सर्वाेच्च न्यायालय 2013 में ऐसे निर्देश पंजाब-हरियाणा के संद्धर्भ में दे चुका है
2018 में सदस्यों के दो पद सृजित करके एक ही क्यों भरा गया?
सरकार के इसी कार्यकाल में तीसरा अध्यक्ष नियुक्त करने की स्थिति क्यों बनी
आयोग में परीक्षाओं के परिणाम निकालने में पहले की अपेक्षा अब देरी क्यों हो रही है
शिमला/शैल। प्रदेश लोकसेवा आयोग इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। चर्चा के मुद्दे हैं सरकार द्वारा आयोग के सदस्यों को पैन्शन देने का फैसला लेना। इसी के साथ आयोग के पूर्व अध्यक्ष रहे के. एस. तोमर की उच्च न्यायालय में याचिका जिसमें 300 और 250 पैन्शन देने के 1974 में किये गये प्रावधान को आज के संद्धर्भ में संवैधानिक पद के साथ क्रूर मजाक करार देते हुये इसे सम्मान करने का आग्रह। इन्हीं मुद्दों के साथ उच्च न्यायालय द्वारा जनवरी 2020 में सरकार को दिये गये निर्देशों की आज तक अनुपालना न हो पाना इन निर्देशों में उच्च न्यायालय ने लोक सेवा आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक निश्चित प्रक्रिया और नियम बनाने के निर्देश/उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा है The Court said that it hopes that the State of H.P. must step in and take urgent steps to frame memorandum of Procedure,administrative guidelines and parameters for the selection and appointment of the Chairperson and Members of the Commission, so that the possibility of arbitrary appointments is eliminated.
उच्च न्यायालय ने यह निर्देश इसलिए दिये कि जो याचिका अदालत में आयी थी उसमें मीरा वालिया की नियुक्ति को अवैध करार देने के आग्रह के साथ ही एक तय प्रक्रिया और नियम बनाये जाने की गुहार लगाई गयी थी। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने भी 2013 में पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय से अपील में शीर्ष अदालत के पास पहुंचे एक मामले में दिये गये थे। सर्वाेच्च न्यायालय के इन निर्देशों पर शायद इसीलिये अमल नहीं किया गया कि इसे पंजाब हरियाणा का ही मामला मान लिया गया। लेकिन अब जब प्रदेश उच्च न्यायालय से भी ऐसे ही निर्देश आ चुके हैं तब भी प्रदेश सरकार द्वारा उसकी अनुपालना न किया जाना जयराम सरकार की नीयत और नीति दोनों पर ही कई गंभीर सवाल खड़े कर देता है। स्मरणीय है कि जबसे प्रदेश लोकसेवा आयोग का संविधान की धारा 315 के तहत गठन हुआ है तब से लेकर आज तक इसमें सेना के लै.जनरल से लेकर प्रदेश के मुख्य सचिव डीजीपी और पत्रकार तक अध्यक्ष रह चुके हैं। सदस्यों के नाम पर भी आई.ए.एस. अधिकारियों से लेकर इंजीनियर वकील विभागों के उप निदेशक और पत्रकार तक इसके सदस्य रह चुके हैं। ऐसा इसीलिये हुआ है क्योंकि आज तक सदस्य और अध्यक्ष की नियुक्ति के लिये कोई निश्चित प्रक्रिया और नियम ही नहीं बन पाये हैं। शायद पूरे देश में ऐसा ही है इसलिये जब पंजाब हरियाणा का मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पहुंचा था तब ऐसी ही छः याचिकाएं शीर्ष अदालत के पास लंबित थी। सर्वाेच्च न्यायालय ने तब इसका कड़ा संज्ञान लेते हुए यह कहा था कि लोकसेवा आयोग राज्य की शीर्ष प्रशासनिक सेवाओं के लिये उम्मीदवारों का चयन करते हैं परंतु उनके अपने ही चयन के लिये कोई प्रक्रिया और नियम न होना खेद का विषय है। जबकि इनकी नियुक्ति तो राज्यपाल करता है परंतु इनको हटाने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है। पर