Monday, 02 March 2026
Blue Red Green

ShareThis for Joomla!

गुजरात और दिल्ली के चुनावों के परिदृश्य में हिमाचल में जीत का दावा करना बना भाजपा की आवश्यकता

चुनाव समीक्षा के बाद शीर्ष नेताओं के दावों में भिन्नता क्यों
समीक्षा में बीस प्रत्याशी ही जीत के प्रति आश्वस्त हो पाये

शिमला/शैल।मतदान के बाद राजनितिक दल चुनावी समीक्षाओं में व्यस्त हो गये हैं और ऐसा होना स्वभाविक भी है। हिमाचल का हर चुनाव भाजपा कांग्रेस और आप सभी के लिए अलग-अलग महत्व रखता है। इस चुनाव में यदि आप को कुछ मिल जाता है तो इससे उसकी राष्ट्रीय पार्टी बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। लेकिन इसके लिए आप अभी इंतजार कर सकती है और इसीलिए शायद उसने चुनाव के अन्त तक अपनी रणनीति ही बदल ली। भाजपा और कांग्रेस के लिये सीधी लड़ाई का रास्ता साफ कर दिया। भाजपा यदि यह चुनाव हार जाती है तो इसका सीधा प्रभाव हरियाणा पर पड़ेगा। क्योंकि दिल्ली और पंजाब पहले ही उसके हाथ से निकले हुए हैं। उत्तराखंड में हारे हुए आदमी को उपचुनाव लड़ा कर मुख्यमंत्री बनाना पड़ा है। कांग्रेस की स्थिति भी ऐसी ही है। हिमाचल हारने पर उसके पास पूरे क्षेत्र में पांव रखने के लिए जगह नहीं रहती। कांग्रेस और भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व इस स्थिति को समझता है। इसलिये भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व प्रदेश में लंगर डालकर बैठ गया। प्रधानमंत्री को एक दर्जन रैलियां सम्बोधित करनी पड़ी तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष को परिवार सहित बिलासपुर में डेरा डालना पड़ा। जबकि कांग्रेस ने इस चुनाव में भी स्व. वीरभद्र सिंह के प्रति पनपी सहानुभूति को पूरी तरह भुनाने में कोई कसर नहीं रखी।

इस पृष्ठभूमि में संपन्न हुए प्रदेश के चुनाव में भाजपा चारों उपचुनावों में शून्य होने के तमगे से बाहर ही नहीं निकल पायी। मुख्यमंत्री लाभार्थियों की रैलियों के गणित में ऐसे उलझे की यह भूल ही गये कि हर चीज की एक सीमा होती है। यह सीमाएं लांघने का ही परिणाम था कि प्रधानमंत्री की धर्मशाला की अंतिम रैली बुरी तरह असफल रही। कांग्रेस को जिस स्तर तक तोड़ने की योजना बना रखी थी वह पूरी तरह फेल हो गयी। बल्कि टिकट आवंटन के बाद जिस तरह की बागियों की समस्या से भाजपा को जूझना पड़ा उससे उनके प्रबंधकीय कौशल का भी जनाजा निकल गया। मुख्यमंत्री को यह मानना पड़ा कि एक दर्जन बागी भाजपा को नुकसान पहुंचा सकते हैं। मतदान के बाद बागियों से संपर्क बनाने के प्रयासों के बयान इसी हताशा का परिणाम है। इसलिये बागियों को लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के ब्यान अन्त विरोधी होकर सामने आ रहे हैं। मुख्यमंत्री बागियों से संपर्क में होने की बात कर रहे हैं तो प्रदेश प्रभारी बागियों के बिना ही अपने दम पर सरकार बनाने की बातें कर रहे हैं। शीर्ष नेताओं के परस्पर भिन्न ब्यानों से ही स्पष्ट हो जाता है कि परिणामों को लेकर सबकी एक राय नहीं है।
यह चुनाव पार्टी की नीतियों पर न होकर सरकार की पांच वर्ष की कारगुजारी पर हुए हैं। सरकार को पांच वर्षों में सात मुख्य सचिव क्यों बनाने पड़े इस सवाल का जवाब अन्त तक नहीं आया है। इस सवाल पर सरकार और संगठन में पांच वर्षों में कोई जुबान नहीं खोल पाया है कि लोकसेवा आयोग में जनवरी 2018 में की गयी नियुक्ति कार्यकाल के अन्त तक गले की हड्डी क्यों बनी रही? सरकार के इन कदमों का प्रशासनिक कुशलता पर ऐसा कुप्रभाव पड़ा जो अन्त तक सूलझ ही नहीं पाया। इस परिदृश्य में हुई चुनावी समीक्षा में कोई कितनी सपष्टता से अपनी बात रख पाया होगा इसका अन्दाजा लगाया जा सकता है। वैसे सूत्रों के मुताबिक इस समीक्षा में भी बीस से अधिक प्रत्याशी अपनी जीत का भरोसा नहीं दिला पाये हैं। इससे अन्दाजा लगाया जा सकता है कि अन्त में व्यवहारिक स्थिति क्या रहने वाली है। वैसे तो अभी गुजरात और दिल्ली एम सी डी के चुनावों के परिपेक्ष में यह दावा करना राजनीतिक आवश्यकता बन जाता है कि हिमाचल में भाजपा सत्ता में वापसी कर रही है। क्योंकि हिमाचल के अधिकांश नेताओं की दिल्ली में चुनाव प्रचार में जिम्मेदारियां लगी हुई हैं। इन प्रचार में जिम्मेदारियों के कारण हिमाचल में जीत का दावा करना राजनीतिक आवश्यकता बन जाता है।

