शिमला/शैल। भाजपा ने टिकट आवंटन के लिये कोर कमेटी की बैठक को रद्द करके संसदीय क्षेत्रवार पदाधिकारियों की बैठक बुलाकर उनसे प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के लिये तीन-तीन नामों का गुप्त मतदान करवाकर उनकी राय जानने की प्रक्रिया अपनाई है। इस मतदान की पेटियां हेलीकॉप्टर के माध्यम से दिल्ली ले जाकर चुनाव चयन कमेटी के सामने रखी जायेंगी। भाजपा को यह प्रक्रिया अपनाने की की बात चुनाव तारीखों का ऐलान होने के बाद ही क्यों दिमाग में आयी। यह सवाल विश्लेषकों के लिये महत्वपूर्ण हो गया है। क्योंकि जब प्रधानमंत्री की चम्बा में रैली आयोजित की गयी थी तब वहां पर जो पोस्टर लगाये गये थे उनमें राज्यसभा सांसद इन्दु गोस्वामी का फोटो गायब था। जैसे ही यह सूचना दिल्ली पहुंची तो वहां से आये निर्देशों के बाद पुराने पोस्टर हटाकर इन्दु गोस्वामी के फोटो के साथ नये पोस्टर लगाये गये। इन्दु गोस्वामी का पोस्टर इस तरह से आने के बाद भाजपा के भीतर की राजनीति में फिर तूफान खड़ा हो गया है। क्योंकि इन्दु गोस्वामी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चाएं दो बार बड़ी गंभीरता से उठ चुकी हैं। इन्हीं चर्चाओं के बीच इन्दु गोस्वामी ने सुजानपुर में प्रेम कुमार धूमल को भारी मतों से जीताने की अपील कर दी थी। इससे यह संकेत स्पष्ट रूप से उभर रहे थे की धूमल और इन्दु गोस्वामी का गठजोड़ आने वाले समय में प्रभावी हो सकता है। धूमल कि 2017 के चुनाव में हार एक प्रायोजित षडयंत्र थी यह सामने आ चुका है। धूमल को अपना राजनीतिक सम्मान बहाल करवाने के लिए एक बार चुनाव लड़ कर जीतने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता है।
भाजपा के अन्दर अचानक उभरी यह स्थिति आगे चलकर क्या करवट लेती है यह टिकट वितरण से ही साफ हो जाएगा। क्या धूमल और उनके समर्थकों को पार्टी टिकट देती है या नहीं? अगर धूमल चुनाव लड़ते हैं तो स्पष्ट संदेश होगा कि अगले मुख्यमंत्री वही होंगे। इससे एक बार फिर नड्डा-जयराम बनाम धूमल खेमों में अघोषित संघर्ष और तेज हो जायेगा। क्योंकि जब दोनों निर्दलीयों को भाजपा में शामिल करवाया गया था तो उससे धूमल समर्थक ही सीधे प्रभावित हुए थे और इसमें स्थानीय मण्डलों तक को विश्वास में नहीं लिया गया था। वहां से दोनों खेमों में शुरू हुआ यह संघर्ष अब टिकट वितरण में क्या असर दिखाता है यह देखना रोचक होगा। क्या मुख्यमंत्री खेमा इन लोगों को टिकट दिलवा पाता है या नहीं? दोनों निर्दलीयों को स्थानीय मण्डलों के विरोध के बावजूद टिकट मिलना सीधा संकेत होगा कि इस चुनाव में धूमल खेमे को पूरी तरह अप्रसांगिक कर दिया गया है।
ऐसी स्थिति में यह देखना दिलचस्प होगा कि धूमल खेमा चुनाव में क्या भूमिका निभाता है। चुनाव प्रचार में कितना सक्रिय रह पाता है। यह माना जा रहा है कि नड्डा जय राम के आश्वासन पर भाजपा में शामिल हुए चारों विधायकों को यदि पार्टी टिकट दे देती है तो उस स्थिति में किसी भी विधायक या मंत्री का टिकट काट पाना संभव नहीं हो पायेगा। सरकार पर लगते आ रहे नॉन परफारमैन्स के आरोपों के साथ ही पार्टी को चुनाव में उतरना होगा।
शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के चुनावी टिकटों के आवटन में सिद्धांत रूप से जब यह फैसला लिया था की सभी वर्तमान विधायकों पूर्व में रहे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षों और वर्तमान में प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पदाधिकारियों को टिकट दिये जायेंगे तो उससे कांग्रेस की भाजपा और आप पर एक मनोवैज्ञानिक बढ़त बन गयी थी। लेकिन इस बढ़त पर उस समय ग्रहण लग गया जब विप्लव ठाकुर जैसी वरिष्ठ नेता का ब्यान आ गया कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है। इसी के साथ शिमला जिला से किसी ने पार्टी द्वारा करवाये गये सर्वेक्षणों की विश्वसनीयता पर यह कहकर सवाल खड़े कर दिये कि सर्वेक्षण का यह काम किसी बड़े नेता ने अपने ही किसी खास रिश्तेदार को एक योजना के तहत दिया था। इन ब्यानों का किसी बड़े नेता ने खण्डन नहीं किया और इसके बाद पार्टी से कुछ लोग भाजपा में चले गये तथा टिकट आवंटन कमेटी में सुखविंदर सुक्खू और प्रतिभा सिंह में उभरे मतभेदों की खबरें तक छप गयी। इसी सब के कारण टिकट आवंटन अभी तक फाईनल नही हो पाया है। बल्कि कांग्रेस में उभरी इस स्थिति को भाजपा और आप पूरी तरह अपने पक्ष में भुना भी रहे हैं। ऐसे में यह आकलन करना स्वभाविक हो जाता है कि कांग्रेस ने ऐसी स्थिति क्यों उभरी है और इसका पार्टी की चुनावी सेहत पर क्या असर पड़ेगां कांग्रेस प्रदेश में 2014 2017 और 2019 में हुये चुनावों में बुरी तरह हार चुकी है। जबकि तब स्व.वीरभद्र और स्व.पंडित सुखराम जैसे बड़े नेता भी मौजूद थे। इसके बाद जब प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बदला तब कांग्रेस ने पहले दो नगर निगम और फिर 3 विधानसभा तथा एक लोकसभा का उप चुनाव जीता। क्या कांग्रेस की यह जीत प्रदेश नेतृत्व के कारण हुई या राष्ट्रीय स्तर पर योजनाबद्ध तरीके से चलती रही राहुल गांधी की सक्रियता से। इस पक्ष पर शायद आज तक खुलकर विचार नहीं हुआ है। जबकि व्यवहारिक सच तो यह रहा है कि 2014 से लेकर मार्च 2020 में कोविड के कारण लगे लॉकडाउन तक केन्द्र सरकार के जो भी आर्थिक फैसले रहे हैं उन पर पूरे देश में पूरी स्पष्टता के साथ किसी भी दूसरे नेता ने बेबाक सवाल नहीं उठाये हैं। इन आर्थिक फैसलों का असर आज महंगाई और बेरोजगारी के रूप में हर घर तक पहुंच चुका है। इन्हीं फैसलों के कारण विकास दर का आकलन लगातार घटता जा रहा है। रूपया डॉलर की मुकाबले बुरी तरह लूढ़क चुका है। केन्द्र से लेकर राज्यों तक कर्ज इतना बढ़ चुका है कि रिजर्व बैंक तक श्रीलंका जैसे हालात हो जाने की आशंका व्यक्त कर चुका है। इस वस्तु स्थिति ने आम आदमी को पूरी तरह आतंकित कर दिया है। सरकार इससे ध्यान हटाने के लिए जांच एजैन्सियों का खुला राजनीतिक उपयोग करने पर आ गयी है। आर्थिक स्थिति पर संघ प्रमुख मोहन भागवत तक चिन्ता व्यक्त कर चुके हैं। यह व्यवहारिक स्थिति कांग्रेस की ताकत बन गयी है और इसी का एहसास शायद प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को नहीं है। जबकि चारों उपचुनाव हारने के बाद से लेकर आज तक सरकार के पक्ष