Monday, 02 March 2026
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डॉ राज बहादुर के अपमान पर आप की चुप्पी सवालों में

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश में आप ने चुनाव लड़ने का ऐलान पंजाब की जीत से प्रोत्साहित होकर किया था। बल्कि इस जीत के बाद अरविन्द केजरीवाल हिमाचल के हर दौरे में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवन्त मान को अपने साथ लाते रहे हैं। लेकिन जैसे ही अनुराग ठाकुर ने आप में सेन्धमारी करके इसके संयोजक को भाजपा में लाकर खड़ा कर दिया तभी से आप के फैलाव पर रोक लगनी शुरू हो गयी। बल्कि अनुराग की सेन्धमारी के बाद प्रदेश कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुखविन्दर सिंह सुक्खू भी इसमें सक्रिय हो गये और उन्होंने आप के पूर्व संयोजक रहे निक्का सिंह पटियाल और कुछ अन्य नेताओं को कांग्रेस में लाकर खड़ा कर दिया। अब भाजपा ने धर्मशाला के राकेश चौधरी को आप से निकालकर अपने में शामिल करवा दिया है। स्मरणीय है कि पिछले विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर 16000 वोट लेने वाले राकेश ने अरविन्द केजरीवाल के सामने आप का दामन थामा था।
अब पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ने जिस तरह से हिमाचल के ऊना से ताल्लुक रखने वाले बाबा फरीद मैडिकल विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ राजबहादुर को अपमानित किया है वह पूरे मैडिकल जगत में एक मुद्दा बन गया है। हर व्यक्ति इसकी निन्दा करते हुए पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री की बर्खास्तगी की मांग कर रहा है। हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा ने इसको बड़ा मुद्दा बनाकर उछाला है। लेकिन हिमाचल की आप इकाई इस मुद्दे पर एकदम चुप्पी साध कर बैठ गयी है। जबकि हर हिमाचली डॉ. राजबहादुर के इस अपमान को प्रदेश का अपमान कर पंजाब सरकार से सार्वजनिक क्षमा याचना करने की मांग कर रहा है। पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री का व्यवहार निश्चित रूप से निंदनीय है। लेकिन प्रदेश इकाई की इस पर चुप्पी यह दर्शाती है कि इसके किसी भी नेता में गलत को गलत कहने का साहस नहीं है। इससे यह भी सामने आता है कि आप का प्रदेश नेतृत्व कितना परिपक्व है। आप की चुप्पी पार्टी की सेहत के लिये घातक सिद्ध होगी यह तय है।

सरकार की असफलताओं का कोई डैमेज कंट्रोल नहीं होता

जब प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा परोसा जा रहा है तो साथ ही कर्ज का क्यों नहीं
जिस प्रदेश के हर आदमी की आय दो लाख है उस सरकार को कर्ज क्यों लेना पड़ रहा है
कर्ज के सहारे रेवड़ीयां कब तक बंटेगी?

शिमला/शैल। भाजपा ने अभी उर्मिल ठाकुर, चेतन बरागटा, राकेश चौधरी की पार्टी में वापसी करवा कर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि अब उन्होंने डैमेज कन्ट्रोल कर लिया है। पार्टी के जो कार्यकर्ता खीमीराम और इन्दु वर्मा के कांग्रेस में जाने से हताशा में आ गये थे उन्हें इस डैमेज कन्ट्रोल कवायद से क्या राहत मिली होगी और कितना मनोबल बड़ा होगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यहां विचारणीय अवश्य है कि क्या उर्मिल ठाकुर और चेतन बरागटा किसी अन्य दल में शामिल हो गये थे? शायद नहीं क्योंकि उर्मिल ठाकुर का कांग्रेस में जाना नाममात्र का ही रहा है। यह घर के नाराज लोग अब घर वापस आ गये हैं बस इतनी सी उपलब्धि है। जबकि असली समस्या उन लोगों की है जो 2017 के चुनाव तक पार्टी के बड़े चेहरे माने जाते थे और 2017 के बाद उन्हें ऐसे भुला दिया गया कि यह शायद कभी इस संगठन का हिस्सा ही