77.6% मतदान सत्ता परिवर्तन का स्पष्ट संकेत

नड्डा जयराम का सिहासन संकट में
कांग्रेस अप्रत्याशित जीत की ओर अग्रसर
पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का प्रतिशत रहा अधिक
रामपुर में अनाधिकृत वाहन में मिली ईवीएम मशीनें

शिमला/शैल। मतदान का अन्तिम आंकड़ा 77.6% पर पहुंच गया है। इस मतदान में भी पुरुषों की अपेक्षा करीब 4.5% प्रतिशत महिलाओं ने अधिक मतदान किया है। यह अब तक का सबसे अधिक प्रतिशत रहा है और इस तरह के मतदान से हमेशा सत्ता परिवर्तन हुआ है। इसलिये इस बार भी सत्ता का भाजपा के हाथ से निकलना तय माना जा रहा है। यह चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई माना जा रहा है। हालांकि आप ने भी 67 सीटों पर चुनाव लड़ा और माकपा के भी 11 उम्मीदवार चुनाव में थे और पिछली बार 1 सीट पर जीत भी हासिल की थी। इनके अतिरिक्त निर्दलीय और अन्य छोटे दलों के भी कुछ उम्मीदवार मैदान में थे। लेकिन राजनीति में राष्ट्रीय परिदृश्य जिस मोड़ पर आ खड़ा हुआ है उसको सामने रखते हुए यही लगता है कि भाजपा और कांग्रेस को छोड़कर अन्य की भूमिका इस चुनाव में ज्यादा प्रभावी नहीं रहेगी।

