीण और कुसुम्पटी का हिस्सा होते हैं। लेकिन विकासात्मक कार्यों के लिए दो जगह एक साथ बंटे होने से कहीं से भी कुछ भी पाने में पिछड़ जाते हैं। इसलिये यह प्रश्न उठ रहा है कि इन्हें शिमला शहरी विधानसभा का हिस्सा बना दिया जाये।
शिमला/शैल। नगर निगम शिमला में चुनाव प्रक्रिया चल रही है और इसके परिणाम स्वरूप निगम क्षेत्र में चुनाव आचार संहिता लागू है। इस संहिता के चलते नगर निगम प्रशासन और राज्य सरकार ऐसी कोई घोषणा नहीं कर सकते जिसका प्रभाव निगम क्षेत्र के निवासियों पर पड़ता हो। लेकिन सुक्खू सरकार ने 13 अप्रैल को हुई मंत्री परिषद की बैठक में यह फैसला ले कर सबको चौंका दिया कि सरकार एटिक फ्लोर को वाकायदा रहने लायक बनाने के लिये 2014 के टी.सी.पी. नियमों में संशोधन करने जा रही है। इसके लिए चार और 15A में संशोधन करके एटिक की ऊंचाई बढ़ाने का प्रावधान किया जायेगा। स्मरणीय है कि मकानों के नक्शे पास करवाने की आवश्यकता शहरी क्षेत्रों में ही आती है। जहां पर एन.ए.सी. नगरपालिका या नगर निगम है। इसमें भी सबसे ज्यादा समस्या नगर निगम शिमला क्षेत्र की है। जहां पर नौ बार कांग्रेस और भाजपा की सरकारें रिटैन्शन पॉलिसियां ला चुकी है। कई बार प्रदेश उच्च न्यायालय सरकारों के प्रयासों पर कड़ी टिप्पणियां करते हुये अंकुश लगा चुका है। क्योंकि शिमला भूकंप के मुहाने पर खड़ा है और राज्य सरकार अपनी ही रिपोर्टों में यह स्वीकार भी कर चुकी है।
1971 में किन्नौर में आये भूकंप के दौरान शिमला का लक्कड़ बाजार क्षेत्र और रिज जो प्रभावित हुआ था वह आज तक पूरी तरह संभल नहीं पाया है। शिमला की इस व्यवहारिक स्थिति और सरकार के अपने ही अध्ययनों का संज्ञान लेते हुये एन.जी.टी. ने 2016 में शिमला में अढ़ाई मंजिल से अधिक के निर्माणों पर रोक लगा दी थी और कोर क्षेत्र में तो नये निर्माणों पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया था। शिमला से कार्यालयों को बाहर ले जाने की राय दी है। शिमला में अढाई मंजिल से अधिक के निर्माणों पर इसलिये प्रतिबन्ध लगाया गया है क्योंकि शिमला की और भार सहने की क्षमता नहीं रह गयी है। प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपने पुराने भवन को गिराकर नया बनाने की अनुमति एन.जी.टी. से मांगी थी जो नहीं मिली और उच्च न्यायालय ने इस इन्कार को चुनौती नहीं दी है। सरकार ने एन.जी.टी. के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने एनजीटी के फैसले को स्टे नहीं किया है।
जयराम सरकार के समय में शिमला के लिये एन.जी.टी. के आदेशों के अनुसार एक स्थाई प्लान बनाने के निर्देश दिये थे। इन निर्देशों के तहत यह प्लान तैयार भी हुआ और इसमें भवन निर्माण के लिये कई राहतें दी गयी थी। जैसी अब एटिक फ्लोर के लिये दी गयी है। बड़ी धूमधाम से पत्रकार वार्ता में यह 250 पन्नों का प्लान जारी किया गया। लेकिन अन्त में अदालत ने इसे अपने निर्देशों की उल्लंघना करार देकर निरस्त कर दिया। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब एन.जी.टी. के निर्देशों की अवहेलना करके बनाये गये प्लान को रिजैक्ट कर दिया गया है तो अब एटिक की ऊंचाई 2.70 मीटर से 3.05 मीटर करके उसको नियमित करने के फैसले को कैसे अदालत अपनी स्वीकृति दे देगी फिर यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और सरकार का फैसला वहां तक पहुंचेगा ही। ऐसे में यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि प्रशासन के सामने यह सारी स्थिति स्पष्ट थी तो क्या प्रशासन ने मंत्रिपरिषद को इससे अवगत नहीं कराया होगा? क्या प्रशासन की राय को नजरअंदाज करके राजनीतिक नेतृत्व ने वोट की राजनीति के लिये यह लुभावना फैसला ले लिया। कानून के जानकारों की राय में यह राहत एन.जी.टी. के फैसले की अवहेलना है और इसका लागू हो पाना संदिग्ध है। जबकि इसके बिना भी सरकार की स्थिति मजबूत थी।