उसके लिये भी इनके खिलाफ आयी शिकायत की जांच सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा की जायेगी। सर्वाेच्च न्यायालय की सिफारिश पर ही राष्ट्रपति उन्हें हटा सकता है। या विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित करके ऐसा कर सकती है। इसलिये इनकी नियुक्ति के लिये भी नियम और प्रक्रिया होना आवश्यक है। सर्वाेच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि सदस्य बनने के लिये सरकार के वित आयुक्त जितनी योग्यता होनी चाहिये। प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों को ही आगे बढ़ाते हुये जनवरी 2020 में जयराम सरकार को निर्देश दिये थे कि वह तुरन्त प्रभाव से यह नियम बनाये जो आज तक नहीं बने हैं। यहां यह भी समरणीय है कि जयराम सरकार ने जब सत्ता संभाली थी तब लोकसेवा आयोग में सदस्यों के दो पद सृजित किये गये परंतु उनमें से भरा एक ही। बल्कि आज तक यह पद भरा नहीं गया है। यहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब दूसरा पद भरना ही नहीं था तो उसको सृजित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जयराम सरकार के कार्यकाल में शायद अध्यक्ष की नियुक्ति भी थोड़े-थोड़े समय के लिये ही होती रही है। इसमें भी यह सवाल उठते रहे हैं कि क्या सरकार को ऐसा व्यक्ति ही नहीं मिलता रहा जो पूरे छः वर्ष के लिये अध्यक्ष रह पाता। इसमें भी सरकार की नीयत पर सवाल उठते रहे हैं। क्योंकि सरकार का कार्यकाल पूरा होने से पहले ही फिर अध्यक्ष की नियुक्ति की जायेगी। एक कार्यकाल में तीन बार अध्यक्ष की नियुक्ति किया जाना एक तरह से संस्थान की प्रतिष्ठा को भी सवालों में लाकर खड़ा कर देता है। क्योंकि इससे संस्थान की कार्य संस्कृति प्रभावित हुई है। आज आयोग द्वारा ली जा रही परीक्षाओं के परिणाम निकालने में इतना समय लगाया जा रहा है जो पूर्व में नहीं लगता था। आज छः माह से लेकर एक वर्ष तक परिणाम नहीं आ रहे हैं। चर्चा है कि एच.पी.सी.एल. में ए.ई. की परीक्षा को करीब एक वर्ष हो रहा है और परिणाम नहीं आया है। एच.ए.एस. के परिणाम में ही शायद माह का समय लग गया है। आम आदमी पर इस देरी का क्या असर पड़ेगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसा इसीलिए हो रहा है कि सरकार उच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद नियम बनाने को तैयार नहीं है। शायद अगले अध्यक्ष की नियुक्ति के बाद ही इस बारे में विचार किया जायेगा। जिस ढंग से पैन्शन का फैसला लिया गया है उससे स्पष्ट हो गया है कि मुख्यमंत्री को सलाह नहीं मिल रही है। क्योंकि पैन्शन का फैसला तो आयोग के गठन के साथ ही ले लिया गया था। 1974 के 300 रूपये की आज क्या कीमत होगी यह कोई भी अनुमान लगा सकता है। फिर ब्रिगेडियर एल.एस.ठाकुर को अदालत पैन्शन का लाभ दे ही चुकी है। इसी के आधार पर डॉ. मानसिंह, प्रदीप चौहान, मोहन चौहान अदालत गये थे। उच्च न्यायालय ने इन के हक में फैसला दिया था। सरकार जिस की अपील में सर्वाेच्च न्यायालय गयी हुई है। शीर्ष अदालत में मामला अभी तक लंबित है। ऐसे में क्या अभी 1974 के प्रावधान को जनता के सामने रखे बिना पैन्शन का फैसला लिया जाना चाहिये था। आज आर्थिक संकट के दौर में सारी स्थिति जनता में स्पष्ट किये बिना फैसला लेना सही ठहराया जा सकता है क्या यह मुख्यमंत्री के सलाहकारों पर प्रशन नहीं है।
पेपर सैटिंग कमेटी और प्रिंटिंग कमेटी को भेजी गयी अलग-अलग प्रश्नवाली क्या है?
