Monday, 02 March 2026
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सीमेन्ट उत्पादन में घाटा होना चुनाव परिणामों के बाद ही क्यों सामने आया?

हेल्सिम से 82000 करोड़ में खरीद के समय सरकार को कोई टैक्स क्यों नहीं मिला?
प्रशासन इस खरीद पर खामोश क्यों रहा?
प्रतिस्पर्धा आयोग द्वारा 2016 में लगाये गये जुर्माने की भरपाई कौन करेगा?
क्या यह तालाबन्दी सरकार को अस्थिर करने का पहला प्रयोग है?
 
शिमला/शैल। क्या अदानी समूह द्वारा अंबुजा और एसीसी सीमेन्ट कारखानों को अचानक बन्द कर देना कोई साजिश है? यह सवाल इसलिये खड़ा हो रहा है कि प्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणाम 8 दिसम्बर को आये जिसमें भाजपा हार गयी और सता कांग्रेस को मिल गयी। इन परिणामों के बाद अदानी समूह नेे सरकार के गठन से पहले ही सीमेन्ट के रेट बढ़ा दिये। यह रेट बढ़ाये जाने पर सरकार और जनता में रोष होना स्वभाविक था क्योंकि जनता को सरकार बदलने का ईनाम इस महंगाई के रूप में मिला। जब सरकार ने यह रेट बढ़ाये जाने का कारण पूछा तो अचानक घाटा होने का कवर लेकर इस इन सीमेन्ट कारखानों को बिना किसी पूर्व सूचना के बन्द कर दिया गया। कारखाने अचानक बन्द कर दिये जाने से हजारों लोग एकदम प्रभावित हुये हैं क्योंकि जो लोग यहां पर नौकरी कर रहे थे उनकी नौकरी पर अचानक प्रश्न चिन्ह लग गया है। सीमेन्ट के उत्पादन से लेकर इसकी ढुलाई तक के काम में प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हजारों लोग प्रभावित हो गये हैं। एक तरह से अराजकता का माहौल पैदा हो गया है। उत्पादन बन्द कर दिये जाने से सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्र में चल रहे निर्माण कार्य प्रभावित हुये हैं। सीमेन्ट की ढुलाई में लगे ट्रकों के पहिये एकदम रुक गये हैं। ट्रक यूनियनों और कंपनी प्रबन्धन में हो रही वार्ताएं हर रोज विफल हो रही है। प्रशासन एक तरह से लाचारगी का शिकार हो गया है। कंपनी प्रबन्धन सीमेन्ट उत्पादन में घाटा होने का कवर लेकर ट्रकों से भाड़ा कम करने की मांग कर रहा है तो ट्रक ऑपरेटर तेल की कीमतें बढ़ने और उसी के कारण रखरखाव के दाम बढ़ने का तर्क देकर भाड़ा कम करने में असमर्थता व्यक्त कर रहे हैं। सुक्खू सरकार जनता से रोजगार बढ़ाने के दावा करके आयी है। इस तालाबन्दी से लगे हुये रोजगार पर ही संकट खड़ा हो गया है।