में कर्ज बढ़ने के अतिरिक्त कुछ नहीं घटा है। इस व्यवहारिक स्थिति के बावजूद प्रदेश कांग्रेस के नेताओं में बढ़ती खींचतान इसका संकेत मानी जा रही है कि आज यह नेता अपने को येन केन प्रकरेण मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करवाने की कवायद में लग गये हैं। यह सही है कि स्व. वीरभद्र सिंह के बाद नेतृत्व के नाम पर कांग्रेस शून्य की स्थिति से गुजर रही है। स्व. वीरभद्र सिंह के निधन से उपजी सहानुभूति को भुनाने के लिए प्रतिभा सिंह को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना समय की मांग था। लेकिन इस समय भी नेता को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करना घातक होगा। क्योंकि जो भी घोषित होगा उसे पूरे प्रदेश में प्रचार के लिये निकलना पड़ेगा और पीछे से वह धूमल की तरह अपनों के ही षड़यंत्र का शिकार हो जायेगा। ऐसे में यदि मुख्यमंत्री के लिये दावेदारी जताने वालों को अपने-अपने जिले की सारी सीटें जिताने की जिम्मेदारी डाल दी जाये तो इससे पार्टी और नेता दोनों को ही लाभ मिलेगा।
मुख्यमंत्री द्वारा राहुल को पप्पू प्रचारित करने से उठी चर्चा।
क्या मोदी के ड्रोन ज्ञान पर चर्चा का माहौल तैयार कर रहे हैं मुख्यमंत्री
शिमला/शैल। सत्ता में वापसी का दावा करना और उस दावे पर जन विश्वसनीयता बनाने के लिए अपनी कथित उपलब्धियों का करोड़ों के विज्ञापन जारी करके जनता में बखान करने का सरकार और सत्तारूढ़ दल को पूरा-पूरा अधिकार है। क्योंकि उन दावों की जमीनी सच्चाई प्रचार के लिये जारी हुए विज्ञापनों में नहीं बल्कि जनता के सामने यथास्थिति खड़ी होती है। आज चुनाव की पूर्व संध्या पर जिस सरकार के विशेषज्ञ डाक्टर अपनी मांगों के लिये हड़ताल पर जाने को विवश हो जायें जहां राजधानी के साथ सटे स्कूल में ही कोई भी अध्यापक न होने का आरोप लगे जहां लंपी रोग से त्रस्त जनता के सामने पशु औषधालय में एक-एक डॉक्टर के हवाले चार-चार अस्पताल हों जहां अस्पताल को जमीन देने के लिये गौशाला से गाय औणे पौणेे दामों में अपने को बेचने के आरोप लगने लग जायें तो ऐसी सच्चाई को विज्ञापनों के आवरण में ढकने के सारे प्रयास बहुत बौने पड़ जाते हैं। ऐसी कड़वी सच्चाई के सामने पर जब कोई मुख्यमंत्री विपक्ष के लिये ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने पर आ जाये कि ‘‘कांग्रेस तो तब आयेगी जब हम उसे आने लायक रखेंगे’’ तब न चाहते हुए भी यह सोचना पड़ जाता है कि यह भाषा किसी अहंकार के कारण है या सच्चाई के बेनकाब हो जाने की हताशा से उपजी पीड़ा का प्रमाण है। क्योंकि मुख्यमंत्री ने इस भाषा का प्रयोग प्रधानमंत्री की बिलासपुर रैली के बाद करना शुरू किया है। बिलासपुर में जब शीर्ष भाजपा नेतृत्व ने प्रदेश में हुए सारे विकास का श्रेय एक स्वर में नरेन्द्र मोदी के नाम कर दिया और प्रधानमंत्री ने आगे वह श्रेय जनता के नाम कर दिया तब ऐसी भक्ति से अभिभूत हुए प्रधानमंत्री ने जनता से अपना ड्रोन ज्ञान सांझा करते हुए यहां तक सपना दिखा दिया कि किन्नौर का आलू भी इससे बड़ी मंडियों में पहुंचाया जा सकता है। प्रधानमंत्री के इस ज्ञान पर विवश