शिमला/शैल। कांग्रेस नेता रहे पूर्व मंत्री हर्ष महाजन अब भाजपा ने आकर स्टार प्रचारकों की सूची में भी शामिल हो गये हैं। हर्ष महाजन लम्बे समय से चुनावी राजनीति को अलविदा कह चुके हैं और भाजपा में आकर भी चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हर्ष महाजन को संघ भाजपा की विचारधारा की अब समझ आ गयी है और कांग्रेस भाजपा में आकलन करते हुये उन्हें भाजपा बेहतर लगी है। लेकिन भाजपा में शामिल होने पर उन्होंने वैचारिकता को लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है। केवल कांग्रेस के प्रदेश और केन्द्रिय नेतृत्व पर किसी दूसरे की बात न सुनने का आरोप लगाया है। लेकिन यह आरोप लगाते हुये उनका ध्यान इस तथ्य की ओर नहीं गया है की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो पिछले आठ वर्ष से देश को केवल अपने ही मन की बात सुनाते आये हैं। आठ वर्षों में कोई पत्रकार वार्ता तक संबोधित नहीं की है इसलिये भाजपा-कांग्रेस दोनों के शीर्ष नेतृत्व की तुलना करते हुये हर्ष महाजन का आरोप जमीन पर नहीं ठहर पाता है और इसलिये गले नहीं उतरता है।
क्योंकि कांग्रेस में आज हर्ष महाजन कार्यकारी अध्यक्ष थे और पूर्व में राज्य सहकारी बैंक के चेयरमैन रह चुके हैं। स्मरणीय है कि जब वह बैंक के अध्यक्ष थे तब बैंक में कर्मचारियों की भर्ती को लेकर एक बड़ा विवाद उठा था। भाजपा ने इसको अपने आरोपपत्र में प्रमुखता से उठाया था। जयराम की सरकार बनने के बाद विभागीय स्तर पर इसकी प्रारंभिक जांच करने के बाद इसमें बाकायदा एफ आई आर दर्ज करके मामले की जांच करने के आदेश जुलाई 2018 को विजिलैन्स को दिये गये थे। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की संस्तुति के बाद यह मामला विजिलैन्स को भेजा गया था। लेकिन आज तक इस पर कोई कारवाई नहीं हो पायी है। चर्चा है कि जब मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि कांग्रेस चुनाव लड़ने लायक ही नहीं रहेगी तो उस दौरान यह पड़ताल की जा रही थी कि कांग्रेस के किस-किस नेता को विजिलैन्स के माध्यम से साधा जा सकता है। उस पड़ताल में हर्ष महाजन का नाम सामने आने के बाद हर्ष भाजपा के हो गये यह सामने है।
यही नहीं हर्ष महाजन ने नवंबर 2016 में नोट बन्दी लागू होने के बाद 16 मई 2017 को एक गाड़ी खरीदी थी। लेकिन मई 2017 में खरीदी गई इस गाड़ी का पंजीकरण 16 मार्च को गाड़ी खरीदने से पहले ही हो गया। यूनाइटेड इन्श्योरेंस कंपनी से इसका इन्श्योरस 2 मार्च को ही हो गया। अभी मार्च 2023 तक इसका इन्श्योरेंस है यह दस्तावेज भाजपा के कई हलकों में इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। स्वभाविक है कि नोटबंदी के बाद बड़ी गाड़ी खरीदना और खरीद से पहले ही उसका पंजीकरण और इन्श्योरेंस करवा लेना हर किसी के बस की बात नहीं है। भाजपा ने शायद इन्हीं अनुभवों का लाभ लेने के लिये उन्हें अपने यहां सम्मानित किया है और वह भी साम दाम की नीति अपनाकर कांग्रेसियों को भाजपा में लाने का प्रयास कर रहे हैं।
क्या यह हार का पहला संकेत है