यहां पर यह समझने और ध्यान देने का प्रशन है कि अदानी समूह ने इसी वर्ष अंबुजा और ए सी सी सीमेन्ट स्विट्जरलैण्ड की कंपनी होल्सिम से 82000 करोड़ में खरीदी है। इस सौदे के बाद होल्सिम के सी.ई.ओ. जॉन जेनिश (Jan Jenisch) ने अपने निवेशकों को संबोधित करते हुए कहा है कि यह लेनदेन टैक्स फ्री है और इस सौदे से उन्हें 6.4 अरब स्विस फ्रैंक की शुद्ध आय हुई है। होल्सिम अंबुजा और ए सी सी में किसी भी नुकसान या कर के लिये जिम्मेदार नहीं होगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या इस सौदे में देय करों के लिये अदानी समूह जिम्मेदार होगा। अदानी की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। बल्कि राज्य सरकार भी इस पर आज तक खामोश है। प्रधानमंत्री और अदानी के रिश्ते जगजाहिर है? क्या इन रिश्तों के चलते जयराम सरकार और प्रशासन चुप रहा है। क्योंकि अंबुजा को जमीन तो सरकार ने दी है। क्या जमीन देने के साथ ही सरकार के सारे अधिकार समाप्त हो गये हैं? क्योंकि इस 82,000 करोड़ के सौदे में सरकार को टैक्स के रूप में एक पैसा तक नहीं मिला है। यही नहीं 2016 में प्रतिस्पर्धा आयोग ने अंबुजा को 1164 करोड़ और ए सी सी को 1148 करोड़ का जुर्माना लगाया था। इस जुर्माने को अपीलीय कोर्ट में चुनौती दी गयी थी और वहां से हारने के बाद अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। स्वभाविक है कि यह जुर्माना लगने के कारण इन कंपनियों द्वारा कुछ अनियमितताएं करना रहा होगा। लेकिन इस पर राज्य सरकार का चुप रहना कई सवाल खड़े करता है क्योंकि कंपनियां ऑपरेट तो हिमाचल में ही कर रही थी।
इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि जब अदानी ने 82000 करोड़ में यह खरीद की तो क्या उस समय सीमेन्ट उत्पादन से लाभ-हानि होने का उसे कोई ज्ञान नहीं हुआ होगा। अचानक चुनाव परिणाम आने के बाद ही घाटा क्यों सामने आया? अदानी समूह का आचरण सेब खरीद में भी सवालों में रहता आया है। अदानी के प्रदेश में तीन सी ए स्टोर हैं। सरकार की शर्तों के मुताबिक इन स्टोरों में 20% जगह स्थानीय बागवानों के लिये सुरक्षित रखने का नियम है। लेकिन इस नियम की अनुपालन नहीं हो रही है। इस पर भी सरकार खामोश रही है। सौर ऊर्जा में भी अदानी का एकछत्र साम्राज्य है। ऐसे में यदि अदानी जैसा समूह आज सीमेन्ट में सरकार के लिये इस तरह की परिस्थितियां पैदा कर सकता है तो आने वाले समय में अन्य क्षेत्रों में भी यह सब कुछ घट सकता है। जब अदानी ने इन सीमेन्ट उद्योगों की खरीद की और इसमें प्रदेश को कर के रूप में कुछ नहीं मिला तब प्रशासन इस पर खामोश क्यों रहा? आज भी प्रशासन अदानी के घाटे के तर्क पर खामोश क्यों है? क्योंकि जमीन का अधिग्रहण तो सरकार ने स्थापना के समय छः हजार रूपये प्रति बीघा किया है और यह कीमतें पर तो आगे कभी बढ़ी नहीं है और यही इस उद्योग का कच्चा माल है। स्थापना के समय सौंपी गई रिपोर्ट के मुताबिक तो शायद उस समय एक बैग की कीमत 35 रूपये रही है। इसलिए आज घाटे का तर्क किसी भी आधार पर मान्य नहीं बनता है। ऐसी आशंकाएं बल पकड़ रही है कि यह तालाबन्दी सरकार को अस्थिर करने का पहला प्रयोग है।