शिमला/शैल। प्रदेश भाजपा ने अध्यक्ष सुरेश कश्यप की अध्यक्षता में राज्य चुनाव आयुक्त को नगर निगम शिमला के लिये कांग्रेस द्वारा फर्जी वोट बनाये जाने का गंभीर आरोप लगाया है। कहा गया है कि एक घर में 18 से 20 वोट बनाने का प्रयास किया जा रहा है और ऐसा उप-मुख्यमंत्री और कुछ अन्य मंत्रीयों के घरां में हो रहा है। आरोय लगाया गया है कि वैनमोर में एक ही कमरे में 18 से 20 लोगों ने वोट बनाने के लिये आवेदन किया है और भी कई वार्डों से ऐसी शिकायतें आ रही हैं। निगम चंनावों के लिये जारी किये गये रोस्टर को तैयार करने में भी पक्षपात का आरोप लगाया गया है। भाजपा के यह आरोप गंभीर है और इन चुनावों में यह बड़ा मुद्दा बनेंगे यह तय है। राज्य निर्वाचन आयोग और संबद्ध प्रशासन कि इन आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। निवर्तमान निगम सदन में भाजपा का बहुमत था। सी.पी.एम. और कांग्रेस के कुछ पार्षद भी पासा बदलकर भाजपा में शामिल हो गये थे। इस समय निगम क्षेत्र में स्मार्ट सिटी और अन्य परियोजनाओं में जो कार्य चले हये हैं उनका केंद्रीय सहायता के बिना पूरा होना संभव नहीं होगा। यह तथ्य भी इन चुनावों को प्रभावित करेगा ऐसा माना जा रहा है। भाजपा प्रदेश विधानसभा का चुनाव एक प्रतिश्त से भी कम अन्तर से हारी है। सुक्खू सरकार के पहले बजट सत्र में भाजपा ने विपक्ष की भूमिका काफी प्रभावी निभाई है। नेता प्रतिपक्ष सदन में काफी आक्रामक रहे हैं। यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संयोग रहा है कि सुक्खू सरकार ने शपथ ग्रहण समारोह के दूसरे ही दिन पिछले छः माह के फैसले पलटकर ऐसा मुद्दा भाजपा को थमा दिया जिससे वह पहले ही मंत्रिमंडल विस्तार तक प्रदेश के हर कोने तक ले गयी। प्रदेश उच्च न्यायालय में इस संद्धर्भ में याचिका भी दायर कर दी गयी है। पूरे बजट सत्र में भाजपा ने इस मुद्दे को काफी भुनाया है। इन सारे मुद्दों के अतिरिक्त सरकार ने गारंटीयों को पांच वर्ष में पूरा करने की बात कहकर विपक्ष को और मुद्दा दे दिया है। तीन सौ यूनिट बिजली मुफ्त तब दी जायेगी जब 2000 मेगावाट सोलर ऊर्जा का उत्पादन हो जाएगा और तब तक बिजली की दरें बढ़ा दी गयी हैं। बिजली के अतिरिक्त निगम क्षेत्रों में पानी और गारवेज कलैक्शन की दरें भी 10% बढ़ाकर भाजपा को मुद्दा थमा दिया है। इस तरह मुद्दों के नाम पर निश्चित रूप से भाजपा का प्रक्ष कुछ मजबूत है। देखना है कि चुनाव में आक्रामकता रहती है या नहीं।
शिमला/शैल। कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद होने जा रहे नगर निगम शिमला के चुनाव सुक्खू सरकार की पहली चुनावी परीक्षा होने जा रहे हैं। मुख्यमंत्री सुक्खू के लिये यह और भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है कि वह इसी नगर निगम से दो बार छोटा शिमला वार्ड से पार्षद रहे हैं। उनकी पढ़ाई लिखाई भी इसी शहर में हुई है। लेकिन अब मुख्यमंत्री बनने के बाद होने जा रहा यह चुनाव उनकी सरकार के लिये भी किसी परीक्षा से कम नहीं होगा। क्योंकि शिमला को मिनी हिमाचल की संज्ञा भी हासिल है। प्रदेश के हर