इस चुनाव में भाजपा ने रिवाज बदलने का नारा दिया था। क्योंकि हिमाचल में अब तक कोई भी मुख्यमंत्री सत्ता में वापसी नहीं कर पाया है। यहां हर पांच वर्ष बाद सत्ता बदलती आयी है। जयराम इस परम्परा को तोड़ने के दावे के साथ चुनाव मैदान में उतरे हैं और विधानसभा के मानसून सत्र के तुरन्त बाद उन्होंने हर चुनाव क्षेत्र का दौरा करके करोड़ों की घोषणाएं और शिलान्यास किये। सरकार की योजनाओं के लाभार्थियों के दर्जनों सम्मेलन आयोजित किये। एक एक कार्यक्रम का मीडिया में इस तरह से प्रचार किया गया कि प्रदेश में जयराम सरकार से पहले शायद कोई विकास हुआ ही नहीं था। बल्कि इन कार्यक्रमों में भाजपा के ही पूर्व मुख्यमन्त्रियों शांता कुमार और प्रेम कुमार धूमल की भागीदारी नहीं के बराबर रही। मुख्यमंत्री के इतने प्रचार प्रयासों के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी एक दर्जन चुनाव रैलियां प्रदेश में संबोधित की हैं। गृह मन्त्री अमित शाह और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का योगदान अतिरिक्त रहा है। बल्कि नड्डा तो मतदान के बाद प्रदेश से दिल्ली गये हैं। क्योंकि हिमाचल उनका गृह राज्य है। केन्द्रीय नेतृत्व का जितना घेरा इस चुनाव प्रचार में प्रदेश में रहा है उसके बावजूद यदि प्रदेश भाजपा के हाथ से निकल जाता है जो कि तय माना जा रहा है तो उसके मायने क्या होंगे यह विश्लेषकों के लिए रोचक विषय बना हुआ है।
2017 का चुनाव भाजपा ने प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमन्त्री घोषित करके लड़ा था। भाजपा तो यह चुनाव जीत कर सता में आ गई लेकिन धूमल और उनके कुछ विश्वस्त स्वयं चुनाव हार गये। बड़े बाद में कुछ मन्त्रियों के ब्यानों से ही यह सामने आया कि धूमल की हार प्रायोजित थी। धूमल ने इसकी जांच करवाने की गुहार लगाई जिसे राष्ट्रीय अध्यक्ष नड्डा ने अस्वीकार कर दिया। बल्कि इसी दौरान धूमल को मानव भारती विश्वविद्यालय प्रकरण में घेरने का प्रयास किया गया। भाजपा के अन्दर का यह विरोधाभास यहीं नहीं रुका बल्कि निर्दलीय विधायक होशियार सिंह और प्रकाश राणा को पार्टी में शामिल करके धूमल के  विश्वसतों रविन्द्र रवि और गुलाब सिंह को हाशिये पर धकेलने का सफल प्रयास हुआ। इस पर संगठन के भीतर किस तरह की तनातनी के हालत बने यह पूरा प्रदेश जानता है। हिमाचल में गुजरात और उत्तराखंड की तर्ज पर नेतृत्व परिवर्तन की चर्चायें चली मन्त्रीयों को हटाने और उनके विभाग बदलने की चर्चायें चली। लेकिन यह सब कुछ नड्डा के संरक्षण के चलते चर्चाओं से आगे नहीं बढ़ा। 2017 में जब जयराम मुख्यमंत्री बने थे तब विधायकों का एक बड़ा वर्ग धूमल को मुख्यमंत्री बनाने के पक्ष में आ गया था। लेकिन तभी नड्डा भी मुख्यमंत्री बनने के प्रयासों में आ गये थे। 2017 की यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधि रही है और इस ने भाजपा की प्रदेश राजनीति को लगातार प्रभावित किया है।