विपक्ष ने कोई बड़ी प्रतिक्रियाएं नहीं दी। क्योंकि इस तरह के ज्ञान के कई उदाहरण देश के सामने आ चुके हैं। परन्तु इस ज्ञान के बोझ से मुख्यमंत्री इतने दब गये हैं कि उन्हें लगा कि कहीं जनता सच में ही ड्रोन की मांग न करने लग जाये। इस मांग से जनता में कोई मुद्दा न खड़ा हो जाये इसलिये मुख्यमंत्री ने इस संभावित चर्चा का रुख कांग्रेस की ओर मोडते हुये तंज कस दिया कि कांग्रेस में उथल-पुथल पप्पू के कारण है और इसे प्रमाणित करने के लिए राहुल गांधी के नाम लगे आटा लिटरों में तोलने के बयान का हवाला भी दे दिया। राहुल गांधी को पप्पू प्रचारित करने में भाजपा ने आई टी सैल के माध्यम से मीडिया में लाखों रुपया निवेशित किया है। यह कोबरा पोस्ट के स्टिंग ऑपरेशन में सामने आ चुका है। आटा लिटरों में तोलने का बयान कैसे कांट-छांट करके तैयार किया गया था यह भी सामने आ चुका है। बल्कि इस बयान के बाद जब ‘‘बेटी बचाओ-बेटी पटाओ’’ का ब्यान पलटवार के रूप में सामने आया तब यह सारा प्रचार स्वतः ही बन्द हो गया। इस तरह से ब्यानों को तोड़मरोड़ कर पेश करने की संस्कृति आई टी सैल के कार्यकर्ताओं तक तो कुछ देर के लिए चल जाती है और उसे कोई ज्यादा अहमियत भी नहीं दी जाती है। लेकिन जब ऐसे बयानों का सहारा मुख्यमंत्री को अपने विरोधियों पर हमला करने के लिये लेना पड़ जाये तब सारे संदर्भ और अर्थ बदल जाते हैं। विश्लेषकों के लिये भी यह आकलन का मुद्दा बन जाता है। क्योंकि आज जयराम सरकार अपनों के ही पत्र बम्बों से इतनी घिरी हुई है कि इनमें लगाये गये आरोपों की जांच कर इन्हें स्थाई रूप से विराम देने की बजाय सरकार के सलाहकारों ने इन पत्रों के लेखकों की तलाश की ओर रुख कर लिया। इसका परिणाम यह हुआ कि न तो इन पत्रों के लेखकों को सरकार आज तक चिन्हित कर पायी और न ही इनमें लगे आरोपों से मुक्त हो पायी। जबकि सरकार की समझ के परिणाम स्वरुप यह पत्र अधिकारिक रूप से रिकॉर्ड पर आ चुके हैं। कुछ पत्रों पर तो मुख्यमंत्री के बयान की बाध्यता तक बन जाती है। इस वस्तु स्थिति में यह पत्र बम यदि अब चुनाव में एक मुद्दा बनकर सामने आ जाते हैं तो किसी को भी हैरत नहीं होगी। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि क्या सरकार इन पत्र बम्बों की आंच से कांग्रेस को तोड़फोड़ का डर दिखाकर या राहुल गांधी को पप्पू प्रचारित कर बच पायेगी।
चालीस टिकट बदले जाने की कवायद शुरू
धूमल के चुनाव लड़ने का फैसला हाईकमान पर छोड़ने के संकेत
नड्डा परिवार से बेटा या पत्नी के चुनाव लड़ने की संभावना
शिमला/शैल। भाजपा ने अभी तक विधानसभा चुनावों के लिये पार्टी के उम्मीदवारों की कोई सांकेतिक सूची तक जारी नहीं की है। जबकि कांग्रेस, माकपा और आप इस दिशा में भाजपा से बहुत आगे निकल चुके हैं। माना जा रहा है कि रणनीतिक तौर पर भाजपा अपने उम्मीदवारों की सूची अन्तिम दिन जारी करेगी। ताकि जिनके टिकट काट दिये जाते हैं उनके पास बगावत के लिए व्यवहारिक रूप से कोई समय न बचे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि जो पार्टी केन्द्र और प्रदेश में दोनों जगह पार्टी की सरकारें होने के नाम पर सत्ता में