Monday, 02 March 2026
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सरकार की राजनीतिक सेहत पर भारी पड़ सकता है धारा 118 में किया गया संशोधन

उच्च न्यायालय से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक दो वर्ष की समय सीमा को जायज ठहरा चुके हैं।
जब सरकार यह संशोधन ला रही थी तब उसके पास यह जानकारी कैसे नहीं थी कि कितने अधिकारियों ने 118 के तहत खरीद की अनुमति मांगी है।
ऐसे कितने और किस-किस के मामले हैं जो दो वर्षों में जमीन को उपयोग में नहीं ला पाये हैं।

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने अपने कार्यकाल के विधानसभा के अंतिम सत्र के अंतिम दिन नौ विधेयक पारित किये हैं। यह विधेयक राज्यपाल की स्वीकृति के बाद अधिसूचित होकर कानून की शक्ल लेंगे और उसके बाद जनता के व्यवहार में आकर उसकी प्रतिक्रियाओं का आधार बनेंगे। यह सब इस सरकार के बचे हुए कार्यकाल में संभव नहीं होगा। स्वभाविक है कि यह विधेयक पारित करवाकर चुनावी लाभ लेना सरकार का सबसे बड़ा मकसद रहेगा। इन विधेयकों की यदि प्रदेश की जनता को आवश्यकता थी तो इन्हें विधानसभा के पहले सत्र में ही क्यों नहीं लाया गया? क्या इनकी जन उपादेयता समझने में ही सरकार को 5 वर्ष लग गये? यह सवाल आने वाले दिनों में चर्चा का विषय बनेंगे यह तय है। सदन में चर्चा के दौरान विपक्ष की ओर से भी कोई बड़े सवाल इस संद्धर्भ में सामने नहीं आये हैं। इन नौ विधेयकों में एक विधेयक के माध्यम से भू-अधिनियम की धारा 118 में भी संशोधन किया गया है। स्मरणीय है कि धारा 118 के उपयोग/दुरुपयोग को लेकर प्रदेश की सरकारों पर हिमाचल ऑन सेल के आरोप लगते आये हैं। इन आरोपों को लेकर कई जांच आयोग भी बैठ चुके हैं। अभी जब सरकार यह संशोधन ला रही थी तभी इसी सत्र में एक सवाल के माध्यम से सरकार से यह पूछा गया था कि उसने कितने आईएएस/ आईपीएस /एच ए एस अधिकारियों को सेब के बगीचे खरीदने की अनुमति दी है? सरकार ने इन्हें भू-राजस्व कानून की धारा 118 के प्रावधानों से छूट प्रदान की है। सरकार ने इन प्रश्नों के उत्तर में मुकेश अग्निहोत्री को बताया है कि अभी सूचना एकत्रित की जा रही है। जब सरकार धारा 118 में संशोधन प्रस्तावित कर रही थी तभी 118 से जुड़े प्रश्न पर सूचना एकत्रित किये जाने का उत्तर अपने में ही कई सवालों को जन्म दे जाता है। धारा 118 में प्रावधान है कि कोई भी गैर कृषक हिमाचल में सरकार से अनुमति लेकर गैर कृषि उद्देश्य के लिये जमीन खरीद सकता है। ऐसी अनुमति से खरीदी गयी जमीन को खरीद उद्देश्य के लिये दो वर्ष के भीतर उपयोग में लाना होगा। इस समय सीमा को सरकार की अनुमति से एक वर्ष और बढ़ाने का प्रावधान है। अब इसमें संशोधन करके तीन की बजाय पांच वर्ष तक कर दिया गया है। इसके लिये तर्क दिया गया है कि दो वर्ष के समय में प्राय व्यक्ति उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाता है जिसके लिये उसने जमीन खरीदी होती है। हिमाचल पहाड़ी राज्य होने के कारण यहां के लोगों के पास काश्तकारी बड़ी छोटी छोटी है। जब 1953 में बड़ी जमींदारी खत्म किये जाने का अधिनियम आया था और बड़े जमींदार की परिभाषा में वही लोग आये थे जो सौ रूपये या उससे अधिक का लगान देते थे। उस समय बड़े जमीदारों राज