Monday, 02 March 2026
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क्या एनजीओ भवनों का दुरुपयोग हो रहा है अराजपत्रित कर्मचारी सेवाएं महासंघ के पत्र से उठा मुद्दा

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी सेवाएं महासंघ ने प्रदेश के मुख्य सचिव को एक ज्ञापन देकर आरोप लगाया है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में बने एनजीओ भवनों का दुरुपयोग हो रहा है। मांग की गई है कि सामान्य प्रशासन इन भवनों को शीघ्र अपने नियंत्रण में ले। स्मरणीय है कि कर्मचारी संगठनों को अपना दायित्व ठीक से निभाने के लिये कर्मचारी महासंघ के नाम पर जमीनों का आवंटन करके इन भवनों का निर्माण करवाया था। सरकारी धन से बने इन भवनों का उद्देश्य कर्मचारी नेतृत्व को सुविधा प्रदान करना था। ताकि वह कर्मचारियों के कल्याण से जुड़े मुद्दों को सुचारू ढंग से उठा सके। कर्मचारी संगठनों के लिए प्रक्रिया और नियमावलि तय है। इसी के अनुसार चयनित संगठन को सरकार मान्यता प्रदान करती है। जयराम सरकार पर यह आरोप लगाया गया है कि वह प्रक्रिया और नियमों की अनदेखी करके बने संगठन को ही मान्यता देकर कर्मचारी मुद्दों पर वार्ता के लिए आमंत्रित करती है। सरकार के इस पक्षपातपूर्ण व्यवहार से वर्तमान महासंघ एक प्रायोजित संगठन बनकर रह गया है। यह आरोप उस समय लगाये जा रहे हैं जब चुनाव के बाद नई सरकार का गठन होना है। यह स्वभाविक है कि इन आरोपों और मांगों के परिदृश्य में प्रदेश के कर्मचारी राजनीति में नये समीकरण बनेंगे और इससे संगठनों में आगे चलकर एक टकराव की स्थिति भी पैदा हो सकती है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि बनने वाली सरकार इस मांग पर किस तरह का रुख अपनाती है।

यह है सौंपा गया ज्ञापन

क्या एनजीओ भवनों का दुरुपयोग हो रहा है अराजपत्रित कर्मचारी सेवाएं महासंघ के पत्र से उठा मुद्दा

शिमला/शैल। हिमाचल प्रदेश अराजपत्रित कर्मचारी सेवाएं महासंघ ने प्रदेश के मुख्य सचिव को एक ज्ञापन देकर आरोप लगाया है कि प्रदेश के विभिन्न जिलों में बने एनजीओ भवनों का दुरुपयोग हो रहा है। मांग की गई है कि सामान्य प्रशासन इन भवनों को शीघ्र अपने नियंत्रण में ले। स्मरणीय है कि कर्मचारी संगठनों को अपना दायित्व ठीक से निभाने के लिये कर्मचारी महासंघ के नाम पर जमीनों का आवंटन करके इन भवनों का निर्माण करवाया था। सरकारी धन से बने इन भवनों का उद्देश्य कर्मचारी नेतृत्व को सुविधा प्रदान करना था। ताकि वह कर्मचारियों के कल्याण से जुड़े मुद्दों को सुचारू ढंग से उठा सके। कर्मचारी संगठनों के लिए प्रक्रिया और नियमावलि तय है। इसी के अनुसार चयनित संगठन को सरकार मान्यता प्रदान करती है। जयराम सरकार पर यह आरोप लगाया गया है कि वह प्रक्रिया और नियमों की अनदेखी करके बने संगठन को ही मान्यता देकर कर्मचारी मुद्दों पर वार्ता के लिए आमंत्रित करती है। सरकार के इस पक्षपातपूर्ण व्यवहार से वर्तमान महासंघ एक प्रायोजित संगठन बनकर रह गया है। यह आरोप उस समय लगाये जा रहे हैं जब चुनाव के बाद नई सरकार का गठन होना है। यह स्वभाविक है कि इन आरोपों और मांगों के परिदृश्य में प्रदेश के कर्मचारी राजनीति में नये समीकरण बनेंगे और इससे संगठनों में आगे चलकर एक टकराव की स्थिति भी पैदा हो सकती है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि बनने वाली सरकार इस मांग पर किस तरह का रुख अपनाती है।