शिमला/शैल। नामांकन वापसी के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के बागी चुनाव मैदान में हैं और दोनों के लिये परेशानी का कारण बनेगे यह तय है। भाजपा प्रदेश में सत्ता में है और केन्द्र में भी उसी की सरकार है तथा प्रदेश में सत्ता में वापसी करके रिवाज बदलने का दावा कर रही है। इसलिये भाजपा की स्थिति का आकलन करना महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा त्रिदेवों और पन्ना प्रमुखों की नीव पर आधारित विश्व की सबसे बड़ी और अनुशासित पार्टी होने का दम भरती हैं। इसलिये आज इसके बागियों की संख्या कांग्रेस से तीन गुना फील्ड में होना उसके अनुशासन के दावों पर पहला गंभीर सवाल है। बागियों को मनाने के लिये राष्ट्रीय ंअध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर स्वयं फील्ड में उतरे थे लेकिन नड्डा बिलासपुर तथा जयराम मण्डी में ही बुरी तरह असफल रहे हैं। इस असफलता को चुनावी हार का पहला संकेत माना जा रहा है। इसलिये भाजपा का केन्द्रिय नेतृत्व पार्टी की स्थिति से बुरी तरह विचलित हो रहा है। शायद इसी कारण से नड्डा और जयराम को दिल्ली तलब किया गया था। केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने भी बड़े साफ शब्दों में कहा है कि मुख्यमंत्री कौन होगा इसका फैसला चुनाव परिणामों के बाद होगा। मुख्यमंत्री ने भी अपने कुछ विश्वसतों के साथ इस आशंका को साझा किया है। मुख्यमंत्री के अपने ही चुनाव क्षेत्र में जब कॉलेज और सड़क जनता के मुद्दे बन जाये तो तान्दी ने बनाया गया होटल सिराज क्षेत्र के विकास का प्रतीक नहीं बन पाता है। क्योंकि सरकार के इस निवेश का लाभ जनता को न मिलकर केवल क्लब महिन्द्रा को मिल रहा है।
पार्टी की यह स्थिति क्यों हो गयी इसको लेकर संघ में भी अब चिन्ता और चिन्तन चल रहा है। क्योंकि संघ के अपने चुनावी सर्वेक्षणों में भी भाजपा सरकार बनाने से बहुत दूर रह रही है। शायद इसीलिये सुरेश भारद्वाज और वीरेन्द्र कंवर जैसे मंत्रियों को चुनाव प्रचार में जाने के लिये अपने को अगला मुख्यमंत्री प्रचारित करना पड़ रहा है और विक्रम ठाकुर को बाबा राम रहीम के आशीर्वाद लेना पड़ रहा है। आज पार्टी जिस मुकाम पर आ पहुंची है वहां यह सवाल गंभीरता से उठ गया है कि नेतृत्व और कार्यकर्ता में संवाद की कमी क्यों रह गयी। इसी संवाद हीनता के कारण तो जयराम को उड़ने वाले मुख्यमंत्री की संज्ञा मिली है। अब यह खुलकर कहा जा रहा है की मुख्यमंत्री गोदी मीडिया की गोद से एक क्षण भी बाहर नहीं निकल पाये। सूचना और जनसंपर्क विभाग ने भी गोदी मीडिया के घेरे से मुख्यमंत्री को बाहर नहीं निकलने दिया। इसी का प्रमाण है कि चार वर्षों में विज्ञापनों पर आये सवालों का जवाब तक नहीं दिया गया। केवल कड़वा सच लिखने वालों को ही दण्डित करने की योजनाएं बनती रही। सरकार धूमल को राजनीति से बाहर करने के एजैण्डे पर ही चलती रही। जिस मुख्यमंत्री के फैसलों की पटकथा गोदी मीडिया पहले ही लिख देगा उसे न तो सरकार की पारदर्शिता माना जाता और न ही मीडिया की दूदर्शिता। जो मुख्यमंत्री अपने कार्यकाल के अन्तिम दिनों लोकसेवा आयोग पर लिये गये फैसले को अमलीजामा न पहना सके ? जिस लोकसेवा आयोग का सदस्य अपने को चुनावी उम्मीदवार प्रचारित करवाने से परहेज न करवाये और सरकार भी इस पर चुप्पी साधे रखे तो उस सरकार को लेकर आम आदमी में क्या संदेश जा रहा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। शायद सरकार का सारा ध्यान धनबल के सहारे कांग्रेस को दो फाड़ करने में लगा रहा। जब कांग्रेस नहीं टूटी तो अपने ही घर में बगावत का यह रूप देखने को मिल गया।