भर्ती बोर्ड के चेयरमैन आई.जी. जे.पी. सिंह का अलग से प्रश्नावली क्यों भेजी गयी?
क्या इनके जवाबों से एस.आई.टी. संतुष्ट है?
प्रिंटिंग प्रैस के चयन की प्रक्रिया क्या रही?
शिमला/शैल। पुलिस भर्ती में पेपर लीक होने और उसके पांच से आठ लाख तक में बिकने के प्रकरण से प्रदेश तथा सरकार की प्रतिष्ठा पर जो दाग लगे हैं वह शायद कभी भी नहीं धुल पायेंगे। क्योंकि जैसे ही यह मामला उजागर हुआ तभी सारा विपक्ष सरकार के खिलाफ खड़ा हो गया। उच्च न्यायालय की निगरानी में जांच करवाये जाने के ज्ञापन राज्यपाल को सौंपा गये। पुलिस द्वारा की जा रही जांच पर भरोसा न जता कर सीबीआई जांच की मांग की गयी। प्रदेश उच्च न्यायालय में इस आशय की याचिका पहुंच गयी। पूूर्व में घटे गुड़िया मामले की तर्ज पर इस मामले के भी सीबीआई में जाने की संभावना बढ़ गयी। यह लगने लगा था कि उच्च न्यायालय ही यह जांच सीबीआई को सौंपने के निर्देश कर देगा। क्योंकि पुलिस के खिलाफ पुलिस की ही विश्वसनीय नहीं होने का तर्क खड़ा हो गया था। पुलिस विभाग का प्रभार स्वयं मुख्यमंत्री के पास होने से उनकी अपनी प्रतिष्ठा और निष्पक्षता दाव पर आ गयी थी। इस सब को सामने रखकर उच्च न्यायालय की सुनवाई से पहले ही 17 मई को मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की मुख्यमंत्री ने घोषणा कर दी। सभी ने घोषणा का स्वागत किया और मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा बहाल रह गयी।
लेकिन अब 27 जून को जब डी.जी.पी. संजय कुण्डू ने यह घोषणा कर दी कि एक सप्ताह के भीतर इस जांच का चालान अदालत में पेश कर दिया जायेगा और जांच की कुछ तफसील भी पत्रकारों के साथ सांझा कर ली तो वह सारे सवाल फिर से उठ खड़े हुए हैं जो पहले दिन से ही उछल गये थे। फिर कुण्डू ने सारे मामले में संबद्ध पुलिस अधिकारियों की लापरवाही की संभावना से इन्कार नहीं किया है। अब तक मामले में 171 लोग लोगों की गिरफ्तारी का तथ्य तो समझा कर लिया गया लेकिन यह कहीं सामने नहीं आया कि पुलिस के कितने लोगों से पूछताछ की गयी है। यह भी नहीं बताया गया कि एस.आई.टी. ने पेपर सैटिंग कमेटी और प्रिंटिंग कमेटी को जो अलग-अलग प्रश्नावलियां भेजी थी उनका क्या जवाब आया? क्या उस जवाब से एस.आई.टी. संतुष्ट है? पुलिस भर्ती बोर्ड के चेयरमैन आई.जी. जे.पी. सिंह को अलग से प्रश्न भेजे गये थे उनका क्या जवाब आया है? 2021 में पुलिस भर्ती प्रक्रिया में ऑनलाइन आवेदन मंगवाने का फैसला हुआ था। ए.डी.जी.पी. आर्मड पुलिस, आई.जी. रेंज, वैलफेयर और प्रशासन तथा डी.आई.जी. रेंज तक को बोर्ड में रखा गया था। लेकिन बाद में इस फैसले को किस तरह पर बदला गया यह आज तक सामने नहीं आ पाया है। यह सवाल भी अपनी जगह खड़ा है की पेपरों की प्रिंटिंग हिमाचल सरकार की प्रैस से न करवा कर बाहर से यह प्रिटिंग करवाने का फैसला किस स्तर पर और क्यों लिया गया। