Monday, 02 March 2026
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कितना सफल रहेगा आप का सुशान्त प्रयोग

शिमला/शैल। आम आदमी पार्टी की हिमाचल इकाई में कांगड़ा के पूर्व सांसद और धूमल सरकार में राजस्व मन्त्री रहे डॉ. राजन सुशान्त फिर से शामिल हो गये हैं। स्मरणीय है डॉ. सुशान्त 2014 में भी आप में थे और इसके टिकट पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं। लेकिन आगे चलकर स्थितियां बदली और सुशान्त ने आप से किनारा कर लिया। 2017 का विधानसभा चुनाव भी लड़ा बल्कि उसके बाद आया उप चुनाव भी लड़ा। इसी बीच अपना राजनीतिक दल भी पंजीकृत करवा लिया। ओ.पी.एस. को लेकर सरकार के खिलाफ संघर्ष भी छेड़ रखा है। ‘‘हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी’’ अपना राजनीतिक दल बनाकर प्रदेश को इस के बैनर तले चुनाव लड़ने का भरोसा भी दे चुके हैं। इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि वह कारण सार्वजनिक हो जिनके चलते आप को छोड़ने की नौबत आयी थी और आज फिर से उसी में वापस जाने की बाध्यता खड़ी हुई। राजनीति करना और राजनीतिक दल बनाना या किसी में शामिल होना या उससे बाहर जाना सार्वजनिक जीवन का हिस्सा होते हैं। ऐसे में यह सब जानना आम आदमी का हक हो जाता है। फिर आम आदमी पार्टी बीते आठ वर्षों में हिमाचल में नेतृत्व को लेकर कई प्रयोग कर चुकी है। बल्कि इन्हीं कारणों से आप को भाजपा की बी टीम होने का तमगा भी मिल चुका है। क्योंकि जिस दिल्ली में विधानसभा पर तो उसका कब्जा लगातार पुख्ता होता गया परन्तु उसी दिल्ली में वह लोकसभा में दोनो बार शून्य रही। बल्कि नगर निगम भी उसके हाथ नहीं लग पाये। जिस दिल्ली मॉडल को देशभर में भुनाने के प्रयास हो रहे हैं आज उसी की व्यवहारिकता पर पंजाब में गंभीर सवाल उठने लग पड़े हैं और आप की ओर से उन पर कोई जवाब नहीं आ रहा है। यही नहीं आज मुफ्ती की जो गारंटीयां आप घोषित करती जा रही है कांग्रेस और भाजपा ने तो उनकी संख्या भी कहीं अधिक बढ़ा दी है। ऐसे में जो मतदाता इन गारंटीयों के लिए आप पर भरोसा जताएगा वह इन्ही के लिये कांग्रेस और भाजपा पर अविश्वास किस आधार पर कर पायेगा। इस समय आप के नेता दिल्ली से थोड़ी देर के लिये हिमाचल आकर गारंटीयां घोषित करके वापस चले जाते हैं। लेकिन प्रदेश का नेतृत्व बाद में उनकी आर्थिकी लोगों को समझा नहीं पाता है। बल्कि यही संदेश जाता रहा है कि हिमाचल को भी दिल्ली से ही संचालित करने की योजना चल रही है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि इस स्टेज पर आप का सुशान्त प्रयोग किसके पक्ष में कितना सफल रहता है।

