सरकार की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस सवालों में
शिमला/शैल। हिमाचल सरकार का स्वास्थ्य विभाग एक लंबे अरसे से विवादों का केंद्र चला आ रहा है। विभाग को लेकर पहली चर्चा उस समय शुरू हुई जब पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार के नाम लिखा एक पत्र वायरल हुआ। इस पत्र के तथ्यों पर कोई जांच करने की बजाय सरकार ने इसके लेखक का पता लगाने को प्राथमिकता दी। कई लोगों पर शक किया गया। शैल भी शक के दायरे में रहा और अंततः धूमल शासन में मंत्री रहे रविन्द्र रवि के खिलाफ इस संबंध में एक मामला दर्ज कर लिया गया। इस मामले का अंतिम परिणाम आज तक सामने नहीं आया है। इसके बाद सोलन से एक ऑडियो वायरल हुआ। इस पर मामला दर्ज हुआ तत्कालीन स्वास्थ्य निदेशक की गिरफ्तारी तक हुई। स्वास्थ्य मंत्री को बदलकर विधानसभा अध्यक्ष बना दिया गया। लेकिन मामले का अंतिम परिणाम अभी आना बाकी है। फिर पी.पी. किटस और सैनिटाइजर खरीद पर सवाल उठे। सैनिटाइजर खरीद पर सचिवालय के एक अधिकारी और कर्मचारी के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। इसका भी परिणाम आना शेष है।
लेकिन इन सारे मामलों के साथ एक और गंभीर तथ्य यह घटता रहा कि हिमाचल में बनने वाली दवाओं के सैंपल फेल होने के समाचार आते रहे हैं। विधानसभा में इस आश्य के प्रश्न आये। सरकार ने जवाब में दवाइयों और निर्माता कंपनियों के नामों सहित पूरा विवरण पटल पर रखा। लेकिन इस पर कारवाई के नाम पर यही आया कि निर्माताओं को शो कॉज नोटिस जारी कर दिये गये। शो कॉज नोटिस के बाद क्या कारवाई हुई आज तक सामने नहीं आया है। जबकि सैंपल फेल होने के किस्से अब तक जारी हैं। संयोगवश विधानसभा में आये सवाल लिखित जानकारी आने तक ही सीमित रहे हैं। बद्दी देश का एक बड़ा फार्मा हब है। बड़े-बड़े दवा निर्माता यहां पर हैं। हिमाचल में बनी हुई एक दवाई के सेवन से जम्मू में कुछ बच्चों की मौत होने तक का मामला घट चुका है। इस पर एक अपराधिक मामला भी दर्ज हो चुका है। लेकिन इसका भी अंतिम परिणाम सामने नहीं आया है।
दवाई जीवन रक्षक होती है। जब उसके निर्माण में उसकी गुणवत्ता के मानकों की ही पालना नहीं होगी तो शायद इससे बड़ा और कोई अपराध नहीं हो सकता। ऐसे अपराधियों के खिलाफ यदि कारण बताओ नोटिस से आगे कारवाई न बढ़े तो क्या इसे सरकार की कार्यप्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न चिन्ह नहीं माना जाना चाहिये। दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करना दवा नियंत्रक की जिम्मेदारी होती है। दवाइयों की कीमतें किस गति से बढ़ाई जा रही हैं और इसमें फार्मा कंपनियां किस तरह आचरण करती हैं इसका जिक्र पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार अपनी आत्म कथा में कर चुके हैं। नागपुर में एक एनजीओ साथी कि 40 पन्नों की रिपोर्ट में भी फार्मा कंपनियों की भूमिका को लेकर बहुत ही सनसनीखेज खुलासा हुआ है। हिमाचल में दवा नियंत्रक रहे शेर सिंह का मामला भी सभी जानते हैं। दवाइयों की खरीद में किस तरह कितने कमीशन का आदान-प्रदान होता है इसका खुलासा मण्डी में हुई खरीद पर कैग रिपोर्ट में आ चुका है। जब नड्डा प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री थे तब भी इस खरीद पर लंबा चौड़ा मामला घट चुका है तब भी स्वास्थ्य निदेशक की गिरफ्तारी हुई थी।
