Monday, 02 March 2026
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सुक्खू सरकार उद्योगों के लिए लायेगी वन स्टॉप सॉल्यूशन

  • क्या सुक्खू सरकार नई उद्योग नीति लाने से पहले पुरानी नीतियों का व्यवहारिक सच सामने लायेगी?

शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिये समर्पित निवेश प्रोत्साहन एवं सुगमता ब्यूरो गठित करने का फैसला लिया है। इस ब्यूरो के माध्यम से निवेशकों को सभी सवीकृतियां समयबद्ध ढंग से प्रदान की जायेगी। यह ब्यूरो उद्योग, पर्यटन, खाद्य प्रसंस्करण, आयुर्वेद, सूचना प्रौद्योगिकी एवं आईटीसी, ऊर्जा तथा स्वास्थ्य एवं शिक्षण संस्थानों में निवेश के लिये वन स्टॉप सॉल्यूशन सुविधा उपलब्ध करवायेगा। इस ब्यूरो के माध्यम से 10 करोड़ से अधिक के निवेश वाली परियोजना को अनुमोदन और स्वीकृतियां प्रदान की जायेगी। स्मरणीय है कि कांग्रेस ने जो दस गारंटीयां जारी की हैं उनमें एक गारंटी एक लाख रोजगार सृजित करने की भी है। इस समय प्रदेश के सरकारी क्षेत्र में करीब अढ़ाई लाख कर्मचारी कार्यरत हैं और प्राइवेट क्षेत्र में उद्योग विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 2.40 लाख कर्मचारियों को रोजगार उपलब्ध है। सरकारी क्षेत्र में प्रतिवर्ष सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों की संख्या भी करीब दस हजार के आसपास रहती हैं। इस परिदृश्य में एक लाख रोजगार प्रतिवर्ष उपलब्ध करवा पाना एक बहुत बड़ा लक्ष्य हो जाता है। प्रदेश के रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगार युवाओं की संख्या करीब बारह लाख है।
ऐसे में जब भी रोजगार के अवसर सृजित करने की बात उठती है तो सबसे पहला ध्यान उद्योगों पर जाता है। प्रदेश में औद्योगिक विकास की ओर 1977 से ध्यान जाने लगा है। इसके बाद भी औद्योगिक क्षेत्र चिन्हित और स्थापित हुये हैं। प्रदेश में उद्योगों को आमन्त्रित करने के लिये हर तरह की सुविधायें उन्हें प्रदान करवाई गयी। कर्ज और उपदान सब कुछ दिया गया है। बल्कि इसके परिणाम स्वरूप प्रदेश का वित्त निगम लगभग बन्द होने की कगार पर पहुंच गया है। उद्योगों की सहायता में कार्यरत अन्य बोर्ड/निगम भी भारी घाटे में चल रहे हैं। आज तक केन्द्र से लेकर राज्य सरकार तक ने जो उपदान उद्योगों को दे रखे यदि सबका योग किया जाये तो यह राशि इन उद्योगों के अपने निवेश से कहीं ज्यादा हो जाती है। इन उद्योगों से कुल रोजगार प्रदेश के युवाओं को मिल पाया है वह भी सरकारी क्षेत्र से कम है। इन उद्योगों से सरकारी कोष में वर्ष 2022-23 में आया कुल कर राजस्व 10881.39 करोड़ और करेत्तर राजस्व 2769.21 करोड़ है। इन उद्योगों को अब तक दी गयी आर्थिक सुविधाओं के लिए जो ब्याज सरकार प्रतिवर्ष दे रही है वह इस कुल कर राजस्व से कहीं अधिक हो जाता है। जो उद्योग 1977 से 1990 तक प्रदेश में लगे हैं उनमें से शायद आज आधे से भी कम व्यवहारिक रूप से उपलब्ध हैं। जब हर सरकार उद्योगों को लुभाने के आकर्षित उद्योग नीतियां लेकर आती रही है। प्रदेश के भीतर और बाहर बड़े स्तर पर इन्वैस्टर मीट आयोजित हुए हैं। हर मीट के बाद निवेश और रोजगार के लम्बे-लम्बे आंकड़े परोसे जाते रहे हैं लेकिन कोई भी सरकार अपने दावों पर श्वेत पत्र जारी नहीं कर पायी है। यह एक स्थापित सत्य है कि जिस भी उद्योग के लिए यहां पर कच्चा माल और उपभोक्ता प्रदेश में उपलब्ध रहेगा वही यहां पर सफल हो पायेगा दूसरा नहीं। सुक्खू सरकार ने व्यवस्था बदलने का वादा प्रदेश से किया है। इस वायदे के परिपेक्ष में यह उम्मीद किया जाना स्वभाविक है कि नई उद्योग नीति लाने से पहले अब तक के व्यवहारिक परिदृश्य पर नजर दौड़ा ली जाये क्योंकि प्रदेश की स्थिति श्रीलंका जैसी होने की आशंका बराबर बनी हुई है।

