
शिमला/शैल। सुक्खू सरकार ने हमीरपुर स्थित अधीनस्थ कर्मचारी सेवाएं चयन आयोग को भंग कर दिया। यह कदम तब उठाया गया जब जे.ओ.ए.(आई.टी) की परीक्षा का पेपर लीक होने की शिकायत परीक्षा होने से पहले ही एक अभ्यर्थी के माध्यम से विजिलैन्स के पास पहुंच गयी। शिकायत मिलने पर पूरा तन्त्र हरकत में आ गया। परीक्षा रद्द कर दी गयी। कारवाई में कुछ लोगों को गिरफ्तारीयां हुई हैं। इसी कारवाई के बीच यह आशंकाएं उभरी कि कहीं पूर्व में हुई परीक्षाओं में भी ऐसा ही न हुआ हो। इसी आशंका पर आयोग निलंबित कर दिया गया और जांच के लिए एस.आई.टी. का गठन कर दिया गया। सचिव शिक्षा को भी जांच करके रिपोर्ट देने के आदेश दिये गये। यह सूचनाएं सामने आयी की अठारह कोड की परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं। विजिलैन्स की कोई रिपोर्ट अभी तक अधिकारिक रूप से सामने नहीं आयी है। न ही शिक्षा सचिव की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है। लेकिन इन्हीं रिपोर्टों के बीच आयोग को ही भंग कर दिया गया है। आयोग को भंग करने पर मुख्यमंत्री का ब्यान आया है। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया है कि इसमें ऊपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त था। मुख्यमंत्री के ब्यान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मांग की है कि इस भ्रष्टाचार में व्याप्त सबके नाम उजागर किये जायें और उनके खिलाफ कारवाई की जाये। इसी प्रतिक्रिया के साथ जयराम ने यह भी आरोप लगाया है कि यह कारवाई केवल भाजपा द्वारा लगाये गये अध्यक्ष और सदस्यों को हटाने के लिये की गयी है। जयराम की प्रतिक्रिया और आरोपों के परिदृश्य में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार एक तय समय सीमा के भीतर सारे प्रकरण को अदालत पहुंचा कर दोषियों को दण्डित करवाये।
स्मरणीय है कि एक समय प्रदेश में चिट्टों के माध्यम से हर विभाग और सरकारी उपक्रमों में हजारों की संख्या में भर्तीयां होने का मामला सामने आया था। इन भर्तीयों की जांच के लिये हर्ष गुप्ता और अवय शुक्ला दो कमेटियां गठित हुई थी। इन कमेटियों की रिपोर्टां पर प्रदेश उच्च न्यायालय के माध्यम से जांच की मांग की गयी थी। उच्च न्यायालय ने भी रिपोर्टों का कड़ा संज्ञान लेते हुए जांच के आदेश दिये थे। लेकिन आज तक यह सामने नहीं आ पाया है कि इस प्रकरण में कौन-कौन दण्डित हुआ है। इसी परिदृश्य में भविष्य में ऐसा न हो और एक अलग संस्था सरकारी नौकरियों में भर्ती का काम देखे। इस उद्देश्य के लिये हमीरपुर में इस संस्थान का गठन हुआ था। यहां भी पेपर लीक की शिकायतें पहली बार आयी हैं। इन शिकायतों के परिदृश्य में संस्थान को ही भंग कर देने के फैसले को सिर से जुएं निकालने की बजाये सिर को ही काट देने के रूप में देखा जा रहा है। क्योंकि प्रदेश में नौकरियां देने वाला सरकार से बड़ा कोई अदारा नहीं है। इस आयोग के पास इस समय करीब चार हजार भर्तीयां करने की प्रक्रिया विभिन्न स्तरों पर चल रही थी। अब यह काम प्रदेश लोक सेवा आयोग को दिया गया है। लोक