नहीं थे। इन्हीं लोगों के लिये यह खबरें प्लांट होती रही कि दो दर्जन से भी अधिक पुराने प्रत्याशियों को टिकट नहीं दिये जायेंगे। यह कारण है कि इस समय एक दर्जन से भी अधिक ऐसे लोगों ने हर हालत में अगला चुनाव लड़ने की परोक्ष/अपरोक्ष में घोषणा कर रखी है। राकेश चौधरी के वापसी भाजपा में आने पर संजय शर्मा ने जिन तेवरों से पत्राकार वार्ता के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया दी है वह भविष्य को लेकर बड़ा संकेत है। क्योंकि इसी डैमेज कन्ट्रोल की कवायद के बाद भी जसवां परागपुर से क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण के सदस्य रहे मुकेश कुमार ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। आज अधिकांश मंत्रियों के खिलाफ संघ के पुराने लोगों ने ही बगावत का बिगुल बजा दिया है। ऊना में वीरेन्द्र कंवर के खिलाफ संघ के संस्थापक रहे स्व. वेद रत्न आर्य के परिवार ने ही बगावत कर दी है। प्रशासन पर सरकार की पकड़ कितनी है इसका अनुभव ऊना में भी सतपाल सत्ती को उस समय हो गया जब उन्हें डैड बॉडी वैन तक प्रशासन उपलब्ध नहीं करवा पाया। ऐसे प्रकरण लगभग हर चुनाव क्षेत्र में घट चुके हैं।
आज मुख्यमंत्री चुनावों के परिदृश्य में हर चुनाव क्षेत्र में करोड़ों की योजनाओं की घोषणा कर रहे हैं। इन घोषणाओं का प्रदेश की जनता पर कितना सकारात्मक प्रभाव पढ़ सकेगा। क्योंकि यह प्रदेश की जनता के सामने ही है कि जब केन्द्र द्वारा घोषित 69 राष्ट्रीय राजमार्ग अभी तक सिद्धांत से आगे नहीं बढ़ पाये हैं तो मुख्यमंत्री की घोषणाओं को पूरा होने में तो दशकों लग जायेंगे। आज सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के सम्मेलन बुलाकर उन्हें अपरोक्ष में यह कहा जा रहा है कि इस लाभ के बढ़ते तुम्हें अब भाजपा को वोट देना है। लेकिन इन लाभार्थियों से यह जानने का प्रयास किसी ने नहीं किया है कि इस महंगाई में उनका चूला कैसे जल रहा है? उनसे यह भी नहीं पूछा है कि उन्हीं के घर में बेरोजगार कितने हैं और क्या वह उज्जवला योजना में मुफ्त मिले गैस सिलैण्डर को आसानी से रिफिल करवा पाये हैं।
अभी प्रधानमंत्री ने मुफ्ती योजनाओं को रेबड़ियां कहकर भविष्य के लिए घातक करार दिया है। सर्वाेच्च न्यायालय ने भी इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सरकार से इस संबंध में पॉलिसी बनाने के लिये कहा है। याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया है कि जो राज्य मुफ्ती की घोषणा करेंगे उन्हें कर्ज लेने की सुविधा न दी जाये। आज जयराम सरकार जिन लाभार्थियों के सम्मेलन आयोजित करने जा रही है क्या उन सम्मेलनों में इन लोगों को यह भरोसा दिला पायेगी कि प्रधानमंत्री की चेतावनी के बावजूद वह इन मुफ्ती योजनाओं को जारी रख पायेगी? क्या यह आश्वासन दे पायेगी कि वह इसके लिए जनता पर कर्ज का बोझ और नहीं डालेगी? आज सरकार जब प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा 201854 बता रही है तो इसके साथ प्रति व्यक्ति कर्ज का आंकड़ा क्यों नहीं बताया जा रहा है? जिस प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय दो लाख है उस पर देश को इतना कर्ज क्यों लेना पड़ रहा है? उस प्रदेश का राजस्व में कुल बजट का कैग के मुताबिक 90% क्यों हो गया है? यह वह सवाल है जिनका जवाब आने वाले दिनों में देना पड़ेगा। इन व्यवहारिक प्रश्नों से जब आम आदमी का वास्ता पड़ेगा तो वह सरकार को कितना समर्थन दे पायेगा? यह देखना रोचक होगा। इस परिदृश्य में स्पष्ट है कि लोगों की नाराजगी सरकार से है जिसे किसी भी डैमेज कन्ट्रोल से नहीं रोका जा सकता और न ही दूसरे दलों में तोड़फोड़ करना इसका हल है।