भाजपा में उभरी बगावत कांग्रेस का हाथियार बनी
शिमला/शैल। कांग्रेस ने हमीरपुर से पूर्व मंत्री रणजीत सिंह वर्मा के बेटे डॉक्टर पुष्पेन्द्र वर्मा को उम्मीदवार बनाने का फैसला लेकर सभी 68 विधानसभा क्षेत्रों से अपने उम्मीदवारों की अंतिम सूची जारी कर दी है। कांग्रेस में भी टिकट आवंटन को लेकर कुछ स्थानों पर रोष और विद्रोह उभरा है इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन भाजपा के मुकाबले यह नगण्य है। कांग्रेस में टिकटों को लेकर सबसे ज्यादा सुखविंदर सिंह का मिजाज बहुत कड़ा रहा है। क्योंकि संयोगवश सुखविंदर सुक्खु ही इस समय कांग्रेस में ऐसे नेता हैं जो छः वर्ष तक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं और इस नाते व्यवहारिक रूप से कार्यकर्ताओं और नेताओं को लेकर ज्यादा जानकारी रखते हैं। इसी कारण से उन्हें प्रचार कमेटी का अध्यक्ष भी बनाया गया है। कुछ लोग अभी से उन्हें मुख्यमंत्री के संभावित चेहरे के रूप में भी चर्चित करने लग पड़े हैं। जबकि मुख्यमंत्री का प्रश्न चुनाव परिणाम आने के बाद विधायकों की सर्व राय से हल होगा यह तय है। इस समय प्रतिभा वीरभद्र सिंह पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष हैं और पार्टी उम्मीदवार तय करने में उनकी सबसे बड़ी भूमिका रही है। स्व.वीरभद्र सिंह की राजनीतिक विरासत वह तभी संभाल रही हैं जब प्रदेश की राजनीति का सबसे अधिक व्यवहारिक ज्ञान उनके पास है। लेकिन बीते पांच वर्षों में पार्टी को सदन के भीतर जिस तरह से प्रभावी बनाये रखा है उसमें मुकेश अग्निहोत्री का योगदान सबसे अधिक रहा है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के साथ कितनी बार किस तरह के सीधे टकराव में आ चुके हैं यह पूरा प्रदेश जानता है। इस तरह कांग्रेस के मुख्यमंत्री बनने की क्षमता रखने वाले नेताओं की एक लंबी सूची है।
2014 से आज 2022 तक कांग्रेस जिस दौर से गुजरी है उसमें ईडी, आयकर और सीबीआई के डर से सैकड़ों नेता पार्टी छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके हैं। आज चुनाव घोषित होने के बाद भी दो विधायक पार्टी छोड़ भाजपा में चले गये। हर्ष महाजन और मनकोटिया जैसे लोग भाजपा में चले गये हैं। इन लोगों का कांग्रेस पर सबसे बड़ा आरोप परिवारवाद का होता था लेकिन अब जब हिमाचल में ही भाजपा ने परिवारवाद की नयी इबारत लिख दी है तो स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस छोड़ने के पीछे कोई वैचारिक कारण नहीं बल्कि कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ और डर प्रभावी रहे हैं। मनकोटिया ने जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ बाकायदा पत्रकार वार्ता करके हमला बोला था भाजपा ने उसी को दोबारा उम्मीदवार बनाकर मनकोटिया को अपरोक्ष में जवाब दे दिया है। लेकिन इस पीढ़ी के नेता अपने वैचारिक धरातल शायद अब भी तर्क की कसौटी पर परखने का प्रयास तक करने