सुक्खू सरकार ने लिया चार हजार करोड़ का कर्ज जयराम का आरोप

  • जयराम पर वित्तीय कुप्रबंधन के आरोपों के परिदृश्य में चार हजार करोड़ का कर्ज लेना बड़ा मुद्दा
  • धूमल ने भी कहा कांग्रेस की गारन्टीयां पूरी होने के लिये करना होगा इन्तजार
  • लोकसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है यह आरोप-प्रत्यारोप

शिमला/शैल। भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की ऊना में हुई बैठक में राज्य सरकार के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाने का फैसला लिया गया है। यह फैसला सरकार द्वारा अब तक लिये गये फैसलों के खिलाफ जनमत तैयार करने को लेकर लिया गया है। जिसमें कांग्रेस सरकार द्वारा जयराम कार्यकाल के अन्तिम वर्ष में लिये गये फैसलों को पलटना प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। इस अवसर पर पूर्व मुख्यमन्त्री और अब नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर की ओर से जारी किये प्रेस नोट में कहा गया है कि सुक्खू सरकार की कर्ज लेने की रफ्तार बहुत बढ़ गयी है। प्रेस ब्यान में खुलासा किया गया है कि सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालने के बाद पन्द्रह दिन के भीतर एक हजार करोड़ का कर्ज लिया गया है। इसके बाद जनवरी में पन्द्रह सौ करोड़ और फिर फरवरी में भी पन्द्रह सौ करोड़ का कर्ज लिया गया है। इस तरह यह सरकार अभी तक ही चार हजार करोड़ का कर्ज ले चुकी है। जय राम द्वारा जारी इन आंकडों़ का खण्डन सरकार द्वारा नहीं किया जाना इन्हें प्रमाणिक बना देता है। धर्मशाला में हुए पहले विधानसभा सत्र में कैग रिपोर्ट आने के बाद जयराम पर सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाले मुख्यन्ंत्री का तमगा चिपका दिया गया था। कैग रिपोर्ट आने के बाद जयराम कार्यकाल पर यह आरोप भी लगाया गया था कि इसने सुक्खू सरकार पर कर्मचारियों की पैन्शन और वेतन भुगतान का ही ग्यारह हजार करोड़ की देनदारी छोड़ी है। जयराम ने भी इन आरोपों का खण्डन नहीं किया है। इसका अर्थ है कि दोनों पार्टियों के यह शीर्ष नेता अपने को जनता के सामने नंगा करके रखने में जुट गए हैं। इसका प्रदेश पर कितना और कैसा असर पड़ेगा यह आने वाले दिनों में सामने आयेगा।
भाजपा की इस कार्यसमिति की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल ने भी सुक्खू सरकार को इन्तजार की सरकार की संज्ञा देते हुये यह दावा किया है कि भाजपा आने वाले दिनों लोकसभा चुनाव में प्रदेश की चारों सीटों पर कब्जा करेगी। धूमल ने तर्क दिया है कि भाजपा के पास जब विधानसभा में केवल सात सीटें थी तब भी लोकसभा की चारों सीटों पर कब्जा किया था तो अब तो भाजपा के पास पच्चीस सीटें हैं। धूमल ने कांग्रेस द्वारा घोषित इस गारन्टियों के पूरा होने के लिये भी इन्तजार करने को कहा है। भाजपा की यह बैठक और इसमें लगाये गये आरोप आने वाले लोकसभा चुनाव के परिपेक्ष में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसी अवसर पर मोदी सरकार द्वारा प्रदेश को दी गयी सहायता और विभिन्न योजनाओं का भी लम्बा चौड़ा विवरण जारी किया गया है।
सुक्खू सरकार जयराम कार्यकाल पर वित्तीय कुप्रबंधन और 75000 करोड का कर्ज तथा ग्यारह हजार करोड की वेतन और पैन्शन आदि की देनदारियों छोड़ जाने का जो आरोप लगा रही है उस पर एकदम चुप्पी साधते हुये इस सरकार पर कर्ज लेने की गति बढ़ाने का आरोप लगा देना भाजपा की एक अलग रणनीति का परिचय देती है। इस परिदृश्य में यह देखना रोचक होगा कि सुक्खू सरकार जय राम और धूमल के आरोपों का जवाब किस तर्ज में देती है। क्योंकि ऊना में कार्यसमिति की बैठक का आयोजन कर और उसमें धूमल के यह तेवर सामने आना निश्चित रूप से लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से बहुत अहमियत रखता है। यह सही है कि विधानसभा चुनावों में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में भाजपा को भारी नुकसान हुआ है। चुनाव परिणामों के बाद यह माना जाने लगा था कि इस हार की गाज नड्डा, जयराम, अनुराग और सुरेश कश्यप सब पर बराबर गिरेगी। लेकिन जिस तरह से नड्डा, जयराम, अनुराग अपने पद बचाने में सफल रहे हैं उसी तर्ज पर सुरेश कश्यप के भी सुरक्षित रहने की पूरी पूरी संभावना है। यह यथा स्थितियां बहाल रहने से पार्टी के शीर्ष पर जो आपसी खींचतान बढ़ने के कयास लगाये जा रहे थे उन पर विराम लगने से जहां भाजपा की स्थिति सुखद हुई है वहीं पर कांग्रेस के लिये एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