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिनकी ओर शायद जांच में कोई ध्यान नहीं गया है। 2006 के पी.एम.टी. पेपर मामले के अभियुक्त रहे मंडी ट्रक यूनियन के अध्यक्ष रहे मनोज कुमार कि अब इस मामले में भी संलिप्तता का खुलासा करके अपरोक्ष में यह तो कह दिया गया कि पेपर लीक तो बहुत पहले से होती आ रही है। यह तो बता दिया गया कि 10 राज्यों में यह गिरोह सक्रिय है। लेकिन इस सब से यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि पुलिस के अपने ही अधिकारियों कर्मचारियों के खिलाफ पुलिस की ही जांच की इससे विश्वसनीयता कैसे बन जाती है?
क्या मुकेश अग्निहोत्री के उद्योग मंत्री काल में 73 करोड़ के खर्च में भ्रष्टाचार हुआ है?
यदि हां तो सरकार अब तक चुप क्यों थी?
यदि नहीं तो क्या मुकेश को डराने का प्रयास हो रहा है।
इसी दौरान आये डॉ. रचना गुप्ता के टवीट के मायने क्या हैं
शिमला/शैल। इन दिनों प्रदेश में नेता सत्ता पक्ष और नेता प्रतिपक्ष में सार्वजनिक संवाद जिस स्तर तक पहुंच गया है उसे आम आदमी मर्यादाओं का अतिक्रमण करार दे रहा है। मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष का आपसी संवाद जब मर्यादाए लांघना शुरू कर देता है तो आम आदमी पर उसका प्रभाव बहुत ज्यादा सकारात्मक नहीं रह जाता है। क्योंकि ऐसे संवाद में एक-दूसरे पर ऐसे आरोप अपरोक्ष में लगाये जाते हैं जिन पर न चाहते हुये भी आम आदमी का ध्यान चला जाता है और वह अपने ही स्तर पर अपने निज के लिये ही उनकी पड़ताल करना शुरू कर देता है। ऐसा वह इसलिये करता है कि इन नेताओं की जो तस्वीर उसने अपने दिमाग में बिठा रखी होती है उसका आकलन वह नये सिरे से कर सके। प्रदेश के इन शीर्ष नेताओं में हुये सार्वजनिक संवाद का विषय हेलीकॉप्टर का उपयोग/ दुरुपयोग बना है। यह एक सार्वजनिक सच है कि शायद मुख्यमंत्री की हवाई यात्रा की माइलेज उनकी रोड यात्रा से बढ़ जाये। यह भी सच है कि प्रदेश में सड़कों की सेहत दयनीय है। इनकी मुरम्मत में किस तरह की गुणवत्ता अपनाई जा रही है उसके प्रमाण राजधानी शिमला से लेकर हर विधानसभा क्षेत्र में मिल जायेंगे। कैसे तारकोल मिट्टी पर ही बिछा दिया जा रहा है इसके कई वीडियोस वायरल हो चुके हैं। लोक निर्माण विभाग और पर्यटन का प्रभार मुख्यमंत्री के पास है इसलिये हेलीकॉप्टर पर सबकी नजर चली जाती है। क्योंकि अधिकारियों को यह पता होता है कि मुख्यमंत्री ने तो हवाई मार्ग से ही आना है इसलिये उन्हें सड़कों की जमीनी हकीकत का पता क्यों और कैसे लगेगा। फिर मुख्यमंत्री के गिर्द मंडराने का अवसर भी उन्हीं को मिलता है जो हरा ही हरा दिखाने में पारंगत होते हैं।