वापसी के दावे कर रही है वह इतना संभल कर क्यों चल रही है? उसे बगावत का खतरा क्यों महसूस हो रहा है? इस सवाल की पड़ताल करने के लिए 2017 के चुनावों से लेकर आज तक सरकार और पार्टी में घटी कुछ मुख्य घटनाओं का स्मरण करना आवश्यक हो जाता है। स्मरणीय है कि 2017 में भी पार्टी मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करने की रणनीति पर चली थी। लेकिन जब चुनाव प्रचार के दौरान यह फीडबैक मिला कि मुख्यमंत्री घोषित किये बिना जीत संभव नहीं है तब पीटरहॉफ की बैठक के बाद धूमल को मुख्यमंत्री घोषित करना पड़ा। इस घोषणा का लाभ मिला और पार्टी को चुनावों में बहुमत हासिल हो गया। परन्तु इस जीत में धूमल और उनके आधा दर्जन कट्टर समर्थक चुनाव हार गये। यह हार कितनी प्रायोजित थी यह जंजैहली प्रकरण से लेकर मानव भारती विश्वविद्यालय प्रकरण में शान्ता कुमार, राजेन्द्र राणा और जयराम की संयुक्त सक्रियता तथा बाद में सुरेश भारद्वाज के ब्यान से पूरी तरह खुलकर सामने आ चुकी है। इसी कारण से उस समय विधायकों का बहुमत धूमल के साथ होने के बावजूद उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया। उस समय जगत प्रकाश नड्डा ने भी मुख्यमंत्री बनने के लिये पूरे प्रयास किये थे और वह सफल नहीं हो पाये थे। यह पूरा प्रदेश जानता है।
इन परिस्थितियों में जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री तो बन गये लेकिन आगे चलकर बतौर मुख्यमंत्री उनकी परफॉरमैन्स का जब यह परिणाम सामने आया कि भाजपा के पास डबल इंजन होते हुये भी चार में से दो नगर निगम हारने के बाद तीन विधानसभा के रूप और एक लोकसभा उपचुनाव हारने से शिमला नगर निगम का चुनाव करवाने तक का साहस नहीं कर पाये। इस स्थिति पर किसी भी हाईकमान का माथा टनकना स्वभाविक था। इससे प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें चलना शुरू हो गयी। कई मंत्रियों की छुट्टी करने और विभाग बदलने की चर्चाएं शुरू हो गयी। लेकिन यह चर्चाएं व्यवहारिक रूप नहीं ले पायी। क्योंकि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा हिमाचल से ताल्लुक रखते थे। नड्डा धूमल शासनकाल में कैसे दिल्ली पहुंचे यह भी प्रदेश में सब जानते हैं। 2017 के चुनाव के बाद नड्डा ने फिर हिमाचल आने का मन बनाया तो जयराम ने इसे सफल नहीं होने दिया। लेकिन जब भी हिमाचल में नेतृत्व परिवर्तन का सवाल दिल्ली में उठा तो जयराम का विकल्प नड्डा की जगह धूमल ही उभरा। परन्तु नड्डा के लिये यह दिल से स्वीकार्य नहीं हो पाया। इसलिये परिस्थितियों ने जयराम को ही कुर्सी पर बनाये रखा। लेकिन जयराम अपने को प्रमाणित नहीं कर पाये वह अपनो के स्वार्थों से ऐसे घिर गये कि शीर्ष प्रशासन पर उनकी पकड़ और समझ रेत की मूठी से आगे नहीं बढ़ पायी। जो मुख्यमंत्री लोकसेवा आयोग के लिये किये गये अध्यक्ष के अपने फैसले को अन्जाम न दे सके जिस मुख्यमंत्री के शीर्ष प्रशासन के आधा दर्जन अधिकारियों पर लगे आरोपों की जांच के लिये आये पी.एम.