सुक्खू सरकार ने लिया चार हजार करोड़ का कर्ज जयराम का आरोप

  • जयराम पर वित्तीय कुप्रबंधन के आरोपों के परिदृश्य में चार हजार करोड़ का कर्ज लेना बड़ा मुद्दा
  • धूमल ने भी कहा कांग्रेस की गारन्टीयां पूरी होने के लिये करना होगा इन्तजार
  • लोकसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है यह आरोप-प्रत्यारोप

शिमला/शैल। भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की ऊना में हुई बैठक में राज्य सरकार के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान चलाने का फैसला लिया गया है। यह फैसला सरकार द्वारा अब तक लिये गये फैसलों के खिलाफ जनमत तैयार करने को लेकर लिया गया है। जिसमें कांग्रेस सरकार द्वारा जयराम कार्यकाल के अन्तिम वर्ष में लिये गये फैसलों को पलटना प्रमुख मुद्दा बनाया गया है। इस अवसर पर पूर्व मुख्यमन्त्री और अब नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर की ओर से जारी किये प्रेस नोट में कहा गया है कि सुक्खू सरकार की कर्ज लेने की रफ्तार बहुत बढ़ गयी है। प्रेस ब्यान में खुलासा किया गया है कि सुक्खू सरकार ने सत्ता संभालने के बाद पन्द्रह दिन के भीतर एक हजार करोड़ का कर्ज लिया गया है। इसके बाद जनवरी में पन्द्रह सौ करोड़ और फिर फरवरी में भी पन्द्रह सौ करोड़ का कर्ज लिया गया है। इस तरह यह सरकार अभी तक ही चार हजार करोड़ का कर्ज ले चुकी है। जय राम द्वारा जारी इन आंकडों़ का खण्डन सरकार द्वारा नहीं किया जाना इन्हें प्रमाणिक बना देता है। धर्मशाला में हुए पहले विधानसभा सत्र में कैग रिपोर्ट आने के बाद जयराम पर सबसे ज्यादा कर्ज लेने वाले मुख्यन्ंत्री का तमगा चिपका दिया गया था। कैग रिपोर्ट आने के बाद जयराम कार्यकाल पर यह आरोप भी लगाया गया था कि इसने सुक्खू सरकार पर कर्मचारियों की पैन्शन और वेतन भुगतान का ही ग्यारह हजार करोड़ की देनदारी छोड़ी है। जयराम ने भी इन आरोपों का खण्डन नहीं किया है। इसका अर्थ है कि दोनों पार्टियों के यह शीर्ष नेता अपने को जनता के सामने नंगा करके रखने में जुट गए हैं। इसका प्रदेश पर कितना और कैसा असर पड़ेगा यह आने वाले दिनों में सामने आयेगा।
