विधायक अनिरुद्ध के आरोपों का जवाब क्यों नहीं दे पा रही भाजपा
क्या हर्ष महाजन पर अपने ही आरोप पत्र में लगाये गये आरोपों को भाजपा वापस लेगी?
हर्ष महाजन की गाड़ी का पंजीकरण और इन्श्योरैन्स खरीद से पहले ही नोटबंदी में कैसे संभव हुआ
शिमला/शैल। हिमाचल में जब तीन विधानसभा तथा एक लोकसभा चुनाव क्षेत्र के लिये उपचुनाव हुये थे और भाजपा की जयराम सरकार यह चारों उपचुनाव हार गयी तब इसके लिये मुख्यमंत्री ने महंगाई को जिम्मेदार ठहराया था। अब सरकार का कार्यकाल समाप्त होने के बाद विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। सरकार और भाजपा नेता यह प्रचार कर रहे हैं कि इस बार रिवाज बदलेगा तथा भाजपा सत्ता में वापसी करेगी। ऐसा प्रचार तथा दावे करके भाजपा नेता अपने स्वभाविक राजनीतिक धर्म का पालन कर रहे हैं। क्योंकि चुनावों से पहले ऐसे दावे करना उसकी जिम्मेदारी है। जबकि कड़वा सच यह है कि अभी आरबीआई को बैंकों के दिये जाने वाले कर्ज की ब्याज दरें बढ़ानी पड़ी हैं। यह दरें बढ़ाने का स्वभाविक परिणाम होगा कि आने वाले दिनों में महंगाई और बेरोजगारी बढ़ेगी। जिसका प्रभाव हर घर और रसोई पर पड़ता है और व्यवहारिक रूप से सभी को समझ आता है। महंगाई और बेरोजगारी बढ़ाने का फैसला पिछला बजट बनाते हुए ही ले लिया गया था जब गांवों से जुड़ी हर चीज के बजट में भारी-भरकम कटौतीयां कर दी गयी थी। यह कटौतीयां इसलिए की गयी थी क्योंकि आम आदमी की सुविधायें सरकार की प्राथमिकता ही नहीं है। इसलिए तो शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अहम सेवाएं भी पीपीपी मोड पर प्राइवेट सैक्टर को देने का फैसला ले लिया गया है। आने वाली स्थितियों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी अपनी मांगे बनाने के लिये हड़ताल का रुख करना पड़ रहा गया है। यह सारे प्रभाव चुनाव से पहले कुछ ही दिनों में आम आदमी को व्यवहारिक रूप से सामना करने पड़ेंगे यह तय है।
सरकार भी इन खतरों के प्रति सचेत है इसलिए सीबीआई, ईडी और आयकर जैसी जांच एजेंसियों को सक्रिय कर दिया गया है। यूपी विधानसभा चुनाव में यह पूरे देश ने देख लिया है कि जब भाजपा से जुड़ा एक जैन आयकर और ई डी की जांच में फंस जाता है तो कैसे उसके लिए सारा तर्क बदल दिया जाता है। लेकिन जब सपा से जुड़ा दूसरा जैन ई डी के निशाने पर आ गया तो फिर तर्क बदल गये। ऐसे दर्जनों मामले हैं जो जांच एजैन्सियों के राजनीतिक उपयोग का सच बयां करते हैं। हिमाचल में ही कांग्रेस विधायक अनिरुद्ध सिंह ने तो सीधे मुख्यमंत्री पर उन पर भाजपा में शामिल होने का दबाव डालने का आरोप लगाया है। इस आरोप का जवाब मुख्यमंत्री की ओर से न आकर सुरेश भारद्वाज की ओर से यह कहना कि लोग अपनी इच्छा से भाजपा में आ रहे हैं एक कमजोर प्रतिक्रिया है। बेरोजगारों में आज हिमाचल देश के टॉप छः राज्यों में शामिल है यह भारत सरकार की रिपोर्ट में दर्ज है। क्या आज कोई हिमाचल में लगातार बढ़ रही बेरोजगारी से प्रभावित होकर भाजपा में शामिल होना चाहेगा?