भाग का आदमी शिमला में मिल जाता है। फिर यह नगर निगम क्षेत्र का सबसे बड़ा क्षेत्र भी है। इस नाते यह चुनाव सुक्खू सरकार द्वारा चार माह में लिये गये फैसलों का भी आकलन होगा। सुक्खू सरकार ने यह घोषित कर रखा है कि वह व्यवस्था परिवर्तन करने आयी है और इसी व्यवस्था परिवर्तन के तहत शिमला नगर निगम के आयुक्त और संयुक्त आयुक्त नहीं बदले गये है। इस निगम के चुनाव पिछले वर्ष होने थे जो कुछ कारणों से नहीं हो पाये और आज यह प्रशासक के अधीन चल रही है। प्रशासक का दायित्व जिलाधीश शिमला के पास है और वह भी नहीं बदले गये हैं। पुराने प्रशासन के साये में ही यह चुनाव हो रहे हैं। नगर निगम के वार्ड 34 हो या 41 इस संबंध में भाजपा की एक याचिका प्रदेश उच्च न्यायालय में लंबित है । बल्कि इस पर फैसला सुरक्षित है जो कभी भी घोषित हो सकता है। उस फैसले का असर भी निगम चुनावों के परिणाम पर पड़ेगा। यदि वार्ड 41 हो जाते हैं तो इसका कुछ लाभ वामदलों को भी मिलेगा। इस बार आम आदमी पार्टी ने यह चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। आप के रिश्ते कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी पर हैं। इसका असर दोनों कांग्रेस और भाजपा पर एक बराबर पड़ेगा। अभी जो वार्डों को लेकर रोस्टर जारी हुआ है उसमें कांग्रेस की गुटबन्दी ज्यादा चर्चा में है।
इस सबसे हटकर यदि राजनीतिक आकलन किया जाये तो इस समय मंत्रिमंडल और अन्य राजनीतिक ताजपोशी की बात की जाये तो सबसे अधिक प्रतिनिधित्व जिला शिमला का है। यह इसलिये हुआ कहा जा रहा है कि सुक्खू की कार्यस्थली ही शिमला रही है। कई ऐसे लोगों की ताजपोशियां भी शायद हो गयी हैं जो शायद कांग्रेस संगठन में भी कोई बड़े कार्यकर्ता नहीं थे। शिमला में ही कई वरिष्ठ कार्यकर्ता नजरअंदाज हो गये हैं जिनकी निष्ठा शायद हॉलीलाज के साथ थी। जितना प्रतिनिधित्व जिला शिमला को दे दिया गया है उतना किसी भी अन्य जिले को मिल पाना अब संभव नहीं रह गया है और देर सवेर यह एक बड़ा मुद्दा बनेगा यह तय है। इसलिए यह राजनीतिक असंतुलन यदि कहीं नगर निगम चुनावों में चर्चित हो गया तो निश्चित रूप से संकट खड़ा हो सकता है। क्योंकि गारंटीयां देकर सत्ता में आयी सरकार अभी तक व्यवहारिक तौर पर जनता को कोई राहत नहीं दे पायी है। बल्कि आते ही तीन रूपये प्रति लीटर डीजल के दामों में बढ़ौतरी कर दी गयी। अब बिजली की दरें 22 से 46 पैसे प्रति यूनिट बढ़ा दी गयी हैं। कैग रिपोर्ट के मुताबिक 74वें संविधान संशोधन के अनुरूप स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने के लिये शक्तियां ही नही दे पायी हैं। क्या सुक्खू सरकार कैग की सिफारिशों के अनुरूप कदम उठाने का वायदा करेगी।
शिमला नगर निगम प्रशासन एक तरह से अराजकता का पर्याय बना हुआ है यहां पर अदालती फैसलों पर अमल करने या उनके खिलाफ अगली अदालत में अपील करने की बजाये फैसलों पर पार्षदों की कमेटियां राय बनाकर लोगों को परेशान करती है। एन.जी.टी. के फैसले को नजरअंदाज करके शहर में कितने निर्माण खड़े हो गये हैं यह अराजकता का ही परिणाम है। शिमला जल प्रबन्धन निगम रिटायरियों की शरण स्थली बनकर रह गयी है वहां पर सुक्खू सरकार के आदेश भी लागू नहीं हो पाये हैं। स्मार्ट सिटी के तहत कितने निर्माण बनने की स्टेज पर ही गिर गये और किसी की कोई जिम्मेदारी तय नही हो पायी। अब चुनावों के दौरान ऐसे दर्जनों मामले जवाब मांगेंगे। क्योंकि निगम प्रशासन में सत्ता परिवर्तन की कोई झलक देखने को नहीं मिली है।