भाजपा की इस कार्यसमिति की बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता प्रेम कुमार धूमल ने भी सुक्खू सरकार को इन्तजार की सरकार की संज्ञा देते हुये यह दावा किया है कि भाजपा आने वाले दिनों लोकसभा चुनाव में प्रदेश की चारों सीटों पर कब्जा करेगी। धूमल ने तर्क दिया है कि भाजपा के पास जब विधानसभा में केवल सात सीटें थी तब भी लोकसभा की चारों सीटों पर कब्जा किया था तो अब तो भाजपा के पास पच्चीस सीटें हैं। धूमल ने कांग्रेस द्वारा घोषित इस गारन्टियों के पूरा होने के लिये भी इन्तजार करने को कहा है। भाजपा की यह बैठक और इसमें लगाये गये आरोप आने वाले लोकसभा चुनाव के परिपेक्ष में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इसी अवसर पर मोदी सरकार द्वारा प्रदेश को दी गयी सहायता और विभिन्न योजनाओं का भी लम्बा चौड़ा विवरण जारी किया गया है।
सुक्खू सरकार जयराम कार्यकाल पर वित्तीय कुप्रबंधन और 75000 करोड का कर्ज तथा ग्यारह हजार करोड की वेतन और पैन्शन आदि की देनदारियों छोड़ जाने का जो आरोप लगा रही है उस पर एकदम चुप्पी साधते हुये इस सरकार पर कर्ज लेने की गति बढ़ाने का आरोप लगा देना भाजपा की एक अलग रणनीति का परिचय देती है। इस परिदृश्य में यह देखना रोचक होगा कि सुक्खू सरकार जय राम और धूमल के आरोपों का जवाब किस तर्ज में देती है। क्योंकि ऊना में कार्यसमिति की बैठक का आयोजन कर और उसमें धूमल के यह तेवर सामने आना निश्चित रूप से लोकसभा चुनाव के दृष्टिकोण से बहुत अहमियत रखता है। यह सही है कि विधानसभा चुनावों में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में भाजपा को भारी नुकसान हुआ है। चुनाव परिणामों के बाद यह माना जाने लगा था कि इस हार की गाज नड्डा, जयराम, अनुराग और सुरेश कश्यप सब पर बराबर गिरेगी। लेकिन जिस तरह से नड्डा, जयराम, अनुराग अपने पद बचाने में सफल रहे हैं उसी तर्ज पर सुरेश कश्यप के भी सुरक्षित रहने की पूरी पूरी संभावना है। यह यथा स्थितियां बहाल रहने से पार्टी के शीर्ष पर जो आपसी खींचतान बढ़ने के कयास लगाये जा रहे थे उन पर विराम लगने से जहां भाजपा की स्थिति सुखद हुई है वहीं पर कांग्रेस के लिये एक बड़ी चुनौती बन सकती है।