अभी जो लोग निर्दलीय या कांग्रेसी भाजपा में शामिल हुये हैं वह राजनीति के साथ विजनैस से भी जुड़े हुये हैं। राजनेता को आयकर तथा ई डी जैसी एजैन्सियां कभी कहीं भी परेशान कर सकती हैं यह संदेश आम आदमी में नीचे तक जा चुका है। कांग्रेस छोड़ भाजपा में गये पूर्व मन्त्री और कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष राज्य सहकारी बैंक के अध्यक्ष रह चुके हैं। अध्यक्षता के कारण भाजपा के आरोप पत्र में उनका नाम प्रमुखता से छपा हुआ है। भाजपा अपने ही आरोप पत्र में लगाये गये आरोपों का क्या जवाब देगी इस पर सबकी निगाहें लगी हुई है। नोटबन्दी के दौरान देशभर में पुराने नोटों को नये नोटों में बदलने में प्रदेश के सहकारी बैंकों का स्थान सबसे ऊपर रहा है। भाजपा ही इस पर एक समय सवाल उठा चुकी है। इसी नोटबन्दी के दौरान हर्ष महाजन 80 लाख की गाड़ी खरीद चुके हैं। इस गाड़ी का पंजीकरण और इन्श्योरेंस खरीदने से बहुत पहले हो चुका है। नूरपुर में हुआ यह पंजीकरण खरीद से पहले ही किन नियमों में संभव हुआ है भाजपा में ही इस पर एक समय सवाल उठ चुके हैं। चर्चा है कि यह सवाल अब फिर उठने जा रहा था। शायद इन सवालों से बचने के लिये ही हर्ष महाजन भाजपा में जाने के लिये बाध्य हुये हैं अन्यथा जो नेता एक दशक से भी ज्यादा समय से चुनावी राजनीति से विदा ले चुका हो उसकी चुनावी प्रसगिकता आज कितनी शेष रह चुकी होगी। इसका अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसा नेता कुछ लोगों को राजनीतिक गाली देने से ज्यादा क्या योगदान दे पायेगा यह अपने में ही अब सवाल बनता जा रहा है। वैसे राजनीति में सिद्धांतों और स्वच्छता का आवरण ओढ़े रखने वाली भाजपा कांग्रेस से गये हुये कितने लोगों को टिकट दे पाती है इस पर सबकी निगाहें लगी गयी हैं
शिमला/शैल। आम आदमी पार्टी ने जहां चार विधानसभा क्षेत्रों के लिये उम्मीदवारों की घोषणा की है वहीं पर सी.पी.एम. ने एक दर्जन क्षेत्रों के लिये उम्मीदवार घोषित कर दिये हैं। मौजूदा विधानसभा में भी सी.पी.एम. का एक उम्मीदवार है जिसकी सदन में रही वर्किंग इसका पर्याप्त प्रणाम बन जाती है कि सी.पी.एम. जन मुद्दों के प्रति कितना सजग और ईमानदार रही है। सी.पी.एम. की तुलना आम आदमी पार्टी से करना इसलिये आवश्यक हो जाती है कि आप प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा का विकल्प होने का दावा कर रही है। जबकि जन सरोकारों के मुद्दों पर सी.पी.एम. की गंभीरता तथा जन संघर्ष में भागीदारी कांग्रेस और भाजपा से कहीं अधिक रही है। आज शिक्षा को जिस तरह मौजूदा सरकार प्राईवेट सैक्टर के हवाले एक योजनाबद्ध तरीके से करती जा रही है और प्राईवेट शिक्षण संस्थानों ने फीसें बढ़ाकर करीब एक लाख तक पहुंचा दी है तब इस सब के विरूद्ध किसी ने आन्दोलन का आयोजन किया है तो इसका श्रेय केवल सी.पी.एम. को जाता है। शिक्षण संस्थाओं को बाजार बनाने के प्रयासों का विरोध किया जाना आज पहली आवश्यकता बन चुका है। क्योंकि सरकारी स्कूलों को जानबूझकर कमजोर रखा जा रहा है बल्कि अध्यापकों की आपूर्ति करवाने के लिए उच्च न्यायालय का सहारा तक लेना पड़ा है।