इस परिदृश्य में जब भाजपा में चुनावी टिकटों के आवंटन का अवसर आया तो मन्त्री महेंद्र सिंह का टिकट काटकर उनके बेटे को टिकट दे दिया। पूर्व मंत्री स्व. बरागटा के बेटे को उपचुनाव में परिवारवाद के नाम पर टिकट नहीं दिया गया था लेकिन इस बार दे दिया गया। दो मन्त्रीयों सुरेश भारद्वाज और राकेश पठानिया के चुनाव क्षेत्र बदल दिये गये। इस टिकट बांट में भाजपा के अन्दर रोष उभरा और करीब दो दर्जन बागियों ने चुनाव लड़ लिया। प्रधानमंत्री को कृपाल परमार को फोन करके चुनाव से हटने का आग्रह करना पड़ा और परमार ने यह आग्रह अस्वीकार कर दिया। जगत प्रकाश नड्डा के बिलासपुर सदर में बागी सुभाष शर्मा ने नड्डा से मिलने से ही इन्कार कर दिया। नड्डा बिलासपुर में ही किसी बागी को मना नहीं पाये। अनुराग ठाकुर और महेश्वर सिंह के सार्वजनिक मंच पर आंसू निकल आये। प्रेम कुमार धूमल को एक टीवी साक्षात्कार में स्वीकार करना पड़ा कि बागियों के कारण चुनाव में नुकसान होगा। सरकार की अपनी प्रशासनिक छवि कैसी रही है इसका अन्दाजा इसी से लग जाता है कि पांच वर्षों में मुख्यमंत्री को सात मुख्यसचिव बदलने पड़े। मुख्यमन्त्री के नाम तय तमगा लगा कि वह सबसे अधिक कर्ज लेने वाले मुख्यमंत्री जाने जायेंगे।
प्रदेश में दो नगर निगम चुनाव हारने के बाद जब तीन विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव जयराम सरकार हार गयी थी तब इस हार के लिये महंगाई और बेरोजगारी को जिम्मेदार ठहराया था। लेकिन तब से लेकर अब तक महंगाई और बेरोजगारी पर नियंत्रण पाने के उपाय करने के बजाय कांग्रेस को तोड़ने की रणनीति पर लग गये। यहां तक ब्यान आ गये कि कांग्रेस चुनाव लड़ने लायक ही नहीं रहेगी। कांग्रेस के आरोपपत्र को रोकने के लिये अपने आरोप पत्र को सीबीआई को सौंपने के ब्यान आ गये। लेकिन अन्त में कांग्रेस अपना आरोप ले आयी। सरकार पर नौकरियां बेचने और खुली लूट के आरोप जनता की अदालत में पहुंचा दिये गये। पुलिस भर्ती में हुआ पेपर लीक एक ऐसा प्रकरण है जो लम्बे समय तक भाजपा का पीछा नहीं छोड़ेगा। ऐसी पृष्ठभूमि के साथ जो भी सरकार चुनाव में उतरेगी वह कैसे सत्ता में वापसी के दावे कर पायेगी यह कोई भी अनुमान लगा सकता है।
दूसरी ओर कांग्रेस नेे कर्मचारियों के लिये ओ.पी.एस. बहाली का वायदा करके भाजपा को ऐसे संकट पर लाकर खड़ा कर दिया जहां वह उसकी दस गारन्टियों की कोई काट नहीं कर पायी है। ओ.पी.एस. के समझौता ज्ञापन का दस्तावेज जारी करके भाजपा के उन आरोपों को वही दफन कर दिया जहां वह इसके लिये कांग्रेस पर जिम्मेदारी डाल रही थी। महिलाओं को प्रतिमाह पंद्रह सौ देने की गारन्टी का परिणाम है की 4.5% महिलाएं पुरुषों से ज्यादा वोट डालने पहुंची है। जिन युवाओं ने प्रधानमंत्री के धर्मशाला आगमन पर अग्निवीर योजना का भाजपा के बैनर पोस्टर फाड़ कर विरोध प्रदर्शन किया था उन्हें आज कांग्रेस के पांच लाख नौकरियां देने के वायदे पर प्रधानमन्त्री के दो करोड नौकरियां और पन्द्रह लाख देने के वायदे पर ज्यादा विश्वास है। कांग्रेस की दस गारन्टीयों से जो हताशा भाजपा को मिली है उसी का परिणाम है कि पार्टी के आईटी सेल को कांग्रेस के प्रभारी राजीव शुक्ला के नाम से एक फर्जी चुनाव सर्वेक्षण जारी करना पड़ा। जिसकी कांग्रेस ने विधिवत शिकायत दर्ज करवाई है। यही नहीं इसी हताशा का परिणाम है कि मतदान के बाद रामपुर में एक अनाधिकृत वाहन में ईवीएम मशीनें पकड़ी गयी। कांग्रेस की शिकायत पर ड्राइवर को गिरफ्तार करके चुनाव कर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है। लेकिन ऐसा हुआ क्यों यह खुलासा होना अभी बाकी है। इस सब से यह अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि चुनाव परिणाम क्या रहने वाले है।