सेवा आयोग में 2018 जनवरी में सदस्यों के दो पद सृजित करके एक भर लिया गया था लेकिन आगे चलकर जो जो सदस्य सेवानिवृत्त होते गये उनके स्थान पर नई नियुक्तियां तत्काल नहीं हो पायी और एक समय यह स्थिति बन गयी कि आयोग में एक ही सदस्य रह गया। लेकिन इसी दौरान भर्तीयों को लेकर जो हुआ यदि उस पर नजर डाली जाये तो यह सामने आता है कि 2018 से लेकर 2022 तक भर्तीयों के जितने विज्ञापन जारी हुए हैं उनके मुताबिक करीब दो सौ विज्ञापन जारी हुए हैं। जिनमें 2018 में 18, 2019 में 25, 2020 में 12, 2021 में 62 और 2022 में 64 विज्ञापन जारी हुए हैं। 2022 चुनावी वर्ष था और इसमें 64 विज्ञापन जारी हुए। जबकि 2017 भी चुनावी वर्ष था और उसमें 17 विज्ञापन जारी हुए थे। 2021 और 2022 में जब आयोग में सदस्यों के कुछ पद खाली चल रहे थे तब आयोग में इतने विज्ञापनों की अनुपालना कैसे हो पायी होगी यह विचार का विषय है। कई भर्तीयों की प्रक्रिया तो शायद एक एक वर्ष में भी पूरी नहीं हो पायी है। ऐसे में अधीनस्थ सेवाएं चयन का काम भी अब लोक सेवा आयोग को देना अपने में ही सवाल खड़े कर जाता है। यह आंकड़े आयोग की साइट पर उपलब्ध हैं।
अधीनस्थ सेवाएं चयन आयोग और लोक सेवा आयोग के बाद भर्तीयों का तीसरा बड़ा माध्यम आऊटसोर्सिंग है। आऊटसोर्स कमीशन खाने का एक बड़ा उद्योग बन कर रह गया है। जयराम सरकार के समय रमेश धवाला, होशियार सिंह, राजेंद्र राणा और विक्रमादित्य ने सवाल पूछा था कि तीन वर्षों में सरकारी और प्राइवेट सैक्टर में कितने लोगों को रोजगार मिला है। सरकार ने जवाब में कहा है कि सूचना एकत्रित की जा रही है। मोहनलाल बरागटा, मुकेश अग्निहोत्री और विक्रमादित्य ने सवाल पूछा था कि सरकारी विभागों और उपक्रमों में कितने लोगों को आऊटसोर्स के माध्यम से नौकरी पर रखा गया। इसमें 12165 का आंकड़ा दिया गया और कहा गया कि पिछले वर्ष 3000 लोगों को रखा गया था। इन लोगों के लिये 94 कंपनीयों को 23,09,58,224 रुपए का कमीशन दिया गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि आऊटसोर्स कमीशन खाने का ही माध्यम बनकर रह गया है। फिर आऊटसोर्स कंपनियों को उनके माध्यम से लगे कर्मचारियों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है। कंपनियां किस आधार पर कर्मचारीयों का चयन करती है यह स्पष्ट नहीं है। क्योंकि वह अपने कमीशन तक ही सीमित रहते हैं। इस तरह कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया में सरकार से लेकर आऊटसोर्स तक हर माध्यम की विश्वसनीयता प्रश्नित हो चुकी है। आज जब कर्मचारी चयन आयोग को भंग कर दिया गया है तब यह सवाल बड़ा बन गया है कि एक विश्वसनीय तन्त्र की स्थापना कैसे हो पायेगी? क्योंकि हर सरकार के समय चयन की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। सरकार जांच आदेशित कर देती है जिसका अन्तिम फैसला आते-आते कई सरकारें बदल जाती हैं। इसलिये सुक्खु सरकार को अपनी व्यवस्था परिवर्तन की प्रतिबद्धता पर अमल करने के लिये सिर से जुएं निकालने का प्रयास करना होगा न कि सिर ही काटने का।