मुख्यमंत्री का चेहरा कौन इस सवाल से कांग्रेस की एकजुटता पर होगा प्रहार

शिमला/शैल। हिमाचल कांग्रेस ने वर्तमान विधायकों अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले पदाधिकारियों और पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष को टिकट देने की घोषणा करके भाजपा तथा आप पर जो पहल हासिल कर ली थी उससे जनता में यह सन्देश गया था कि पार्टी पूरी इमानदारी से एकजुट होकर वर्तमान सरकार से पीछा छुड़ाने के लिए कार्यरत है। लेकिन एकजुटता का यह सन्देश उस समय ध्वस्त हो गया था जब पार्टी की वरिष्ठ नेता पूर्व सांसद विपल्व ठाकुर का यह ब्यान आ गया कि अभी किसी का भी टिकट फाइनल नहीं हुआ है और इस ब्यान का कोई खण्डन भी नहीं आया। इससे पहले आनन्द शर्मा चुनाव संचालन कमेटी से त्यागपत्र देकर पार्टी की एकजुटता पर प्रश्नचिन्ह लगा चुके हैं। अब प्रदेश के कई चुनाव क्षेत्रों से एक दूसरे का विरोध होने के समाचार लगातार आने शुरू हो गये हैं। इसमें अब मण्डी से आश्रय शर्मा का भी नाम जुड़ने से स्थिति और जटिल हो गयी है। आश्रय ने भी प्रदेश नेतृत्व पर अनदेखी के आरोप लगाते हुए अपना त्यागपत्र दिल्ली भेज दिया है। यही नहीं शिमला तक में कई टिकटार्थीयों ने यह ऐलान कर दिया है कि यदि उन्हें टिकट न मिला तो वह निर्दलीय होकर चुनाव लड़ेंगे। कुछ ने तो चुनावी पोस्टर तक शहर में चिपका दिये हैं। लेकिन पार्टी नेतृत्व ऐसे लोगों के ऐसे कृत्यों के बारे में खामोश चला हुआ है और यही नेतृत्व की कमजोरी बनती जा रही है। इस समय कांग्रेस का मुकाबला सिर्फ जयराम की सरकार और सुरेश कश्यप के संगठन से ही नहीं बल्कि दिल्ली बैठे नरेन्द्र मोदी तथा अमित शाह की नीतियों और भाषण बाजी से भी होगा यह मानकर चलना होगा। इसके लिये अभी तक कांग्रेस की कोई बड़ी तैयारी सामने नहीं आ रही है। क्योंकि नरेन्द्र मोदी की जुमलेबाजी के प्रभाव से ही 2014 में स्व. वीरभद्र सिंह के मुख्यमंत्री होते हुये भाजपा प्रदेश की चारों लोकसभा सीटें जीत कर ले गयी थी तथा 2019 में इस जीत के अन्तर को और बढ़ा दिया था। वीरभद्र और सुखराम का सहयोग भी इसमें सेंध नहीं लगा पाया था। यह ठीक है कि उसके बाद इसी भाजपा और जयराम सरकार से कांग्रेस नेे चारों उपचुनाव छीन लिये थे। लेकिन उस जीत में प्रदेश से ज्यादा राष्ट्रीय स्थितियों का बड़ा योगदान था और आज की तरह अपने घर में ऐसे विरोध के स्वर नहीं के बराबर थे। आज बहुत सारा विरोध प्रायोजित भी होगा और इसको पहचानना पार्टी की प्राथमिकता होनी चाहिये। इस समय राष्ट्रीय परिदृश्य जिस तरह के दौर से गुजर रहा है उससे राजनीति के सारे मानक बदल गये हैं। संविधान को बदलने के अपरोक्ष में प्रयास शुरू हो गये हैं। आर्थिकी लगातार कमजोर होती जा रही है और इसके कारण महंगाई तथा बेरोजगारी नियन्त्रण से बाहर जा चुकी है। लेकिन इसे विभिन्न योजनाओं के लाभार्थीयों की हर जगह परेड करवाकर जन चर्चा से बाहर रखने का प्रयास किया जा रहा है। यह लाभार्थी खड़ा करने के लिये आम आदमी को किस तरह कर्ज के गर्त में धकेल दिया गया है इसे चर्चा में नहीं आने दिया जा रहा है। इस समय इन योजनाओं का असली चेहरा और कर्ज की वास्तविकता आम आदमी के सामने रखने की आवश्यकता है लेकिन इस दिशा में कांग्रेस के प्रयास नहीं के बराबर हैं। इसी कारण से आज भी कुछ लोग प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व को कोस कर कांग्रेस छोड़ने के बहाने तलाश रहे हैं। ऐसे लोगों को चिन्हित करके उनके प्रति कड़ा रुख अपनाने की आवश्यकता है। इस समय जो लोग टिकट न मिलने की सूरत में बगावती होकर चुनाव लड़ने की घोषणाएं कर रहे हैं उन्हें समय रहते बाहर का रास्ता दिखाने की आवश्यकता है। आज जो लोग मण्डी में वहां की सांसद के दखल का ही विरोध करने पर उतर आये उन्हें संगठन का शुभचिंतक किस गणित से माना जा सकता है। इस समय प्रदेश नेतृत्व को सरकार के प्रति जितना आक्रामक होना चाहिये उसमें अभी बहुत कमी है। संगठन के बड़े चेहरों को सामूहिक एकजुटता का सन्देश देना सबसे बड़ी आवश्यकता है। क्योंकि सता पक्ष इस एकजुटता को मुख्यमंत्री का चेहरा कौन के प्रश्न से उलझाने का प्रयास करेगी।