सरकार की असफलताओं का कोई डैमेज कंट्रोल नहीं होता
जब प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा परोसा जा रहा है तो साथ ही कर्ज का क्यों नहीं
जिस प्रदेश के हर आदमी की आय दो लाख है उस सरकार को कर्ज क्यों लेना पड़ रहा है
कर्ज के सहारे रेवड़ीयां कब तक बंटेगी?
शिमला/शैल। भाजपा ने अभी उर्मिल ठाकुर, चेतन बरागटा, राकेश चौधरी की पार्टी में वापसी करवा कर यह संदेश देने का प्रयास किया है कि अब उन्होंने डैमेज कन्ट्रोल कर लिया है। पार्टी के जो कार्यकर्ता खीमीराम और इन्दु वर्मा के कांग्रेस में जाने से हताशा में आ गये थे उन्हें इस डैमेज कन्ट्रोल कवायद से क्या राहत मिली होगी और कितना मनोबल बड़ा होगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा। लेकिन यहां विचारणीय अवश्य है कि क्या उर्मिल ठाकुर और चेतन बरागटा किसी अन्य दल में शामिल हो गये थे? शायद नहीं क्योंकि उर्मिल ठाकुर का कांग्रेस में जाना नाममात्र का ही रहा है। यह घर के नाराज लोग अब घर वापस आ गये हैं बस इतनी सी उपलब्धि है। जबकि असली समस्या उन लोगों की है जो 2017 के चुनाव तक पार्टी के बड़े चेहरे माने जाते थे और 2017 के बाद उन्हें ऐसे भुला दिया गया कि यह शायद कभी इस संगठन का हिस्सा ही
नहीं थे। इन्हीं लोगों के लिये यह खबरें प्लांट होती रही कि दो दर्जन से भी अधिक पुराने प्रत्याशियों को टिकट नहीं दिये जायेंगे। यह कारण है कि इस समय एक दर्जन से भी अधिक ऐसे लोगों ने हर हालत में अगला चुनाव लड़ने की परोक्ष/अपरोक्ष में घोषणा कर रखी है। राकेश चौधरी के वापसी भाजपा में आने पर संजय शर्मा ने जिन तेवरों से पत्रकार वार्ता के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया दी है वह भविष्य को लेकर बड़ा संकेत है। क्योंकि इसी डैमेज कन्ट्रोल की कवायद के बाद भी जसवां परागपुर से क्षेत्रीय परिवहन प्राधिकरण के सदस्य रहे मुकेश कुमार ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। आज अधिकांश मंत्रियों के खिलाफ संघ के पुराने लोगों ने ही बगावत का बिगुल बजा दिया है। ऊना में वीरेन्द्र कंवर के खिलाफ संघ के संस्थापक रहे स्व. वेद रत्न आर्य के परिवार ने ही बगावत कर दी है। प्रशासन पर सरकार की पकड़ कितनी है इसका अनुभव ऊना में भी सतपाल सत्ती को उस समय हो गया जब उन्हें डैड बॉडी वैन तक प्रशासन उपलब्ध नहीं करवा पाया। ऐसे प्रकरण लगभग हर चुनाव क्षेत्र में घट चुके हैं।