परिवारों के अतिरिक्त कुछ अन्य परिवार आये थे। इस अधिनियम के बाद 1972 में लैण्ड सीलिंग एक्ट आ गया था। इसमें काश्त की अधिकतम सीमा 161 बीघे कर दी गयी। फिर 1974 में भू-राजस्व अधिनियम आ गया इसमें गैर कृषकों के लिये भूमि खरीद पर यह बन्दिश लगा दी गयी कि वह सरकार की पूर्व अनुमति के बिना ऐसा नहीं कर सकते। इसमें दो वर्ष की सीमा लगायी गयी थी। इस प्रावधान को 1975 में ही चुनौती दे दी गयी थी। बल्कि कई बार ऐसा हुआ है लेकिन उच्च न्यायालय से लेकर सर्वाेच्च न्यायालय तक ने इस प्रावधान और दो-वर्ष की समय सीमा को जायज ठहराया है। 1995 से लेकर 2010 तक आश्य की आयी छः याचिकाओं पर 1 अक्तूबर 2013 को प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति कुलदीप सिंह की खण्डपीठ ने विस्तृत फैसला देते हुए दो वर्ष की मूल समय सीमा और उसके बाद एक वर्ष के विस्तार को पूरी तरह जायज ठहराते हुये सभी छः याचिकाओं को खारिज कर दिया था। उच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि The act is of agrarian and reform and purpose of the act is to check  accumulation of property in the hands of few moneyed people. The provision has been made in the act for transfer of land in favour of genuine non- agriculturists with the  permission of the State Government who want to use the land of specific purpose. one of the test of genuineness of transfer in favour of non-agriculturist with the permission of the state government is that the land is used by the non-agriculturist/purchaser immediately after its purchase for the purpose it has been purchased by him. Such purchaser before purchase of land with the permission of Government is expected to plan his project knowing fully time within which land is to be put to use for which it has been purchase. The initial period fixed for using the land in extendable as provided in the act. In the   circumstances, the stipulation of two years initially with extension of one year to use the land after purchase by non-agriculturist for the purpose for which it has been purchased cannot be said to be arbitrary. Similarly the non-agriculturist after purchase cannot be allowed to divert the purpose for which he has purchased the land without the permission of the State Government. These conditions are necessary to achieve the object of the act. On the basis of individual difficulty in a given case it cannot be said that third proviso to sub-section 2 of section 118 is arbitrary.  आज जयराम सरकार को अदालत के फैसले को पलटने की आवश्यकता क्यों पड़ी और ऐसे कितने मामले सरकार के पास लंबित है जो तीन वर्षों में भी खरीदी जमीन को उपयोग में नहीं ला पाये हैं। ऐसे कितने लोगों के खिलाफ इसी अधिनियम के प्रावधान के तहत कारवाई की अनुशंसा प्रस्तावित थी। अब इन सारे सवालों पर चर्चायें उठेगी ऐसा माना जा रहा है। धारा 118 में किया गया संशोधन सरकार की राजनीतिक सेहत पर कहीं भारी न पड़ जाये यह आशंका बराबर बनी हुई है।