के लिए तैयार नहीं हैं। जो छद्म ताना-बाना 2014 में गुंधा गया था अब 2022 तक उसको परोस्ते परोस्ते उबकाई जैसी हालत हो गयी है। लगातार कमजोर होती अर्थव्यवस्था ने महंगाई और बेरोजगारी के जो जख्म आम आदमी को दिये हैं उससे अब हर आदमी ड्रोन से आलू धोने का ज्ञान परोसा जाना अपने को मूर्ख बनाने का प्रयास मान चुका है। इस परिदृश्य में आज प्रदेश में जो भी कांग्रेस का नेतृत्व और कार्यकर्ता बचा हुआ है वह सराहना का पात्र बन जाता है। क्योंकि यह सबने देखा है कि मुख्यमंत्री ने किस तर्ज में यह कहा था कि कांग्रेस को चुनाव लड़ने लायक ही नहीं रहने दिया जायेगा। जब नेता प्रतिपक्ष के साथ मंच का हादसा हुआ तब मुख्यमंत्री ने फोन पर जो कुशल क्षेम पूछने का शिष्टाचार निभाया उसकी गंभीरता को उसी क्षण ट्वीट करके हल्का भी बना दिया।
आज प्रदेश की राजनीति व्यवहारिकता के इस स्टेज पर आकर खड़ी हो गयी है की सत्ता के जिस मद में कल तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था उसे आज अपनों की ही बगावत ने पूरी तरह काफुर कर दिया है। आज भाजपा की बगावत ही कांग्रेस का एक बड़ा हथियार बन गयी है। क्योंकि आने वाले दिनों में सवाल तो सत्ता पक्ष से ही पूछे जायेंगे विपक्षी से यह सवाल नहीं पूछा जाएगा कि उसने आज तक सरकार के खिलाफ कोई भी आरोपपत्र जारी क्यों नहीं किया। कांग्रेस ने टिकट आवंटन में जिस सूझबूझ का परिचय दिया है वहीं भाजपा की कमजोरी सिद्ध हो गयी है। क्योंकि यह माना जा रहा है कि शायद हर्ष महाजन कांग्रेस के हर उम्मीदवार के खिलाफ विद्रोही उम्मीदवार खड़ा करने के रणनीति पर काम कर रहे हैं। क्योंकि हर्ष महाजन लम्बे समय तक कांग्रेस में रहे हैं और स्व. वीरभद्र के विश्वासपात्र रहे हैं। जब वह पहली बार ही मंत्री बनकर विवादित हो गये थे और पोस्टर तक लगने की नौबत आ गयी थी उसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति से किनारा कर लिया था। आज भाजपा में शामिल होने के बाद भी हर्ष महाजन ने चुनाव नहीं लड़ा है। लेकिन राजनीति के माध्यम से व्यापारिक हितों की रक्षा कैसे की जाती है और हितों को कैसे बढ़ाया जाता है वह बहुत अच्छी तरह जानते हैं। वीरभद्र जब केंद्रीय मंत्री थे तब स्क्रैप के कारोबार में उन्होंने अपने इस अनुभव का सफल परिचय दिया। यदि आज भाजपा में आकर वह कांग्रेस को अन्दर से नुकसान पहुंचाने में सफल हो पाते हैं तभी उनकी वहां पर स्वीकार्यता बन पायेगी। कांग्रेस ने इस संभावित नुकसान की आशंका को टिकट आवंटन में ही समय लगाकर काफी कम कर लिया है।
कई जिलों में खाता तक खोलना हो सकता है कठिन
नड्डा जयराम के गृह जिलों में शान्त नहीं हो पायी बगावत
धूमल परिवार को हाशिये पर धकेलना पड़ सकता है महंगा
शिमला/शैल। टिकट आवंटन के बाद जिस स्तर पर भाजपा में रोष और बगावत के स्वर उभरे हैं उससे यह स्पष्ट हो गया है की सत्ता में वापसी करने और रिवाज बदलने के जितने भी दावे किये जा रहे थे वह सब न केवल हकीकत से कोसों दूर हो गये हैं बल्कि पार्टी को दहाई का आंकड़ा लांघने के भी संकट पर खड़ा कर दिया है। क्योंकि टिकट आवंटन में पार्टी के अब तक के घोषित सारे बड़े सिद्धांतों की आहुति दे दी गयी है। जिस परिवारवाद को कांग्रेस