इस परिदृश्य में आज जो आठ पन्नों की एक शिकायत दवा नियन्त्रक मरवाह के खिलाफ मीडिया तक पहुंची है उस पर सरकार द्वारा अब तक कोई कारवाई न किया जाना अपने में कई सवाल खड़े कर देता है। एक एम सी जैन द्वारा प्रधानमंत्री सहित एक दर्जन अधिकारियों नेताओं को भेजी इस शिकायत में बहुत गंभीर आरोप लगाये गये हैं। इन आरोपों की सत्यता सामने आनी चाहिए। जिस एम सी जैन के नाम से यह शिकायत मीडिया तक पहुंची है वहीं पर यह शिकायत सरकार और उसकी एजेंसियों तक भी पहुंची होगी। लेकिन इस पर अब तक किसी की ओर से भी कोई प्रतिक्रिया जारी न होना कई सवाल खड़े करता है। ऐसे में इस शिकायत में दर्ज तथ्यों की सत्यता पर कुछ भी न कहते हुये इसे यथास्थिति पाठकों के सामने रखना सरोकारी पत्रकारिता का धर्म हो जाता है।
यह है एम.सी. जैन की शिकायत







शिमला/शैल। आम आदमी पार्टी अभी तक प्रदेश इकाई का नये सिरे से गठन नहीं कर पायी है। केजरीवाल की यात्राओं और सत्येंद्र जैन के प्रयासों से भी इस दिशा में कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पायी है। लेकिन दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री सिसोदिया की यात्रा के बाद प्रदेश में शिक्षा की हालत एक मुद्दा अवश्य बन गयी है। सिसोदिया द्वारा उठाये गये सवालों की चपेट में पूरी जयराम सरकार आ गयी और जवाब देने पर विवश भी हो गयी है। यही नहीं सिसोदिया ने आप की घोषणाओं को पूरा करने के लिये साधन कहां से आयेंगे इसका जवाब देते हुए कहा है कि यह सब भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करके हो सकता है। भ्रष्टाचार का उदाहरण देते हुये स्पष्ट जिक्र किया कि प्रदेश का एक नेता मंत्री बनने से पहले एक साधारण तीन कमरों के मकान में रहता था लेकिन मंत्री बनने के बाद जब वह अपने बेटे की शादी की दस-दस रिसैप्शन दिल्ली और शिमला के बीच दे तो तय है कि यह हैसियत भ्रष्टाचार से ही आयी है। सिसोदिया ने मंत्री का नाम लिये बगैर भाजपा के उन तीनों बड़े नेताओं पर जनता का ध्यान केंद्रित करवा दिया जिन्होंने इस दौरान अपने बेटों की शादियां की है। आप सरकार भ्रष्टाचार के प्रति कितनी गंभीर है इसका परिचय भगवंत मान ने अपने स्वास्थ्य मंत्री को बर्खास्त और गिरफ्तार करके दे दिया है। जबकि स्वास्थ्य विभाग के सौदों में 1% कमीशन मांगे जाने की सूचना केवल मुख्यमंत्री के ही पास थी और सार्वजनिक नहीं थी। लेकिन हिमाचल में ऐसी सूचनाओं के सार्वजनिक होने के बावजूद भी किसी नेता के खिलाफ कोई कारवाई नहीं हुई है। पंजाब की आप सरकार के इस तरह के कदमों से हिमाचल में भी आम आदमी की विश्वसनीयता बनने में एक आधार तैयार हो रहा है। लेकिन इसी कदम के साथ हिमाचल में भी भाजपा से निकलकर आप में शामिल हुये नेताओं पर चर्चा आ सकती हैं क्योंकि संघ की सक्रिय पृष्ठभूमि से निकलकर दूसरे दलों में गये नेताओं की पहली निष्ठा संघ में ही रहती है। जबकि आज की बुनियादी समस्याओं के लिये संघ की वैचारिकता ही सबसे बड़ा कारण है। 1980 में जनता पार्टी इसी दोहरी निष्ठा के कारण टूटी थी। प्रदेश की आप इकाई में सिसोदिया के कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर आप के दो ग्रुपों में झगड़ा होने के वीडियो जिस तरह से वायरल हुये हैं उससे यह आशंका बराबर बन गयी है कि आने वाले दिनों में ऐसे झगड़े पार्टी के आकार लेने से पहले ही उसके लिए कोई कठिनाइयां न खड़ा कर दें। क्योंकि ऐसा झगड़ा होने की यह दूसरी घटना है। इसके लिए पार्टी में संयोजक का बनाया जाना बहुत आवश्यक हो गया है। क्योंकि प्रदेश स्तर पर भाजपा और कांग्रेस को एक साथ घेरना आवश्यक