यदि कौल सिंह चुनाव न हारते तो मुख्यमंत्री बनते प्रतिभा के ब्यान ने फिर हिलाई राजनीति

शिमला/शैल। राहुल गांधी की भारत छोड़ो यात्रा को आगे बढ़ाने के लिये कांग्रेस ने हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा शुरू कर दी है। भारत  जोड़ो यात्रा का कोई सीधा राजनीतिक लक्ष्य नहीं था जबकि हाथ से हाथ जोड़ो यात्रा का उद्देश्य राजनीतिक है। इस यात्रा के माध्यम से कांग्रेस के साथ ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने का लक्ष्य है। वहीं पर यह भी आवश्यक है कि कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं में एकजुटता का व्यवहारिक संदेश जाये। यह सवाल अभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सांसद प्रतिभा वीरभद्र सिंह के मण्डी में उस वक्तव्य के बाद उभरा है जिसमें उन्होंने यह कहा कि यदि ठाकुर कौल सिंह विधानसभा चुनाव न हारते तो वह प्रदेश के मुख्यमंत्री होते। यह बात सही हो सकती है लेकिन व्यवहारिक सच यह रहा है कि कांग्रेस ने यह चुनाव सामूहिक नेतृत्व तले लड़ा है। चुनावों से पहले और इनके दौरान किसी को भी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया गया था। क्योंकि जयराम सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस के कई छोटे-बड़े नेताओं के भाजपा में जाने की चर्चाएं उठती रही हैं। कांग्रेस सदन के अंदर जितनी आक्रमक रही है उतनी आक्रमकता सदन के बाहर नहीं रख पायी है। कई बार तो सदन के अंदर की आक्रमकता तब के नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर में व्यक्तिगत होने के कगार पर पहुंचती रही है। इसी आक्रमकता का परिणाम था की जयराम सरकार में कांग्रेस चारों उपचुनाव और दो नगर निगम जीत गया था। सदन के बाहर कांग्रेस संगठन में पदाधिकारियों की लंबी सूची बनाकर कुलदीप राठौर ने कार्यकर्ताओं को फील्ड में उतरने पर पहुंचा दिया था।
इस परिदृश्य में कांग्रेस हाईकमान ने सामूहिक नेतृत्व का सूत्र देकर किसी एक को नेता घोषित करने से परहेज किया था। अब जब सुखविंदर सुक्खू के नेतृत्व में सरकार बनी और इसमें पहला मंत्रिमण्डल विस्तार हुआ तो इसमें तीन पद खाली रखने तथा मंत्रियों से पहले ही मुख्य संसदीय सचिवों को शपथ दिलाने की बाध्यता ने अनचाहे ही पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिये हैं। यही नहीं जीन गैर विधायकों को कैबिनेट रैंक में सरकार के अंदर जिम्मेदारियां दी गयी हैं उनमें कई वरिष्ठ नेताओं को इसमें जगह न मिल पाने से भी एकजुटता पर ही प्रश्नचिन्ह लगे हैं। क्योंकि मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री की शपथ के बाद मंत्रिमण्डल के विस्तार में लंबा समय लग जाने से इसी धारणा को बल मिला है।
ऐसे में जब पार्टी अध्यक्ष की ओर से पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता कॉल सिंह को लेकर ऐसा ब्यान आयेगा तो दूसरे लोग निश्चित रूप से इसके राजनीतिक अर्थ ही निकालेंगे। क्योंकि कौल सिंह को उनकी वरीयता के अनुसार सरकार में कोई जिम्मेदारी नहीं मिल पायी है। अभी सरकार को शिमला नगर निगम के चुनावों का सामना करना है और निगम क्षेत्रों में ही पानी की दरें 10% बढ़ा दी गयी हैं। इससे पहले डीजल पर वैट बढ़ा दिया गया है। यह फैसले क्या सरकार के ही स्तर पर लिये गये हैं या इन्हें संगठन का भी अनुमोदन प्राप्त है यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। जबकि चुनावों में सरकार से ज्यादा संगठन की भूमिका रहती है और इसमें सरकार के फैसले ही ज्यादा चर्चा में आते हैं। इस परिदृश्य में कांग्रेस के हर बड़े नेता का ब्यान चर्चा का विषय बनेगा ही। इस समय सरकार हर मंच पर वित्तीय कुप्रबंधन और पिछली सरकार द्वारा हजारों करोड़ की वेतन और पैन्शन की जिम्मेदारियां छोड़ जाने का आरोप लगा रही है। लेकिन इस वित्तीय स्थिति से उबरने के लिये सरकार क्या प्रयास कर रही है और इसमें संगठन की क्या भागीदारी है इस बारे में भी कोई ज्यादा जानकारी सामने नहीं है और यही आगे चलकर ऐसे बयानों की पृष्ठभूमि में कई सवालों को जन्म देगा।