यदि डबल इंजन सरकार लाभदायक है तो इन सवालों के जवाब क्या हैं?

2018 में सौ योजनाओं पर सरकार एक पैसा भी खर्च क्यों नहीं कर पायी

2019 में स्कूलों में वर्दियां क्यों नहीं मिल पायी
तीन वर्ष कुछ योजनाओं में केन्द्र से कोई भी सहायता अनुदान क्यों नहीं मिल पाया?
जीएसटी में 544.82 करोड़ की क्षतिपूर्ति क्यों नहीं मिल पायी?
तीन वर्षों में बजट अनुमानों से वास्तविक खर्च 72826 करोड़ कैसे बढ़ गया?
क्या बढे़ हुये खर्च के लिये धन कर्ज लेकर जुटाया गया

शिमला/शैल। प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा, कांग्रेस और आप तथा निर्दलीयों तक के घोषणा पत्र आ चुके हैं। सभी ने मतदाताओं से लम्बे चौड़े वादे कर रखे हैं। लेकिन किसी ने भी प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर कुछ नहीं कहा है। वादे पूरे करने के लिये धन कहां से आयेगा उस पर सब खमोश हैं। 2014 में जब केन्द्र में भाजपा की सरकार बनी तब से लेकर आज तक यह स्पष्ट हो चुका है कि यह सरकार सरकारी क्षेत्र की जगह प्राइवेट क्षेत्र को ज्यादा अधिमान दे रही है। इसी के चलते सारे सार्वजनिक उपक्रम योजनाबद्ध तरीके से प्राइवेट सैक्टर के हवाले किये जा रहे हैं। यहां तक कि इन्हें कारोबार के लिये पूंजी भी सरकारी क्षेत्र से ही उपलब्ध करवाई जा रही है। प्राइवेट क्षेत्र को इस तरह से अधिमान दिये जाने का अर्थ है कि सरकारी क्षेत्र को योजनाबद्ध तरीके से कमजोर करना। इस कमजोर करने के प्रयास का परिणाम होता है महंगाई और बेरोजगारी। लेकिन इस तथ्य से लोग सीधे अवगत ही नहीं हो पाये हैं। इसलिए उनका ध्यान बांटने के लिये सभी भावनात्मक मुद्दे उनके सामने परोसे जाते हैं। आज हिमाचल के चुनाव में भी डबल इंजन की सरकार का तर्क दिया जा रहा है। केन्द्र में 2014 से प्रदेश में 2017 से भाजपा की सरकारें हैं। केन्द्र और राज्य दोनों जगह एक ही पार्टी की सरकारें होना प्रदेश के विकास के लिये अच्छा होता है। लेकिन क्या हिमाचल के संद्धर्भ में ऐसा हो पाया है? क्या हिमाचल को कोई अतिरिक्त सहायता मिल पायी है? या हिमाचल को उसका अपना जायज हिस्सा भी नहीं मिल पाया है और प्रदेश का नेतृत्व डबल इंजन के कारण आवाज भी नहीं उठा पाया है? इन सवालों की पड़ताल करने के लिये सीएजी रिपोर्ट से ज्यादा प्रमाणिक दस्तावेज और कोई नहीं हो सकता। जयराम सरकार ने दिसम्बर 2017 को पदभार संभाला था। इस सरकार के आने के बाद 31 मार्च 2019 को कैग की पहली रिपोर्ट आयी और इसके मुताबिक यह सरकार 100 योजनाओं पर एक नया पैसा भी खर्च नहीं कर पायी है। रिपोर्ट आने पर यह प्रमुखता से छपा था लेकिन इसका जवाब आज तक नहीं आ पाया है। इस रिपोर्ट में जीएसटी को लेकर यह दर्ज है कि प्रदेश को जो क्षतिपूर्ति केन्द्र द्वारा की जानी थी उसमें 544.82 करोड रुपए केन्द्र से नहीं मिल पाया है। जुलाई 2017 में प्रदेश में जीएसटी लागू हो गया था और एक्ट के मुताबिक राज्य को होने वाले घाटे की भरपाई केन्द्र को करनी थी जो नहीं हो पायी। इसके बाद 31 मार्च 2020 को अगली के रिपोर्ट आयी है। 2019 में सरकार स्कूलों में बच्चों को वर्दियां नहीं दे पायी है। ऐसा क्यों हुआ है इसके कारणों का खुलासा आज तक नहीं हो पाया है। 31 मार्च 2020 को आयी इस रिपोर्ट के दूसरे पन्ने पर भारत सरकार से प्राप्त सहायता अनुदान की तालिका छपी है। इसके मुताबिक 2017-18 और 19-20 के 3 वर्षों में कुछ योजनाओं में केन्द्र कोई अनुदान नहीं मिला है। इसी रिपोर्ट के पहले पन्ने पर सरकार के बजट और व्यय के आंकड़े छपे हैं। इन आंकड़ों के मुताबिक इन्हीं तीन वर्षों में सरकार के बजट अनुमानों से उसका खर्च 72,826 करोड बढ़ गया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि इस बढ़े हुये खर्च के लिये धन का प्रावधान कैसे किया गया क्या सरकार के पास कर्ज लेने के अतिरिक्त और कोई विकल्प उपलब्ध था इन सवालों का जवाब सत्ता पक्ष की ओर से आज तक नहीं आया है। इसलिए यह दस्तावेजी साक्ष्य पाठकों के सामने रखे जा रहे हैं। इन साक्ष्यों से यह आशंका बनी हुई है कि प्रदेश का कर्ज भार कहीं एक लाख करोड से तो नहीं बढ़ गया है। फिर अब तो प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना भी बन्द हो चुकी है और इसमें भी 203 सड़कें अधूरी हैं। क्या यही डबल इंजन सरकार के लाभ हैं।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

‘‘पन्द्रह साल नड्डा ने जलील किया है’’ कृपाल परमार का आरोप

शर्मनाक हार की ओर बढ़ रही है स्थितियां
सभी मंत्री संकट में
मुख्यमंत्री को कांग्रेसियों से मांगना पड़ रहा है सहयोग