शिमला/शैल। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने मण्डी में शिवरात्रि आयोजन के अवसर पर परिधिगृह में आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लेते हुये यह कहा है कि पूर्व सरकार ने शिवधाम और मण्डी हवाई अड्डे के लिये बजट का कोई प्रावधान नही किया था। लेकिन वर्तमान सरकार पूर्व सरकार की सभी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को पूरा करेगी। जनकल्याण से जुड़ी हर परियोजना को पूरा करना हर सरकार की नैतिक जिम्मेदारी होती है। लेकिन यह जिम्मेदारी निभाने के लिये धन का प्रावधान और आवश्यकता की प्राथमिकता देखना भी सरकार का ही दायित्व होता है। मण्डी को छोटी काशी भी कहा जाता है। मण्डी में भूतनाथ मन्दिर से लेकर पंचवक्र महादेव तक कई शिव मन्दिर स्थापित है। माता के भी कई मन्दिर विद्यमान है। इन सारे मन्दिरों की एक जैसी देखभाल भी शायद प्रशासन के लिये कर पाना संभव नहीं है। ऐसे में जिस नगर को छोटी काशी की उपमा हासिल हो वहां पर नगर से कुछ दूर एक पहाड़ी पर भगवान शिव के द्वादिश लिंगों की स्थापना करके एक शिवधाम बसाना और वह भी तब जब प्रदेश कर्ज के सहारे चल रहा हो तो उसके औचित्य तथा सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठेंगे ही।
मण्डी की सांसद और प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा प्रतिभा वीरभद्र सिंह ने भी शिवधाम की आवश्यकता और औचित्य पर एक साक्षात्कार में सवाल उठाये हैं। अब जब मुख्यमंत्री सार्वजनिक मंच से यह खुलासा कर रहे हैं कि शिवधाम परियोजना बिना बजट के ही शुरू कर दी गई थी तो क्या इस पर अब तक हुआ करोड़ों का खर्च भ्रष्टाचार की संज्ञा में नहीं आ जाता है? इसी परियोजना के टैन्डर में यह सामने आ चुका है कि चालीस करोड़ के टैन्डर में केवल बीस हजार रूपये ही ई.एम.डी. के रूप में लिये गये हैं। जबकि सरकार के वित्तीय नियमों के अनुसार यह ई.एम.डी. कम से कम दो प्रतिशत होनी चाहिये थी। चालीस करोड़ की टैन्डर वैल्यू पर यह राशि 80 लाख बनती है। शैल ने जब यह खबर उठाई थी तो जयराम का पूरा प्रशासन शैल की आवाज दबाने के प्रयासों में लग गया था। शैल ने इस ई.एम.डी. को लेकर विजिलैन्स को भी रिकार्ड पर शिकायत की है। विजिलैन्स ने सारे दस्तावेजी प्रमाण देखने के बाद यह मामला पर्यटन निगम को कारवाई के लिये भेज दिया था। लेकिन आज तक इस पर कोई कारवाई न होना कई सवाल खड़े कर देता है।
ऐसे में जब यह परियोजना बिना बजट प्रावधान के शुरू कर दी गयी है और इस पर करोड़ों खर्च हो गये हैं तो निश्चित रूप से यह सीधे भ्रष्टाचार का मामला बनता है। जब प्रदेश के हालात श्रीलंका जैसे होने की संभावना बनी हुई है तब तो ऐसे मामलों की जांच किया जाना और भी आवश्यक हो जाता है। क्योंकि शिवधाम और मण्डी हवाई अड्डे में से हवाई अड्डे को प्राथमिकता देना तो जनहित के दायरे में आ जाता है लेकिन शिवधाम नहीं आता है। बिना बजट के करोड़ों का खर्च कर दिये जाने के लिये क्या संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कारवाई नहीं की जानी चाहिये। क्योंकि अब तो शिवधाम का काम कर रहे ठेकेदार द्वारा भी काम छोड़ दिये जाने की चर्चा है।