संस्थान बंद करने के फैसलों को जयराम ठाकुर उच्च न्यायालय में देंगे चुनौती

शीर्ष प्रशासन की निष्ठाओं और ईमानदारी पर उठेंगे सवाल

शिमला/शैल। कांग्रेस ने चुनावों में वायदा किया था कि वह जयराम द्वारा पिछले छः माह में लिये गये फैसलों की समीक्षा करेगी। सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने विधायकों की एक कमेटी बनाकर इन फैसलों की समीक्षा करवाई। इस समीक्षा में विभागों से ऐसे फैसलों की सूची लेकर प्रशासनिक सचिवों और वित्त विभाग से जानकारी ली गयी जो फैसले प्रशासनिक अनुमति और बजट प्रावधानों के बिना लिये गये थे। उन्हें अन्ततः रद्द करने का फैसला लिया गया। इस सैद्धान्ति फैसले के बाद बिना प्रावधानों के खोले गये कार्यालयों/संस्थानों को बन्द करने के आदेश जारी किये गये हैं। इनमें बिजली बोर्ड और लोक निर्माण तथा शिक्षा विभाग प्रभावित हुए हैं। सुक्खू सरकार के इन फैसलों को बदले की भावना से की गई कारवाई करार देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इन फैसलों को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती देने की घोषणा की है। जयराम ठाकुर ने यह भी कहा है कि इन फैसलों के लिये सभी वांछित अनुमति ली गयी है।
जयराम ठाकुर के इस ब्यान से स्थिति रोचक हो गयी है क्योंकि सुक्खू सरकार को वित्त विभाग ने यह जानकारी दी है कि इन फैसलों की अनुपालना करने के लिये बजट ही नहीं है। जयराम ठाकुर इसमें सारी औपचारिकताएं पूरी होने का दावा कर रहे हैं और इसी आधार पर इन फैसलों को प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती देकर बदले की भावना से की जा रही कारवाई करार देना चाहते हैं। यह अपने में ही रोचक स्थिति हो जाती है कि जो वित्त विभाग इन फैसलों को बिना बजट के लिये गये करार दे रहा है उसी के सामने जयराम सरकार ने यह फैसले लिये हैं। ऐसे में किसका दावा कितना सही है इसका सच तो अदालत में ही सामने आयेगा। इसी के साथ यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि प्रशासन राजनेताओं को कितनी सही जानकारी और राय देता है। क्योंकि जयराम शासन में बहुत सारे अधिकारियों को शीर्ष पदों पर बैठाने के लिये बहुत सारे नियमों/कानूनों को ताक पर रखा गया था। आज यदि उन अधिकारियों द्वारा दी गयी राय और जानकारी सही नहीं निकलती है तो इसके प्रभाव दूरगामी होंगे यह तय है।

बिना बजट प्रावधानों के हुये फैसलों पर लगी रोक

शिमला/शैल। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने जनता से वायदा किया था कि यदि वह सत्ता में आये तो जयराम सरकार द्वारा पिछले छःमाह में लिये गये फैसलों के समीक्षा की जायेगी। यह वायदा इसलिये किया गया था कि एक ओर तो सरकार करीब हर माह भारी कर्ज लेकर अपना काम चला रही थी तो दूसरी ओर हर विधानसभा क्षेत्र में लोगों को लुभाने के लिये सैंकड़ों करोड़ों की नई घोषणाएं कर रही थी। पिछले छः माह में की गयी हर तरह की घोषणा को पूरा करने पर होने वाले कुल खर्च का यदि जोड किया जाये तो यह विधानसभा द्वारा पारित वार्षिक बजट के आंकड़े से भी ज्यादा बढ़ जायेगा। शैल ने उस दौरान भी इस पर विस्तार से चर्चा की हुई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक था कि या तो सरकार सत्ता में वापसी के लिये जनता को जुमलों का झुनझुना थमा रही है या बिना सोचे समझे प्रदेश को कर्ज के दलदल में धकेल रही है। अब सरकार में आने पर कांग्रेस की यह आवश्यकता हो जाती है कि वह वायदे के अनुसार इन फैसलों की पड़ताल करती। इस पड़ताल के लिये मुख्यमंत्री सुक्खू ने विधायकांे की एक टीम बनाकर इन फैसलों की समीक्षा की। सबंधित विभागों और वित्त विभाग से जानकारी ली गई और यह सामने आया कि घोषणाएं बिना बजट प्रावधानों के की गयी हैं। वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि इन घोषणाओं को पूरा करने के लिये कोई बजट उपलब्ध नहीं है। वित्त विभाग की इस स्वीकारोक्ति से यह और सवाल खड़ा हो गया है कि जब वित्त विभाग के पास पैसा ही नहीं है तो फिर इन घोषणाओं के उद्घाटनों आयोजनों के लिए धन का प्रावधान कैसे और कहां से किया गया?