जब अंतिम सत्र में भी सूचना एकत्रित करने का ही जवाब आये तो सत्ता में वापसी का दावा....?

पांच वर्ष में लोकायुक्त न लगा पाना भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेन्स है क्या?

शिमला/शैल। जयराम सरकार के कार्यकाल का अंतिम विधानसभा सत्र समाप्त हो गया है। इस सत्र की समाप्ति पर मीडिया को संबोधित करते हुये मुख्यमंत्री ने दावा किया है कि प्रदेश की जनता इस बार ‘‘एक बार भाजपा और एक बार कांग्रेस’’ के चलन को समाप्त कर भाजपा को पुनः सत्ता में लायेगी। एक राजनेता और वर्तमान मुख्यमन्त्री होने के नाते ऐसा दावा करना उनका न केवल अधिकार ही है बल्कि कर्तव्य भी है। क्योंकि यदि एक वर्तमान मुख्यमंत्री ही ऐसा दावा नहीं करेगा तो फिर पार्टी किस मनोबल के साथ चुनाव में जायेगी। क्योंकि इस बार जनता पार्टी के वायदों पर नहीं बल्कि पांच वर्षों की कारगुजारी पर वोट देगी। सरकार की कारगुजारी का प्रमाण पत्र जितना जनता होती है उतना ही बड़ा प्रमाण पत्र विधानसभा में विधायकों द्वारा सरकार से पूछे गये सवाल पर सरकार द्वारा सदन में दिये गये जवाब होते हैं। इस परिपेक्ष में विधानसभा का अंतिम सत्र बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसी सत्र में विधायकों का तीखापन और उसी अनुपात में सरकार की तैयारी उसके जवाबों से सामने आती है। जब सरकार सदन में किसी सवाल का जवाब यह कहकर टाल जाती है कि अभी सूचना एकत्रित की जा रही है तो उससे पता चलता है कि पूछे गये सवाल के जवाब में कुछ ठोस कहने लायक सरकार के पास नहीं है। बल्कि कई बार ऐसे जवाब आगे चलकर विजिलैन्स जांच तक का विषय बन जाते हैं। इस परिदृश्य में यदि इस सत्र में आयें ऐसे सवालों पर नजर डाली जाये जिनके जवाब में ‘‘सूचना एकत्रित की जा रही है’’ कहा गया है क्योंकि ऐसे सवाल अंतिम सत्र के साथ ही समाप्त हो जाते हैं। पिछले कई सत्रों से सरकार से यह पूछा जा रहा था कि उसने अपने प्रचार प्रसार पर कितना खर्च किस माध्यम से किया है। उसने कितने और कौन-कौन से समाचार पत्रों को विज्ञापन जारी किये हैं। सरकार ने हर सत्र में ‘‘सूचना एकत्रित की जा रही है’’ का ही जवाब दिया है इस अंतिम सत्र में भी यही जवाब दिया है कि अभी भी सूचना एकत्रित की जा रही है। स्मरणीय है कि पिछले दिनों कांग्रेस विधायक रामलाल ठाकुर ने एक पत्रकार वार्ता में सरकार की प्रचार प्रसार नीति पर ऐसे गंभीर सवाल उठाये हैं जो निश्चित रूप से विजिलैन्स जांच का विषय बनते हैं। यह एक सामान्य नियम है कि