शिमला/शैल। सरकारी कर्मचारी अधिकारी पोस्टिंग स्टेशन के दायरे में सिर्फ अपने नाम पर या परिजनो के नाम पर संपत्ति नहीं खरीद सकते हैं। यह आदेश 12.01.1996 को जारी हुये थे। इन आदेशों के साथ ऐसे अधिकारियों/कर्मचारियों की सूची भी जारी हुई थी और सूचना सभी संबद्ध नियन्ता अधिकारियों को भेजी गई थी। इसके बाद 16.8.1997 और 26.06.2012 को भी इन्ही आदेशों को दोहराते हुये निर्देश जारी हुये तथा सूची में कुछ छूट गये वर्गों को भी शामिल किया गया। यह सूचना भी ऐसे सारे संबद्ध अधिकारियों को भेजी गयी। लेकिन सरकार के इन आदेशों में सरकार के सचिवालय और विभागों के निदेशालयों में बैठे अधिकारियों/कर्मचारियों को इस प्रतिबन्ध में शामिल नहीं किया गया था। जबकि नगर निकायों तक के अधिकारी कर्मचारी इसमें शामिल थे। सरकार के इन आदेशों का कर्मचारियों/अधिकारियों पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा था और कुछ कर्मचारी संगठनों ने इस पर नाराजगी भी व्यक्त की थी। इस नाराजगी का संज्ञान लेते हुए सरकार ने 15.02.2016 को इस नीति में संशोधन करते हुए नये सिरे से आदेश जारी करते हुए यह सुविधा दे दी कि सरकार की पूर्व अनुमति से संपत्ति खरीदी जा सकती है। इसमें यह शर्त लगा दी कि ऐसी खरीदी हुई संपत्ति का पंजीकरण अधिकारी/कर्मचारी की उस स्टेशन से ट्रांसफर के दो वर्ष बाद होगा। अब सुक्खू सरकार ने 2016 में मिली सुविधा को वापिस ले लिया है। संपत्ति खरीद पर पुनः रोक लग गयी है। सरकार के इस फैसले को भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि सरकार ने इस संबंध में जारी हुए हर पत्र में यह कहा है कि सरकार के पास उसके आदेशों की अवहेलना की सूचनाएं आ रही हैं। लेकिन आज तक ऐसी अवहेलना के लिये किसी को भी दंडित किये जाने की जानकारी सामने नहीं आयी है। जबकि यह अवहेलना दण्डनीय अपराध घोषित है। ऐसे में अब यह चर्चा चल पड़ी है कि क्या इससे सही में भ्रष्टाचार रुक जायेगा? क्या फील्ड में तैनात कर्मचारी अधिकारी ही भ्रष्टाचार करता है और सचिवालय तथा निदेशालय में बैठे लोग एकदम पाक साफ हैं? यह माना जा रहा है कि जब तक ऐसा प्रतिबंध हर कर्मचारी/अधिकारी पर एक साथ एक जैसा लागू नहीं होगा तब तक इसका कोई अर्थ नहीं होगा। संपत्ति खरीद पर रोक से पहले सरकार को यह विचार करना चाहिये कि एक अधिकारी/कर्मचारी को राजस्व अधिनियम की धारा 118 के तहत जमीन खरीद की कितनी बार अनुमतियां मिलनी चाहिये। क्योंकि सरकार में ऐसे अधिकारी कर्मचारी हैं जिनके पास प्रदेश के कई स्थानों पर संपत्तियां हैं और वह गैर कृषक और गैर हिमाचली हैं।