ओ. के फरमान को अमली शक्ल न दे पाये वह प्रधानमंत्री का कितना विश्वास पात्र बना रह सकता है। इसका अन्दाजा लगाना किसी भी राजनीति विश्लेषक के लिये कठिन नहीं हो सकता है। मुख्यमंत्री की प्रशासनिक पकड़ का ताजा उदाहरण प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के रूप में सामने आया है। वर्ष 2000 में स्व. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर शुरू हुई इस योजना का अन्तिम चरण भी अब सितम्बर 2022 को समाप्त हो गया है। योजना का अन्तिम चरण 2019 में शुरू हुआ था। इस योजना में गांव को सड़कों से जोड़ना था। केंद्र में यह योजना ग्रामीण विकास विभाग देखता है। लेकिन हिमाचल में यह काम मुख्यमंत्री के लोक निर्माण विभाग के पास है। योजना समाप्त हो गयी है और इसके तहत बन रही 203 सड़के अभी तक अधूरी हैं। केन्द्र ने योजना की समय अवधि बढ़ाने का सरकार का आग्रह अस्वीकार कर दिया है। इनमें निवेशित हुआ सैकड़ों करोड़ रुपया बेकार होने के कगार पर पहुंच गया है। यदि मुख्यमंत्री के प्रभार में चल रहे विभाग की यह स्थिति होगी तो अन्य विभागों का क्या हाल होगा? क्या ऐसी परफॉरमेन्स पर सत्ता में वापसी के दावे जमीनी हकीकत हो सकते हैं। इस परिदृश्य में ही सुजानपुर में राज्य सभा सांसद इन्दु गोस्वामी को धूमल को भारी बहुमत से विजय बनाने का आह्वान करते हुये नेतृत्व के प्रश्न पर भी कई संकेत छोड़ जाता है। जबकि आज भाजपा के विधायक किस तरह प्रशासन पर अपने नाजायज फैसले मनवाने के लिये प्रशासन पर दबाव डाल रहे हैं यह विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज के वायरल वीडियो से सामने आ चुका है। उपाध्यक्ष केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर से शिकायत करने की धमकी दे रहे हैं। लेकिन मुख्यमंत्री से लेकर प्रदेश अध्यक्ष राष्ट्रीय अध्यक्ष और अनुराग ठाकुर तक की इस प्रकरण पर चुप्पी पार्टी और सरकार में फैली अराजकता का सीधा सन्देश दे रही है। इसी कारण से आज छः मंत्रियों सहित 30 विधायकों और 14 पूर्व विधायकों के टिकट काटने की चर्चा चल पडी है। इसी चर्चा के साथ नड्डा के बेटे या पत्नी तथा धूमल के चुनाव लड़ने का फैसला हाईकमान पर छोड़ा जा रहा है। निर्दलीयों और कांग्रेस से आये विधायकों तथा सुरेश चन्देल और हर्ष महाजन को शिमला की एक सीट से उम्मीदवार बनाने के लिये भाजपा अपने सिद्धांतों की आहुति देने के कगार पर आ पहुंची है।
शिमला/शैल। कांग्रेस के दो कार्यकारी अध्यक्ष पार्टी छोड़ भाजपा में चले गये हैं। विधायक लखविंदर राणा और पवन काजल भी भाजपा में शामिल हो गये हैं। तीन बार हमीरपुर से भाजपा सांसद और प्रदेश अध्यक्ष रहे सुरेश चन्देल भी भाजपा में वापसी कर गये हैं। कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने वाले सभी नेताओं ने कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व से लेकर प्रदेश नेतृत्व तक पर वही रश्मि आरोप दोहराये हैं जो भाजपा का केन्द्र से लेकर राज्य नेतृत्व अब तक लगाता आ रहा है। इनमें से कितने नेता ई.