आज मुख्यमंत्री चुनावों के परिदृश्य में हर चुनाव क्षेत्र में करोड़ों की योजनाओं की घोषणा कर रहे हैं। इन घोषणाओं का प्रदेश की जनता पर कितना सकारात्मक प्रभाव पढ़ सकेगा। क्योंकि यह प्रदेश की जनता के सामने ही है कि जब केन्द्र द्वारा घोषित 69 राष्ट्रीय राजमार्ग अभी तक सिद्धांत से आगे नहीं बढ़ पाये हैं तो मुख्यमंत्री की घोषणाओं को पूरा होने में तो दशकों लग जायेंगे। आज सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के सम्मेलन बुलाकर उन्हें अपरोक्ष में यह कहा जा रहा है कि इस लाभ के बढ़ते तुम्हें अब भाजपा को वोट देना है। लेकिन इन लाभार्थियों से यह जानने का प्रयास किसी ने नहीं किया है कि इस महंगाई में उनका चूला कैसे जल रहा है? उनसे यह भी नहीं पूछा है कि उन्हीं के घर में बेरोजगार कितने हैं और क्या वह उज्जवला योजना में मुफ्त मिले गैस सिलैण्डर को आसानी से रिफिल करवा पाये हैं।
अभी प्रधानमंत्री ने मुफ्ती योजनाओं को रेबड़ियां कहकर भविष्य के लिए घातक करार दिया है। सर्वाेच्च न्यायालय ने भी इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सरकार से इस संबंध में पॉलिसी बनाने के लिये कहा है। याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया है कि जो राज्य मुफ्ती की घोषणा करेंगे उन्हें कर्ज लेने की सुविधा न दी जाये। आज जयराम सरकार जिन लाभार्थियों के सम्मेलन आयोजित करने जा रही है क्या उन सम्मेलनों में इन लोगों को यह भरोसा दिला पायेगी कि प्रधानमंत्री की चेतावनी के बावजूद वह इन मुफ्ती योजनाओं को जारी रख पायेगी? क्या यह आश्वासन दे पायेगी कि वह इसके लिए जनता पर कर्ज का बोझ और नहीं डालेगी? आज सरकार जब प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा 201854 बता रही है तो इसके साथ प्रति व्यक्ति कर्ज का आंकड़ा क्यों नहीं बताया जा रहा है? जिस प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय दो लाख है उस पर देश को इतना कर्ज क्यों लेना पड़ रहा है? उस प्रदेश का राजस्व में कुल बजट का कैग के मुताबिक 90% क्यों हो गया है? यह वह सवाल है जिनका जवाब आने वाले दिनों में देना पड़ेगा। इन व्यवहारिक प्रश्नों से जब आम आदमी का वास्ता पड़ेगा तो वह सरकार को कितना समर्थन दे पायेगा? यह देखना रोचक होगा। इस परिदृश्य में स्पष्ट है कि लोगों की नाराजगी सरकार से है जिसे किसी भी डैमेज कन्ट्रोल से नहीं रोका जा सकता और न ही दूसरे दलों में तोड़फोड़ करना इसका हल है।

चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में नहीं बनी भाजपा की सरकार

समय-समय पर आये पत्र बम्बों ने बिगाड़ा गणित
अधिकांश मंत्रियों की वापसी संदिग्ध
जिस महंगाई ने उपचुनाव हराये उसके चलते आम चुनाव कैसे हो सकते हैं सुरक्षित
खीमी, कुठियाला और इन्दु वर्मा के बाद यह आंकड़ा एक दर्जन होने की संभावना

शिमला/शैल। क्या हिमाचल में भाजपा सत्ता में वापसी कर पायेगी? क्या भाजपा हिमाचल कांग्रेस में तोड़फोड़ कर पायेगी? यह सवाल इन दिनों फिर पूछे जाने लग पड़े हैं। क्योंकि जब भाजपा चारों उपचुनाव हार गयी थी तो इस हार के लिये महंगाई को जिम्मेदार ठहराया गया था। अब यह महंगाई और बढ़ गयी है लेकिन जयराम के मंत्रिमण्डलीय सहयोगी वीरेन्द्र कंवर महंगाई को कोई मुद्दा ही नहीं मानते हैं। इस आश्य का उनका ब्यान छपा है। वैसे अब जब साधारण खाद्य सामग्री पर जीएसटी लगा दिया गया है तो स्वभाविक रूप से महंगाई बढ़ेगी ही। लेकिन इस महंगाई पर अभी तक मुख्यमंत्री ने मुंह नहीं खोला है। तय है कि जब महंगाई से तंग आकर जनता उपचुनाव हरवा सकती है तो अब जब सरकार बदली जा सकती है तो जनता क्यों पीछे रहेगी। उपचुनाव में मिली हार के बाद यह लगातार छपता रहा है कि जिन मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड अच्छा नहीं है उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। उनके विभाग बदले जा सकते हैं। चुनाव में तीन दर्जन लोगों के टिकट बदले जायेंगे। उप चुनावों के बाद इस आश्य का जो कुछ भी छपा वह भले ही सही नही हुआ हो लेकिन इससे यह संदेश अवश्य गया है कि सरकार और संगठन में सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। जब उत्तराखंड में धामी की हार के बाद भी उसे मुख्यमंत्री बना दिया गया तब हिमाचल में भी यह मांग उठी की धूमल की हार के कारणों की जांच की जाये। इस मांग को किस तरह नकारा गया और यहां तक कह दिया गया कि 2017 में पुराने नेतृत्व और नीति को खत्म करके नया नेता और नीति लायी गयी है। इसका असर धूमल समर्थकों पर क्या हुआ होगा इसका अन्दाजा लगाना कठिन नहीं होगा। बल्कि जब इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए दो निर्दलीय विधायकों को भाजपा में शामिल किया गया इससे धूमल समर्थकों रविन्द्र रवि और गुलाब सिंह ठाकुर को हाशिये पर धकेल दिया गया। इससे भी भाजपा के अन्दर खेमे बाजी होने का ही प्रमाण मिलता है। जयराम के कार्यकाल में पार्टी के अपने ही कार्यकर्ताओं और नेताओं ने सरकार के खिलाफ पत्र बम्बों के माध्यम से नेतृत्व और हाईकमान को समय-समय पर आगाह करने के प्रयास हुये हैं वह भी किसी से छिपा नहीं है। भले ही कांग्रेस सरकार के खिलाफ आरोपपत्र न ला पायी हो लेकिन जो मुद्दे इन पत्र बम्बों में उछले हैं उनका असर विपक्ष के आरोपों से कहीं ज्यादा है। क्योंकि चुनाव के दौरान यह पत्र बम फिर से मुद्दा बन जायेंगे इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है। चंडीगढ़ में एक मंत्री की पत्नी के पर्स की चोरी होने पर दर्ज हुई एफआईआर का परिणाम आज तक सामने नहीं आया है। इन पत्र बम्बों के माध्यम से मुद्दे आज तक अपनी जगह खड़े हैं। बल्कि इसी का परिणाम है कि अब भाजपा छोड़ नेता कांग्रेस में जाने लग पड़े हैं। खीमी राम, मनोज कुठियाला और अब इन्दु वर्मा सबका कांग्रेस में जाना यह इंगित करता है कि निकट भविष्य में यह लाइन उम्मीद से ज्यादा लंबी हो सकती है। भाजपा तो यह दावे ही करती रही है कि कांग्रेस से लोग भाजपा में आयेंगे जैसा कि अन्य प्रदेशों में हो रहा है। लेकिन हिमाचल में इससे उलट हो रहा है और इसका प्रदेश नेतृत्व के पास कोई जवाब नहीं है। बल्कि इस परिदृश्य में जो चुनाव पूर्व चार सर्वेक्षण हुए उनके परिणाम भी वायरल हो चुके हैं। किसी भी सर्वेक्षण में भाजपा सत्ता में वापसी नहीं कर पायी है। सबसे बड़े जिले कांगड़ा में दो या तीन के आंकड़े से आगे नहीं बढ़ पायी है। चंबा, ऊना, हमीरपुर और बिलासपुर में शून्य होने की संभावनाएं हैं। जनजातीय क्षेत्रों में भी शून्य का सर्वे है। अधिकांश मंत्री सुरक्षित नहीं माने जा रहे हैं। केवल गोदी मीडिया की रिपोर्टों में स्थिति संतोषजनक है।