यह है सौंपा गया ज्ञापन

कांग्रेस का आंकड़ा पचास तक पहुंचने का अनुमान

उपचुनावों के बाद भी महंगाई और बेरोजगारी में कोई कमी नहीं आयी
मतदान के दूसरे ही दिन मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव का दिल्ली चले जाना क्या संकेत है?
सरकार के वित्त सचिव का कांग्रेस नेता से सहायता मांगना क्या संकेत है?
कांग्रेसी की गारन्टीयों के परिणाम स्वरूप महिला मतदाताओं की संख्या रही ज्यादा
सरकार की उज्जवला पर महिलाओं को प्रतिमाह पन्द्रह सौ का वायदा
ओ.पी.एस. बहाली की गारन्टी ने बदले कर्मचारी
शिमला/शैल। मतदान और मतगणना के बीच जितना अन्तराल इस बार आया है इतना शायद पहले कभी ही रहा है। यह अन्तराल इतना लम्बा क्यों रखा गया इसका कोई समुचित तर्क सामने नहीं आ पाया है। इसी अन्तराल के कारण ई.वी.एम. मशीनों की सुरक्षा पर सवाल उठे। चुनाव आयोग को ऊना में इनकी सुरक्षा के लिये स्वयं टैन्ट लगाने पड़े। पोस्टल बैलट भी सवालों के घेरे में आ गये हैं। ऐसा क्यों हुआ है इसके लिये कोई संतोषजनक कारण सामने नहीं आये हैं। इस मतदान के दूसरे ही दिन मुख्यमन्त्री के प्रधान सचिव ने दिल्ली जाने की अनुमति सरकार से हासिल कर ली। चुनाव परिणामों तक भी इन्तजार नहीं किया। सरकार के वित्त सचिव ने कांग्रेस की प्रचार कमेटी के अध्यक्ष से सहायता की गुहार लगा दी। गुहार का यह आग्रह वायरल भी हो गया। चुनाव परिणामों से पहले ही यह सब घट जाने को कैसा राजनीतिक संकेत माना जाना चाहिये यह पाठक स्वंय तय कर सकते हैं।
2017 में जयराम ठाकुर के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार ने 2019 में लोकसभा चुनाव का सामना किया। हिमाचल समेत पूरे देश में इन चुनावों में भाजपा ने इतिहास रचा। इन चुनावों के कारण सुरेश कश्यप और किशन कपूर की विधानसभा सीटें खाली हुई और यह उपचुनाव भी भाजपा जीत गयी। लेकिन इसके बाद जब सरकार की परफारमैन्स जनता के सामने व्यवहारिक रूप से आती चली गयी तो इसका पहला प्रभाव नगर निगम चुनावों में देखने को मिला और सरकार चार में से दो नगर निगम हार गयी। इसके बाद हुये एक लोकसभा और तीन विधानसभा उपचुनावों में भाजपा चारों उपचुनाव हार गयी। इस हार पर तात्कालिक प्रतिक्रिया में महंगाई को मुख्यमंत्री ने हार का कारण माना था। क्या इन उपचुनावों के बाद महंगाई कम हुई है? क्या युवाओं को बड़े स्तर पर रोजगार उपलब्ध हो पाया है? क्या मनरेगा में सरकार रोजगार उपलब्ध करवा पायी है? जब चारों उपचुनावों के बाद परिस्थितियों में कोई व्यवहारिक रूप से बदलाव आया ही नहीं है तो आज जनता का समर्थन किस आधार पर मिल पायेगा?