है। लेकिन अभी तक प्रदेश के नेता उसी पाठ को दोहरा रहे हैं जिसकी इबारत उन्हें दिल्ली से लिखकर दी जा रही है। इस समय सोशल मीडिया में पार्टी के लिये वह लोग पोस्टे डाल रहे हैं जो इसके लिये अधिकृत ही नहीं है। बल्कि उनकी पहली निष्ठांये आज भी भाजपा के साथ हैं। ऐसे में आप के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा आप के लिये जो भी व्यावहारिक आधार तैयार किया जा रहा है उस को आगे बढ़ाने के लिये जब तक स्थानीय स्तर पर कोई सक्षम लोग नहीं होंगे तब तक कोई ज्यादा परिणाम सामने नहीं आयेंगे। जब तक प्रदेश इकाई की पूर्ण घोषणा नहीं हो जायेगी तब तक यह आरोप लगता ही रहेगा कि कहीं पार्टी अंत में अपरोक्ष रूप में भाजपा को ही मजबूत करने का प्रयास तो नहीं कर रही है। क्योंकि अभी तक सिराज में रोड शो और रैली करने की तारीख घोषित नहीं हो पायी है।
बार-बार नड्डा के प्रदेश दौरों से उठी चर्चा
नड्डा का फ्रन्ट पर आना जय राम की सफलता या मजबूरी
शिमला/शैल। इस वर्ष के अन्त में प्रदेश विधानसभा के लिये चुनाव होने हैं। भाजपा कांग्रेस और आप तीनों राजनीतिक दलों के लिये यह चुनाव अपने अपने कारणों से महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि दिल्ली और पंजाब दोनों जगह भाजपा और कांग्रेस आप से हार चुके हैं। हरियाणा में भाजपा अकेले अपने दम पर सत्ता में नहीं है। ऐसे में यदि हिमाचल भी इनके हाथ से निकल जाता है तो दोनों दलों को राष्ट्रीय स्तर पर बहुत गहरा आघात लगेगा और उसके परिणाम भी दूरगामी होंगे कांग्रेस ने प्रदेश संगठन में बदलाव करके इसमें होने वाले पलायन को रोक लिया है। लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा अभी ऐसा कुछ नहीं कर पायी है। जबकि उसके संगठन और सरकार में लम्बे अरसे से बदलाव की चर्चाएं चलती आ रही हैं। जब भाजपा प्रदेश में चारों उपचुनाव हार गयी थी तब नेतृत्व परिवर्तन से लेकर कुछ मंत्रियों को हटाने और कुछ के विभागों में फेरबदल किये जाने की चर्चाएं बहुत तेज हो गयी थी। लेकिन यह सब व्यवहारिक शक्ल नहीं ले पाया है। ऐसा क्यों हुआ है यह विश्लेष्कों के लिए अब तक खोज का विषय बना हुआ है। लेकिन इस पर कलम चलाने से पहले प्रदेश के शीर्ष प्रशासन पर उठते सवालों और उन पर सरकार की रहस्यमई चुप्पी सवालों में है। आज सरकार के मुख्य सचिव से लेकर उनकी नीचे के पांच अधिकारी भी सवालों में आ खड़े हुये हैं। क्योंकि दो-दो जगह सरकारी आवास लेने के अतिरिक्त विशेष वेतन का वितीय लाभ भी ले रहे हैं। नियमों के अनुसार यह गंभीर अपराध है। पूरे प्रदेश में यह चर्चा का विषय बना हुआ है। लेकिन मुख्यमंत्री इस पर चुप है। पुलिस भर्ती परीक्षा के पेपर लीक मामले में करीब दो दर्जन लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। प्रदेश में यह अपनी तरह का पहला मामला है जिसमें इतने बड़े स्तर पर प्रश्न पत्रों को बेचा गया है। कई तरह के नाम चर्चा में आ रहे हैं। विपक्ष मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रही है। लेकिन सरकार कोई फैसला नहीं ले पा रही है। यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर मुख्यमंत्री की क्या ऐसी मजबूरी है जो उन्हें कड़ा कदम लेने से रोक रही है। सरकार नेता प्रतिपक्ष को तो मंत्री स्तरीय आवास दे नहीं पायी है लेकिन अपने अफसरों को दिल्ली और शिमला में एक साथ मकान दे कर बैठी हुयी है। कर्ज में डूबी सरकार के इस तरह के आचरण का आम आदमी पर क्या प्रभाव पड़ रहा होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। देर सवेर अधिकारियों का यह मामला विजिलेंस और अदालत में पहुंचेगा ही। ऐसे में राजनीतिक पंड़ितों के लिए यह बड़ा सवाल बना हुआ है कि जिस सरकार का शीर्ष प्रशासन सवालों के कटघरे में खड़ा हो भर्ती परीक्षा के पेपर बेचे जाने के प्रकरण में मामला गिरफ्तारीयों तक पहुंच जाये उस सरकार की साख अपने अंध भक्तों से हटकर आम आदमी की नजर में कहां खड़ी होगी इसका अंदाजा भले ही नेता लोग न लगा पा रहे हो लेकिन आम आदमी पूरी तरह स्पष्ट है। क्योंकि 12ः बेरोजगारी की दर के कारण प्रदेश का नाम देश के 6 राज्यों में आ चुका है। इस सबके बावजूद भी जब हाईकमान न हिल रहा हो तो निश्चित रूप से ध्यान जयराम के दिल्ली में बैठे दो वकीलों जेपी नड्डा और अनुराग ठाकुर पर जायेगा। क्योंकि नड्डा ने ही जयराम के वकील होने का दावा किया है। इस वकालत नामे पर अमल करते हुये दोनों वकील प्रदेश में किसी न किसी बहाने आने का कार्यक्रम बनाने पर विवश हो गये हैं। अब तो प्रधानमंत्री को भी लाने का जुगाड़ बैठा लिया गया है। भले ही अंतिम क्षणों में प्रधानमंत्री न आ पायें लेकिन एक बार तो आम कार्यकर्ताओं को बता ही दिया गया है कि प्रधानमंत्री सरकार से कितने खुश हैं। इस परिदृश्य में यह सवाल भी काफी रोचक हो गया है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल को पोस्टरों में जगह न देने और धूमल की हार के कारणों की जांच की मांग को सीधे ठुकराने के बाद नड्डा ने प्रदेश की जिम्मेदारी अपने कंधों पर कैसे ले ली है। नड्डा को फ्रन्ट पर लाकर खड़ा कर देना जयराम की सफलता है या नड्डा की मजबूरी इस पर अभी पर्दा बना हुआ है। लेकिन इस सब में अनुराग की भूमिका आने वाले दिनों में क्या रहती है यह देखना रोचक होगा। क्योंकि जिस तरह से नड्डा प्रदेश में बार-बार आकर रोड शो करने पर मजबूर होते जा रहे हैं उससे प्रदेश में जीत की जिम्मेदारी जयराम से बदलकर नड्डा पर आती जा रही है। इसमें यह देखना भी रोचक होगा कि नड्डा अन्त तक जयराम के साथ खड़े रहते हैं या कुछ कदम चलकर पांव पीछे खींच लेते हैं।
कमेटियों का कार्यकाल 12-07-2021 को समाप्त हो गया था
इस दौरान सचिव पर्यावरण की जिम्मेदारी पहले के.के.पंथ के पास थी और अब प्रबोध सक्सेना के पास है
क्या इस दौरान क्लियर किये गये मामले वैध माने जा सकते हैं जबकि कमेटी ही नहीं थी
सुप्रीम कोर्ट की पर्यावरण पर गंभीरता के बाद मामला हुआ रोचक
शिमला/शैल। प्रदेश विजिलैन्स के पास सरकार के पर्यावरण विभाग को लेकर 11-04-22 को एक शिकायत आयी है। इस शिकायत का संज्ञान लेते हुये विजिलैन्स ने इसमें प्रारंभिक जांच आदेशित करते हुये निदेशक पर्यावरण से आठ बिन्दूओं पर रिकॉर्ड तलब किया है। इसमें जानकारी मांगी गई है कि भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने प्रदेश की एस ई ए सी का 1-1-2021 से अब तक कब गठन किया गया था या उसको विस्तार दिया था। दूसरा बिंदु है कि केंद्र ने हिमाचल के एस ई आई ए का 1-1- 21 को अब तक कब गठन किया या विस्तार दिया। तीसरा है की 1-1- 21 से अब तक पर्यावरण क्लीयरेंस के कितने मामले आये हैं। चौथा है कि इन कमेटियों की बैठकों में क्या-क्या एजेंडा रहा है। पांचवा है कि इन कमेटियों की कारवायी का विवरण। 1-1- 21 से अब तक प्रदेश की इन कमेटियों द्वारा पर्यावरण के कितने मामले क्लियर किये गये तथा सदस्य सचिव द्वारा उनके आदेश जारी किये गये। कितने मामलों की सूचना डाक द्वारा भेजी गई और कितनों में हाथोंहाथ दी गयी।