सरकार जो भी किसी भी माध्यम से विज्ञापित करती है उस पर प्रिंट लाइन का होना कानूनी आवश्यकता है। जो बड़े-बड़े होर्डिंग लगाये जाते हैं उन पर प्रिंट लाइन के साथ ही उन्हें किसी सार्वजनिक स्थल पर लगाने के लिए प्रशासन से भी अनुमति लेनी पड़ती है। कई बार ऐसे होर्डिंग सार्वजनिक स्थलों पर लगे देखने को मिले हैं। जिन पर प्रिंट लाइन नहीं थी। माल रोड पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के बिना प्रिंटलाइन के होर्डिंग लग चुके हैं। जब शैल ने यह विषय उठाया था तब तुरन्त उन्हें हटा लिया गया था। प्रचार प्रसार के संद्धर्भ में पूछे गए सवाल का जवाब इसलिये नहीं दिया गया क्योंकि इसमें सरकार से तीखा सवाल पूछने वाले समाचार पत्रों को विज्ञापनों से वंचित रखा गया है। लेकिन सरकार तो इस सवाल का जवाब भी नहीं दे पायी है कि सरकार के कितने विभागों/निगमों में कितने पद सृजित है, स्वीकृत हैं- कितने पद रिक्त हैं- कितनों को रोजगार दिया गया है। यह सवाल भी पूछा गया था कि प्रदेश में विभिन्न स्तर के कितने अस्पताल-औषधालय हैं। इनमें डॉक्टरों के कितने पद सृजित और रिक्त हैं। इस पर भी सूचना एकत्रित की जा रही है का ही जवाब दिया गया है। ऐसे और भी कई सवाल हैं जिन में सूचना एकत्रित किये जाने का ही जवाब दिया गया है। रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य ऐसे विषय हैं जो प्रदेश के हर व्यक्ति को सीधे प्रभावित करते हैं। इनमें सरकार अपनी उपलब्धियों के ढोल पीटती रही है। लेकिन जहां जिस मंच पर इन से जुड़े तथ्य रखे जाने थे वहां जब सरकार के पास कार्यकाल के अन्त में भी सूचना एकत्रित की जा रही है कहकर जवाब से टलना पड़े तो स्पष्ट हो जाता है कि सरकार की करनी और कथनी में दिन रात का अन्तर है। शायद इसी व्यवहारिक जमीनी हकीकत के कारण अब तक हुये सभी चुनावी सर्वेक्षणों में सरकार सत्ता में वापसी नहीं कर पायी है। वैसे भी जो सरकार पांच वर्ष में लोकायुक्त का पद न भर पायी हो उसके भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेन्स के दावों पर कोई कैसे विश्वास कर पायेगा। आरटीआई के माध्यम से कोई सूचना न मांग ले इसलिये सूचना आयुक्त के पद को खाली रखने में ही भलाई मानी जा रही है। ऐसे में यह सवाल तो उठेगा ही कि जो सरकार संवैधानिक पदों को भरने में विश्वास न रखती हो और विधानसभा के अन्तिम सत्र में भी जनहित के तीखे सवालों पर अभी सूचना ही एकत्रित कर रही हो वह सत्ता में वापसी की हकदार कितनी और कैसे हो सकती है।