ऐसे में जमीन से जुड़े और उसके सरोकारों से बंधे लोगों का हेलीकॉप्टर के उपयोग को लेकर आपस में बातें करना तथा सवाल उठाना स्वभाविक हो जाता है। इन लोगों को यह भी जानकारी रहती है कि मुख्यमंत्री के अतिरिक्त और कौन लोग इस में यात्रा कर लेते हैं। बल्कि एक समय तो जन चर्चा यहां तक रही है कि कुछ लोगों ने तो नाम बदलकर हवाई यात्रा की है। शायद उनके पद के कारण अपने ही नाम से यात्रा करना उनकी निष्पक्षता को प्रभावित करता। ऐसे में हेलीकॉप्टर के उपयोग को लेकर विपक्ष का परोक्ष/अपरोक्ष में सवाल उठाना स्वभाविक हो जाता है। शायद इन सवालों की धार कुछ ज्यादा पैनी हो होती जा रही थी जिस पर मुख्यमंत्री को सार्वजनिक मंच से यह कहना पड़ गया कि यह हेलीकॉप्टर नेता प्रतिपक्ष के टब्बर का नहीं है। मुख्यमंत्री के इस कथन का जवाब नेता प्रतिपक्ष ने भी उसी शैली में देते हुये यह कह दिया कि यह हेलीकॉप्टर न उनके परिवार का है और न ही मुख्यमंत्री के परिवार का। यह प्रदेश सरकार का है और इसके हर उपयोग की जानकारी हर आदमी को जानने का अधिकार है। आरटीआई के माध्यम से यह जानकारीयां मांगी जा सकती हैं। यह जवाब देते हुये नेता प्रतिपक्ष ने यह भी कह दिया कि यह हेलीकाप्टर सहेलियों के लिए भी नहीं है।
नेता प्रतिपक्ष के इस जवाब से आहत होकर प्रदेश के वन मंत्री राकेश पठानिया और ऊर्जा मंत्री सुखराम चौधरी ने एक पत्रकार वार्ता में नेता प्रतिपक्ष को बिना शर्त माफी मांगने के लिये कहा है। उन्होंने सहेली शब्द को असंसदीय करार देते हुये यह भी कहा है कि उनके पास कानूनी कारवाई करने का भी विकल्प है। राकेश पठानिया ने इसी पत्रकार वार्ता में यह भी आरोप लगाया कि जब मुकेश अग्निहोत्री वीरभद्र सरकार में उद्योग मंत्री थे तब उनके क्षेत्र में हुये 73 करोड़ के कार्यों को लेकर भी काफी कुछ मसाला उनके खिलाफ है। पठानिया के मुताबिक इस 73 करोड़ के खर्च में भ्रष्टाचार हुआ है। जिस पर मुकेश अग्निहोत्री के खिलाफ मामला बनता है जो अब तक नहीं बनाया गया है। राकेश पठानिया जयराम सरकार में वन मंत्री हैं और इस सरकार का यह अंतिम वर्ष चल रहा है। आज पठानिया ने जो 73 करोड़ के खर्च में घपला होने का आरोप लगाया है यह आरोप पहली बार लगा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि जयराम सरकार के संज्ञान में यह मामला पहले दिन से रहा है। लेकिन यह सरकार इस पर इसलिये चुप रही क्योंकि मुकेश अग्निहोत्री सरकार के खिलाफ शायद इतने आक्रामक नहीं थे। अब जब आक्रमक हुये हैं तब उनके खिलाफ यह मामले याद आ रहे हैं या बनाये जाने की धमकी है यह जो भी हो इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह सरकार इस सिद्धांत पर चलती रही है कि तुम हमें कुछ मत बोलो हम तुम्हें नहीं बोलेंगे। जयराम के मंत्री का यह ब्यान कानून की नजर में बहुत मायने रखता है। आने वाले समय में जनता इसका जवाब अवश्य मांगेगी। अभी यह देखना दिलचस्प होगा कि जयराम अपने ही मंत्री के इस वक्तव्य का क्या जवाब देते हैं। क्योंकि जनता को यह जानने का हक है कि सही में भ्रष्टाचार हुआ है या मंत्री सार्वजनिक रूप से डरा रहे हैं।