विजिलेंस के पत्र से स्पष्ट हो जाता है कि पर्यावरण से जुड़ी इन कमेटियों का महत्व कितना है। किसी भी छोटे बड़े उद्योग की स्थापना के लिए इन कमेटियों की क्लीयरेंस अनिवार्य है। क्योंकि पर्यावरण आज एक गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने तो एक मामले में यहां तक कह दिया है कि पर्यावरण आपके अधिकारों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। पर्यावरण की इस गंभीरता के कारण ही भारत सरकार वन एवं पर्यावरण मंत्रालय प्रदेशों के लिए इन कमेटियों का गठन स्वयं करता है। यह अधिकार राज्यों को नहीं दिया गया है। पर्यावरण से जुड़ी क्लीयरेंस के बिना कोई भी उद्योग स्थापित नहीं किया जा सकता है। इसलिए जितने बड़े आकार का उद्योग रहता है उतने ही बड़े उससे जुड़े हित हो जाते हैं और यहीं पर बड़ा खेल हो जाता है। प्रदेश में पर्यावरण विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में नियुक्तियां इसी कारण से अहम हो जाती हैं। इन्हीं को लेकर समय-समय पर संबद्ध अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें आती रही हैं। कसौली कांड इसका सबसे बड़ा प्रमाण रहा है। सरकार अपने विश्वसतों को बचाने के लिए किस हद तक जाती रही है उसका उदाहरण भी यही कसौली कांड बन जाता है। क्योंकि इसमें नामित और चिन्हित लोगों के खिलाफ आज तक कोई कार्यवाही नहीं हो पायी है।
इसी प्ररिपेक्ष में विजिलेंस तक पहुंचे इस मामले में भी अंतिम परिणाम तक पहुंचने को लेकर संशय उभरना शुरू हो गया है। क्योंकि भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा गठित यह कमेटी 12-07-2021 को समाप्त हो गई थी। केंद्र को यह सूचना प्रदेश सरकार द्वारा दी जानी थी। ताकि नई कमेटीयों का गठन हो जाता। यह जिम्मेदारी सरकार के सचिव पर्यावरण और संबंधित मंत्री की थी। सचिव की जिम्मेदारी पहले के.के. पंथ के पास रही है और अब प्रबोध सक्सेना के पास है। मंत्री स्तर पर पर्यावरण विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। 12-07-2021 को समाप्त हो चुकी कमेटियों का गठन क्यों नहीं किया गया? क्या इस दौरान प्रदेश में किसी नए उद्योग का प्रस्ताव ही नहीं आया। सरकार ने 2019 की अपनी उद्योग नीति में भी संशोधन किया है। क्या इस संशोधन के दौरान भी इन कमेटियों का कोई जिक्र नहीं आया। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जो सरकार की नीयत और नीति पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। अब जब किसी ने विजिलेंस के पास यह शिकायत कर दी है तो इसी दौरान भारत सरकार ने भी प्रदेश से इसमें जवाब तलब किया है। लेकिन यह चर्चा भी सामने आ रही है कि भारत सरकार में भी इस मामले को रफा-दफा करवाने के प्रयास किए जा रहे हैं। संबद्ध अधिकारी अपनी गलती मान कर भारत सरकार से क्षमा कर दिये जाने की गुहार लगा रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर भी प्रयास किये जा रहे हैं। जिस तरह की गंभीरता सुप्रीम कोर्ट पर्यावरण को लेकर दिखा चुका है उसके परिदृश्य में इस पर गंभीर कारवाई बनती है। क्योंकि इस दौरान जितने भी उद्योगों के मामले मामलों में पर्यावरण क्लीयरेंस जारी किये गये होंगे उनकी कानूनी वैधता संदिग्ध हो जाती है। क्योंकि जिसने भी यह क्लीयरेंस अनुमोदित की होगी वह उसके लिए अधिकृत ही नहीं था। चुनावी वर्ष में यह मामला सरकार की सेहत पर कितना असर डालता है और विपक्ष की इसी पर क्या प्रतिक्रिया रहती है यह देखना दिलचस्प होगा।