हर वर्ग सरकार से नाराज फिर भी सता में वापसी करने का दावा

पैन्शनर्ज  को चार साल में कुछ नहीं मिला
युवा बेरोजगार यात्रा निकालने को हुये मजबूर
किसानों बाागवानों को निकालनी पड़ी आक्रोश रैली
लोकसेवा आयोग में रह गया एक ही सदस्य
अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड को उच्च न्यायालय ने लगाया दस लाख का जुर्माना

शिमला/शैल। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं उसी अनुपात में राजनीतिक गतिविधियां भी तेजी पकड़ती जा रही हैं। मुख्यमंत्री हर चुनाव क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं। हर जगह करोड़ों की घोषणा हो रही हैं। इन घोषणाओं को पूरा करने के लिये अभी सरकार को पन्द्रह सौ करोड़ का कर्ज लेना पड़ा है। कांग्रेस नेता रामलाल ठाकुर ने इस पर सवाल उठाते हुये आरोप लगाया है कि सरकारी खर्च पर पार्टी का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। रामलाल केे सवाल का जवाब भी उन्हीं के प्रतिबंधी रणधीर शर्मा ने दिया है। रणधीर शर्मा ने रामलाल द्वारा दिये गये कर्ज के आंकड़ों को झूठ का पुलिंदा बताया है। दोनों नेताओं में हुये इस वाकयुद्ध से यह प्रमाणित हो जाता है कि एक भी नेता को सही स्थिति का ज्ञान नहीं है। किसी ने भी 31 मार्च 2020 तक की आयी कैग रिपोर्ट का अध्ययन नहीं किया है। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि शायद किसी भी राजनेता ने इस रिपोर्ट का अध्ययन नहीं किया है। क्योंकि इस रिपोर्ट में दर्ज तथ्य किसी के भी होश उड़ा देंगे। मुख्यमंत्री और उनके प्रशासन के पास इन तथ्यों का कोई जवाब नहीं है। शैल अगले अंक में यह खुलासा अपने पाठकों के सामने रखेगा।
लेकिन अभी जो रिपोर्ट फील्ड से आ रही है उसके मुताबिक मुख्यमंत्री की घोषणाओं का एक चौथाई भी व्यवहारिक शक्ल नहीं ले पाया है। पांवटा से मिली रिपोर्ट के मुताबिक मुख्यमंत्री द्वारा घोषित शैक्षणिक संस्थानों में से आधे से ज्यादा फंक्शनल नहीं हो पाये हैं और यही स्थिति अन्य जगह भी है। अभी पैन्शनर्ज संघों ने शिमला में एक पत्रकार वार्ता करके आरोप लगाया है कि जयराम सरकार अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में उनकी एक भी मांग पूरी नहीं कर पायी है। 65, 70 और 75 वर्ष की आयु पर मिलने वाले 5,10 व 15 प्रतिशत पैन्शन भत्ता की अदायगी संशोधित पैन्शन पर नहीं कर पायी है। वृद्ध पैन्शनरों को जो 1500 रूपये बढ़ा हुआ चिकित्सा भत्ता नहीं मिल पाया है। पैन्शनर्ज सरकार से बुरी तरह खफा हैं यह स्पष्ट हो चुका है। बेरोजगार युवा रोजगार के लिये कांग्रेस के बैनर तले बेरोजगार यात्रा निकाल रहे हैं। अभी प्रदेश के किसान और बागवान हजारों की संख्या में आक्रोश रैली निकालकर सचिवालय का घेराव कर चुके हैं। क्योंकि 28 जुलाई को मुख्यमंत्री ने इनके 20 सूत्रीय मांग पत्र को स्वीकार कर लिया था। लेकिन इस पर व्यवहारिक रूप से कोई भी कदम नहीं उठाया गया है और शायद इसीलिये आक्रोश रैली से निपटने के लिये मुख्य सचिव को आगे कर दिया। अब सरकार ने इनसे दस दिन का समय मांगा है। क्या दस दिन में इनकी मांगों को सरकार स्वीकार कर पायेगी? प्रदेश की वित्तीय स्थिति की जानकारी रखने वालों के अनुसार सरकार किसी भी वर्ग की कोई भी मांग पूरी करने की स्थिति में नहीं है। सरकारी संस्थानों की कार्यप्रणाली कैसे चल रही है इसका खुलासा अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड को प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा लगाये गये दस लाख के जुर्माने से सामने आ गया है। क्या इस जुर्माने के लिये बोर्ड प्रशासन के खिलाफ कारवाई की जायेगी? यही नहीं आज प्रदेश लोक सेवा आयोग में भी यह स्थिति आ गयी है कि वहां पर अध्यक्ष समेत छः पद सृजित होने के बावजूद केवल एक ही सदस्य रह गया है। इससे सरकार की गंभीरता का पता चलता है। ऐसे में यह सवाल उठना शुरू हो गया है कि इस तरह की कार्यप्रणाली के साथ सरकार की सत्ता में वापसी के दावे कितने विश्वसनीय हो सकते हैं।


चुनाव घोषणा पत्र से पहले ही चुनावी वायदों का औचित्य सवालों में

क्या कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में शीत युद्ध शुरू है?