क्या बिना काम के बैठाना जिम्मेदारी में समकक्षता है

सरकार के आदेश से उभरी चर्चा

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने अभी 14 तारीख को 1987 बैच के आईएएस अधिकारी राम सुभाग सिंह को मुख्य सचिव के पद से हटाकर उनके स्थान पर 1988 बैच के आर.डी. धीमान को इस पद पर तैनात किया है। वैसे राम सुभाग सिंह की सेवानिवृत्ति जुलाई 2023 में होगी। मुख्य सचिव किसको बनाना है यह मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है। इसमें यही सुनिश्चित किया जाता है यदि किसी जूनियर को इस पद पर तैनाती दी जाती है तो ऐसे में नजरअन्दाज किये जाने वाले सीनियर को उसके जूनियर के तहत पोस्ट न किया जाये। जयराम सरकार ने भी आर.डी. धीमान को मुख्य सचिव नियुक्त करते हुये उनसे सीनियर राम सुभाग सिंह, निशा सिंह और संजय गुप्ता को नजरअंदाज करके इन लोगों को बतौर सलाहकार नियुक्तियां दी। यह नियुक्तियां व्यवहारिक रूप से बिना काम के बैठने वाली होती हैं। क्योंकि कोई भी विभागीय सचिव सलाहकार से सलाह लेने नहीं जाता है। सरकार के रूल्स ऑफ बिजनेस में भी सलाहकार का पद परिभाषित नहीं है। किस स्तर पर कौन सी फाइल सलाहकार को जायेगी ऐसा कुछ भी इन नियमों में प्रदत नहीं है और यह नियम बाकायदा विधानसभा से पारित हैं और गोपनीय माने जाते हैं। इस परिपेक्ष में जब यह सामने आया कि इन तीनों अधिकारियों को बिना काम के बैठा दिया गया है जबकि नियमों के मुताबिक इन्हें मुख्य सचिव के समकक्ष होना है। यह सामने आते ही एक और आदेश पारित करके इन लोगों को मुख्य सचिव के समकक्ष स्टेटस और जिम्मेदारियां दी गयी। इस आशय का आदेश अलग से जारी हुआ है। लेकिन व्यवहार में इन अधिकारियों के पास कोई फाइल आने का प्रावधान ही रूल्स ऑफ बिजनेस में नहीं है। ऐसे में कोई भी अधिकारी बिना काम के जिम्मेदारी में भी मुख्य सचिव के समकक्ष कैसे हो जायेगा? यह सवाल सचिवालय के गलियारों से लेकर सड़क तक बराबर चर्चा में चल रहा है। क्योंकि यह अधिकारी और इनके कार्यालयों में तैनात कर्मचारी कई लाखों में वेतन ले रहे हैं। लेकिन सभी बिना काम के बैठे हैं। मान सम्मान तो बिना काम के बैठ कर भी मिलना माना जा सकता है। लेकिन बिना काम के भी जिम्मेदारी में भी समकक्षता कैसे हो जायेगी यह रहस्य बना हुआ है।

यह माना जा रहा है कि इस स्तर के तीन-तीन अधिकारियों को चुनावों से 4 माह पहले बिना काम के बैठा कर प्रदेश की जनता और पूरे प्रशासन को जो संदेश अपरोक्ष में जा रहा है वह सरकार की चुनावी सेहत के लिये बहुत घातक सिद्ध होगा। क्योंकि नजरअन्दाज हुये अधिकारी स्वभाविक है कि वह सरकार के अब शुभचिंतक नहीं हो सकते। इस स्तर के अधिकारियों के पास सरकार को लेकर जो जानकारियां रही होंगी वह चुनावों के दौरान बाहर आकर सरकार के लिये कैसी कठिनाइयां पैदा करेंगे यह तो आने वाला समय ही बतायेगा जिन सलाहकारों ने चुनावों से चार माह पहले ऐसी सलाह दी है उन्होंने इससे पहले क्या-क्या किया होगा यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं होगा।