अभी जब पशुओं विशेषकर गोधन में जो लम्पी रोग का प्रकोप फैला और इस दिशा में सरकार के प्रयास नहीं के बराबर सिद्ध हुये तब सी.पी.एम. के नेता और कार्यकर्ता ही प्रभावितों का दर्द बांटने के लिये उनके पास पहुंचे। कुसुम्पटी क्षेत्र जो शिमला की जलापूर्ति का एक बड़ा स्त्रोत है जब इसके बाशिंदों को पेयजल का संकट झेलना पड़ा तब इनकी समस्या को संबद्ध प्रशासन तक पहुंचाने में सी.पी.एम. नेता डॉ. तनवर ही इनके पास पहुंचे। महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी सी.पी.एम. नेतृत्व जनता के साथ खड़ा होने में अग्रिम रहा है। जनहित से जुड़े मुद्दों पर सत्ता के खिलाफ खड़ा होने की जो भूमिका सी.पी.एम. ने निभाई है वह विपक्ष के नाते कांग्रेस या आप नहीं निभा पायी है। जन सरोकारों पर संघर्ष के मानक पर वाम नेतृत्व से ज्यादा खरा कोई नहीं उतरता है। ऐसे में यदि जनता का समर्थन मुद्दों के मानक पर आता है तो इस बार तीसरे दल के नाम पर सी.पी.एम. का दखल विधानसभा के पटल पर संख्या बल के नाम पर बहुत प्रभावी रहेगा यह तय है। क्योंकि आप भाजपा की बी टीम होने के लांछन से मुक्त नहीं हो पायी है। भाजपा सत्ता के लिए जांच एजैन्सियों के दुरुपयोग में सारी सीमाएं लांघती जा रही है यह धारणा समाज के हर वर्ग में बहुत गहरे तक उतर गयी है। कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग जांच एजैन्सियों के बढ़ते दखल से डरकर भाजपा में जाने में ही अपनी भलाई मान रहा है। इस वस्तुस्थिति का स्वभाविक राजनीतिक लाभ सी.पी.एम. को मिलना तय है।
क्या भाजपा का परिवारवाद का मानक अनिल-आश्रय पर लागू नहीं होगा?
क्या अनिल अब भी महेन्द्र सिंह को राजनीतिक गाली देने का साहस दिखायेंगे?
शिमला/शैल। भले ही बारिश ने प्रधानमन्त्री का मण्डी आना रोक दिया लेकिन इस मौसम ने सुखराम परिवार की राजनीतिक अनिश्चितता के बादल साफ करते हुये भाजपा में जाने का रास्ता प्रशस्त कर दिया है वैसे तो अनिल भाजपा के ही विधायक हैं। भाजपा ने उन्हें मन्त्री बनाकर पूरा सम्मान दिया था। परन्तु जब 2019 के लोकसभा चुनाव में अनिल के बेटे आश्रय शर्मा ने कांग्रेस के टिकट पर मण्डी से चुनाव लड़ लिया और अनिल स्वयं न तो भाजपा और मन्त्री पद छोड पाये न ही भाजपा के लिये चुनाव प्रचार कर पाये। इस स्थिति में भाजपा और अनिल के रिश्तों में कड़वाहट आयी तथा मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा। लेकिन इसके बावजूद न भाजपा ने अनिल को निकाला और न ही अनिल कोई राजनैतिक नैतिकता दिखाई बल्कि इस सारे दौरान यह आरोप अवश्य बार-बार लगाते रहे की मुख्यमन्त्री को खराब करने में केवल महेन्द्र सिंह का हाथ है। अब जिस ढंग से अनिल के बेटे आश्रय को भी भाजपा में ले आये हैं उससे यह अवश्य इंगित होता है कि मण्डी में महेन्द्र सिंह को कोसने का काम सुखराम परिवार को किसी योजना के तहत मुख्यमन्त्री ने ही तो नहीं दे रखा था। क्योंकि आज सुखराम परिवार के इस तरह पाला बदलने पर पूरी भाजपा खामोश है जबकि महेन्द्र सिंह के नाम का कवर लेकर जो जो आरोप यह लोग जयराम सरकार पर लगा चुके हैं उनका जवाब देना इन्हें ही कठिन हो जायेगा। इस परिदृश्य में यदि अनिल और आश्रय के सारे राजनीतिक चरित्र