केन्द्र और प्रदेश में दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के नाम पर क्या कोई आर्थिक पैकेज प्रदेश को मिल पाया है शायद नहीं। बल्कि आज मुख्यमन्त्री को चुनावों के बाद केन्द्र से जी.एस.टी. की प्रतिपूर्ति की मांग करनी पड़ी है। बल्कि जो कुछ भी कथित रूप से मिला है वह सैद्धान्तिक स्वीकृतियों से आगे नहीं बढ़ा है। प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना बन्द होने से दो सौ ग्रामीण सड़कें अधर में लटकी हुई हैं। क्या ग्रामीण इस स्थिति को भोग नहीं रहे हैं। इस परिदृश्य में हुए चुनावों में पार्टी को दो दर्जन बागियों का सामना करना पड़ा है। जिन सिद्धान्तों के नाम पर अन्य दलों से अपने को भिन्न होने का दावा करते थे इस चुनाव में उन सबकी बलि ले ली है और आम आदमी इस बात को समझ चुका है कि इनकी करनी और कथनी में कितना अन्तर है। कांग्रेस में तोड़फोड़ की नीति भी नामांकन भरे जाने तक ज्यादा कारगर सिद्ध नहीं हुई है। बल्कि कांग्रेस से भाजपा में गये नेताओं को भाजपाइयों का कितना सहयोग मिल पाया है इसका खुलासा पवन काजल के वायरल हुए पत्र से लग जाता है।
उज्जवला जैसी योजनाओं के लाभार्थियों की प्रदेश भर में हुई रैलीयों में जितनी परेड जगह-जगह करवाई गयी उसकी काट कांग्रेस ने महिलाओं को प्रतिमाह पन्द्रह सौ रुपए देने की जो गारन्टी दी है वह निश्चित तौर पर भाजपा की योजनाओं पर भारी पड़ी है। इसी कारण महिला मतदाताओं की संख्या करीब पांच प्रतिश्त पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा रही है। ओ.पी.एस. की बहाली की गारन्टी ने कर्मचारियों की बहूप्रतिक्षित मांग को पूरा किया है जबकि भाजपा इस अहम मुद्दे पर अन्त तक स्पष्ट नहीं हो पायी है। इस परिदृश्य में हुये रिकॉर्ड तोड़ मतदान को बदलाव का सीधा संकेत माना जा रहा है। बल्कि बदलाव के लिये इस मतदान को एक तरफ माना जा रहा है। आंकड़ों के गणित में यह माना जा रहा है कि कांग्रेस इसमें पचास सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है। शिमला, सोलन, कुल्लू, बिलासपुर और ऊना में भाजपा को ज्यादा नुकसान होने का अनुमान है। भाजपा इस स्थिति से बाहर निकलने के लिये कांग्रेस के अन्दर बड़े स्तर पर तोड़फोड़ की रणनीति पर चल रही है और इसका संकेत अब निर्दलीयों के सर्वे का आंकड़ा उछाले जाने को माना जा रहा है। यह लग रहा है कि मीडिया के माध्यम से एक नयी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है। जबकि विश्लेषक इस चुनाव में निर्दलीयों को नहीं के बराबर मान रहे हैं।