डी. और आयकर विभाग की दबिश से डरकर भाजपा में गये हैं यह सब आने वाले दिनों में सामने आ जायेगा लेकिन इन नेताओं के जाने से सही में कांग्रेस को कितना नुकसान होता है यह इस पर निर्भर करेगा कि जाने वाले कितने लोगों को भाजपा टिकट देकर चुनाव लड़वाती है और वह जीत भी जाते हैं। लेकिन इस जाने से भाजपा तन्त्र नौमिनेशन फाइल होने की अन्तिम दिन तक कई नेताओं और सक्रिय कार्यकर्ताओं के पार्टी छोड़ने की अफवाहें फैलाने के एजेंडे को अंजाम दे सकता है। इसका परिणाम भी उस समय सामने आ गया जब स्वयं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का यह ब्यान छप गया कि यदि कांग्रेस अध्यक्षा प्रतिभा सिंह भी भाजपा में आना चाहे तो उनका स्वागत है। बल्कि जब मुख्यमंत्री का यह ब्यान छपा तब एक वीडियो भी जारी हुआ जिसमें किसी भाजपा नेता राणा की प्रतिभा सिंह के साथ मीटिंग होने तक का जिक्र हुआ। कांग्रेस की ओर से न तो मुख्यमंत्री के ब्यान का और न ही इस वीडियो का कोई कड़ा जवाब आया। बल्कि यह जवाब न आने से और कई नेताओं के पार्टी छोड़ने की अफवाहों का बाजार गर्म है। ऐसी अफवाहों पर विराम लगवाना पार्टी नेतृत्व की जिम्मेदारी हो जाती है क्योंकि इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है। आज अफवाहों और ज्योतिषी आकलनों को मनोवैज्ञानिक हमले की संज्ञा दी जाती है जिसे काऊन्टर करना आवश्यक हो जाता है। कांग्रेस नेतृत्व इस प्रचार का जवाब देने में असफल रहा है इसमें कोई दो राय नहीं है। इस समय कांग्रेस में स्व. वीरभद्र सिंह के बाद नेतृत्व का सवाल स्वभाविक रूप से खड़ा है। क्योंकि आज की तारीख में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कॉल सिंह भी 2017 का चुनाव हारने के बाद नेतृत्व के पहले दावेदार नहीं रह जाते हैं। इस समय चुनाव न हारने के मानक पर आशा कुमारी और मुकेश अग्निहोत्री तथा हर्षवर्धन चौहान रह जाते हैं। ठाकुर रामलाल और सुखविन्दर सिंह सुक्खू के नाम भी चुनाव हारने का तमगा चिपक चुका है। लेकिन जहां मुकेश अग्निहोत्री ने सदन में नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपने को प्रमाणित कर दिया है वहीं पर मुकेश के बाद सुक्खू का बतौर अध्यक्ष रहा कार्यकाल भी पार्टी के लिये एक बड़ा योगदान रहा है जबकि वह स्व. वीरभद्र सिंह के साथ लगातार टकराव में रहे हैं। इस परिदृश्य में आज भाजपा के भ्रामक प्रचार को चुनौती देने की जिम्मेदारी सामूहिक रूप से प्रतिभा सिंह, आशा कुमारी, सुखविंदर सिंह सुक्खू और मुकेश अग्निहोत्री तथा हर्षवर्धन चौहान की बन जाती है। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व भाजपा के प्रचार को सक्षम रूप से चुनौती नहीं दे पा रहा है। बल्कि इन सभी नेताओं को उनके ही चुनाव क्षेत्रों में बांध कर रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। इस समय भाजपा जिला शिमला में सबसे ज्यादा कमजोर है भाजपा पर यह दबाव और पुख्ता करने के लिए यदि प्रतिभा सिंह शिमला से विधानसभा चुनाव लड़ने की योजना पर काम करती हैं तो शिमला के अतिरिक्त पूरे प्रदेश में वीरभद्र सिंह के समर्थकों को न केवल सक्रिय होने का अवसर मिलता है बल्कि उनको एक राजनीतिक आका भी मिल जाता है। संयोग से भाजपा में धूमल के अतिरिक्त प्रदेश स्तर पर भाजपा कार्यकर्ताओं को आका नहीं मिल पाया है। क्योंकि जयराम एक वर्ग विशेष से बाहर ही नहीं निकल पाये हैं।