का आकलन इससे भाजपा को लाभ तथा कांग्रेस को नुकसान के गणित से किया जाये तो यही सामने आता है कि जब से पंडित सुखराम ने हिमाचल विकास कांग्रेस का गठन किया तब से मण्डी में कांग्रेस को चुनावी लाभ बड़े स्तर पर नहीं हो पाया है। क्योंकि मण्डी में कांग्रेस के बड़े नामों में स्व. पंडित सुखराम के साथ कौल सिंह, गुलाब सिंह, रंगीला राम राव और महेन्द्र सिंह का बराबर लिया जाता रहा है। इनमें से गुलाब सिंह और महेन्द्र सिंह तो कांग्रेस छोड़कर हिविकां मे शामिल हो गये। 1998 में हिविंका के सहयोग से भाजपा की सरकार बनने तक अनिल शर्मा की राजनीतिक छवि पंडित सुखराम का बेटा होने से ज्यादा नहीं बन पायी है। बल्कि जब स्वास्थ्य और केस के कारण पंडित जी की सक्रियता में कुछ कमी आयी तब अनिल घर के अन्दर के विवाद को भी बाहर आने से नहीं रोक पाये। बल्कि इस दौरान जयराम के हाथों महेन्द्र सिंह को सार्वजनिक रूप से राजनीतिक गाली देने के मोहरे के रूप में यूज होने से नहीं रोक पाये। बल्कि आश्रय भी कांग्रेस में होते हुये भी प्रतिभा सिंह और कौल सिंह को कोसने का मोहरा होकर ही रह गये। क्योंकि जब आश्रय ने मण्डी में प्रतिभा सिंह के दखल पर सवाल उठाये और द्रंग से कांग्रेस टिकट की दावेदारी जताई थी तभी राजनीतिक पंडितों के लिये यह स्पष्ट हो गया था कि अब आश्रय का भाजपा में जाना कभी भी घोषित हो सकता है। बल्कि अनिल का कांग्रेस में उपमुख्यमंत्री की मांग रखना भी इसी रणनीति का हिस्सा था। जिसे कांग्रेस ने समय रहते ही समझ लिया और अस्वीकार कर दिया। इस परिपेक्ष में जब अनिल और आश्रय भाजपा के हो जाते हैं तो सबसे पहले इन्हें परिवारवाद के मानक को क्रॉस करना होगा। क्या भाजपा इनके लिये इस मानक को नजरअन्दाज कर देगी? क्या इस मानक के लिये यह लोग अपने राजनीतिक हित की आहुति देने के लिये सहमत हो जायेंगे? यदि भाजपा अनिल आश्रय के लिये परिवारवाद के सिद्धांत को नजरअन्दाज करने पर सहमत हो जाती है तो उसी गणित से यह सिद्धान्त महेंद्र सिंह और धूमल परिवारों पर कैसे लागू हो पायेगा? वैसे तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा भी अपने बेटे को विधायक या सांसद देखना चाहते हैं। बिलासपुर की कोई भी राजनीतिक गतिविधि नड्डा के बेटे की उपस्थिति के बिना पूरी नहीं होती है। दूसरी ओर अब जब अनिल और आश्रय दोनों भाजपा के हो गये हैं तो अब वह किस नैतिकता के तहत महेन्द्र सिंह के खिलाफ पहले की तरह मुंह खोल पायेंगे यह भी आने वाले दिनों का एक बड़ा सवाल होगा जिसका प्रभाव पूरे प्रदेश पर पड़ेगा।
पार्टी के भीतर चर्चित होने लगा है यह मुद्दा
शिमला/शैल। आम आदमी पार्टी ने चार चुनाव क्षेत्रों फतेहपुर, नगरोटा श्री पांवटा साहिब और लाहौल स्पीति से उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है। लेकिन जब पार्टी इन नामों को अन्तिम रूप दे रही थी उसी दौरान कुछ नेता आप छोड़कर कांग्रेस में जा रहे थे। पंजाब में जीत दर्ज करने के बाद आप ने हिमाचल में चुनाव लड़ने का ऐलान किया था और बहुत लोग आप में शामिल भी हुये थे। लेकिन जैसे ही भाजपा के अनुराग ठाकुर ने इसमें सेन्ध लगाकर प्रदेश संयोजक सहित तीन नेताओं को भाजपा में शामिल करवा दिया उसके बाद से पार्टी में कोई बड़े चेहरे शामिल नहीं हो पाये हैं। बल्कि उसके बाद जो नई कार्यकारिणी का गठन हुआ उसमें बहुत सारे पुराने महत्वपूर्ण लोगों को हाशिये पर धकेल दिया गया। पूर्व डी.