शिमला/शैल। भाजपा के बागियों को मनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को उन्हें फोन करने पड़े हैं। यह प्रधानमंत्री की पूर्व राज्यसभा सांसद कृपाल परमार से हुये संवाद के वायरल होने से बाहर आ गयी हैं। मोदी कृपाल परमार को फोन पर चुनाव से हट जाने का अनुरोध करते हैं और परमार ने उन्हें दो दिन लेट हो गये कि बात करके यह भी साफ सुना दिया की नड्डा ने उन्हें पन्द्रह साल जलील किया है। नड्डा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। हिमाचल के बिलासपुर से आते हैं और बिलासपुर में ही कुछ बगियों ने उन्हें मिलने तक से इन्कार कर दिया यह भी सामने आ गया है। हिमाचल को छोड़कर उन सभी भाजपा शासित राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन हुआ या होने के प्रयास हुये जहां चुनाव होने थे। लेकिन हिमाचल में ऐसा नहीं हो पाया। कुछ मंत्रियों की छुट्टी करने कुछ के विभाग बदले जाने का प्रचार गोदी मीडिया के माध्यम से लगातार करवाया जाता रहा। लेकिन व्यवहार में ऐसा नहीं हो पाया। इसलिए आज भाजपा के करीब दो दर्जन बागी चुनाव लड़ रहे हैं। आज धूमल को जिस तरह हाशिये पर धकेल दिया गया उसकी पीड़ा अनुराग ठाकुर के आंसुओं से सार्वजनिक हो चुकी है। महेश्वर सिंह के बेटे ने महेश्वर को टिकट दिये जाने से पहले निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। नड्डा को यह जानकारी होने के बाद भी महेश्वर सिंह को दिल्ली बुलाया गया और टिकट दिया गया। इस टिकट को अन्तिम दिन बेटे के चुनाव से न हटने के दण्ड के रूप में बदल दिया गया। महेश्वर का दर्द उनके आंसूओं में सार्वजनिक हो गया। क्या महेश्वर को टिकट देने से पहले बेटे को चुनाव से हटाने की शर्त रखी गयी थी यह अभी तक रहस्य बना हुआ है। जब निर्दलीय विधायक होशियार सिंह और प्रकाश राणा को पार्टी में शामिल किया गया था तब यह आरोप लगा कि इन्हें लाने से पहले धूमल जैसे वरिष्ठ नेताओं से राय नहीं ली गयी है। बल्कि संबंधित मण्डल तक को विश्वास में नहीं लिया गया। इस पर उभरी नाराजगी लखविंदर राणा और पवन काजल के शामिल होने तक जारी रही। फिर हर्ष महाजन और विजय सिंह मनकोटिया को शामिल करने में क्या शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल से राय ली गयी थी। शायद नहीं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि इस समय पार्टी में जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए केवल नड्डा और जयराम ही जिम्मेदार हैं।
हिमाचल में यह स्थिति लगभग पहले दिन से ही बन गयी थी। इसी का परिणाम है कि 2019 के लोकसभा चुनाव इतने प्रचण्ड मार्जन से जीतने के बाद भाजपा ने दो नगर निगम के चुनाव हारे फिर तीन विधानसभा और एक लोकसभा उपचुनाव हारा। बीस विधानसभा चुनाव क्षेत्र इससे प्रभावित हुये। जुब्बल-कोटखाई जो 2017 में भाजपा के पास थी वहां भाजपा जमानत नहीं बचा पायी। जबकि कांग्रेस ने अर्की और फतेहपुर पर अपना कब्जा बरकरार रखा। यहां पर 2017 के चुनाव के इस तथ्य पर भी नजर डालना आवश्यक हो जाता है कि इस चुनाव के समय भाजपा में नेतृत्व को लेकर कोई प्रश्न नहीं थे। बागियों की कोई समस्या नहीं थी। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ कोई प्रश्न मुखर नहीं थे। तब भी उस समय भाजपा की पन्द्रह सीटों पर जीत दो हजार से कम के अन्तर से हुई है। दस सीटों पर निर्दलीयों ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ा था। आज यह पच्चीस सीटें सीधे भाजपा के हाथ से निकलती नजर आ रही है। क्योंकि जब प्रधानमन्त्री को बागियों को फोन करने की नौबत आ जाये और उसका कोई असर तक न हो तो संगठन के भीतर की स्थिति सार्वजनिक चर्चा का विषय बन जाती है। आज भाजपा इन सारी स्थितियों से बुरी तरह घिरी हुई है। 2017 के चुनाव के दौरान मण्डी की एक जनसभा में हिमाचली कर्मचारियों को नामतः यह आश्वासन दिया था कि जो काला धन वापस आने वाला है उसमें से कुछ हिस्सा हिमाचली कर्मचारियों को भी मिलेगा। प्रधानमंत्री के ब्यान का यह वीडियो चुनावों में वायरल हो चुका है। बिलासपुर में डाªेन ज्ञान और चम्बा में रेल पहुंचने की उपलब्धियां गिनाता केंद्रीय नेतृत्व भी आज प्रदेश में प्रसांगिक हो गया है। क्योंकि उसके दिये हुये 69 राष्ट्रीय उच्च मार्ग आज सैद्धांतिक स्वीकृति से आगे नहीं बढ़े हैं।