शिमला/शैल। हिमाचल के हालात श्रीलंका जैसे हो सकते हैं यह आशंका व्यक्त की है मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू ने। मुख्यमंत्री ने यह आशंका व्यक्त करते हुये प्रदेश के कर्ज भार का आंकड़ा 75000 करोड़ और कर्मचारियों के वेतन पैन्शन का बकाया जिसकी अदायगी पूर्व सरकार नहीं कर पायी है वह 11000 करोड़ विरासत में मिलने का भी खुलासा जनता के सामने रखा है। यही नहीं पूर्व सरकार पर वित्तीय कुप्रबंधन का भी गंभीर आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री के इस खुलासे से प्रदेश की राजनीति एक बार फिर गरमा गयी है। पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से लेकर नीचे तक सभी भाजपा नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करते हुये कहा है कि यदि ऐसा होता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी कांग्रेस सरकार की होगी। लेकिन यह प्रतिक्रिया देते हुये प्रदेश की माली हालत और बढ़ते कर्ज पर कोई टिप्पणी नहीं की है। जबकि धर्मशाला में हुये विधानसभा के पहले सत्र में प्रदेश की वित्तीय स्थिति पर हुई खुली चर्चा के बाद पूर्व सरकार पर सबसे ज्यादा कर्ज लेने का तमगा लगा है।
अब मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू की टिप्पणी के बाद पूर्व मुख्यमंत्री शान्ता कुमार और प्रेम कुमार धूमल के ब्यान भी आये हैं। शान्ता कुमार ने दावा किया है कि वह प्रदेश पर शून्य कर्ज छोड़ कर गये हैं। प्रो.धूमल ने भी स्पष्ट कहा है कि उनके कार्यकाल में केवल 6646 करोड़ का कर्ज लिया गया है। स्मरणीय है कि शान्ता कुमार 1977 और फरवरी 1990 में दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। भले ही वह दोनों बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाये हैं। लेकिन वित्तीय अनुशासन के लिये जाने जाते हैं। उन्हीं के कार्यकाल ने जो काम न करें उसे वेतन नहीं की नीति लायी गई थी। धूमल 1998 और फिर 2007 में दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं। अपने पहले ही कार्यकाल में उन्होंने विधानसभा के पटल पर प्रदेश की वित्तीय स्थिति को लेकर श्वेत पत्र रखा था। जो बाद में आये मुख्यमंत्री नहीं रख पाये हैं। अब इन पूर्व मुख्यमंत्रियों के ब्यानों से स्पष्ट हो जाता है कि प्रदेश के इस इतने बड़े कर्ज भार के लिये या तो पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीरभद्र सिंह या फिर भाजपा के जयराम ही इस कर्ज भार के लिये जिम्मेदार है। वीरभद्र सिंह आज मौजूद नहीं है इसलिये उनकी ओर से कोई भी जवाब कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व की ओर से ही आना है। जयराम सरकार इस कर्ज भार पर कुछ कह नहीं पा रही हैं। लेकिन सुक्खू के ब्यान ने कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के भीतर एक चर्चा अवश्य छेड़ दी है।
सुक्खू सरकार को सत्ता संभाले अभी दो माह का ही समय हुआ है। वित्तीय वर्ष का अन्त 31 मार्च को होना है। इसलिये चालू वित्त वर्ष के खर्चे चालू बजट के प्रावधानों से ही पूरे होते हैं। लेकिन सुक्खू सरकार को वर्ष समाप्त होने से पहले ही दिसम्बर, जनवरी और फरवरी में चार हजार करोड़ का कर्ज लेना पड़ गया है। संभव है कि मार्च में भी कर्ज लेना पड़े। सुक्खू सरकार द्वारा यह कर्ज लेने का अर्थ है कि उसे विरासत में सरकारी कोष खाली मिला है। इसी कारण से इस सरकार को डीजल पर वैट बढ़ाना पड़ा है। नगर निगम क्षेत्रों में पानी के दाम बढ़ाने पड़े हैं। अब बिजली के रेट बढ़ाने की बारी आ गयी है। यह एक गंभीर स्थिति है जिसका अर्थ होगा कि अगले वर्ष अन्य सेवाओं की दरों में भी बढ़ौतरी होगी। क्योंकि अब तक आयी कैग रिपोर्ट से स्पष्ट हो जाता है कि केन्द्र द्वारा राज्य को जी.