जून में बन्द हुई जी.एस.टी. प्रतिपूर्ति पर इतना समय क्यों चुप रहे जयराम

क्या कैग रिपोर्टों के खुलासे को नजरअन्दाज किया जा सकता है
गुलाब सिंह और रेणु चड्डा के ऑडियो और पवन काजल के पत्र का सच क्या है

शिमला/शैल। मतदान के बाद चुनाव की समीक्षाओं का दौर चल रहा है और भाजपा तथा कांग्रेस दोनों दल अपनी-अपनी सरकारें बनाने के दावे कर रहे हैं। गुजरात और दिल्ली एम.सी.डी. चुनावों के परिदृश्य में नेताओं के लिये यह दावे करना स्वभाविक और आवश्यक भी हो जाता है। ऐसे में किसी निष्पक्ष आकलन के लिये यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार के कामकाज को उसके सत्ता संभालने के पहले दिन से लेकर कार्यकाल के अन्तिम दिन तक पूरी निष्पक्षता के साथ नजर में रखा जाये। इसी के साथ यह भी आवश्यक हो जाता है कि इस दौरान विपक्ष और मीडिया की सरकार को लेकर क्या और किस तरह की प्रतिक्रियाएं रही हैं। क्योंकि विपक्ष और मीडिया ही जनता की सूचनाओं के मुख्य स्रोत रहते हैं। जनता इन सूचनाओं और प्रतिक्रियाओं को अपने चारों और व्यवहारिकता में देखकर सबके बारे में अपना मन बनाती है। उसका यह व्यवहारिक अनुभव ही कम ज्यादा या औसत मतदान के रूप में सामने आता है और चुनावी आकलनों का आधार बनता है। इसमें जब केंद्र और राज्य ने एक ही पार्टी की सरकारें होना भी साथ रहता है तब यह आकलन दोनों के ही नेतृत्व का प्रतिफल बन जाता है। इस परिपेक्ष में हिमाचल के चुनाव का आकलन केन्द्र और राज्य दोनों ही सरकारों के आपस में रहे सहयोग का भी खुलासा हो जाता है। इसलिए विपक्ष और मीडिया की प्रतिक्रियाओं को भी संज्ञान में रखना आवश्यक हो जाता है। इस परिपेक्ष में जब जयराम सरकार और भाजपा का आकलन इन चुनावों के परिदृश्य में किया जाये तो यह पहला सवाल इसके डबल इंजन होने को लेकर उठता है। अभी मतदान के बाद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की केन्द्रीय वित्त मंत्री के साथ बैठक हुई है। इस बैठक में मुख्य सचिव और अतिरिक्त मुख्य सचिव वित्त भी मुख्यमंत्री के साथ थे। इस बैठक में अन्य मुद्दों के साथ जीएसटी की प्रतिपूर्ति की बहाली का मुद्दा बड़ी प्रमुखता से उठाया गया। यह सामने आया कि केन्द्र सरकार ने जून माह से प्रदेश को जीएसटी की प्रतिपूर्ति पूरी तरह से बन्द कर दी है। जबकि जीएसटी एक्ट के तहत राज्यों का यह प्रतिपूर्ति पाना अधिकार है। यह प्रतिपूर्ति बंद किया राज्य को उसके अधिकार से वंचित रखना हो जाता है। इस प्रतिपूर्ति के तहत प्रदेश का करीब 4000 करोड़ मिलना है जो नहीं दिया जा रहा है।
सरकार को कर्ज लेकर अपना काम चलाना पड़ रहा है। जून में यह प्रतिपूर्ति बन्द हो जाने पर भी जयराम सरकार विधानसभा चुनाव के मतदान तक इस मुद्दे पर जुबान नहीं खोल पायी है। मीडिया भी अधिकांश में चुप रहा है। केवल शैल ने इस पर सवाल उठाये हैं। यहां तक कि विपक्ष भी चुप बैठा रहा है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वभाविक हो जाता है कि यदि डबल इंजन के इस तरह के सहयोग की जानकारी मतदाताओं को चुनाव के दौरान रहती तो इसका क्या प्रभाव पड़ता। जबकि डबल इंजन का कड़वा सच 31 मार्च 2019 और 31 मार्च 2020 को आयी कैग रिपोर्ट में ही सामने आ चुका है। इनके मुताबिक 2018-19 और 2019-20 में केन्द्रीय प्रायोजित योजनाओं के लिये केन्द्र से प्रदेश को कोई पैसा नहीं मिला है। जीएसटी की प्रतिपूर्ति भी तब से रुकती चली आयी है। शैल यह दस्तावेज अपने पाठकों के सामने रख चुका है। इसीलिए तो 69 राष्ट्रीय राजमार्ग आज तक सिद्धांत से आगे नहीं बढ़ पाये हैं। 