शिमला/शैल। 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान बन्द किये जाने पर प्रदेश के राजनीतिक हल्कों में जिस तरह की प्रतिक्रियाएं उभरी हैं उससे यह आशंका बढ़ती जा रही है की कहीं हिमाचल वित्तीय आपात या राष्ट्रपति शासन की ओर तो नहीं बढ़ रहा है। यह अनुदान बन्द होने पर सरकार की पहली प्रतिक्रिया वित्त सचिव की इस मुद्दे पर आयी प्रस्तुति से सामने आयी। इस प्रस्तुति से प्रदेश भर में चिन्ता और चिन्तन का माहौल खड़ा हो गया। इस माहौल को देखते हुये सरकार ने स्पष्ट किया कि यह प्रस्तुति सिर्फ एक आकलन है कोई फैसला नहीं। इसके बाद सरकार ने इस पर चर्चा करने के लिये विधानसभा का एक दिन के लिये विशेष सत्र बुलाने की योजना बनाई जिसकी राज्यपाल ने यह कहकर अनुमति नहीं दी कि जब अभी बजट सत्र आ रहा है तो एक दिन के विशेष सत्र की क्या आवश्यकता है। इसके बाद सरकार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई इस बैठक में मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने वॉकआउट कर दिया। इसके बाद विधानसभा का बजट सत्र आ गया इस सत्र में सरकार ने राज्यपाल के अभिभाषण में राजस्व घाटा अनुदान पर वित्त आयोग पर विशेष फोकस कर लिया। लेकिन महामहिम राज्यपाल ने इस अभिभाषण के पैरा तीन से सोलह तक को यह कह कर पढ़ने से मना कर दिया कि इसमें संवैधानिक संस्था पर टिप्पणियां हैं इसलिये वह इसे नहीं पढ़ेंगे। इस तरह राज्यपाल का अभिभाषण दो मिनट एक सेकंड में ही पूरा हो गया। इस तरह वित्त सचिव की प्रस्तुति से लेकर राज्यपाल के अभिभाषण तक जो घटा है और उसका आगे क्या प्रभाव हो सकता है इस पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। क्योंकि सरकार ने इस पर लम्बी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है।
प्रदेश की वित्तीय स्थिति खराब है यह चेतावनी मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालते ही दे दी थी। इस स्थिति का दोष पूर्व सरकार के कुप्रबंधन पर डालकर उसके अंतिम छः माह में लिये गये फैसलों को बदल दिया। खराब वित्तीय स्थिति के चलते सरकार कर्ज पर आश्रित होती चली गयी। जब इस सरकार ने पदभार संभाला था तब प्रदेश का कुल कर्जभार 74000 करोड़ था जो आज बढ़कर एक लाख करोड़ से उपर पहुंच गया है और अभी एरियर और महंगाई भत्ते की ही करीब चौदह हजार करोड़ की देनदारियां खड़ी हैं। विभिन्न विभागों की देनदारियां अलग से हैं। सरकार तीन वर्षों से लगातार पूर्व सरकार और केन्द्र पर दोषारोपण करती आ रही है। लेकिन आज तक पूर्व सरकार के एक भी भ्रष्टाचार के मामले को सामने लाकर उस पर कारवाई नहीं कर पायी है। संसाधन जुटाने और प्रदेश को आत्मनिर्भर बनाने के नाम पर सरकार तीन वर्षों में मुख्यमंत्री के अनुसार 26000 करोड़ से अधिक का राजस्व प्रदेश से इकट्ठा कर चुकी है। लेकिन इस सब के बावजूद सरकार स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों से भागती रही है। आने वाले पंचायत चुनाव सरकार के सारे दावों का खुलासा सामने रख देंगे। आज फील्ड में न तो सरकार के काम दिख रहे हैं और न ही कार्यकर्ता। यह स्थिति हो गयी है।
इस वस्तु स्थिति में जब राजस्व घाटा अनुदान बन्द होने का सच सामने आया है तो सरकार के हाथ पैर फूलने पर चर्चा आवश्यक हो जाती है। राजस्व घाटा अनुदान बन्द होगा यह पिछले वित्त आयोग की रिपोर्ट में ही स्पष्ट अंकित था। यह अनुदान 31 मार्च 2026 तक ही रहेगा यह स्पष्ट था। फिर 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट भी 2025 में आ गयी थी तब सरकार इस पर सचेत क्यों नहीं हुई? जो अधिकारी वित्त आयोग के पास प्रदेश का पक्ष रखते रहे हैं क्या सरकार उनको जनता के साथ सांझा करेगी? राजस्व घाटा अनुदान कोई शाश्वत अधिकार नहीं है जिसे अदालत के माध्यम से बहाल करवाया जा सके। यह वित्त आयोग की सिफारिश पर किया गया एक प्रावधान है। इसलिये यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अनुदान किसी भी सूरत में बहाल नहीं होगा। इस मुद्दे पर यदि विपक्ष भी सरकार के साथ मिलकर दिल्ली में गुहार लगाने चला तो फिर भी इससे कोई लाभ नहीं मिलेगा। बल्कि इस मुद्दे पर आने वाले दिनों में प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े होंगे उसके संकेत जयराम ठाकुर के उस बयान से सामने आ गये हैं जिसमें वह सरकार से उस कांग्रेस नेता के बारे में पूछ रहे हैं जिसे उसके खिलाफ चल रही जांच को बन्द न करने पर पार्टी पद छोड़ने की धमकी दी है। ऐसे बहुत सारे सवाल आने वाले दिनों में और भी सामने आयेंगे। ऐसे परिदृश्य में यदि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न हो पाया तो सरकार कैसे चलेगी। पिछली देनदारियां कैसे पूरी होगी? अभी राज्यपाल ने अपने अभिभाषण में वित्त आयोग पर सरकार के खुलासे को अपने शब्द नहीं दिये हैं। इस पर भाजपा की प्रतिक्रिया क्या रहती है और सरकार का आचरण क्या रहता है यह सब आने वाले दिनों में सामने आयेगा? क्योंकि राजस्व घाटा अनुदान बहाल न होने पर सरकार के खर्चे कैसे चलेंगे यह सवाल अपनी जगह खड़ा रह जाता है। क्योंकि वित्त सचिव ने जो कुछ अपनी प्रस्तुति में कहा है वह कोई राजनीतिक भाषण नहीं बल्कि एकदम कड़वा सच है। वित्त सचिव के खुलासे पर अमल करने के लिये प्रदेश में वित्तीय आपात लागू करने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता है। क्योंकि वित्तीय आपात की स्थिति में भी वित्तीय लाभों पर कैंची चलाई जा सकती है। राष्ट्रपति शासन में सारी राजनीतिक नियुक्तियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में यदि सही में प्रदेश के वित्तीय हालत खराब हैं तो देर-सवेर प्रदेश को इन विकल्पों पर लाना ही होगा।