जी.पी. भण्डारी एक बड़ा नाम था जो अब निष्क्रिय होकर बैठ गया है। अभी तक पार्टी प्रदेश भाजपा और जयराम सरकार के खिलाफ कोई बड़ा मुद्दा लेकर जनता में नहीं आ पायी है। हिमाचल में पार्टी आगे बढ़ने के लिये पंजाब में आप की सरकार होने को आधार बनाकर चल रही है। अब जब पंजाब सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने शुरू हो गये हैं तब प्रदेश इकाई में ऐसा कोई चेहरा सामने नहीं है जो उन सवालों का जवाब देने के लिये सामने हो बल्कि अब जब राजन सुशान्त फिर से आप में आ गये हैं तब से फिर यह आशंका हो गयी है कि प्रदेश कार्यकारिणी के नेतृत्व में फिर से कोई बदलाव हो जाये। इस समय यदि किसी कारण से पंजाब की सरकार आने वाले दिनों में विवादित हो जाती हैं तो हिमाचल इकाई के पास अपना कुछ भी नहीं रह जायेगा। क्योंकि प्रदेश में जो भी नेतृत्व अब तक सक्रिय है वह व्यवहारिक रूप से दिल्ली सरकार के अच्छा शासन देने और भ्रष्टाचार पर नकेल डालने तथा भ्रष्टाचार के आरोपी अपने ही मंत्री को जेल भेजने के सूत्र वाक्यों से आगे नहीं बढ़ पाया है।
प्रदेश इकाई पर इस समय कौन निवेश कर रहा है? यह धन कहां से आ रहा है? इस समय प्रदेश में आप हाईकमान द्वारा भेजे करीब डेढ़ सौ लोगों की टीम सक्रिय है। यही टीम प्रदेश के नेताओं कार्यकर्ताओं को निर्देश जारी करती है। यह टीम की व्यवहारिक रूप से सर्वेसर्वा है। इसके सामने स्थानीय कार्यकर्ता और नेता केवल मोहरे हैं। यह टीम पार्टी के अपने पदाधिकारियों या कार्यकर्ताओं की नहीं है। बल्कि एक तरह व्यवसायिक लोग हैं जो मोटी पगार लेकर राजनीतिक काम कर रहे हैं। अब यह चर्चा पार्टी के भीतर बड़े पैमाने पर चल पड़ी है। यहां तक कहा जा रहा है कि नयी कार्यकारिणी के गठन में भी इन्हीं लोगों का हाथ है। पार्टी के भीतरी सूत्रों के मुताबिक इस समय तक करीब दो करोड़ प्रतिमाह का निवेश प्रदेश में हो रहा है। चुनावों के दौरान यह निवेश कई गुना बढ़ेगा यह तय है। स्वभाविक है कि राजनीतिक दल के लिये पैसा तो चाहिये ही। फिर आज के राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली एकदम कारपोरेट घरानों जैसी हो गयी है। इसके लिये निवेश तो चाहिये ही। यह निवेश उद्योगपतियों के अतिरिक्त और कहीं से मिल नहीं सकता। क्योंकि पार्टी के सदस्यों के शुल्क से तो कार्यालय का बिजली-पानी का बिल भी नहीं भरा जा सकता है।
आम आदमी पार्टी के संद्धर्भ में यह चर्चा इसलिये प्रसांगिक हो जाती है क्योंकि इसका नेतृत्व भ्रष्टाचार मुक्त शासन देने का दावा करता है। यह भी दावा करता है कि उसकी सरकार कर्ज के सारे नहीं चल रही है। जबकि केजरीवाल सरकार पर भी पचास हजार करोड़ का कर्ज होने का खुलासा आर.बी.आई. की उस रिपोर्ट के बाद सामने आ चुका है जिसमें तेरह राज्यों की सूची जारी की गयी थी। इस सूची में पंजाब भी शामिल है। आर.बी.