सुक्खू सरकार ने भी किया भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरैन्स का दावा

  • क्या सरकार 1997 में अधिसूचित रिवार्ड योजना के नियम बनायेगी या इसे वापस लेगी
  • क्या कांग्रेस के 27-12-2021 को राज्यपाल को सौंपे ज्ञापन पर कारवाई होगी
  • ‘‘लूट की छूट’’ आरोपपत्र पर जांच कब होगी उठने लगा है सवाल

शिमला/शैल। मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविंदर सिहं सुक्खू ने भी हिमाचल के पूर्ण राज्यत्व दिवस पर यह दावा किया है कि उनकी सरकार की भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरैन्स की नीति रहेगी। प्रदेश की हर सरकार यह दावा करने की रस्म ईमानदारी से निभाती आ रही है लेकिन व्यवहार में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिलता है। इसलिये यह दावा करना एक रस्म अदायगी होकर रह गया है या सबसे छोटे कर्मचारी के खिलाफ कारवाई से आगे नहीं बढ़ पाया है। बल्कि बड़े लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार का बड़ा आरोप लगा हुआ होना एक बड़ी योग्यता बनकर बड़ी तरक्की का माध्यम बन जाता है। लेकिन यह भ्रष्टाचार ही है जो हर समस्या के मूल में खड़ा रहता है। कानूनी दॉव पेचों के जाल में भ्रष्टाचार ऐसे उलझ जाता है कि सी.बी.आई. का मामला झेल रहा व्यक्ति भी अपनी चालाकी से शीर्ष पर जा बैठता है और कोई कुछ नहीं कर पाता।
भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरैन्स के परिदृश्य में 31 अक्तूबर 1997 को तत्कालीन वीरभद्र सरकार ने एक रिवार्ड योजना अधिसूचित की थी। इस योजना में यह प्रावधान किया गया था कि भ्रष्टाचार की हर शिकायत पर तीस दिन के भीतर प्रारम्भिक जांच की जायेगी और यदि शिकायत की इस जांच में मामले को आगे बढ़ाने के तथ्य मिलते हैं तो शिकायतकर्ता को उसी स्टेज पर इनाम राशि का 25% तुरंत दे दिया जायेगा। शेष राशि जांच पूरी होने पर देने की बात की गयी। ईनाम की कुल राशि शिकायत से सरकार को होने वाले लाभ का 25% भाग रखा गया था। इस योजना के तहत कई शिकायतें सरकार के पास और विजिलैन्स के पास आयी हैं लेकिन एक भी शिकायत पर तीस दिनों के भीतर कोई प्रारम्भिक जांच तक नहीं हुई है। यहां तक कि इसकी अधिसूचना जारी होने के बाद इसमें जो नियम बनाये जाने थे वह आज तक नहीं बन पाये हैं और न ही इस योजना को निरस्त किया गया है। आज भी यह योजना सरकारी रिकॉर्ड में यथास्थिति बनी हुई है। यदि इस योजना के तहत आयी शिकायतों पर ईमानदारी से अमल किया जाता तो शायद प्रदेश कर्ज के गर्भ में डूबने से बच जाता। अदालत के निर्देशों तक की अनुपालन नहीं हुई है।