2018 में ऐसे ही सहयोग के चलते सरकार 100 योजनाओं पर एक पैसा तक खर्च नहीं कर पायी है और 2019 में स्कूलों में बच्चों को वर्दियां नहीं मिल पायी है। इस तरह के व्यवहारिक सहयोग के चलते डबल इंजन की सरकार होने का चुनावी लाभ कितना मिला होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। डबल इंजन के उन पक्षों पर जयराम, अनुराग ठाकुर और जेपी नड्डा इसलिये आज तक चुप चले आ रहे हैं। अब चुनावों के दौरान टिकट आवंटन के बाद जिस तरह की बगावत पार्टी के अन्दर देखने को मिली है उसी के परिणाम स्वरूप करीब दो दर्जन चुनाव क्षेत्रों में बागियों ने चुनाव लड़ा है। इनमें से कितने चुनाव जीतकर आ जायेंगे इसका सही आकलन पार्टी के विद्वान अभी तक नहीं लगा पाये हैं। लेकिन यह मुख्यमंत्री ने स्वयं माना है कि बारह से पन्द्रह बागी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिये बागियों से संपर्क साधने को लेकर शीर्ष नेतृत्व एक राय नहीं हो पाया है। लेकिन इस सबसे ज्यादा रोचक तो पार्टी नेता गुलाब सिंह ठाकुर का जोगिन्दर नगर से वायरल हुआ ऑडियो है। इस ऑडियो की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि चम्बा से वरिष्ठ पार्टी नेत्री रेणु चड्डा का ऑडियो सामने आ गया हालांकि उसने इसका बाद में खण्डन भी किया हैं। लेकिन इन ऑडियोज में जो चर्चाएं और आक्षेप उठाये गये हैं उन सब पर अन्त में पवन काजल के पत्र ने प्रमाणिकता की मोहर भी लगा दी है। पवन काजल ने अपने पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए स्वीकार किया है कि यह पत्र उन्होंने जे.पी. नड्डा और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के नाम लिखा है तथा इसमें सही आरोप लगाये हैं। पत्र के वायरल होने पर उन्होंने हैरानी अवश्य जताई है। ऐसे ही आरोप प्रदेश के हर हिस्से में सामने आये हैं। इस चुनाव में भाजपा को अपने सिद्धांतों को अंगूठा दिखाना पड़ा है। परिवारवाद का आरोप अब केवल विपक्ष के लिये हैं और भाजपा पर लागू नहीं होता है। सिद्धांतों के इसी खोखले पन का परिणाम है कि प्रधानमन्त्री को हिमाचल में एक दर्जन तो गुजरात में पच्चास रैलियां करनी पड़ी हैं। और की महंगाई का जवाब प्रधानमन्त्री को मोबाइल डाटा सस्ता होने के रूप में देना पड़ रहा है। महंगाई और बेरोजगारी का दंश झेलते युवा को सस्ता डाटा राम मन्दिर तीन तलाक और 370 हटाने के नाम पर ज्यादा देर तक भटकाया नहीं जा सकता। भ्रष्टाचार पर अन्ना का आन्दोलन यदि दिल्ली में स्व. शीला दीक्षित की सरकार को शुन्य कर सकता है तो आज विनियोग के नाम पर सारे सार्वजनिक उपकरणों को एक-एक करके निजी क्षेत्र के हवाले करना भाजपा को शून्य पर क्यों नहीं ला सकता है।
आज मतदान के बाद चुनावी परिणामों का स्वभाविक आकलन करते हुये क्या भाजपा के अन्दर की इस स्थिति को ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिये? क्या आज विश्वविद्यालय के परिणामों में 80% छात्रों का फेल हो जाना सरकार की कोविड नीति और प्रबंधनो पर नये सिरे से विचार करने पर बाध्य नहीं करता है? क्या आकलन में कैग रिपोर्टों के खुलासों का संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिये? क्या इन सच्चाईयों पर मीडिया की चुप्पी के कारण ही उसे गोदी मीडिया की संज्ञा नहीं मिली है? यदि इस सबको एक साथ रखने के बाद कुछ लोगों को भाजपा के पक्ष में सब कुछ हरा ही दिखाई दे तो सही में सब कुछ हरा ही हो जायेगा यह कतई संभव नहीं है। इसलिये भाजपा की काठ की हांडी इस बार चढ़ने वाली नहीं है यह तय है।