आई. के मुताबिक यह कर्ज लेने की सारी सीमाएं लांघ चुके हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में पंजाब की वित्तीय स्थिति बिगड़ेगी। तब संसाधन बेचने और कर्ज लेने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह जायेगा। यही स्थिति हिमाचल की होने वाली है। अभी कर्ज लेने के लिये प्रतिभूतियों की नीलामी करनी पड़ी है। लेकिन इस स्थिति पर आज कोई भी विपक्षी दल सरकार से सवाल पूछने का साहस नहीं कर रहा है। आप का नेतृत्व दिल्ली और पंजाब की जो स्थिति हिमाचल में परोसकर एक राजनीतिक माहौल खड़ा करने का प्रयास कर रहा है उसके परिदृश्य में आप से यह सवाल उठाने आवश्यक हो जाते हैं। क्योंकि अब तक यही होता रहा है कि दिल्ली से आकर कोई भी नेता प्रदेश को गारंटी की घोषणा कर के चला जाता है और स्थानीय नेतृत्व उस की माला जपता रहता है। इससे यही संदेश जाता है कि हिमाचल का संचालन दिल्ली से ही होगा।
शिमला/शैल। केन्द्र सरकार ने सिरमौर के गिरी पार के हाटीयों को जनजातीय दर्जा दिया जाना स्वीकार कर लिया है। प्रदेश सरकार ने इसे अपनी एक बड़ी उपलब्धि करार देते हुए बड़े स्तर पर इसका प्रचार प्रसार किया है। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल के इस फैसले के बाद संसद में इस आश्य का संविधान संशोधन लाया जायेगा। संसद का सत्र अब वर्ष के अन्त में आयेगा जिसमें यह संशोधन पारित होगा। इस कारण अभी तुरन्त प्रभाव से इन लोगों को इसका लाभ नहीं मिल पायेगा। अभी जो भर्तियां बगैरा सरकार करेगी उसमें इस लाभ से यह लोग वंचित रह जायेंगे। ऐसे में यह सवाल उठना शुरू हो गया है कि यदि प्रदेश सरकार सही में इस पर गंभीर है तो केन्द्र से इसमें अध्यादेश जारी कर इसे तुरन्त प्रभाव से लागू कर सकती है। अन्यथा यह आशंका बराबर बनी रहेगी कि यह मुद्दा भी अंत में कहीं एक जुमला बनकर ही न रह जाये। क्योंकि इस पर कुछ समुदायों में रोष भी फैल गया है। लोग विरोध में धरने प्रदर्शनों पर आ गये हैं। बल्कि यह मामला प्रदेश उच्च न्यायालय तक भी पहुंच गया है।
स्मरणीय है कि हाटी का मसला हर चुनाव से पहले मुखर होता रहा है। 1995 और 2006 में दो बार इस पर पूर्व में विचार हो चुका है। किसी समुदाय या क्षेत्र विशेष को जन जातिय दर्जा देने के कुछ मानक तय हैं। लेकिन यह समुदाय इन मानकों पर पूरा नहीं उतरता रहा है। इसलिये राज्य सरकार के इस आश्य के प्रस्ताव भारत के महा रजिस्ट्रार एवं जनगणना आयुक्त के कार्यालय द्वारा अधिकार होते रहे हैं। इसमें 14 फरवरी 2017 को आया पत्र महत्वपूर्ण है। इस परिदृश्य में यह सवाल उठना स्वभाविक है कि यदि 2017 में यह समुदाय जनजातिय मानकों को पूरा नहीं कर रहा था तो आज 2022 में यह कैसे संभव हो सकता है। 2017 के पत्र के परिदृश्य में सरकार के लिये यह स्पष्ट करना आवश्यक हो जाता है कि वास्तविक स्थिति क्या है। क्योंकि अभी तक केन्द्र सरकार द्वारा पारित प्रस्ताव का प्रारूप सामने नहीं आ पाया है। इसलिये यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार अपनी गंभीरता और ईमानदारी दिखाने के लिए केन्द्र से अध्यादेश जारी करने का आग्रह करे। भारत सरकार का फरवरी 2017 का पत्र पाठकों के सामने रखा जा रहा है ताकि इस पर अपनी राय बना सकें।
भारत सरकार का पत्र