जैन की शिकायत पर ड्रग कन्ट्रोलर जनरल का प्रदेश के स्वस्थ सचिव को पत्र

शिमला/शैल। प्रदेश के दवा नियन्त्रक मरवाह के खिलाफ एक एम.सी. जैन लम्बे समय से राज्य सरकार से लेकर प्रधानमंत्री तक को गंभीर शिकायतें भेजते आ रहे हैं। प्रधानमन्त्री कार्यालय से यह शिकायतें मुख्यमंत्री कार्यालय तक आगामी कारवाई के निर्देशों सहित आ चुकी हैं। सूत्रों के मुताबिक मुख्य सचिव कार्यालय से भी यह शिकायतें आगामी कारवाई के लिये आगे भेजी जा चुकी हैं। लेकिन संयोगवश इन शिकायतों पर आज तक कोई कारवाई नहीं हो पायी है।
अब भारत सरकार के ड्रगा कन्ट्रोलर जनरल ने इसका संज्ञान लेते हुए प्रदेश सरकार के स्वास्थ्य सचिव को कारवाई के लिए सीधे पत्र भेजा है। स्मरणीय है कि एम.सी. जैन ने छः फार्मा कंपनियों को सीधे नाम से इंगित करते हुए 12-08-2020 के अपने पत्र में बहुत ही गंभीर आरोप लगाये हैं। बल्कि एक उद्योग के यहां से वह सामान चोरी होने का आरोप है जिसे शायद एक्साईज विभाग एक छापे में जब्त कर चुका था। कुछ उद्योगों के खिलाफ दूसरे राज्यों में तो कड़ी कारवाई होने की सूचना भी जैन की शिकायत में रही है। लेकिन इस सबके बावजूद राज्य सरकार द्वारा अब तक कोई कारवाई न किया जाना कई सवाल खड़े करता है। इस परिदृश्य में ड्रग कन्ट्रोलर जनरल का यह पत्र महत्वपूर्ण हो जाता है



आखिर ड्रग कंट्रोलर के खिलाफ जयराम सरकार कारवाई क्यों नहीं कर पा रही है

शिमला/शैल। जयराम सरकार का स्वास्थ्य विभाग पहले दिन से ही विवादों में चल रहा है। जब किसी बेनाम कार्यकर्ता ने पूर्व मुख्यमंत्री शान्ता कुमार के नाम एक खुला पत्र लिखा था। यही पत्र आगे चलकर पूर्व मन्त्री रविन्द्र रवि के खिलाफ मामला दर्ज करने का कारण बना। इसी प्रकरण में विपिन परमार को स्वास्थ्य मंत्री से हटाकर विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। राजीव बिन्दल विधानसभा अध्यक्ष पद से हटाकर पार्टी अध्यक्ष बनाये गये। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के विवादों ने बिन्दल की पार्टी अध्यक्षता भी छीन ली और तत्कालीन स्वास्थ्य निदेशक को जेल तक पहुंचा दिया। स्वास्थ्य विभाग की सप्लाईयों को लेकर भी कुछ मामले बने हैं सचिवालय की ब्रांच तक इस लपेट में आ चुकी है। जिस विभाग को लेकर इतना कुछ पूर्व में घट चुका हो उसके बारे में हवा में भी अगर कहीं कोई कानाफूसी चल रही हो तो उसे भी बहुत गंभीरता से लिया जायेगा यह स्वभाविक है। हिमाचल देश का एक बड़ा फार्मा उद्योग केन्द्र है। यहां पर बनने वाली दवाइयों की सप्लाई भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों तक में होती है दवाइयों के निर्माण और उसकी गुणवत्ता की सुनिश्चितता बनाये रखने की जिम्मेदारी सरकार के दवा नियंत्रक की होती है।
लेकिन हिमाचल में बनने वाली दवाइयों के सैंपल फेल होते रहते है। विधानसभा पटल तक यह मामले गूंज चुके हैं। सरकार ऐसी दवा निर्माता कंपनियों की सूची तक सदन में रख चुकी है। लेकिन इन कंपनियों के खिलाफ शो कॉज नोटिस जारी होने से ज्यादा कारवाई नहीं हो पायी है। विपक्ष भी सदन में प्रश्न पूछने तक ही अपनी भूमिका केन्द्रित रखने से आगे नहीं बढ़ा है। इससे जनता में स्वभाविक रूप से यह सवाल उठ रहे हैं कि प्रदेश का फार्मा उद्योग राजनीतिक दलों के लिये चुनावी चन्दे का कोई बड़ा साधन तो नहीं है। क्योंकि प्रदेश के दवा नियंत्रक मरवाह के खिलाफ 500 करोड़ की संपत्ति होने के आरोप एक एम.सी. जैन लम्बे अरसे से लगाते आ रहे हैं। मरवाह के खिलाफ जांच की मांग प्रधानमंत्री से भी कर चुके हैं। जैन के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय भी सरकार को जांच के निर्देश दे चुका है। लेकिन मुख्यमंत्री का सचिवालय प्रधानमन्त्री के निर्देशों के बावजूद इस पर कारवाई करने में क्यों असमर्थ हो रहा है यह लगातार रहस्य बनता जा रहा है। अब 14-08-2022 को पुनः जैन ने प्रधानमंत्री को शिकायत भेजी है जो पाठकों के सामने यथास्थिति रखी जा रही है ताकि पाठक स्वयं इसकी गंभीरता का अनुमान लगा सकें।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