शिमला/शैल। प्रदेश कांग्रेस का आरोप पत्र जितना लेट होता जा रहा है उस अनुपात में पार्टी के बड़े नेताओं में वैचारिक विरोधाभास मुखर होता जा रहा है। सरकार को मुद्दों पर घेरने के बजाय कुछ नेता अपने अपने तौर पर ही एक तरह से चुनावी वायदे करने पर आ गये हैं। यह स्वभाविक हैं कि राजनीतिक दल चुनाव में उतरने के लिये जनता से वायदे करते हैं जैसे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किये थे जिनको बाद में जुमलो की संज्ञा दी गई थी। आज हिमाचल लगातार कर्ज के चक्रव्यू में घंसता जा रहा है। जयराम इस स्थिति के लिये कांग्रेस को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। लेकिन कांग्रेस की ओर से इसका कोई प्रमाणिक जवाब नहीं आ रहा है। बल्कि कांग्रेस नेता स्वयं ऐसी घोषणा करते जा रहे हैं जिन्हें पूरा करने के लिए या तो कर्ज लेना पड़ेगा या फिर जनता पर करों का बोझ लादना पड़ेगा। जबकि यह दोनों स्थितियां प्रदेश की आर्थिक सेहत के लिए घातक होंगी।
अभी यह वायदा किया गया है कि हर महिला को 1500 रूपये प्रतिमाह दिये जाएंगे। युवाओं के लिये 680 करोड की युवा स्टार्टअप योजना शुरू की जायेगी। शिक्षा और बागवानी में दो लाख नौकरियां दी जायेंगी। बागवानी कमीशन का गठन किया जायेगा और पैकेजिंग मैटेरियल पर जीएसटी समाप्त कर दिया जायेगा। अभी तक शायद चुनाव घोषणापत्र तैयार करने वाली कमेटी की कोई बैठक नहीं हुई है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि इन घोषित वायदों पर कितने लोगों की सहमति बन पायी है। इन वायदों को पूरा करने के लिए आर्थिक संसाधन क्या होंगे और कहां से आयेंगे इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है। यह जो वायदे किये जा रहे हैं यह सब एक तरह से मुफ्त खोरी की श्रेणी में आते हैं। सर्वाेच्च न्यायालय तक ने इन मुफ्तखोरी योजनाओं का कड़ा संज्ञान लिया है और यह माना जा रहा है कि इन चुनावों से पहले इस संद्धर्भ में शीर्ष अदालत का कोई चाबुक चल सकता है ऐसे में इस तरह से घोषित की जा रही योजनाओं की व्यवहारिकता पर जब सवाल उठेंगे तो उनका जवाब देना कठिन हो जायेगा।
ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि प्रदेश कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ऐसे कर क्यों रहा है? क्या सही में कांग्रेस के पास इस समय कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो आर्थिकी के इन पक्षों को समझता हो? क्या पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में अभी से मुख्यमंत्री पद के लिये अंदर खाते टकराव के हालात पैदा होते जा रहे हैं? इन सारे सवालों पर विचार करने के लियेे यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का सबसे बड़ा आधार सरकार पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोप ही रहते आये हैं। इसके बाद कर्मचारी नेतृत्व भी दावा करता रहा है कि वह सरकारों के बनाने में बड़ी भूमिका अदा करता है। लेकिन इसका एक सच यह भी है कि आज तक कर्मचारियों में से केवल दो नेता ही विधानसभा पहुंच पाये हैं। इसके बाद जातीय समीकरण प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं और संयोगवश डॉक्टर परमार से लेकर जयराम ठाकुर तक एक शांता कुमार को छोड़कर मुख्यमंत्री राजपूत वर्ग से ही बनता रहा है। भाजपा में तो संगठन का नेतृत्व भी अधिकांश में ब्राह्मण और राजपूतों में से ही रहा है। सुरेश कश्यप पहली बार अपवाद हैं। कांग्रेस में सभी वर्गों से संगठन का नेतृत्व रहा है। इस परिपेक्ष में आज कांग्रेस के अंदर सबसे वरिष्ठ ठाकुर कौल सिंह हैं उनके बाद प्रतिभा सिंह, आशा कुमारी, मुकेश अग्निहोत्री और सुखविंदर सिंह सुक्खू सब की राजनीतिक वरियता लगभग बराबर है। ऐसे में अभी कांग्रेस नेतृत्व को एकजुटता का परिचय देते हुये अपने राजनीतिक विरोधाभासों को विराम देकर चुनावी रण में उतरना होगा।