के खिलाफ बड़े हथियार के रूप में अब तक इस्तेमाल किया जा रहा था और उसी के आधार पर उपचुनाव में जिस चेतन बरागटा का टिकट काटा गया था अब उसी को टिकट देने की मजबूरी हो जाना इसका प्रमाण है। जल शक्ति मंत्री महेन्द्र सिंह की जगह उनके बेटे को टिकट देना पड़ा है। ऐसे आधा दर्जन मामले हैं जहां पर परिवारवाद को प्राथमिकता दी गयी है। दो मंत्रियों सुरेश भारद्वाज और राकेश पठानिया के चुनाव क्षेत्र बदले गये। दोनों मंत्रियों के समर्थक इस पर रोष में हैं। सुरेश भारद्वाज के समर्थकों ने तो शिमला से उम्मीदवार बनाये गये संजय सूद के खिलाफ तो राम मंदिर ट्रस्ट से मुख्यमंत्री कोष में पैसा देने के मामले को सवाल बना कर उछाल दिया है। जबकि अब तक यह मामला राम मंदिर ट्रस्ट की चारदीवारी से बाहर नहीं निकला था। लेकिन अब यह चुनावी मुद्दा बना दिया गया है। ऐसे करीब डेढ़ दर्जन चुनाव क्षेत्र हैं जहां अपनों की बगावत व्यक्तिगत स्तर की अदावत तक पहुंच चुकी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के अपने जिला बिलासपुर और मण्डी में बगावत का जो स्तर सामने आया है उसने दोनों नेताओं की व्यक्तिगत स्वीकार्यता पर ही गंभीर प्रश्न खड़े कर दिये हैं। आज ही जो स्थिति बन चुकी है उसमें प्रदेश के आधे जिलों में तो पार्टी का खाता तक खुलने की संभावनाएं कठिन हो गयी हैं। इस बगावत को शान्त करने के लिये कई जगह आंसुओं का सहारा लेना का प्रयास किया गया है तो कई जगह इन आंसुओं ने आग में घी का काम किया है। 29 तारीख तक यह बगावत कितनी शान्त हो पाती है यह तो तभी पता चलेगा। लेकिन यह तय है कि इस बगावत में अभी तक जो कुछ बाहर आ गया है वही इस घर को जलाकर राख करने के लिये काफी है। क्योंकि कमान से निकले हुये तीर वापस नहीं आते हैं।
जिस स्तर तक यह बगावत पहुंच चुकी है शायद उसका पूर्वानुमान जयराम और नड्डा को या तो नहीं रहा है या फिर एक सोची-समझी योजना के तहत यह किया गया है। क्योंकि हिमाचल में सत्ता में वापसी कोई भी पूर्व मुख्यमंत्री नहीं कर पाया है। मीडिया मंचों से सौ-सौ सर्वश्रेष्ठता के तमगे लेकर भी रिवाज नहीं बदल पाया है। क्योंकि सरकार बनने के बाद सत्ता में वापसी सरकार के कामकाज के आधार पर होती है। मीडिया के प्रमाण पत्रों पर नहीं। जयराम सरकार में तो मुख्यमंत्री का पद दायित्व से अधिक लग्जरी का माध्यम प्रचारित होकर रह गया। जनता को भले ही इसकी जानकारी न रही हो लेकिन पार्टी के बड़े पदाधिकारियों और विधायकों को अवश्य रही है। बल्कि बहुत सारे तो इस जानकारी के आधार पर टिकट पाने और बचाने में सफल हुये हैं। इस सरकार के नाम सबसे अधिक कर्ज लेने का तमगा लगना इसी लग्जरी भाव का परिणाम है। सरकार की पांच वर्ष की कारगुजारी क्या रही है उस पर तो चर्चाएं चुनाव प्रचार के दौरान आयेंगी। लेकिन अभी तक आपस में स्कोर सैटल करने में जो शीत युद्ध चल रहा था वह अब टिकट आवंटन में धूमल परिवार को सफलतापूर्वक हाशिये पर धकेल दिये जाने से एक मोड़ तक पहुंचा दिया गया है। क्योंकि जब यह सामने आया कि 2017 के चुनाव में धूमल और उनके समर्थकों को योजनाबद्ध तरीके से बाहर किया गया था तब यह चर्चा उठी कि धूमल को अपना राजनीतिक मान सम्मान बहाल करने के लिये एक बार