भाजपा की चुनाव प्रबन्धन कमेटियों से सांसद किशन कपूर और इन्दु गोस्वामी के नाम गायब

शिमला/शैल। आने वाले विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत भाजपा ने सत्रह कमेटीयों का गठन किया है। इन कमेटियों में प्रदेश के सारे वरिष्ठ नेताओं को जगह दी गयी है। चुनाव दृष्टि पत्र समिति के संयोजक राज्यसभा सांसद प्रो. डॉक्टर सिकन्दर पूर्व कुलपति हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय को बनाया गया है। इसमें मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल, शांता कुमार, केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के अतिरिक्त जयराम मन्त्रीमण्डल के आधा दर्जन मन्त्रीयों सहित कुछ पूर्व आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को भी शामिल किया गया है। इन कमेटीयों में भाजपा के सभी वरिष्ठ सदस्यों को नामित किया गया है। लेकिन इन स़त्रह कमेटीयों से किसी एक में भी सांसद किशन कपूर और इंदु गोस्वामी का नाम शामिल नहीं है। वैसे तो सांसद सुरेश कश्यप का नाम भी इन कमेटीयों में नही है लेकिन कश्यप क्योंकि पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष है इसलिए वह स्वतः ही सभी कमेटियों के सदस्य हो जाते हैं। बल्कि वह सभी कमेयटीयों की रिपोर्ट तलब कर सकते हैं।
परन्तु इन कमेटीयों में से किशन कपूर और इन्दु गोस्वामी के नाम गायब होना पार्टी के भीतर बाहर चर्चा का विषय बने हुए हैं। दोनों कांगड़ा से ताल्लुक रखते हैं और कांगड़ा में पार्टी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं मानी जा रही है। अब जब कांग्रेस विधायक एवं कार्यकारी अध्यक्ष रहे पवन काजल भाजपा में शामिल हुए तो कांगड़ा भाजपा के उत्साहित होने और काजल का स्वागत करने की बजाये एक तरह के रोष की स्थिति पैदा होना पार्टी हकीकत ब्यान करता है। बल्कि एक समय किश्न कपूर सेे मिलने जब कुछ कार्यकर्ता आ गये थे और उनके आने को पार्टी विरोधी गतिविधि करार देकर कुछ नेताओं ने कपूर की शिकायत तक कर दी थी। आज कपूर का नाम कमेटीयों में न आने से यह पुराने प्रकरण स्वतः ही चर्चित हो उठे हैं।
इसी तर्ज पर इन्दु गोस्वामी ने जब महिला मोर्चा द्वारा आपेक्षित महिला सम्मान सम्मेलन में धूमल को ज्यादा से ज्यादा मतों से जीताने की अपील की तो इस अपील को भी कुछ हल्कों में सहजता से नहीं लिया गया है। बल्कि वह सारे प्रकरण पुनः ताजा हो गये है जब इन्दु गोस्वामी ने अपने पदों से त्यागपत्र तक दे दिया था। यह त्यागपत्र देने के बाद ही वह राज्यसभा सांसद बनी है। नेतृत्व परिवर्तन की परिस्थिति में उनका नाम भी विकल्प के रूप में चर्चा में रहा है। इस परिदृश्य में आज कांगड़ा के इन दोनों सांसदों का नाम किसी भी कमेटी में न होना पार्टी के अन्दर की कहानी ब्यान कर देता है।

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