आज जब मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरैन्स का दावा कर रहे हैं तब भी प्रशासन उनको ऐसे मामलों की सही जानकारी नहीं दे रहा है। क्योंकि मण्डी में बन रहे शिवधाम के निर्माण हेतु मंगवाये गये 80 करोड की राशि के टेण्डर में ईएमडी केवल 20,000 ली गयी जबकि नियमों के मुताबिक यह कम से कम चालीस लाख होनी चाहिये थी। जब यह मामला उजागर होने के बाद भी इस पर कोई कारवाई नहीं हुई तब इस मामले की शिकायत विजिलैन्स में भी की गयी। विजिलैन्स ने संलग्न दस्तावेजों के अवलोकन के बाद मामले कि अपने स्तर पर जांच करके कारवाई करने के लिए पर्यटन निगम को भेज दिया। लेकिन पर्यटन निगम में अभी तक अपने स्तर पर न तो कोई कारवाई की है और न ही विजिलैन्स ने निगम से इस संबंध में कोई जानकारी मांगी है। ऐसी स्थिति डीजल में हुई स्मगलिंग के मामले की है। हिमाचल से झारखण्ड तक डीजल सम्गल हुआ है। मामला उजागर होने के बाद हरकत में आये तन्त्र ने नौ करोड का यह मामला बनाया है। लेकिन जिन टैंकरों से यह चोरी होती रही उनके खिलाफ कोई जांच या कारवाई नहीं हुई है। मामले को रफा-दफा करने के प्रयास हो रहे हैं।
कांग्रेस ने 27-12-2021 को प्रदेश के राज्यपाल को एक आठ पन्नों का ज्ञापन सौंपा था। इसमें सरकार के खिलाफ गंभीर हो आरोप लगाते हुए जांच की मांग की गयी थी। इसके बाद विधानसभा चुनाव के दौरान ‘‘लूट की छूट’’ शीर्षक तले एक आरोप पत्र सार्वजनिक रूप से जारी किया था। इसमें भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाते हुये यह कहा गया था कि सरकार बनते ही इन आरोपों की जांच के लिये एक कमेटी गठित की जायेगी और सारे घोटालेबाज जेल जायेंगे। लेकिन सरकार बनने के बाद हिमाचल दिवस पर आये ब्यान के अतिरिक्त और कोई कारवाई शुरू होने का संकेत तक नहीं है। ऐसे में यह सवाल भी उठने लगा है कि यदि अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड हमीरपुर में पेपर लीक का यह प्रकरण न घटता तो शायद वहां पर पिछले वर्षो में हुए चयन पर कोई सवाल ही उठता। क्योंकि इसी बोर्ड की तरह प्रदेश का लोक सेवा आयोग भी प्रदेश की राजपत्रित सेवाओं की चयन प्रक्रिया के तहत परीक्षाएं लेकर साक्षात्कार के माध्यम से चयन को अंजाम देता है। आयोग को लेकर भी ऐसी चर्चाएं उठती रही है कि कई परीक्षाओं के होने और उनके परिणाम घोषित करने के बाद उनके साक्षात्कार के परिणाम घोषित करने में लंबा अंतराल रहता रहा है। इस अप्रत्याशित अंतराल के कारण पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठते रहे हैं। ऐसे मामलों की जांच किये जाने की मांग भी उठती रही है। बल्कि 2018 में सदन में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का लोक सेवा आयोग को लेकर आया वक्तव्य बहुत महत्वपूर्ण था। परन्तु इस ब्यान के बाद कोई और कदम सामने नही आया था। आज भी लोक सेवा आयोग को लेकर इस सरकार की खामोशी से यही उभरता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा ब्यान देना हर सरकार के लिये एक आवश्यक रस्म अदायगी के अतिरिक्त और कुछ नहीं रह गया है।

 

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