राकेश पठानिया ने मुकेश से बिना शर्त माफी मांगने को कहा है अन्यथा कानूनी विकल्प चुनने की बात की है। लेकिन मुकेश ने अब तक माफी नहीं मांगी है तो क्या पठानिया अदालत जायेंगे? यह देखना दिलचस्प हो गया है। दूसरी ओर मुकेश के ब्यान के बाद संयोगवश प्रदेश लोक सेवा आयोग की सदस्य डॉ. रचना गुप्ता का भी एक ट्वीट आया है। यह मुकेश के ब्यान की प्रतिक्रिया मानी जा रही है। यह ट्वीट भी यथास्थिति पाठकों के सामने रखा जा रहा है। वैसे कानूनी शब्दकोष के मुताबिक सहेली शब्द असंसदीय नहीं है। विश्लेषकों के लिये मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के सार्वजनिक संवाद के दौरान डॉ. गुप्ता के ट्वीट के मायने और संद्धर्भ समझना एक बड़ा सवाल बना हुआ है।
यह है ट्वीट
शिमला/शैल। जयराम सरकार 70,000 करोड़ के कर्ज के चक्रव्यूह में फंसी हुई है। सरकार को केंद्र की मोदी सरकार की ओर से भी कोई बड़ी आर्थिक सहायता नहीं मिल पायी है। यह कैग रिपोर्ट ने सामने ला दिया है। ऐसे में जब चुनावी वर्ष में मोदी के विश्वासपात्र अदाणी के 280 करोड़ 9% ब्याज सहित लौटाने का निर्देश प्रदेश उच्च न्यायालय की एकल पीठ से आ जाये तो यह सरकार के लिये कैसी स्थिति पैदा कर देगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। स्मरणीय है की उच्च न्यायालय की जस्टिस संदीप शर्मा पर आधारित एकल पीठ ने 12 अप्रैल को यह फैसला सुनाया है की 960 मेगावाट की जंगी-थोपन-पवारी परियोजना में ब्रैकल एन.वी.के नाम पर अदाणी पावर से आये 280 करोड़ के अपफ्रंट प्रीमियम को 9% ब्याज सहित अदाणी पावर को वापस लौटाया जाये। स्मरणीय है कि 2006 में वीरभद्र सरकार के कार्यकाल में 960 मैगावाट की यह परियोजना नीदरलैंड की कंपनी ब्रेकल एन.वी को दी गयी थी। लेकिन किन्ही कारणों से यह कंपनी 280 करोड़ का अपफ्रंट प्रीमियम अदा नहीं कर पायी। ऐसा न कर पाने पर रिलायंस ने इस आवंटन को चुनौती दे दी। सरकार बदल चुकी थी। धूमल सत्ता में थे मामला उच्च न्यायालय में चल रहा था अदाणी ने ब्रेकल के नाम पर 280 करोड़ ब्याज सहित जमा करवा दिये। मामला उठा कि जब अदाणी ब्रेकल एन.वी. का पार्टनर ही नहीं है तो उसने किस हैसियत से यह रकम जमा करवायी और सरकार ने इसे स्वीकार कैसे कर लिया। मामला उच्च न्यायालय से होकर सर्वाेच्च न्यायालय तक पहुंच गया। रिलायंस भी पीछे हट गया। परियोजना ब्रेकल एन.वी. रिलायंस और अदाणी किसी को भी नहीं मिल पायी। अब जयराम सरकार ने इसे एसजेवीएनएल को सौंपा है। लेकिन इस सबके बीच अदाणी के 280 करोड़ का मामला खड़ा रहा। 