आज महंगाई और बेरोजगारी के आगे धारा 370 और तीन तलाक बहुत छोटे हो गये हैं। 2014 से आज तक लगातार आम आदमी के जमा पर कम होता गया ब्याज और कर्ज के महंगा होने तथा डॉलर के मुकाबले रुपए के लगातार कमजोर होते जाने के सच के सामने राम मंदिर का निर्माण भी इससे राहत नहीं दिलवा पाता है। आज सरकार की वित्तीय स्थिति उस मोड़ पर आकर खड़ी हो गयी है कि वह दिसम्बर के बाद गरीबों को सस्ता राशन देने की योजना को आगे बढ़ाने की स्थिति में नहीं रह गयी है। क्योंकि बैंकों से जो लाखों करोड़ कर्ज दिलवाया गया था वह आज तक वापस नहीं आ पाया है। ऊपर से आरबीआई द्वारा जारी नौ लाख करोड़ के नोट कहीं गायब हो गये हैं जिनकी विधिवत जांच तक नहीं हो पायी है। यह सारे घाटे आम आदमी की जेब से पूरे करने के लिये हर सेवा को लगातार महंगा किया जा रहा है। यह सारे सच अब आम आदमी को समझ आ चुके हैं। इसी का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री को ही करीब एक दर्जन चुनाव सभाएं करने के साथ ही बागियों को मनाने के लिये स्वयं फोन करने पड़ रहे हैं। इस स्थिति से स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा को इन चुनाव में शर्मनाक हार का सामना करने की आशंका डराने लग गयी है। क्योंकि संघ पार्टी आईबी और सीआईडी किसी के भी सर्वेक्षण में 15 से 20 सीटों से ज्यादा आंकड़ा नहीं बढ़ा है।
भाजपा की यह स्थिति इसलिये हुई है क्योंकि जो कुछ विज्ञापनों में विज्ञापित किया जा रहा है वह जमीन पर देखने में मिल नहीं रहा है। स्कूलों में बच्चों को वर्दियां नहीं दी जा सकी हैं। मिड डे मील के पैसे अध्यापकों को अपनी जेब से देने पड़े हैं। घटिया वर्दी सप्लाई करने के लिये जिन फर्मों पर कांग्रेस सरकार ने करोड़ों का जुर्माना लगाया था इस सरकार ने उसे माफ करके फर्मों को अभयदान दे दिया। इस फैसले के खिलाफ उच्च न्यायालय से अपील दायर करने की अनुशंसा स्वयं मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने फाइल पर कर रखी है। जिस पर पांच वर्षों में अमल नहीं हो पाया। क्योंकि प्रशासन ने विकास की सीमा ओक ओवर के दो मंजिला मकान में लिफ्ट लगने से आगे बढ़ने ही नहीं दी। इससे मुख्यमंत्री की प्रशासन पर पकड़ इतनी कमजोर पड़ गयी कि सवैधानिक पदों पर बैठे लोग उद्योगपतियों के लिये आयोजित इन्वैस्टर मीट में शिरकत रहे और सरकार में किसी का भी इसका संज्ञान लेने का साहस तक नहीं हुआ। ऐसी स्थितियों से जो सन्देश आम आदमी तक पहुंचा वह आज गले पड़ गया है। यह माना गया है कि इस प्रशासन में सब को लूट की बराबर छूट है। शर्त यह थी कि लूट की जिम्मेदारी किसी बड़े पर नहीं आनी चाहिये। इसी का परिणाम है कि चुनाव में मुख्यमंत्री को कांग्रेसियों से सहयोग की अपील करनी पड़ रही है। नड्डा के सहयोग से प्रधानमंत्री और गृहमंत्री तक यह अन्दर की कहानी नहीं पहुंचने दी गयी। आम आदमी और पार्टी के जिम्मेदार लोगों तथा सरकार के बीच संवाद का ऐसा संकट खड़ा हुआ जिसने आज प्रधानमंत्री तक की बात न सुनने के सार्वजनिक हालात पैदा कर दिये। क्या इस परिदृश्य में हो रहे चुनाव में उम्मीद की जा सकती है कि सरकार किसी भी गणित से पुनः सत्ता में वापसी की सोच सकती है।