अमन काचरू की मौत के जिम्मेदारों को दी जयराम सरकार ने नौकरी

शिमला/शैल। जयराम सरकार ने 21.7.2022 को 106 डॉक्टरों को Stop Gap Arrangement के नाम पर दो वर्ष के लिये नियुक्तियां दी हैं। इन नियुक्तियों में डॉ. अभिनव वर्मा, डॉ.नवीन कुमार डॉ. मुकुल शर्मा के नाम भी शामिल हैं। स्मरणीय है कि यह तीनों लोग डॉ. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज टांडा में घटे अमन काचरू रैगिंग प्रकरण में शामिल थे। इसमें अमन काचरू की मौत हो गयी थी। इस मौत के बाद इन लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज हुआ। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने इन्हें हत्या का दोषी पाया और चार लोगों को सजा सुनायी। इस सजा के खिलाफ यह चारों लोग नवीन कुमार, अभिनव वर्मा, अजय वर्मा और मुकुल शर्मा 2010 में अपील में चले गये। इस अपील में उच्च न्यायालय ने इनकी और सरकार की अपीलों को खारिज करते हुए 4 अप्रैल 2013 को दिये अपने फैसले में सजा को बरकरार रखते हुये यह फैसला दिया। 

55. In so far as sentence is concerned, we observe that a young medical student had died consequent upon violent and repeated slapping by the accused persons which is inhuman and is a blatant breach of human right. The victim was the only son of his parents. His life has gone for a song. The accused persons were also medical students which is considered to be a cream, but their barbarous act was a dastardly act for a youth who was none else than their college-mate. While balancing all the factors of both the sides we do feel that it is absolutely not a case of giving any benefit under the benefit of Probation of Offenders Act. However, in the totality of facts and circumstances and looking at the punishment provided for the offences for which they have been held guilty and by adopting a balanced approach to meet the ends of justice, we affirm the sentence already imposed by the learned trial court, with modification in sentence that in addition to the fine already imposed, each of the accused appellants shall also deposit compensation to the tune of `1,00,000/- each under section 357 Cr.P.C. within a month from today, failing which it shall be realized by the learned trial court as a fine. The amount so realized shall be released to the next of the kin of deceased Aman Kachroo. To the above extent, the sentence stands modified. We also feel that the life of deceased cannot be compensated in money but at the same time the accused persons should also realize that they have been sufficiently atoned for their misadventure.

56. In view of the above analysis, discussion, in substance Criminal Appeals No.519, 552, 553 of 2010 and Criminal Appeal No.17 of 2011, are dismissed and also Criminal Appeals No.48 and 80 of 2011, preferred by the State under Section 377 and 378 respectively of the Code of Criminal Procedure are also dismissed.

इस फैसले के अनुसार यह दोषी पाये गये और इन्होंने सजा भोगी है। कानून के जानकारों के मुताबिक जब कोई सजा भोग लेता है तब सरकारी नौकरी आदि पाने के उसके सारे अधिकार समाप्त हो जाते हैं। यह लोग भी सजा भोगने के बाद उसी श्रेणी में आ जाते हैं। सरकारी नौकरी पाने का इनका अधिकार प्रश्नित हो जाता है। स्मरणीय है कि जब यह मामला बना था तब इनकी पढ़ाई जारी रखने पर भी सवालिया निशान लग गया था। तब यह राय बनी थी कि अदालत ने इन्हें सजा दी है लेकिन इनके पढ़ाई करने का अवसर दिया गया था। अब यह पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉक्टर बन गये हैं। डॉक्टर होने के कारण ही बतौर डॉक्टर नौकरी दी गयी है। लेकिन इनकी सजा के कारण इनके नौकरी पाने के अधिकार पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना शुरू हो गया है कि इनके सजाभोगी होने के बावजूद इन्हें सरकार ने नौकरी कैसे दे दी? क्या नौकरी देने के समय इनके रिकॉर्ड को नहीं देखा गया? क्या सरकार ने इसमें नियमों में कोई विशेष छूट दी है या नौकरी देने के समय इनका यह रिकॉर्ड प्रशासन के सामने आ ही नहीं पाया है। लेकिन यह नौकरी मिलने के बाद एक नयी बहस अवश्य शुरू हो गयी है।

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