2015 में वीरभद्र सरकार ने इस परियोजना को रिलायंस को देने का फैसला लेते हुये यह भी फैसला दिया था कि इसमें रिलायंस से जो पैसा मिलेगा उससे अदाणी का पैसा लौटा दिया जायेगा। लेकिन यह परियोजना फिर रिलायंस को नहीं मिल पायी और वीरभद्र सरकार ने पैसा लौटाने का फैसला वापस ले लिया। बल्कि उस समय योग गुरु स्वामी रामदेव भी चर्चा में आ गये थे। फिर सरकार बदल गयी और 2019 में अदाणी फिर से उच्च न्यायालय पहुंच गये। लेकिन जयराम सरकार ने फैसला ले लिया कि यह रकम विभिन्न उपलब्धियों के कारण जब्त कर ली गयी है। इसलिये इसे वापस नहीं किया जायेगा। लेकिन अब अदालत ने वीरभद्र सरकार के दौरान लिये इस फैसले के आधार पर की रिलायंस से पैसा मिलने पर अदाणी को लौटा दिया जायेगा पर यह निर्देश सुना दिये की दो माह के भीतर ब्याज सहित यह रकम अदाणी को लौटा दी जाये। अदालत ने साफ कहा है कि सरकार अपने फैसले को ऐसे नहीं बदल सकती। फैसले को एक माह से ज्यादा का समय हो गया। अपील का सामान्य समय निकल गया है। अदाणी ने उच्च न्यायालय में केविएट भी दायर कर रखी है। ऐसे में प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में इस मामले पर सबकी निगाहें लगी हुई है। वैसे कांग्रेस और वाम दल अपने-अपने कारणों से इस पर चुप हैं। आम आदमी पार्टी को इसकी जानकारी ही नहीं है।
शिमला/शैल। प्रदेश विधानसभा के चुनाव सितम्बर-अक्तूबर में होने की संभावनाएं बढ़ती जा रही है। वैसे तो हिमाचल में हर पांच वर्ष बाद सत्ता बदलती आयी है। पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह से लेकर शान्ता, धूमल तक कोई भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाया है। बल्कि शान्ता और धूमल तो विधानसभा चुनाव तक भी हार चुके हैं। इन दोनों का शासन तो जयराम के शासन से हजार दर्जे बेहतर रहा है। इस नाते जयराम और उनकी सरकार का हारना तय माना जा रहा है। लेकिन इस बार प्रदेश के राजनीतिक वातावरण में वीरभद्र सिंह की मृत्यु और आप के चुनाव लड़ने के ऐलान से भारी बदलाव आया है। पंजाब में आप की अप्रत्याशित जीत से हिमाचल की राजनीति भी प्रभावित हुई है। प्रदेश में दो बार केजरीवाल भगवंत मान के साथ और मनीष सिसोदिया अकेले यहां आ चुके हैं। इन यात्राओं से आप के नेतृत्व ने शिक्षा को एक प्रमुख मुद्दा बनाये जाने का सफल प्रयास भी कर दिया है। इस प्रयास से आप आज हिमाचल में 2.5% से 3% तक वोट ले जाने तक पहुंच चुकी है। इस प्रतिशत से यह माना जा रहा है कि आप अपने तौर पर शायद कोई सीट न जीत पाये लेकिन इससे कांग्रेस का नुकसान अवश्य कर देगी। आप को भाजपा का नुकसान करने और स्वयं सीट जीतने के लिये कम से कम 10% वोट तक पहुंचना होगा। भाजपा का प्रयास यही रहेगा कि आप 2.5% से 3% तक ही रहें। आप के प्रभावी सत्येंद्र जैन की गिरफ्तारी इस रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है और ऐसा लगता है कि प्रदेश के चुनाव तक जैन को जेल से बाहर भी नहीं आने दिया जायेगा। आप की नयी कार्यकारिणी के गठन और हमीरपुर में केजरीवाल के शिक्षा संवाद के बाद भी सरकार की उस पर कोई