जयराम ने बेची नौकरियां-कांग्रेस का संगीन आरोप

शिमला/शैल। अन्ंततः कांग्रेस ने जयराम सरकार के खिलाफ आरोप पत्र जारी कर दिया। बड़े लम्बे अरसे से इस आरोपपत्र की मीडिया और जनता में इंतजार की जा रही थी। जयराम ने कांग्रेस के आरोप पत्र को रोकने के लिए यहां तक कह दिया था कि यदि कांग्रेस ऐसा कुछ करती है तो भाजपा द्वारा कांग्रेस के खिलाफ सौंपे गये आरोप पत्र को सीबीआई को भेज देगी। इस परिदृश्य में अब चुनाव प्रचार के दौरान सीधे जनता की अदालत में रखे गये आरोप पत्र से भाजपा की चुनावी कठिनाईयां बढ़ना स्वाभाविक है। क्योंकि सीधे मुख्यमंत्री पर नौकरियां बेचने का आरोप लगाया गया है। हिमाचल में युवाओं के लिये रोजगार का सबसे बड़ा क्षेत्र सरकार ही है। और जब सरकार में ही नौकरियां बेचने का सच सामने आ जाये तो चुनावों के साथ इससे बड़ा मजाक और कोई हो नहीं सकता। कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि पुलिस भर्ती में 6 से आठ लाख में पेपर बेच गये। 2020 में भी 2022 की ही तरह पेपर लीक हुए थे। पंप ऑपरेटरों के पेपर चार-चार लाख में बिके। स्टाफ सर्विस कमीशन में अपनों को अलग कमरों में बैठाकर पास करवाया गया। आउटसोर्स में 94 कंपनियों को 230958224 का कमीशन दिया गया। अधिकांश कंपनियां परोक्ष/अपरोक्ष में राजनेताओं से जुड़ी हुई हैं। विश्वविद्यालय में हुई भर्तियों का कच्चा चिट्ठा आरटीआई के माध्यम से सामने आ चुका है।
पुलिस भर्ती पेपर लीक मामले में जुलाई में स्वयं हर्ष महाजन रिकॉर्ड पर यह कह चुके हैं कि जल्द ही इस मामले में एक ऑडियो जारी किया जायेगा। पुलिस जब इस मामले की जांच कर रही थी तब पुलिस को हर्ष से यह ऑडियो हासिल करनी चाहिये थी लेकिन ऐसा हुआ नहीं और आज हर्ष महाजन भाजपा के स्टार प्रचारक हैं। इस मामले में जब गुड़िया मामले की तर्ज पर यह सवाल उठा था कि पुलिस के खिलाफ पुलिस की ही जांच विश्वसनीय नहीं होगी और यह जांच सीबीआई को सौंपने के आग्रह की याचिका प्रदेश उच्च न्यायालय में आयी थी। तब अदालत का फैसला आने से पहले ही सरकार ने घोषित कर दिया कि यह जांच सीबीआई को सौंप गयी है। जबकि वास्तव में सरकार ने सीबीआई को ऐसा कोई पत्र भेजा ही नहीं है। यह आरटीआई में मिली जानकारी से स्पष्ट हो जाता है। इस मामले में पुलिस ने करीब सवा सौ लोगों से पूछताछ करने के बाद पेपर खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया है। जिनमें से कुछ जमानत पर हैं तो कुछ हिरासत में हैं। इन लोगों ने पेपर खरीदे हैं लेकिन खरीद का यह पैसा किन बड़े लोगों तक पहुंचा है इस पर अभी तक पर्दा पड़ा हुआ है। इसी से यह आरोप गंभीर हो जाता है कि बड़ों को बचाने का प्रयास किया गया है क्योंकि यह विभाग स्वयं मुख्यमंत्री के पास है। जल शक्ति विभाग में 2200 करोड़ का घपला होने का आरोप है। प्रधानमंत्री की रैलियों पर ही पांच सौ करोड़ का खर्च होने का आरोप है जिसे सरकार बनने के बाद भाजपा से वसूला जायेगा।
कांग्रेस ने जो आरोप लगाये हैं वह जनता में काफी अरसे से चर्चा में हैं। आज इन आरोपों को इस तरह जनता के बीच रखने से इनकी याद दोहरा दी गयी है। कांग्रेस ने दावा किया है कि वह आते ही एक जांच आयोग का गठन करेगी और जयराम सरकार द्वारा अन्तिम छः माह में लिये गये फैसलों की समीक्षा की जायेगी। कांग्रेस ने यह आरोप पत्र राज्यपाल को न सौंपकर सीधे जनता में रखा है ताकि सरकार बनते ही जांच एजैन्सीयां स्वतः ही इस पर काम शुरू कर दें। उन्हें सरकार के औपचारिक आदेशों की प्रतीक्षा न करनी पड़े और यही इस आरोपपत्र का सबसे गंभीर पक्ष है।

Facebook



  Search