एस.टी. की प्रतिपूर्ति भी कुछ समय से नहीं हो रही है। सौ योजनाओं पर जयराम सरकार एक पैसा भी नहीं खर्च कर पायी है। स्कूलों में बच्चों को वर्दियां नहीं दी जा सकी हैं। कई केन्द्रीय योजनाओं और अन्य के लिये केन्द्र से कोई आर्थिक सहयोग नहीं मिल पाया है यह एक रिपोर्ट का खुलासा है। प्रधानमन्त्री ग्रामीण सड़क योजना में अभी भी दो सौ से अधिक सड़कें अधूरी पड़ी हुई हैं और योजना बन्द हो चुकी है। पूर्व मुख्यमन्त्री के विधानसभा क्षेत्र सिराज में बने हेलीपैड उसी समय कांग्रेस के निशाने पर रह चुके हैं। मुख्यमन्त्री के कार्यकाल में दो मंजिला भवन ओकओवर में लगायी गयी लिफ्ट के औचित्य पर जनता सवाल उठा चुकी है। उप मुख्यमन्त्री मुकेश अग्निहोत्री बतौर नेता प्रतिपक्ष तब प्रदेश की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी किये जाने की मांग कर चुके हैं जो आज कांग्रेस की सरकार आने पर भी जारी नहीं हो सका है।
आज जिस तरह से अदानी प्रकरण सामने आया है और इस पर उठते सवालों से केन्द्र सरकार और प्रधानमन्त्री भाग रहे हैं उसका असर देश की आर्थिक स्थिति पर पड़ना निश्चित है। केन्द्रीय बजट में प्राइवेट क्षेत्र से जिस निवेश की उम्मीद की गयी है उसका लक्ष्य पूरा होना संदिग्ध हो गया है। राज्यों तक इसका सीधा असर पड़ेगा। प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी 2024 के लोकसभा चुनाव के परिदृश्य में सारी बहस का रुख बदलने का प्रयास कर रहे हैं। इसी प्रयास की दिशा में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रदेश की सुक्खू सरकार द्वारा डीजल पर वैट बढ़ाये जाने का तंज कसा है। राजस्थान के मुख्यमन्त्री अशोक गहलोत द्वारा नये वर्ष का बजट पेश करते हुये पिछले ही बजट का वक्तव्य सदन में पढ़ने को भी निशाना बनाया गया है। निश्चित है कि केन्द्र अगले चुनावों के परिदृश्य में गैर भाजपा सरकारों को हर ओर से घेरने और अस्थिर करने का प्रयास करेगा। वित्तीय स्थिति इस संद्धर्भ में सबसे आसान मुद्दा हो जाता है प्रदेश सरकार पर हमला करने का। अभी जिस तर्ज में शान्ता और धूमल के ब्यान आये हैं विश्लेषक इन्हें इसी प्रसंग में देख रहे हैं। बल्कि एकदम एक साथ तेरह राज्यों के राज्यपालों का बदला जाना भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है। वित्तीय स्थिति के परिदृश्य में सुक्खू सरकार के सारे फैसलों पर जनता पैनी नजर रख रही है और इनका आने वाले चुनावों पर असर पड़ना तय है। ऐसे में सुक्खू सरकार शान्ता और धूमल के ब्यानों पर क्या प्रतिक्रिया लेकर आती है इस पर सबकी निगाहें लगी हुई हैं क्योंकि शान्ता काल में भी कुछ ऐसे फैसले हुये हैं जिनका आगे चलकर प्रदेश की आर्थिकी पर निश्चित रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।