केजरीवाल पर प्रधानमंत्री के हमले से आप की प्रदेश इकाई की चुप्पी सवालों में

शिमला/शैल। क्या आम आदमी पार्टी हिमाचल में अपनी चुनावी उपस्थिति दर्ज करा पायेगी? यह सवाल पिछले कुछ समय से पूछा जाने लगा है। क्योंकि पंजाब में मिली सफलता के सहारे जिस आगाज से पार्टी ने प्रदेश में दस्तक दी थी और यह दावा किया गया था कि दो लाख लोगों ने इसकी सदस्यता ग्रहण कर ली है। मुख्यमंत्री के गृह जिले मण्डी में रैली करके पहला शक्ति प्रदर्शन किया था और मुख्यमंत्री को उन्हीं के चुनाव क्षेत्र में घेरने का दावा किया था। लेकिन पार्टी की दूसरी रैली कांगड़ा में होने से पहले ही इस के तत्कालीन संयोजक अनूप केसरी और दो अन्य नेताओं को अनुराग ठाकुर ने भाजपा का सदस्य बना कर सारी बाजी ही पलट दी। इसके बाद पार्टी को नई प्रदेश कार्यकारिणी बनाने में समय लगा और इसी दौरान हिमाचल के प्रभारी रहे सत्येंद्र जैन को ईडी ने गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी के बाद प्रदेश ईकाई अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पायी है। मनीष सिसोदिया ने शिक्षा को मुद्दा बनाने का जो मंत्र प्रदेश इकाई को दिया था अब उसका जाप भी लगभग बंद हो गया है। अब प्रदेश ईकाई पंजाब का नाम लेना भी भूल रही है क्योंकि एक तो वहां पर उपचुनाव हार गयी और फिर जिस तरह से पंजाब में राघव चड्डा को सलाहकार कमेटी का मुखिया बनाया गया तथा उस पर पंजाब में ही सवाल उठ गये। उसका भी हिमाचल की इकाई पर असर पड़ा है क्योंकि प्रदेश के नेताओं को यह समझ ही नहीं आ पा रहा है कि वह इसका क्या जवाब दें। यही नहीं जिस दिल्ली मॉडल के सहारे हिमाचल में सत्ता के सपने लिये जाने लगे थे अब जब प्रधानमंत्री ने उस मॉडल पर हमला करते हुए मुफ्ती को भविष्य के लिए घातक करार देकर केजरीवाल को सिंगापुर जाने की अनुमति नहीं दी है। प्रधानमंत्री के इस हमले से निश्चित रूप से पार्टी की योजनाओं पर अंकुश और प्रश्न चिन्ह दोनों एक साथ लगने की स्थिति पैदा हो गयी है। पार्टी की बढ़त पर यह एक बड़ा हमला है और प्रदेश का कोई भी नेता इसके जवाब में मुंह नहीं खोल रहा है जबकि इसी मॉडल के पोस्टर हर प्रचार अभियान में बांटे जा रहे हैं। शायद इससे हटकर प्रदेश नेतृत्व के पास और कुछ भी नहीं है। यह लोग प्रदेश सरकार से कोई भी सवाल नहीं पूछ पा रहे हैं। इससे यह संदेश जा रहा है कि प्रदेश इकाई के नेतृत्व को प्रदेश की समस्याओं की कोई जानकारी ही नहीं है या फिर कुछ लोगों की निष्ठाएं अभी भी संघ भाजपा के साथ बनी हुई है। क्योंकि अब तक यह लोग कांग्रेस को ही निशाने पर लेकर चल रहे थे और भाजपा भी इन्हें खुला हाथ दिये हुए थी। परंतु अब जब प्रधानमंत्री ने सीधे केजरीवाल पर निशाना साध दिया है उससे आप एक बड़ा वर्ग हताशा में आ गया है जबकि इस समय बदले में प्रधानमंत्री पर बड़े सवाल दागना समय की मांग बन गया है।

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