चुनाव में आना ही चाहिये। धूमल के भी इस आशय के कुछ बयान आये। राज्यसभा सांसद इन्दु गोस्वामी ने सुजानपुर में इस मन्तव्य को सार्वजनिक भी कर दिया। पार्टी कार्यकर्ताओं में यह संदेश भी चला गया लेकिन टिकट आवंटन में धूमल परिवार को पूरे व्यवहारिक रूप से हाशिये पर धकेल दिये जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी की हार की चिंता से धूमल को राजनीति से बाहर करना इस समय नेतृत्व की प्राथमिकता बन गयी थी जिसमें नड्डा जयराम सफल रहे हैं।
केवल जस्टिस बारोवालिया ही बन पाये लोकायुक्त
शिमला/शैल। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आंदोलन के माध्यम से बड़ा आन्दोलन खड़ा करके केन्द्र की सत्ता पर काबिज हुई भाजपा शासित अधिकांश प्रदेशों में लम्बे समय तक लोकायुक्त के पद नहीं भर पायी है। हिमाचल भी ऐसे ही राज्यों में से एक है। यहां पर लोकायुक्त का पद भरने की कवायद उस दिन की गयी जब चुनाव आयोग ने विधानसभा की चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया। प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चन्द्रभूषण बारोवालिया को इस पद पर नियुक्त किया गया है। जब उनका न्यायमूर्ति के पद से त्यागपत्र स्वीकार हो जायेगा तब वह बतौर लोकायुक्त शपथ ग्रहण करेंगे। जस्टिस बारोवालिया बतौर न्यायाधीश मार्च 2023 में सेवानिवृत्त होने वाले थे।
उधर जयराम सरकार ने पिछले तीन महीने से भी समय से खाली पडी मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी पर किसी को नहीं बिठाया। शुरू में इस कुर्सी पर मौजूदा मुख्य सचिव आर डी धीमान को बिठाने की अटकलें चली थी। लेकिन अचानक वह मुख्य सचिव बन गये। फिर लगा की जिन राम सुभग सिंह को मुख्य सचिव के पद से हटा कर धीमान को मुख्य सचिव बनाया गया है, उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त बनाया जायेगा। लेकिन जयराम सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। सचिवालय से जुडे सूत्रों के मुताबिक धीमान इस कुर्सी पर बैठने के चाहवान थे। वह दिसम्बर में मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत हो जायेंगे। लेकिन जयराम सरकार के सामने नया मुख्यसचिव किसे बनाया जाये यह आडे आ गया। पहले ही धीमान से तीन-तीन वरिष्ठ अधिकारी जयराम सरकार से खार खाये हुये हैं। राम सुभाग सिंह, निशा सिंह और संजय गुप्ता जो धीमान से वरिष्ठ थे को सरकार ने सलाहकार बनाया हुआ है।
हालांकि जयराम चाहते थे 1990 बैच के आइएएस अधिकारी प्रबोध सक्सेना का मुख्य सचिव बना दिया जाये लेकिन ऐसा नहीं किया जा सका और मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी खाली रह गयी। अब संभवत अगली सरकार ही अपने किसी चहेते अधिकारी को इस पद पर बिठायेगी।
उधर राज्य खाद्य आयोग के अध्यक्ष का पद भी खाली ही रह गया है। जयराम सरकार इस पद पर भी किसी की नियुक्ति नहीं कर पायी। अध्यक्ष के पद का कार्यभार आयोग के सदस्य रमेश गंगोत्रा देख रहे है। पिछले दिनों उनके आयोग के सचिव पर एफआइआर दर्ज करा दी थी। उसके बाद आयोग के सचिव ने भी उन पर अदालत के जरिए एफआइआर दर्ज करा रखी हैै। दोनों ने एक दूसरे पर जातिसूचक शब्द बोलने और मारपीट के इल्जाम लगा रखे हैं।