बजट प्रावधानों के हुये फैसलों पर लगी रोक

शिमला/शैल। चुनावों प्रचार के दौरान कांग्रेस ने जनता से वायदा किया था कि यदि वह सत्ता में आये तो जयराम सरकार द्वारा पिछले छःमाह में लिये गये फैसलों के समीक्षा की जायेगी। यह वायदा इसलिये किया गया था कि एक ओर तो सरकार करीब हर माह भारी कर्ज लेकर अपना काम चला रही थी तो दूसरी ओर हर विधानसभा क्षेत्र में लोगों को लुभाने के लिये सैंकड़ों करोड़ों की नई घोषणाएं कर रही थी। पिछले छः माह में की गयी हर तरह की घोषणा को पूरा करने पर होने वाले कुल खर्च का यदि जोड किया जाये तो यह विधानसभा द्वारा पारित वार्षिक बजट के आंकड़े से भी ज्यादा बढ़ जायेगा। शैल ने उस दौरान भी इस पर विस्तार से चर्चा की हुई है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक था कि या तो सरकार सत्ता में वापसी के लिये जनता को जुमलों का झुनझुना थमा रही है या बिना सोचे समझे प्रदेश को कर्ज के दलदल में धकेल रही है। अब सरकार में आने पर कांग्रेस की यह आवश्यकता हो जाती है कि वह वायदे के अनुसार इन फैसलों की पड़ताल करती। इस पड़ताल के लिये मुख्यमंत्री सुक्खू ने विधायकांे की एक टीम बनाकर इन फैसलों की समीक्षा की। सबंधित विभागों और वित्त विभाग से जानकारी ली गई और यह सामने आया कि घोषणाएं बिना बजट प्रावधानों के की गयी हैं। वित्त विभाग ने स्पष्ट किया है कि इन घोषणाओं को पूरा करने के लिये कोई बजट उपलब्ध नहीं है। वित्त विभाग की इस स्वीकारोक्ति से यह और सवाल खड़ा हो गया है कि जब वित्त विभाग के पास पैसा ही नहीं है तो फिर इन घोषणाओं के उद्घाटनों आयोजनों के लिए धन का प्रावधान कैसे और कहां से किया गया?

कांग्रेस को मिली प्रदेश की सरकार सुखविन्दर सिंह सुक्खु बने मुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री होंगे उप मुख्यमंत्री

मंत्रीमण्डल विस्तार में लग सकता है समय
पार्टी में गुटबाजी का सन्देश जाना हो सकता है नुकसानदेह
शैल का चुनावी आकलन हुआ सही साबित