भाजपा और आप में सेन्ध मारी से ज्यादा आवश्यक है सरकार को मुद्दों पर घेरना

शिमला/शैल। हिमाचल में चुनावी मुकाबला जैसे-जैसे भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर की ओर बढ़ता जा रहा है उसी अनुपात में भाजपा तथा आप से नेता कांग्रेस का हाथ थामने लग पड़े हैं। लेकिन भाजपा और आप में यह सेन्धमारी करना कांग्रेस का पार्टी स्तर पर सामूहिक रणनीतिक फैसला है या कुछ नेताओं का व्यक्तिगत प्रयास है यह सवाल राजनीतिक विश्लेषकों के लिये महत्वपूर्ण और दिलचस्प होता जा रहा है। क्योंकि बड़े स्तर का किसी भी दल का नेता दल बदल करते हुए यह पहले सुनिश्चित करता है कि दूसरे दल में जाकर उसके राजनीतिक हित सुरक्षित होंगे। कार्यकर्ता बनने के लिये केवल कार्यकर्ता ही दलबदल करता है स्थापित नेता नहीं। यह सवाल अभी ठियोग में इन्दु वर्मा के दलबदल करने के बाद कांग्रेस के भीतर उभरी प्रतिक्रियाओं से सामने आया है। अभी जो सेन्धमारी हुई है उसमें जिन नेताओं ने सक्रिय भूमिका अदा की है उसमें पूर्व मंत्री सुधीर शर्मा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खू और वर्तमान अध्यक्ष सांसद प्रतिभा सिंह के नाम प्रमुख हैं। लेकिन जिन लोगों ने इन्दु वर्मा के शामिल होने पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं उनके तार भी हाईकमान से सीधे जुड़े हुए हैं यह भी सबको जानकारी है। ऐसे में अभी से यह आशंकाएं भी उभरने लग पडी हैं कि सेन्धमारी की यह सक्रियता आगे चलकर कहीं हितों का टकराव न बन जाये। क्योंकि अभी तक कांग्रेस भाजपा और उसकी सरकार को मुद्दों पर नहीं घेर पा रही है। कांग्रेस का कथित आरोप पत्र जितना टलता जा रहा है उसको लेकर भी सवाल उठने लगे पड़े हैं।
अभी कांग्रेस जयराम सरकार को घेरने के लिये ठोस मुद्दे नहीं उठा रही है। बल्कि कांगड़ा के एक आयोजन में जिस तरह से युवाओं को ब्याज मुक्त ऋण तथा एक लाख से अधिक नौकरियां उपलब्ध करवाने का वायदा किया गया है उससे मुफ्ती की भी झलक आने लगी है। इसी आयोजन में स्व. बाली को लेकर जिस तरह की टिप्पणी कांग्रेस प्रभारी की ओर से आयी है उसके बाद स्थिति प्रभारी और अनुराग ठाकुर के बीच रहे रिश्तों के जिक्र तक पहुंच गयी है। इसी में एक पूर्व कर्मचारी नेता की कुछ कांग्रेस नेताओं के साथ बढ़ती सक्रियता भी चर्चा का विषय बनती जा रही है। कुल मिलाकर जनता कांग्रेस से जितनी ज्यादा उम्मीद लगाती जा रही है इसके नेता उतना ही आपस में उलझते जा रहे हैं। इसी का सहारा लेकर भाजपा कांग्रेस में एक बड़ी तोड-़फोड़ की विसात बिछाती जा रही है । एक वर्ग इस बात की वकालत में लग गया है कि कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में नेतृत्व फिर जिला शिमला में ही रहना चाहिये। इस योजना को अमली जामा पहनाने के लिए स्व. वीरभद्र सिंह के नक्शे कदम पर चलते हुए अपने विरोधीयों को चुनावों में ही निपटा देने की रणनीति पर काम करने के सुझाव दिये जाने लगे हैं। इसमें भी सबसे रोचक पक्ष यह है कि इस तरह की रणनीति अपनाने की वकालत वह लोग कर रहे हैं जो वैसे मोदी के नाम की माला जपते हैं।
इस तरह जो राजनीतिक वातावरण कांग्रेस नेतृत्व के गिर्द खड़ा किये जाने के प्रयास किये जा रहे हैं उसके अन्तिम परिणाम घातक हो सकते हैं। इस समय सेन्धमारी के प्रयासों से ज्यादा आवश्यक कांग्रेस कार्यकर्ताओं को प्रदेश से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय करने की आवश्यकता है।

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