प्रतिक्रिया न आना इसी दिशा के संकेत माने जा रहे हैं। इस वस्तुस्थिति में प्रदेश में कांग्रेस की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन जिस तरह से कांग्रेस प्रदेश में चल रही है उससे यह नहीं लगता कि वह इस बारे में सचेत भी है। क्योंकि प्रतिभा सिंह की मंडी में जीत का एक बड़ा कारण स्व. वीरभद्र सिंह के प्रति उपजी सहानुभूति भी रही है। इसी सहानुभूति के चलते प्रतिभा सिंह प्रदेश अध्यक्ष बनी है। लेकिन उनकी अध्यक्षता पर उसी समय प्रश्नचिन्ह भी लग गये हैं जब उनके साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष भी बना दिये गये। जबकि कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का प्रयोग अन्य राज्यों में सफल नहीं रहा है। कार्यकारी अध्यक्षों के साथ ही अन्य बड़े नेताओं मुकेश, सुक्खुू आशा, आनन्द शर्मा, कॉल सिंह आदि के लिये भी पदों का प्रबंध किया गया। इसमें मुकेश ही अकेले ऐसे नेता है जो पहले से ही नेता प्रतिपक्ष थे। जब नेताओं को इस तरह से समायोजित किया गया तब कार्यकर्ताओं और क्षेत्रों का भी ख्याल रखना पड़ा और लंबी चौड़ी कार्यकारिणी बनानी पड़ गयी। इसमें जिला शिमला से सबसे ज्यादा लोगों को कार्यकारिणी में जगह देनी पड़ गयी। यह जगह देने से अन्य जिलों के साथ संतुलन गड़बड़ा गया है। दूसरी ओर यदि इस कार्यकारिणी के बाद पार्टी की कारगुजारी पर नजर डाली जाये तो अभी तक पुलिस पेपर लीक के मामले से हटकर कोई और बड़ा मुद्दा पार्टी जनता के सामने नहीं रख पायी है। इसमें भी दावे के बावजूद ऑडियो टेप जारी नहीं किया गया है। पेपर लीक मामला सीबीआई तक क्यों नहीं पहुंचा है इसको लेकर सुक्खू ने जब राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा तब उनके साथ सारे बड़े नेता क्यों नहीं थे। इसका कोई जवाब नहीं आया है। अब प्रतिभा सिंह के दौरों में भी बड़े नेताओं का एक साथ न रहना सवालों में है। प्रतिभा सिंह की सभाओं में कम हाजिरी भी अब चर्चा में आने लग गयी है। सिरमौर में तो कुंवर अजय बहादुर सिंह के खिलाफ जिला नेताओं का पत्र तक आ गया है। हर्षवर्धन चौहान कैसे और क्यों मंच की बजाय कार्यकर्ताओं के बीच बैठे यह एक अलग सवाल बन गया है। कुल मिलाकर सभी बड़े नेता अपनी-अपनी सीट निकालने तक सीमित होते जा रहे हैं। अपने-अपने जिले की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हो रहे हैं। पूर्व मंत्री मनकोटिया ने तो खुलकर वंशवाद हावी होने का आरोप तक लगा दिया है। यहां तक कहा जा रहा है कि 42 सीटों पर ऐसे उम्मीदवार मैदान में होंगे जिनके परिवारों से कोई न कोई विधायक सांसद या मंत्री रहा है। यह सब इसलिये हो रहा है क्योंकि नेतृत्व अभी तक सरकार के खिलाफ ऐसा कोई मुद्दा नहीं ला पाया है। जिस पर सरकार घिर जाती और जवाब देने पर आना पड़ता तथा कार्यकर्ता भी उस पर एकजुट होकर आक्रामक हो जाते।