शिमला/शैल। हिमाचल में सत्ता परिवर्तन हो गया है कांग्रेस 40 सीटें जीत कर सत्ता पर काबिज हो गयी है। सोलन और हमीरपुर में भाजपा शून्य हो गयी है। शिमला, ऊना और कांगड़ा में भी कांग्रेस का प्रदर्शन शानदार रहा है। यदि मंडी और बिलासपुर में भी इसी स्तर का प्रदर्शन रहता तो निश्चित रूप से कांग्रेस का आंकड़ा 50 से भी बड़ जाता। मंडी और बिलासपुर का परिणाम भाजपा तथा कांग्रेस दोनों दलों के लिये अपने-अपने तौर पर चिन्तन और चिन्ता का विषय है। जबकि आम आदमी के लिए बिलासपुर सदर में जो कुछ घटा है वह चुनावी व्यवस्था पर सवाल खड़े करने का पर्याप्त आधार दे देता है। शैल के पाठक जानते हैं कि हमारा आकलन पूरी तरह सही साबित हुआ है। हम लगातार सत्ता परिवर्तन को लेकर आश्वस्त रहे हैं। लेकिन इस सत्ता परिवर्तन के बाद बड़ा सवाल यह होगा कि यह सरकार अपना कार्यकाल पूरी सफलता के साथ पूरा करे और प्रदेश की जनता को दी 10 गारन्टियों को शीघ्र से शीघ्र पूरा करे। नई सरकार पर यह सवाल इसलिये खड़ा हो रहा है कि जब पर्यवेक्षकों ने नेता चुुनने को लेकर जब विधायकों के साथ बैठक की तब कार्यकर्ताओं ने अलग-अलग नेताओं के समर्थन में नारेबाजी कर दी। इस नारेबाजी के परिदृश्य में विधायकों की बैठक के बाद यह सामने आया कि सुखविन्दर सिंह मुख्यमंत्री और मुकेश अग्निहोत्री तथा विक्रमादित्य सिंह उपमुख्यमंत्री नामित हुये हैं। मीडिया में इस आश्य के समाचार भी प्रसारित हो गये। लेकिन जब शपथ ग्रहण समारोह हुआ तो सिर्फ सुखविन्दर सिंह सुक्खु और मुकेश अग्निहोत्री की ही शपत हुई। विक्रमादित्य का नाम गायब हो गया। ऐसा क्यों हुआ इसकी कोई अधिकारी जानकारी आने की बजाये पार्टी में गुटबाजी होने के समाचार आने लग गये। यह सब आम आदमी के सामने घटा है और अनचाहे ही चर्चा का विषय बन गया है। इसी चर्चा के कारण मंत्रिमण्डल के गठन में समय लगने की बात हो रही है। बल्कि कुछ अन्य आवश्यक नयुक्तियां होने में भी समय लग रहा है। यह समय लगना और पार्टी के भीतर पहले दिन से गुटबाजी होने के समाचार आना आगे चलकर क्या रंग दिखाएंगे यह अभी से एक चिन्तन का विषय बन गया है क्योंकि विपक्ष में भाजपा है। गैर भाजपा सरकारों को तोड़ने के लिये ऑपरेशन लोटस कैसे चलता रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। इसी परिदृश्य में यह चर्चा करना प्रसांगिक हो जाता है कि इस समय प्रदेश कांग्रेस में स्व. वीरभद्र के कद का कोई नेता नहीं है। उस कद का नेता बनने के लिये सभी को समय लगेगा। अभी कांग्रेस को अगले लोकसभा चुनावों तक स्व. वीरभद्र सिंह को अधिमान देकर चलना होगा। क्योंकि जब भी जयराम सरकार के फैसलों और उसके कार्यों पर सवाल उठेंगे तो उनका आकलन वीरभद्र सरकार के कार्यकाल से ही करना होगा। अगले लोकसभा चुनाव तक सुक्खु सरकार का केवल एक वर्ष की पूरा हुआ होगा। इस वर्ष में ओ.पी.एस., महिलाओं को 1500 रूपये प्रतिमाह तथा 300 यूनिट बिजली मुफ्त और एक लाख रोजगार सृजित करना ऐसे आर्थिक फैसले होंगे जिनमें साधन आवश्यक होंगे। यह साधन कैसे जूटाये जाते हैं इस पर सबकी निगाहें रहंेगी। चुनावों के दौरान कांग्रेस अपना आरोप पत्र जनता के बीच जारी कर चुकी है। इस पर ही कैसे अगली कारवाही शुरु होगी इस पर भी सबकी नजरें रहेंगी। आरोप पत्र पर कारवाई का सीधा प्रभाव राजनेताओं से पहले प्रशासन पर पड़ेगा। अभी शिमला नगर निगम के चुनावों का सामना करना पड़ेगा। इन चुनावों में एन.जी.टी. का फैसला और उस फैसले की अवहेलना के मामले एक बड़ा सवाल रहेंगे। क्योंकि अवहेलना का आरोप सरकार पर भी लग चुका है। इस संद्धर्भ में सरकार के स्टैण्ड का असर पूरे प्रदेश पर पड़ेगा। यह सब लोकसभा चुनाव से पहले हो जायेगा। इसका प्रभाव लोकसभा चुनाव पर अवश्य पड़ेगा। इसलिये सरकार को एक दूरगामी चिन्तन करके चलना होगा। इस वस्तुस्थिति में यह पहली आवश्यकता होगी की पार्टी में गुटबाजी होने का कोई भी परोक्ष/अपरोक्ष सन्देश नहीं जाना चाहिये। अभी कांग्रेस के हर नेता को हर आयोजन के मंच पर स्व. वीरभद्र सिंह को याद करना पड़ता है क्योंकि सरकार की अपनी परफॉरमैन्स को सामने आने में समय लगेगा। इसलिये विश्लेष्कों की नजर में 2024 के लोकसभा चुनाव तक वीरभद्र परिवार के सम्मान को किसी भी तरह की ठेस पहुंचाना नुकसानदेह हो सकता है। इन चुनावों में पार्टी को मण्डी लोकसभा क्षेत्र में कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है। लेकिन बिलासपुर में भी चार में से 3 सीटें कांग्रेस हार गयी है। वहां पर सदर चुनाव क्षेत्र में चुनाव आयोग का आचरण जिस तरह का रहा है उसको बम्बर ठाकुर ने सीधा जगत प्रकाश नड्डा पर आरोप लगाया है। परन्तु कांग्रेस पार्टी की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया न आना अपने में कई सवाल खड़े कर जाता है। मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खु का संगठन लम्बा अनुभव है वह यह अच्छी तरह से समझते हैं कि संगठन की छोटी घटनाएं भी कई बार बड़ा आकार ले लेती हैं। ऐसे में यह सुक्खु और मुकेश के लिये टैस्ट होगा कि वह गुटबाजी के सन्देश को कैसे रोक पाते हैं।

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